ब्रेकिंग न्यूज़ 

संघ एवं शिक्षा : एक वैचारिक विमर्श

संघ एवं शिक्षा : एक वैचारिक विमर्श

पराधीन भारत यद्यपि 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्र हुआ किन्तु ‘देशानुकूल तंत्र’ विकसित करने के प्रयास में अत्यधिक विलम्ब हुआ। राष्ट्र भक्तों को इसकी आवश्यकता स्वतंत्रता प्राप्ति के बहुत पहले से ही महसूस हो रही थी। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 के विजयादशमी के दिन कुछ स्वयंसेवको के सहयोग से नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। संघ का उद्देश्य  प्रारम्भ से ही स्पष्ट रहा है। भारतवर्ष के बारे में ऐसी किंवदंतिया प्रचलित है कि यह सोने की चिड़िया कहलाता था, जहाँ दूध-घी की नदियां बहती थी। विश्व को ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर करने वाला, ‘वसुधैव कुटुंबकम’ एवं ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का पाठ पढ़ाने वाला यह राष्ट्र परतंत्र क्यों हुआ एवं इसे पुनः परम् वैभवशाली किस प्रकार बनाया जा सकता है? संघ ने इस विषय पर चिंतन-मनन एवं कार्य करने का संकल्प लिया एवं इसकी पूर्ति के उद्देश्य से अपनी जीवन यात्रा प्रारंभ की। स्वयंसेवकों के त्याग एवं बलिदान के फलस्वरूप आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। संघ का मुख्य कार्य ऐसे स्वयंसेवकों का निर्माण करना है, जो इस संकल्प को सिद्धि तक ले जांए। इस हेतु शाखाओं के संचालन का कार्य प्रारंभ हुआ।

संघ की मूल आत्मा शाखा में रचती-बसती है, जिसके माध्यम से स्वयंसेवकों का शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास सुनिश्चित होता है। उनमें समाज एवं राष्ट्र के प्रति दायित्व बोध जगाया जाता है। साथ ही जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने हेतु संघ ने कई आनुषंगिक संगठनों की रचना भी की, जो लक्ष्य प्राप्ति हेतु अहर्निश कार्य कर रहे हैं। उन्हीं आनुषंगिक संगठनों में शिक्षा क्षेत्र से सम्बद्ध कई संगठन है, जिनका संकल्प शिक्षा व्यवस्था को इस प्रकार बनाना है कि प्रत्येक शिष्य एकलव्य और प्रत्येक आचार्य चाणक्य के समान हो।

ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था से छेड़खानी की, उसका मूल स्वरूप नष्ट किया। अंग्रेज़ अधिकारी मैकाले ने जब भारत की शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन किया तो पाया कि यहाँ का समाज पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर है। यहाँ की शिक्षा व्यवस्था गुरुकुल पद्धति पर आधारित है। जिसमें विद्यार्थी हस्त, मस्तिष्क और हृदय के मध्य  सामंजस्य के निर्मिति हेतु विद्या अर्जित करते हैं, जीवन जीने की कला सीखते हैं। तात्पर्य है कि उनको हुनरमंद, विवेकशील और संवेदनशील बनाया जाता था। वस्तुतः शिक्षा एवं जीवन में कोई फाँक नहीं था। अतएव मैकाले ने माना कि इस प्रकार  भारतीयों को अधिक दिनों तक गुलाम नहीं बनाया जा सकता। उसने ब्रिटिश सरकार को सुझाया कि भारत की गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था को पूर्णरूपेण  बदलना होगा ताकि यह लोग दिखने में तो भारतीय लगें, किंतु इनका मानस पश्चिमी सभ्यता की चका-चौंध से पूर्णरूपेण प्रभावित हो। इस योजना के तहत गुरुकुल पद्धति को नष्ट किया गया एवं अंग्रेज़ी ढंग की शिक्षा व्यवस्था का बीजारोपण किया गया। देशी जमीन पर विदेशी पौधा जिस प्रकार नहीं टिकता, यदि टिकता है तो भूमि की गुणवत्ता का क्षरण करता है, ठीक उसी प्रकार अंग्रेज़ी ढंग की शिक्षा व्यवस्था ने हमारे जीवन में उथल-पुथल मचाई। सोच को खंडित किया, भेदों को उभारा। अनुशासनहीनता को प्रश्रय दिया। गुणों की बजाय दुर्गुणों एवं व्यसनों को प्रोत्साहित किया। अर्थात हमारी सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट-भ्रष्ट किया।

ब्रिटिश काल में तो शिक्षा की अमूमन यही दशा रही किंतु दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह रही कि स्वतंत्रता के पश्चात भी भारत सरकार ने शिक्षा की इसी अंग्रेज़ी पद्धति को शिरोधार्य किया। अवसर का एक गवाक्ष जो 15 अगस्त, 1947 को खुला था जहाँ हम सही मायने में ‘स्व’-का-तंत्र विकसित कर सकते थे, वहाँ हमारे नीति निर्धारक चूक गये। संघ ने इस समस्या को जाना- परखा और पाया कि यदि भारत की शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं होगी तो अन्य सारे प्रयास व्यर्थ हो जायेंगे।  संघ का मानना है कि भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने हेतु शिक्षा व्यवस्था को भारत केन्द्रित बनाना ही पड़ेगा। अतः समय-समय पर संघ द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में नवोत्थान हेतु  कई आनुषंगिक संगठनों की रचना की गयी। जिनमें से प्रमुख हैं – विद्या भारती, शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, भारतीय शिक्षण मंडल, संस्कृत भारती, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद एवं अखिल भारतीय शैक्षिक महासंघ। इसके इतर विज्ञान भारती एवं इतिहास संकलन समिति भी शिक्षा में सुधार हेतु कार्यरत है। ये सभी संगठन स्वायत्त रूप से बिना संघ के हस्तक्षेप के कार्य करते हुये अपनी शिक्षा व्यवस्था को देश की तासीर के अनुरूप बनाने का भागीरथ प्रयास कर रहे है।

विद्या भारती

भारत में शैक्षणिक क्षेत्र में सबसे बड़ी अशासकीय संस्था विद्या भारती अर्थात विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान है। इसका ध्येय वाक्य ‘सा विद्या या विमुक्तये’ है। 1977 में स्थापित इस संस्था के द्वारा लगभग हजारों से ज्यादा शिक्षा संस्थान कार्य कर रहे हैं। विद्या भारती- शिशुवाटिका, सरस्वती शिशु मंदिर, सरस्वती विद्या मंदिर, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक, संस्कार केंद्र, एकल विद्यालय, पूर्ण एवं अर्द्ध आवासीय विद्यालय के छात्रों को शिक्षा प्रदान कर रही है।

यदि विद्या भारती के दर्शन और लक्ष्य की बात करें तो इसके शैक्षणिक चिंतन की नींव सनातनी जीवन दर्शन पर आधारित है। विद्या भारती से जुड़े शिक्षाविदों का स्पष्ट अभिमत है कि शिक्षा तभी कल्याणकारी होगी जब वह भारतीय जीवन दर्शन पर अधिष्ठित हो। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का केंद्र पश्चिमी मनोविज्ञान है, जो पूर्णतः भौतिकवादी होने के कारण देशहित में नहीं है। अतएव विद्या भारती ने भारतीय मनोविज्ञान के आधार पर ‘सरस्वती पंचपदीय शिक्षण विधि’ –  अधिती, बोध, अभ्यास, प्रयोग और प्रसार को विकसित किया है। इस शिक्षा व्यवस्था से बालकों का शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास सुनिश्चित होता है।

विद्या भारती शिक्षकों के मार्गदर्शन में पैंतालीस लाख छात्र-छात्राएं शिक्षा एवं संस्कार ग्रहण कर रहे हैं। देश के अधिसंख्य ग्रामों एवं वनवासी और पर्वतीय दुर्गम क्षेत्रों में झुग्गी बस्तियों में शिशु वाटिकाएं, शिशु मंदिर, विद्या मंदिर, सरस्वती विद्यालय, उच्चतर शिक्षा संस्थान, शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र और शोध संस्थान कार्यरत हैं। उच्च शिक्षा के भारतीयकरण हेतु विद्या भारती बंगलुरु में चाणक्य विश्वविद्यालय एवं गुवाहाटी में प्राग्ज्योतिष विश्वविद्यालय की स्थापना करने जा रही है।

भारतीय शिक्षण मंडल

देशज शिक्षा व्यवस्था द्वारा राष्ट्रीय पुनरुत्थान के कार्य हेतु भारतीय शिक्षण मण्डल की स्थापना वर्ष 1969 में रामनवमी के दिन हुई। शिक्षण मंडल का ध्येय वाक्य– ‘सा विद्या या विमुक्तये’ है। शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम एवं पद्धति तीनों भारतीय मूल्यों पर आधारित, भारत केन्द्रित तथा भारत हितैषी हो, इस दृष्टि से संगठन वैचारिक, शैक्षिक और व्यावहारिक गतिविधियों का नियमित आयोजन करता है। इस निमित्त शिक्षा मंडल ने अनुसन्धान, प्रबोधन, प्रशिक्षण, प्रकाशन तथा संगठन रूपी पंच-आयामी कार्यप्रणाली विकसित की।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली में बदलाव  हेतु शिक्षारत लोगों के लिए साप्ताहिक ‘मंडल’ तथा विषय-विशेषज्ञों के लिए ‘अध्ययन समूह’ का गठन हुआ है। इसकी गतिविधियां -गुरुकुल प्रकल्प, शालेय प्रकल्प, महिला प्रकल्प, शैक्षिक प्रकोष्ठ, अनुसन्धान प्रकोष्ठ, युवा आयाम, प्रचार व संपर्क विभाग और प्रकाशन विभाग द्वारा संचालित होती है। हाल ही में देश-भर के युवाओं को अपने क्षेत्रीय नदियों  से परिचय हेतु शिक्षण मंडल ने ‘नदी को जानो’ कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें देश भर के युवाओं ने भाग लिया। तत्पश्चात  प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन दर्शन को युवाओं तक पहुँचाने के लिए राष्ट्रव्यापी शोध पत्र लेखन प्रतियोगिता ‘सुभाष-स्वराज-सरकार’ का आयोजन भी किया। शिक्षण मंडल की मांग पर ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम ‘शिक्षा मंत्रालय’ कर दिया गया। शिक्षण मंडल का यह भी मानना है कि मानव ‘रिसोर्स’ नहीं अपितु ‘सोर्स’ है, एवं शिक्षा व्यवस्था का संचालन पूर्णरूपेण शिक्षकों द्वारा ही किया जाना चाहिए।

शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास

भारत में शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र में कार्य करने वाले शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास  की स्थापना 18 मई,2007 को हुयी थी। यह न्यास अपने सहयोगी संगठनों जैसे, शिक्षा बचाओ आन्दोलन समिति के सहयोग से काम करता है। न्यास का लक्ष्य वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की वैकल्पिक व्यवस्था की रूपरेखा बनाना है। इसका मानना है कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण है। व्यक्तित्व के समग्र विकास एवं राष्ट्रप्रेमी नागरिक तैयार करने में शिक्षा की भूमिका अहम है। इसको संज्ञान में लेते हुए न्यास शिक्षा के पाठ्यक्रम, प्रणाली, विधि और नीति को बदलने तथा शिक्षा के ‘भारतीयकरण’ को आवश्यक मानते हुए कार्य कर रहा है। न्यास का स्पष्ट मत है कि हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था विकसित करनी है जो भारतीय आध्यात्मिक मूल्यों से ओतप्रोत हो। जिससे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करते हुए यहाँ के विद्यार्थी राष्ट्र के पुनर्निर्माण के पावन लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो। न्यास का ध्येय वाक्य है  ‘देश को बदलना है, तो शिक्षा को बदलो’, ‘शिक्षा को बदलना है तो अपनी भाषाओं को अपनाना है’ एवं ‘समस्या की नहीं समाधान की बात करें’।

ज्ञानोत्सव न्यास का प्रमुख वार्षिक आयोजन है, यह वैचारिक कुम्भ की तरह आयोजित होता है जिसमें स्कूली एवं उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय दृष्टि से कार्य करने वाले शैक्षणिक संस्थानों एवं शिक्षाविदों को न्यास एक मंच पर लाकर गुणवत्तापरक एवं देशज शिक्षा प्रणाली के नीति-निर्धारण एवं क्रियान्वयन हेतु गंभीर विचार-विमर्श कराता है। भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे वैदिक गणित आदि विषयों के पाठ्यक्रमों की स्थापना हेतु भी न्यास प्रयासरत है।

संस्कृत भारती

सम्पूर्ण विश्व अपनी भाषा पर गर्व करता है। स्वभाषा में रचे गए साहित्य पर इतराता है, उनपर नित-नवीन शोध करता है। दुर्भाग्य यह है कि हम विश्व भाषाओं की जननी, संस्कृत भाषा से दूर होते गए। अंग्रेजों के शासन में इसे पंडितों की रूढ़ि भाषा कहकर उपेक्षित किया गया। गुरुकुलों को नष्ट कर इस भाषा को मुख्य धारा की शिक्षा-दीक्षा से दूर कर दिया गया। कालांतर में संघ से जुड़े मनीषियों ने इस समस्या पर विचार किया और इसकी गंभीरता को समझते हुए इसके निवारण हेतु संस्कृत भारती का गठन किया। इसका ध्येय वाक्य ‘जयतु संस्कृतं, विश्वपोषकम’ है।

संस्कृत भारती का मुख्य लक्ष्य संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार करते हुए पुनः इसे बोलचाल की भाषा के रूप में स्थापित करना है। जिससे लोगों में संस्कृत के माध्यम से संस्कृति के प्रति स्वाभाविक प्रेम जगे। अपने लक्ष्य की प्राप्ति हेतु संस्कृत भारती द्वारा संस्कृत सम्भाषण शिविर आयोजित किये जाते हैं। जिसमें संस्कृत सिखाने के लिए प्रशिक्षित आचार्यों की नियुक्ति की जाती है। साथ ही संस्कृत परिवार योजना, संस्कृत ग्राम योजना के माध्यम से गॉंव और परिवार तक भी संस्कृत भारती ने पहुँच सुनिश्चित की है। बच्चों को खेल-खेल में संस्कृत भाषा सिखाने का एक रोचक प्रकल्प संस्कृत बाल योजना भी संस्कृत भारती चला रही है। आज संस्कृत भारती के ही प्रयासों से कर्नाटक के मत्तूर जिले के गाँव के सभी लोग संस्कृत में वार्तालाप करने लगे हैं। जब भारतवर्ष का बच्चा-बच्चा संस्कृत समझेगा, बोलेगा, पढ़ेगा और लिखेगा, तब देश अपने प्राचीन ज्ञान साहित्य के मंथन से अमृत निकालकर राष्ट्र सेवा में अपना योगदान दे सकने में सक्षम होगा।

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ

वर्ष 1988 में अपनी स्थापना के समय से आज तक अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन हेतु कटिबद्ध है। इसका ध्येय वाक्य – ‘सा विद्या या विमुक्तये’ है। महासंघ का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दलबंदी के बिना राष्ट्र हितैषी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करना है। इसकी स्थापना एक ऐसे दौर में हुई जब शैक्षणिक संगठन किसी न किसी राजनीतिक पार्टी के पिछलग्गू बने हुए थे और देश के भविष्य की कीमत पर अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे थे। तब महासंघ ने घोषणा की – मैं समाज का अंग हूँ, समाज मेरा अंग है। मेरे किसी कृत्य से समाज को हानि न हो। शिक्षा व्यवस्था से जुड़े होने के नाते हमें बृहद स्तर पर समाजोपयोगी होना है। वैसे तो यह संगठन कई विषयों को अपने में समेटे है परंतु इसके तीन आयाम प्रमुख है। पहला, शैक्षिक संगठन होने के नाते शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी सभी समस्याओं का संज्ञान लेते हुए संदर्भित समाधान हेतु प्रयास करना। दूसरा, शिक्षकों में सामाजिक ऋण का बोध करवा कर इस गुरुतर दायित्व के प्रति सचेत करना। शिक्षक और अभिभावकों के बीच खींची दुर्भाग्यपूर्ण खाई को पाटना और तीसरा, शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार-प्रसार। यह महासंघ  राष्ट्र के हित में शिक्षा, शिक्षा के हित में शिक्षक, शिक्षक के हित में समाज जैसे त्रिसूत्रीय सोच से परिचालित हो रहा है।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन है। इसकी स्थापना छात्र हित और छात्रों को मार्गदर्शन देने हेतु की गयी है। इसका घोष वाक्य ज्ञान, शील और एकता है। परिषद के अनुसार, छात्रशक्ति में ही राष्ट्रशक्ति निहित होती है। राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए छात्रों में राष्ट्रवादी चिंतन को जगाना परिषद का मूल उद्देश्य है।

स्थापना काल से ही परिषद ने छात्र हित और राष्ट्र हित से जुड़े प्रश्नों को प्रमुखता से उठाया है एवं समय-समय पर देशव्यापी आंदोलनों का नेतृत्व किया है। आज इस संगठन से जुड़े लोग सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में सक्रिय हैं, तथा अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। परिषद् देशभर के अनेक राज्यों में प्रकल्प चलाती है। इसके इतर निर्धन मेधावी छात्र, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु निजी कोचिंग संस्थानों में नहीं जा सकते उनके लिये स्वामी विवेकानंद नि:शुल्क शिक्षा शिविर का आयोजन किया जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर संगठन की ओर से प्रत्येक वर्ष ‘स्टूडेंट एक्सचेंज फ़ॉर इंटर स्टेट लिविंग’ का आयोजन किया जाता है, जिसके अंतर्गत दूसरे राज्य में रहने वाले छात्र अन्य राज्यों में प्रवास करते हैं, एवं वहां की संस्कृति और रहन-सहन से परिचित होते हैं। नई दिल्ली से हिंदी में प्रकाशित होने वाला ‘राष्ट्रीय छात्रशक्ति’  विद्यार्थी परिषद् का मुखपत्र है, जो शिक्षा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण पत्रिका है।

उपसंहार : संघ के शिक्षा क्षेत्र से जुड़े स्वायत्त आनुषंगिक संगठनों के भगीरथ प्रयत्न से ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का स्वरूप निर्धारित हुआ है। जहाँ पूर्व में राष्ट्र की शिक्षा का केंद्रबिन्दु यूरोप था, अब वह राष्ट्रोन्मुख हो रही है। इस शिक्षा नीति में जन-जन की भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु देश भर में शिक्षा नीति पर चर्चा हुई और प्राप्त सुझावों पर गंभीरता पूर्वक विचार करते हुए उन्हें शिक्षा नीति में स्थान दिया गया। इन संगठनों के प्रयास से ही मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय किया गया है। भारत में शिक्षा भारतीय मूल्यों पर आधारित हो इसके लिए भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने का जो प्रस्ताव संघ के आनुषंगिक संगठनों ने रखा था उसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्वीकार किया गया। हाल ही में मध्यप्रदेश में चिकित्सा-विज्ञान की पढ़ाई भारतीय भाषा में होनी प्रारंभ हुई है। यह निश्चय ही क्षेत्रीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने वाला विषय है, जो एनईपी का मूल मंतव्य भी है।

साथ ही शिक्षा के स्वायत्त होने, समाज पोषित होने के विचार को भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया गया है। शिक्षकों को नीति निर्धारण प्रक्रिया में सम्मिलित करने से उनके मान-सम्मान एवं आत्म-विश्वास में भी अभिवृद्धि हुई है। उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों के हित में पाठ्यक्रमों में लचीलापन लाया गया एवं बहुविषयीय, कौशल आधारित, अनुभवयुक्त, आनंदकारी, सीखने की प्रवधि पर जोर देने वाली, परिणाम आधारित लक्ष्यों को सुनश्चित करने वाली एवं मानव का सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास करने वाली शिक्षा व्यवस्था का प्रावधान है। मल्टीपल एंट्री-एग्जिट का विकल्प भी इस शिक्षा नीति में जोड़ा गया है। शोध के विषय ऐसे हों जिनका परिणाम सीधे समाज एवं देश हित में हो। यह शिक्षा नीति युवाओं के बौध्दिक, आर्थिक, सामाजिक विकास को सुनिश्चित करने एवं राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को जीवंत रखने में सक्षम है।

21वीं सदी में भारतवर्ष दुनिया का सबसे युवा देश है। ‘युवा’ शब्द को उल्टा करने से ‘वायु’ बनता है। इस वायु को यदि सही दिशा और मार्गदर्शन मिल जाये तो यह सकारात्मक ऊर्जा पैदा करती है, यदि दिशा भटक जाए, स्वच्छंद हो जाये, तो तूफान लाकर तबाही मचाती है। ‘परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रम्’ की मंगलकामना से प्राणवायु प्राप्त करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बंधित शैक्षिक समूह के संगठनों ने यह दायित्व स्वीकारा है कि इस ‘वायु रूपी युवा’ को सही दशा और दिशा देनी है, जिससे उनमें राष्ट्रीयता एवं मातृभूमि के प्रति प्रेम तथा समर्पण की भावना जागृत हो, वे हमारे सनातनी सांस्कृतिक वैभव को अक्षुण्ण बनाये रखें एवं अर्जित सकारात्मक ऊर्जा से भारत को पुनः विश्वगुरु बनाते हुए वैश्विक नेतृत्व में सक्षम बनाये।

 

 

राघवेंद्र प्रसाद तिवारी
(कुलपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा)

Leave a Reply

Your email address will not be published.