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‘ड्रेगन’ से सबसे बड़ी साइबर चुनौती

‘ड्रेगन’ से सबसे बड़ी साइबर चुनौती

किसी ने कहा है कि मनुष्य इतिहास से यह सीखता है कि मनुष्य इतिहास से कुछ नहीं सीखता। यह बात कम-से-कम हमारे देश पर तो सोलह आने लागू होती है। 1962 में पहला भारत-चीन युद्ध हुआ था। तब भारत की युद्ध लडऩे की सामान्य तैयारी भी नहीं थी। हमारे सैनिकों के पास न तो पर्याप्त हथियार थे न गोला बारूद। यदि दूसरा युद्ध होता है, तो हालात बहुत अलग नहीं होंगे। हालांकि दूसरा युद्ध साइबर कुरूक्षेत्र में लड़ा जाएगा। चीन को अपनी सेना हिमालय की वादियों में नहीं भेजनी पड़ेगी केवल अपने साइबर योद्धाओं को कहना भर पड़ेगा कि अपने एयर कंडीशन ऑफिसों से भारत के सुरक्षा संरचना को बंधित कर दो और 1962 की तरह ही हम कुछ नहीं कर पाएंगे क्योंकि, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अनुमान के अनुसार चीन के पास 1.25 लाख साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ हैं। जो भारत की साइबर सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा हैं। भारत इस मामले में चीन से किस कदर कमजोर है इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि भारत के पास हजार साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ भी नहीं हैं। हालांकि भारत सूचना तकनीक के मामले में महाशक्ति नहीं है मगर एक प्रमुख शक्ति तो है ही। यदि हम चीन से तुलना करें तो कहा जासकता है कि हमारी ताकत ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर हैं।

चीन और भारत की साइबर सुरक्षा की तैयारी में जमीन आसमान का फर्क है। सूचना तकनीक के मामले में भारत की काफी प्रतिष्ठा है। हमारे यहां 24 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं। हमारे सरकारी कामकाज, अर्थव्यवस्था और रोजमर्रा के औद्योगिक कामकाज डिजिटलाइज्ड है। लेकिन हम अपने डीजिटलाइज्ड प्लान की सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। हम कई देशों को साइबर वर्कफोर्स निर्यात करने वाले देश होने के बावजूद अपनी बैंडविड्थ की सुरक्षा और अपने यहां होने वाले साइबर अपराधों को खोजने में नाकाम रहते हैं। दूसरी तरफ चीन 64 करोड़ इंटरनेट यूजर्स की विशाल संख्या वाला देश है, जिसके पास साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों की विशाल फौज है, इंटरनेट पर सरकार का नियंत्रण है और वह अपने प्रतिद्वंदियों का मुकाबला करने के लिए बड़ी संख्या में हैकर्स तैनात करता है। चीन ने बहुत पहले ही साइबर सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम कर लिया था क्योंकि उसके खिलाफ लगातार साइबर जासूसी और साइबर हमले होते रहते थे। साइबर सुरक्षा के बारे में चीन की सोच यह है कि साइबर हमलों का सबसे बड़ा शिकार होने के कारण चीन का मानना है कि ‘इस तरह के हमलों में केवल बचाव से काम नहीं चलता। हमले करना सबसे अच्छा बचाव होता है।’ इस पर वह हमेशा अमल भी करता रहता है।

यूं तो सभी देश एक-दूसरे के साइबर नेटवर्क में ताक-झांक, तोड़-फोड़ करते रहते हैं। यही कारण है कि कुछ वर्षों पहले भारत सरकार ने अपने विभागों को साइबर सुरक्षा के बारे में कुछ निर्देश जारी किए थे। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों का अनुभव बताता है कि हमें सबसे ज्यादा खतरा चीन से है। चीन भारत के खिलाफ शीतयुद्ध चला रहा है। वह भारत पर साइबर हमले कर रहा और भारत उनका निरीह शिकार बना हुआ है। इस कारण सामरिक हल्कों में यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि कभी चीन और भारत के बीच साइबर जंग छिड़ी तो क्या भारत चीन के सामने टिक पाएगा या साइबर युद्ध में भी 1962 का इतिहास दोहाराया जाएगा।

कुछ वर्ष पहले रक्षामंत्री ए.के एंटनी, वायु सेनाध्यक्ष, नौसेनाध्यक्ष, और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने भारत पर मंडराते साइबर हमले के खतरे के बारे में आगाह किया था। राष्ट्रीय सुरक्षा के कर्णधारों की यह चेतावनियां सुनकर आमतौर पर यही लगता था कि हमारा नेतृत्व साइबर सुरक्षा को लेकर भी कितना सजग है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय साइबर परिदृश्य पर पैनी नजर रखने वाले कुछ लोगों का कहना है- पिछले कुछ वर्षों का साइबर घटनाक्रम हमें बताता है कि हम एक-बार फिर चूक गए हैं। हमारे सैनिक और सामरिक तंत्र को यह समझने में दस साल लग गए कि हम पर चीन साइबर हमले कर रहा है। एक और शर्मनाक बात यह है कि आईटी पावर होने का दंभ भरने वाले हमारे देश को साइबर हमलों की जानकारी मिली कनाडा और अमेरिका के साइबर शोधकर्ताओं से। तब कहीं जाकर हमारी नींद खुली।

भारतीय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा जब चीन की यात्रा पर गए हुए थे तब वे वहां एक समारोह में कह रहे थे कि भारत और चीन को एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी मानना छोड़ देना चाहिए। तभी कनाडा के कुछ साइबर अनुसंधानकर्ताओं ने चीन के एक साइबर हमलावर अभियान का सबूतों के साथ पर्दाफाश किया जिसके तहत चीन लगातार भारत के सुरक्षा, सैनिक और राजनयिक संस्थानों सहित तमाम सरकारी संस्थानों की महत्वपूर्ण गोपनीय जानकारी कंप्यूटर नेटवक को भेदकर हासिल कर चुका था। इस एजेंसी के मुताबिक चीनी हैकर भारत के अमेरिका, काबुल और मॉस्को स्थित दूतावासों के कंप्यूटर नेटवर्कों, देश की नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सेक्रेटरिएट, मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज, मिलिट्री एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन, डिफेंस थिंक टैंक और प्रकाशनों के नेटवर्कों में झांकने और महत्वपूर्ण जानकारी हासिल करने में कामयाब रहे। वे प्रधानमंत्री निवास से कुछ दूरी पर स्थित रेसकोर्स रोड पर वायुसेना स्टेशन के कंप्यूटर नेटवर्क में सेंध लगाने में सफल रहे।

यह पहला मौका नहीं था जब चीन द्वारा भारत के अति संवेदनशील कंप्यूटर नेटवर्क को हैक किए जाने की जानकारी सामने आई थी। कुछ समय पहले तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नारायणन ने सनसनीखेज खुलासा किया था कि चीन भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय के कंप्यूटर नेटवर्क को हैक करने की कोशिश कर चुका है। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है कि चीन का भारत के खिलाफ साइबर युद्ध जारी है।

15-08-2015

साइबर युद्ध एक ऐसा युद्ध होता है, जो इंटरनेट और कंप्यूटरों के सहारे से लड़ा जाता है। तकनीकी तरीकों से हमले किए जाते हैं और तकनीकी तरीके से ही बचाव किया जाता है। ऐसे कुछ हमलों में एकदम पारंपरिक विधियां भी प्रयोग की जाती है जैसे कंप्यूटर से जासूसी आदि। एक कुशल साइबर योद्धा दुश्मन देश की विद्युत ग्रिडों में हैकिंग के द्वारा सेंध लगाकर गोपनीय सैन्य और अन्य जानकारियां हासिल कर सकता है। इन हमलों में वायरस की सहायता से वेबसाइटें ठप्प कर दी जाती हैं। इस तरह के युद्ध में तकनीकी उपकरणों और नेटवर्कों को भारी नुक्सान पहुंचता है। इसलिए साइबर हमलों से सुरक्षा के लिए कई देशों ने जिनमें चीन शामिल है हजारों की संख्या में साइबर पुलिस तैनात की है।

कुछ अर्से पहले लंदन के अंतर्राष्ट्रीय सामरिक अध्ययन संस्थान ने आगाह किया था कि साइबर युद्ध के जरिये न केवल देश के आर्थिक ढांचे को पंगु किया जा सकता है वरन उसके गुप्त सामरिक केंद्रों में भी सेंध लगाई जा सकती है। वित्तीय लेनदेन और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में गड़बड़ी फैलाई जा सकती है। साइबर हमलों में अंतरिक्ष आधारित निगरानी प्रणालियों और संचार प्रणलियों को भी निशाना बनाया जा सकता है। अभी दुनिया के कुछ ही देशों के पास इन हमलों को समझ पाने की क्षमता है। जैसे-जैसे हमारे संवेदनशील और महत्वपूर्ण सिस्टम नेटवर्क से जुड़ रहे हैं इन पर हमलों का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। कुछ देश उन्नत तकनीकी ज्ञान को साइबर युद्ध कला की ओर मोड़ रहे हैं

चीन के भारत के खिलाफ बढ़ते साइबर हमले हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। भारत पर साइबर वर्चस्व बनाए रखने की आकांक्षा से प्रेरित होकर पिछले कुछ वर्षों में चीनी हैकर भारत की महत्वपूर्ण सरकारी और प्राइवेट कंप्यूटर नेटवर्कों और वेबसाइटों पर रोजाना हमले कर रहे हैं। अक्टूबर 2007 में चीन के हैकरों ने 143 भारतीय वेबसाइटों को अपना निशाना बनाया। अप्रैल 2008 में भारतीय खुफिया एजेंसियों ने पता लगाया कि चीनी हैकरों ने भारतीय विदेश मंत्रालय के कंप्यूटर नेटवर्क में सेंध लगाने में सफलता हासिल की। इस घटना ने सरकार को अपने सुरक्षा उपायों को मजबूत बनाने के लिए नई रणनीति ईजाद करने पर मजबूर कर दिया। हालांकि खुफिया एजेंसियां हैकरों की शिनाख्त कर पाने में नाकाम रही, लेकिन हैकरों ने जो आईपी-ऐड्रेस छोड़े उनसे यही संकेत मिलता है कि हमले में चीन का हाथ था।

कनाडा के साइबर शोधकर्ताओं की एक टीम ने अप्रैल 2010 में ‘शैडो इन द क्लाउड’ शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें विस्तृत जांच के जारिए भारत के व्यापारिक, राजनयिक, सामरिक और अकादमिक हितों को निशाना बनाने के लिए चीन से संचालित स्पाइ नेटवर्क को बेनकाब किया गया था। रिपोर्ट में कहा गया था- ‘मुख्यरूप से भारत केंद्रीत साइबर वॉरफेयर सिस्टम को ‘सन ऑफ घोस्टनेट’ कहा जाता है। चीन स्थित इस साइबर गुप्तचरी के शिकार बनने वाले भारतीय कंप्यूटर नेटवर्कों की संख्या चौका देनेवाली है। अमेरिका, काबुल, मॉस्को, दुबई, अबुजा, सर्बिया, बेल्जियम, जर्मनी, साइप्रस, ब्रिटेन और जिम्बाब्वे के भारतीय दूतावासों के कंप्यूटर नेटवर्क इसका निशाना बने हैं।’ असल में भारत के सैनिक इंजीनियरिंग सर्विस के नेटवर्क को भी टेप किया गया। घोस्टनेट ने केवल सैनिक और राजनयिक ऑपरेशनों को ही नहीं, बल्कि इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्ट्डीज एंड एनालाइसिस जैसे थिंक टैंकों और स्ट्रेटेजिक और फोर्स जैसे सामरिक प्रकाशनों, डीएलएफ और टाटा जैसी कंपनियों के नेटवर्कों को भी हैक किया। भारत सरकार चीन की इन साइबर गुप्तचर गतिविधियों को चुपचाप और उफ किए बगैर सह रही है। दूसरी तरफ चीन ने पिछले ढाई-तीन वर्षों में अपने साइबर हमले तेज किए हैं। कुछ साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि यह रिपोर्ट आइसबर्ग की नोंक जितनी है। चीन को इन साइबर हमलों से न केवल इन संस्थाओं के खातों की जानकारी मिल जाती है बल्कि वह युद्ध की स्थिति में इन साइटों को निष्क्रिय बनाने के तरीके खोज रहा है।

चीन द्वारा साइबर हमले की इन सब घटनाओं के मद्देनजर यह मानना पड़ेगा कि चीन की साइबर चुनौती वास्तविक और बेहद गंभीर है। चीन बड़ी तेजी से दुनिया की सबसे बड़ी सैनिक और आर्थिक महाशक्ति बन चुका है। इसलिए वह हर क्षेत्र में अपना वर्चस्व कायम करना चाहता है। इस दृष्टि से नवीनतम सूचना तकनीक से जन्मा साइबर स्फेयर भी उसके लिए अतिशय महत्वपूर्ण है। खाड़ी युद्ध में अमेरिका के सूचना तकनीक से संचालित अधुनिक युद्ध प्रणालियों का जलवा-जलाल देखने के बाद ‘चीनी सेना ने भी सूचना तकनीक के जरिए अपना आधुनिकीकरण करना शुरू किया जिसका मतलब था सूचना तकनीक और साइबर स्फेयर में वर्चस्व कायम करना।

1999 में कर्नल क्वोओ लियांग और वांग हियांग्सु ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक -अनरिस्टीकटेड वॉरफेयर-में कहा गया है- ‘तकनीकी प्रगति ने हमें बाकी चीजों को नुकसान पहुंचाए बगैर सीधे दुश्मन के नर्व सेंटर पर वार करके विजयी होने के साधन दिए हैं।’ इस कारण लोगों को यह लगने लगा है कि विजय पाने का सबसे अच्छा तरीका है नियंत्रण करें न कि मारे। वे युद्ध की इस आधुनिक पद्धति को ‘असीमित’। युद्ध पद्धति कहते हैं यानी हथियार और तकनीक कई प्रकार की है। युद्धस्थल हर तरफ है और वहां युद्धकाल और शांतिकाल की सीमाएं नहीं है। युद्धस्थल आपके सामने है और दुश्मन नेटवर्क में है। सूचना युद्ध वह युद्ध है जहां कंप्यूटर का उपयोग सूचनाएं हासिल करने और सूचनाएं नष्ट करने के लिए किया जाता है।

इस सैद्धांतिक सैनिक दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप देने के लिए नौवे दशक के मध्य से चीन की सेना के कई प्रशिक्षण केन्द्रों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है और चीन का लक्ष्य 2050 तक सूचना और साइबर युद्ध में जीत हासिल करने की क्षमता अर्जित करना है।

पिछले दो दशकों की तैयारी के बाद चीन साइबर युद्ध क्षमता में कितना ताकतवर बन गया है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिकी और यूरोपीय देशों के कंप्यूटर नेटवर्कों पर साइबर हमले करता रहता है। कुछ वर्ष पहले अमेरिका से प्रकाशित फाइनेंशियल टाइम्स में रिपोर्ट छपी थी कि चीन ने अपने एक सफल साइबर हमले में अमेरिकी सुरक्षा विभाग पेंटागन के कंप्यूटर नेटवर्क को हैक करने में सफलता प्राप्त की। 2008 में यूएस-चायना इकोनॉमिक एंड सिक्योरिटी रिव्यू कमीशन’ ने अमेरिकी कांग्रेस को दी अपनी रिपोर्ट में कहा है- ‘चीन बहुत आक्रामक तरीके से अपने साइबर युद्ध की क्षमता बढ़ा रहा है, जिससे वह अमेरिका के मुकाबले लाभ की स्थिति में है।’

जब भी चीन द्वारा साइबर हमले या हैकिंग की खबरें आती हैं चीन सरकार इनका खंडऩ करते हुए कहती है कि इन हमलों से सरकार का कोई लेना-देना नहीं है। वैसे तो भारत सहित सभी देश एक दूसरे के कंप्यूटर नेटवर्क में ताक-झांक करते रहते हैं पर चीन ने इस मामले में खास महारत हासिल कर रखी है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि चीन हैकिंग के अंडरवल्र्ड का डॉन है और इस कारण दुनिया भर में बदनाम है। रूस और पूर्वी यूरोप की तरह हैकिंग वहां भारी मुनाफा देनेवाला राष्ट्रीय खेल बन चुका है। वहां हैकर्स सम्मेलन होते हैं, हैकर्स ट्रेनिंग अकादमियां, और हैकर्स डिफेंस और हैकर्स एक्स फाइल जैसी मैगजीनें हैं जो कंप्यूटर नेटवर्क को भेदने और ट्रोजनहोर्स और ट्रेपडोअर जैसी हैकिंग तकनीकों की विस्तृत जानकारी देती हैं। इसके अलावा हैकर्स पैनीट्रेशन मेनुअल जैसी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं।

साइबर हमलों के बारे में चीन सरकार की सफाइ से बाकी देश संतुष्ट नहीं हैं। उनका मानना है कि चीन सर्व सत्तावादी देश है। वहां कोई काम सरकार की रजामंदी के बगैर नहीं हो सकता। सामरिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी कहते हैं- ‘चीनी हैकर चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की अनियमित सेना है। युद्ध में यह हरावल दस्ता बनेगी। परंपरागत सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी भारत का मुकाबला करेगी। साइबर योद्धाओं द्वारा दुश्मन की रक्षा क्षमता को भारी नुक्सान पहुंचाने के बाद पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) युद्ध करेगी। साइबर युद्ध कला और सीमा पार का आतंकवाद असीमित युद्ध पद्धति के दो मोर्चे है।’ दोनों में सरकार द्वारा दूसरे देशों पर हमलों के लिए गैर सरकारी या अनियमित लोगों को इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह के हमले करनेवाला देश उनके इशारे पर हुए हमलों से मुकर जाते हैं। ये खबरें और टिप्पणियां इस बात का संकेत हैं कि चीन, भारत के खिलाफ भी धीमी रफ्तार में साइबर युद्ध चला रहा है, जो कभी भी तेज हो सकता है । इससे जानमाल का नुकसान न भी हो मगर उससे वह सुरक्षा और तकनीकी तंत्र की नब्ज को ठप्प कर सकते हैं या उसे अपूर्णिय क्षति पहुंचा सकते हैं। भारत भले ही अपने को आईटी पावर मानता हो, लेकिन यदि उसे चीन के साइबर युद्ध से अपना बचाव करना है तो उसे चीन की तरह आईटी सुपर पावर बनना होगा ताकि ईंट का जवाब पत्थर से दिया जा सके।

भारत साइबर दुनिया का महारथी होने के बावजूद साइबर सुरक्षा को अपनी समग्र सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बनाने के मामले में आलसी रहा है। हमारे देश में साइबर सुरक्षा पर कम ही बहस होती है और इस विषय पर लिखा भी कम ही जाता है, कानाफूसी ही ज्यादा होती है। इस आलस की एक वजह यह है कि भारत साइबर सुरक्षा की गंभीरता को समझने में नाकाम रहा है। भारत दुनिया का युवा देश होने के बावजूद हमारा नेतृत्व युवाओं को लेकर आशंकित रहता है। इसलिए सरकार की साइबर सुरक्षा संबंधित कमेटियों में बुजुर्गोंं का ही बोलबाला है। चीन में साइबर सुरक्षा से संबंधित उच्चस्तरीय कमेटी में राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं, लेकिन हमारे किसी राजनीतिक नेता ने साइबर सुरक्षा को लेकर कोई गहरी दिलचस्पी नहीं दिखाई।

चीन के साइबर हमले का संकट कितना गंभीर है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। एक साइबर विशेषज्ञ के मुताबिक स्टॉक मार्केट, पावर सप्लाई, कम्यूनिकेशन, ट्रैफिक लाइट, रेल और एयर पोर्ट की सुरक्षा करने वाला भारतीय साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर इतना आदिम किस्म का है कि उस पर नियंत्रण करने में चीन को केवल छह घंटे लगेंगे। यदि दूसरा भारत-चीन युद्ध होता है, तो चीन अपने एयर कंडीशन कमरों से अपने साइबर योद्धाओं के जरिये भारतीय साइबर सुरक्षा तंत्र को पंगु कर सकता है।

नतीजा यह है कि दुनियाभर में चल रहे साइबर वॉर में भारत कहीं नहीं है। 2013 में भारत सरकार द्वारा घोषित राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति में इस समस्या के प्रति रवैया ढुलमुल ही है। साइबर सुरक्षा में कोई बदलाव नहीं किया गया और साइबर हमलों की निगरानी करने वाली इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम की क्षमता और शक्ति बहुत कम है। युवा प्रतिभाओं की भर्ती और उनसे सार्थक काम लेने की कोशिश अभी शुरू नहीं हुई है। साइबर सुरक्षा के मामले में देश में तैयारियों के अभाव को उजागर करने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के नोट के बाद सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने और ज्यादा प्रोफेशनल्स को भर्ती करने का फैसला किया है। लेकिन, देश की साइबर सुरक्षा को कारगर बनाने के लिए सबसे जरूरी है रणनीतिक दृष्टि और साइबर सुरक्षा की कमजोरियों को दूर करने की राजनीतिक इच्छा शक्ति।

नेशनल टेक्नीकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन हर सरकार को चीनी साइबर हमले के खतरे के बारे में बताता रहता है। लेकिन अब भारत इस खतरे का मूक दर्शक बना नहीं रह सकता। उसे अपनी रक्षा करने के लिए कदम उठाने ही होंगे। भारत की सबसे बड़ी जरूरत यह है कि वह चीन से पैदा हुए साइबर सुरक्षा के खतरे को समझे और बेहतर फिल्टरों, अर्ली वॉर्निंग सिस्टमों का बेहतर नेटवर्क तैयार करें और भारत की अर्थव्यवस्था को चलाने वाले कंप्यूटरों के इर्द-गिर्द नए फायर वॉल्स जोड़े। साइबर युद्ध की खासियत यह है कि हमलावर हमेशा लाभ में रहता है। जहां तक भारत का सवाल है तो हम हमले में भी फिसड्डी हंै और बचाव में भी।

सतीश पेडणेकर

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