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कांग्रेस के मायाजाल में खड्गे

कांग्रेस के मायाजाल में खड्गे

 

कर्नाटक के कद्दावर नेता मल्लिकार्जुन खड्गे  कांग्रेस के अध्‍यक्ष बन गये हैं और इसी के साथ एक बार फिर पार्टी की कमान सदिच्छा से गैर गांधी परिवार को मिल गई है। खड्गे के लिये जीवन की यह एक बडी जिम्‍मेदारी है जिसकी शुरूआत उनके बड़े फैसले के साथ हुई है। उन्‍होंने कांग्रेस कार्य समिति  की जगह एक दूसरी कमेटी का गठन कर दिया गया है जिसमे  पार्टी 47 नामचीन नेताओं को  जगह दी गई है। वरिष्‍ठ नेता  सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह, ए के एंटनी उसमें शामिल  हैं।

अब तक कांग्रेस में हर बड़ा फैसला कांग्रेस  कार्य समिति (सीडब्‍लूसी) लेती थी और उसके  कुल 23 सदस्य होते थे लेकिन  मल्लिकार्जुन खड़गे ने उसे खत्म कर दिया है। उसकी जगह उन्होंने एक नई समिति दी है जिसमें 47 सदस्यों को जगह दी गई है जो  बड़े फैसले लेगी। खड़गे ने कांग्रेस के संविधान को ध्यान में रखते हुए ही इस नई समिति का गठन किया है। कांग्रेस के संविधान के अनुच्‍छेद 15 (बी) के तहत इस संचालन समिति (स्टीयरिंग कमेटी) का गठन किया गया है जो अब कांग्रेस कार्य समिति की जगह काम करेगी।

इस समिति में  कई और बड़े चेहरों को जगह दी गई है जिसमे  अभिषेक मनु सिंघवी, आनंद शर्मा, रणदीप सुरजेवाला, अजय माकन, दिग्विजय सिंह, अंबिका सोनी, हरीश रावत, जयराम रमेश,केसी वेणुगोपाल, मीरा कुमार, पीएल पुणिया, प्रमोद तिवारी, सलमान खुर्शीद, राजीव शुक्ला को भी शामिल किया गया है।  इस समिति में वरिष्‍ठ नेता शशि थरूर को स्‍थान नही मिला जिन्‍होंने कांग्रेस अध्‍यक्ष के चुनाव में खड्गे को चुनौती दी थी।  उनके नाम की चर्चा थी लेकिन उन्हें शामिल किया जाएगा या नहीं, इस पर अलग-अलग राय थी।

खड्गेे ने जिस दौर में कांग्रेस की कमान संभाली है वह कठिन है। उनसे बहुत अपेक्षायें की जा रही हैं जो स्‍वाभाविक और न्‍यायसंगत नही है। कांग्रेसजनों की उम्‍मीद है कि खड्गेे पार्टी को मजबूत करने में सफल रहेंगे क्‍योंकि इस समय वह जिस मुकाम पर है वहां से उसके आगे बढने के आसार हैं। एक बार फिर देश में एक मजबूत विपक्ष की जरूरत महसूस की जा रही है जिसकी बडी वजह है कि क्षेत्रीय दल राष्‍ट्रीय हित के मुद्दों को लेकर ज्‍यादा उत्‍साहित नही दिखते हैं। अभी भी कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी के बाद सबसे बड़ा राष्‍ट्रीय  दल है और उसका राजनीतिक सफर देश में अपनी पहचान रखता है।

खड्गेे के लिये कांग्रेस की विरासत फायदेमद साबित हो सकती है लेकिन यह सब इसपर निर्भर करेगा कि उन्‍हें अपने निर्णय खुद लेने की कितनी आजादी मिलेगी। कांग्रेस कार्य समिति की जगह संचालन समिति के गठन के निर्णय को पार्टी में लोकतांत्रिक मूल्‍यों की स्‍थापना की एक ईमानदार पहल के रूप में देखा जा सकता है। दरअसल खड्गेे के लिये सबसे बडी चुनौती यह है कि वह कैसे पार्टी को गांधी परिवार के प्रभुत्‍व मुक्‍त कराते हैं या यह प्रस्‍तुत करने में कामयाब रहते हैं कि संगठन अपने निर्णय खुद ले रहा है और गांधी परिवार दखल नही बल्कि सलाह दे रहा है। कांग्रेस की पूर्व अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने पार्टीजनों को भरोसा दिलाया है कि वे खड्गेे के कामकाज में दखल नही देंगे लेकिन यह देखना होगा कि कथनी और करनी में कितनी ईमानदारी झलकती है।

कांग्रेस के लिये तत्‍काल सबसे बड़ी चुनौती है कि वह गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में कैसा प्रदर्शन करती है। हिमाचल में पार्टी उम्‍मीदवारों के नाम तय हो चुके हैं और भाजपा की तरह उसे असंतुष्‍टों के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा है। कांगेस की स्‍टार प्रचारक प्रियंका गांधी वाड्रा हिमाचल में चुनावी रैलियां कर रही हैं और बेरोजगारी के साथ स्‍थानीय मुद्दों को उठा रही हैं। दीगर बात यह भी है कि प्रियंका अपनी दादी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का नाम भुनाने में लगी हैं। उन्‍होंने भावनात्‍मक रूप से हिमाचलवासियों को कांग्रेस से एक बार फिर जोड़ने के लिये कहा है कि इंदिराजी की अस्थियां हिमाचल में बिखरी हुई हैं।

हिमाचल में इस महीने चुनाव होने हैं और अभी तक सत्‍ता की राजनीति हर बार कांग्रेस और भाजपा की अदला-बदली से रही है। इस हिसाब से कांग्रेस को अपनी जीत का सेहरा बंधने की उम्‍मीद है लेकिन वह उत्‍तराखंड के पिछले विधानसभा चुनावों के नतीजों को लेकर सशंकित है जहां पहली दफा भाजपा सत्‍ता बचाये रहने में कामयाब रही है। दरअसल भाजपा का डबल इंजन सरकार का नारा प्रतिद्वंदी दलों पर हावी होता जा रहा है। उत्‍तर प्रदेश में आदित्‍यनाथ योगी सरकार की वापसी में भी यह नारा भाजपा के लिये फायदेमंद रहा था।

खड्गेे अनुभवी नेता हैं और कांग्रेस के सकारात्‍मक और नकारात्‍मक पहलुओं से भलीभांति वाकिफ है। वह जानते हैं कि गांधी परिवार न केवल ताकतवर है बल्कि कांग्रेस को अभी तक बचाये रखने में उसकी भूमिका को खारिज नही किया जा सकता। उनकी पूरी कोशिश रहेगी कि गांधी परिवार से मदभेद न हो और किसी मुद्दे पर हो भी तो वह सार्वजनिक न होने पाये। उनके लिये गांधी परिवार एक दुधारी तलवार है इसलिये हर बडे फैसले लेने के लिये उन्‍हें इस परिवार के साथ संतुलन बनाये रखना होगा। निश्चित तौर पर यह एक कठिन समीकरण है, सत्‍ता के दो केंद्र का खतरा है। इतना ही नही अगर गांधी परिवार में आपस में ही किसी एक मुद्दे पर मतभेद पैदा होता है तो खड्गेे के लिये अग्निपरीक्षा सबब बन सकता है। राहुल गांधी खड्गेे के अध्‍यक्ष बनने से पहले ही भारत जोडो पर निकल गये थे। राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि इस अभियान से कांग्रेस को फायदा हो रहा है। यह अलग बात है कि कितना फायदा होगा, क्‍या कांग्रेस का बेडा पार लग जायेगा। खड्गेे यह भी जानते हैं कि राहुल गांधी इस यात्रा से अपने कद को बढा रहे हैं और उन्‍हें कभी ऐसा नहीं लगे कि उनके अभियान को पार्टी से सहयोग में कमी रखी जा रही है।

गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का अच्‍छा प्रदर्शन रहा था और भाजपा को कडी देने में काफी हद तक सफल रही थी। पिछली बार इस प्रदर्शन का सेहरा राहुल गांधी के सिर बंधा था लेकिन इस बार खड्गेे के लिये चुनौती है और देखना होगा कि वह किस तरह वहां पारंपरिक आदिवासी वोट बैंक को बचाये रख पाते हैं। दरअसल इस बार भाजपा ही नही बल्कि आम आदमी पार्टी भी इस वोटबैंक पर नजरें गडाये बैठी है। दोनो दलों ने जोडतोड कर ली है और नये राजनीतिक समीकरण कुछ ऐसे बने हैं कि हिमाचल की तरह गुजरात में भी चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले की बिसात पहले से ही बिछ चुकी है।

हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनाव के बीच खड्गेे  के सामने कई और बड़ी चुनौतियां हैं जिनमे सबसे बड़ी चुनौती के रूप में राजस्थान की राजनीतिक हलचल को देखा जा रहा है।  कयास लग रहे थे कि अध्यक्ष बनते ही खड्गेे राजस्थान को लेकर कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि फिलहाल वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाने जा रहे हैं। इसकी एक बडी वजह की पिछली दफा राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री अशोक गहलोत गुजरात के चुनाव प्रभारी थे और पार्टी के बेहतर प्रदर्शन की खातिर उनकी सराहना हुई थी। वह अभी गुजरात का चुनावी दौरा करके आये हैं और इस बार भी वहां पर पूरी तरह सक्रिय दिखे।

ताजा राजनीतिक घटनाक्रम के मद्देनजर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं जिसमें सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अशोक गहलोत  की कुर्सी पर से खतरा टल गया है।  दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव से पहले जयपुर में जो कुछ हुआ था उसके बाद अटकलें लगाई जा रही थीं कि अध्यक्ष बनते ही खड्गेे कोई बड़ा फैसला लेंगे। अब इन अटकलों पर फिलहाल विराम लग गया है और माना जा रहा है कि खड्गेे गहलोत को हटाने के पक्ष में नहीं हैं।

दरअसल अशोक गहलोत कांग्रेस अध्‍यक्ष पद के लिये गांधी परिवार के उम्‍मीदवार बन गये थे लेकिन ऐन वक्‍त पर उनके करीबियों ने विधायक दल की बैठक से पहले बगावत कर दी। वजह साफ थी वह सचिन पायलट के नेतृत्‍व में काम करने को तैयार नही थे। पिछले कुछ सालों के दौरान गहलोत और पायलट की भिड़ंत कांग्रेस के लिए मुसीबत बनी हुई है और नया मोड़ तब आया था जब गहलोत के समर्थन में  राजस्थान कांग्रेस के लगभग 100 विधायक पार्टी नेतृत्व के खिलाफ उतर आए थे। तब सोनिया गांधी ने भी अपनी नाराजगी जताई थी।

हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव को देखते हुए यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया था लेकिन पिछले दिनों सचिन पायलट जब खड्गेे से मिले तो गहलोत की कुर्सी को लेकर अटकलें लगीं। फिलहाल खड्गेे हिमाचल प्रदेश और गुजरात पर अपना ध्‍यान केंद्रित कर रहे हैं। इसके अलावा पदाधिकारियों नई टीम का गठन उनके लिये एक और बड़ी चुनौती है। बतौर अध्‍यक्ष उनका हनीमून का दौर कितने दिन रहता है यह तो वक्‍त बतायेगा लेकिन यह तो तय है कि उनकी राहें आसान नही रहनेवाली हैं।

 

 

अशोक उपाध्‍याय

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