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सुंदर कांड : प्रबंधन शिक्षाओं से भरपूर

सुंदर कांड : प्रबंधन शिक्षाओं से भरपूर

रामचरित मानस में सुंदर कांड का विशेष महत्व है। बाल कांड के पश्चात किष्किंधा कांड तक राम के जीवन में काली घटा छाई रहती है। वह सीता की खोज में  वन-वन और पर्वत-पर्वत उन्हें खोजते रहे । सुंदर कांड से ही राम की विपदाओं के निवारण का सूत्रपात होता है। इसी कांड से सीता जी का कुशल-क्षेम जानने के लिए हनुमान जी दुर्गम मार्ग और सौ योजन चौड़े सागर को पार कर त्रिकूट पर्वत पर बसी नगरी लंका में प्रवेश करने के लिए चलते हैं। इससे पूर्व रामकथा में ठहराव सा आ गया था। इसे निर्णायक मोड़ पर भी यही कांड पहुंचाता है।  इस कांड की शुभ घटनाओं को देखते हुए वाल्मीकि कवि की भांति तुलसी दास जी ने भी इसे सुंदर कांड की संज्ञा दी है। सुंदर कांड यथार्थतया हनुमान कांड है। वह मानस के दो महान नायकों में से एक नायक हैं।

गोस्वामी तुलसी दास जी हनुमान जी के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपनी महिमा का गान सुंदर कांड में ही नहीं किया अपितु हनुमान बाहुक और हनुमान चालीसा में भी उनकी शोभा का वर्णन है। हनुमान जी अपनी कुशाग्र बुद्धि धरती सम धैर्य, अद्भुत सूझबूझ और कुशलता के साथ राम के सभी कार्य को संपन्न करते हैं। उनकी हनुमान जी के प्रति यही आस्था है।

दुर्गम काज जगत के जेते ।

 सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ।। ह चा 20

सुंदर कांड इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहीं से एक सुंदर, शुभ और साहसिक कार्य का आरंभ होता है। इसके अंत तक प्रभु राम को वह शुभ संदेश मिलता है जो सत्यम, शिवम और सुंदरम है। यहीं से पापी रावण की कहानी का अंत दिखाई देने लगता है। किष्किंधा कांड के अंत में यह समस्या विचाराधीन है कि लंका के दुर्गम मार्ग को पार कर वहां पहुंचने में कौन सक्षम है?

जामवंत बूढ़े हो चुके हैं। अंगद स्वयं लंका में प्रविष्ट होने की क्षमता तो जताते हैं परंतु वहां से लौटने के प्रति वह आशंकित हैं। बस हनुमान जी ही इस कार्य को कर सकते हैं। परंतु उनकी चुप्पी सभी को हैरान परेशान किए हुए थी। हनुमान जी को अपनी शक्तियां ही विस्मृत हो गई थी। ऐसी अवस्था को देखते हुए जामवन्त जी उनसे कहते हैं –

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना॥

पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

उन्हें उत्प्रेरित करने के लिए यह भी कहते हैं-

कवन सो काज कठिन जग माहीं, जो नहिं होइ तात तुम पाहीं ।।

और तुलसीदास जी तो चालीसा में हनुमान जी को याद दिलाते हैं कि वह तो ‘बल के धाम’ है। अंजनी पुत्र और पवनसुत हैं। और कहते हैं-

जुग सहस्त्र  जोजन पर भानू

लिल्यो ताहि मधुर फल जानू

हनुमान जी को याद दिलाया गया तो उन्हें सब कुछ याद आया । उन्हें अपनी शक्तियों का भान हुआ। और उन्होंने यह घोषणा की

सहित सहाय रावनहि मारी।

आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥

माता सीता की खोज, उन्हें बहु प्रकार से आश्वस्त उनके, उनके प्रति राम का अनुराग और  बिरहा में तड़प का बखान और निजबल का प्रदर्शन इन् उद्देश्यों की पूर्ति का कार्यभार राम जी ने हनुमान को सौंपा था।

हनुमान जी द्वारा शुरू-शुरू में बनाई गई चुप्पी, शक्तियों के प्रति विस्मृति एक प्रबंधन शास्त्री और शिक्षार्थी की इस तथ्य के प्रति आंखें खोलती है कि जब भी किसी व्यक्ति को कोई नया कार्य करने को दिया जाता है उसमें दुविधा, हिचकिचाहट एवं बेचैनी पैदा होना स्वाभाविक है और वह सोचने लगता है कि क्या इस कार्य को करने के लिए सक्षम है क्या नहीं। नये कार्य की चुनौतियों अथवा अवसरों की उसे जानकारी नहीं होती। उसे लगने लगता है कि वह सक्षम नहीं है। तब उसे उत्प्रेरित करने की जरूरत होती है। बनो और परबतो को पार करते हुए वीर हनुमान मैनाक पर्वत पर पहुंच जाते हैं । पर्वत उन्हें आतिथ्य स्वीकार करने का आग्रह करता है और वहां कुछ घंटों के लिए रुक कर विश्राम करने के लिए विनती करता है । हनुमान जी वहां रुकना नहीं चाहते क्योंकि वह अपने लक्ष्य की सिद्धि के बिना आराम करने का सोच भी नहीं सकते । “जिन्हें महबूब मंजिल कि, वह कब आराम करते हैं!” उन्होंने इसे समय की बर्बादी और अपने उदेश्य से पिछड़ नाम जाना। प्रभु राम के कार्य करने के लिए वह तत्पर ही नहीं आतुर रहते हैं।

विद्यावान गुनी अति चतुर

राम काज करने को आतुर

इसलिए मैनाक पर्वत का  स्पर्श  करके वह अपनी राह पर चल देते हैं ।

हनुमान तेहि परसा कर उन्हीं की है प्रणाम।

राम काज किन्हें बिना मोहि कहां विश्राम।

मैनाक पर्वत के प्रसंग द्वारा प्रबंधन के कई गुणों की ओर संकेत किया गया है। प्रथम अपने लक्ष्य को कभी आंखों से ओझल न होने दो। सारी  शक्तियां उसे ही पूरा करने में लगा दो। मैनाक पर्वत सुख- सुविधा और समृद्धि का प्रतीक है । यह वस्तुएं उपयोग के लिए हैं। भोग विलास के लिए कदापि नहीं। इसलिए अपने लक्ष्य और समय की कीमत जानते हुए इन्हें ही जीवन में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इन वस्तुओं को स्पर्श करके यानी उन्हें उचित सम्मान देकर कुशल खिलाड़ी की तरह हनुमान जी वहां से  जिस मार्ग पर वह निकले थे वहां बाधाएं, व्यवधान, अवरोध और आपदाएं तो  पग-पग पर अपेक्षित है। पवन-पुत्र ने मैनाक पर्वत से उड़ान भरी ही थी कि उनका सामना एक और बला से हो गया। नागमाता सुरसा ने आगे बढ़कर उनकी राह रोक ली। वह 10 योजन तक फैल गई हनुमान जी भी उनके मुख्य में घुसकर 10  योजन तक फैल गये। जब वह 100 योजन की हो तो, तुरंत अंजनीपुत्र भी 100 योजन के हो गए और  उस समय सूझ-बूझ से काम लेते हुए, अंगूठे सम छोटा रूप धारण करके सुरसा को नमस्कार करते हुए, अपने मार्ग पर अग्रसर हो गये। सुरसा भी उन से प्रसन्न होकर आशीर्वाद देती है।

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।

आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान ।।

हनुमान जी ने  सुरसा के इरादे को जान लिया था और उस अनुसार ही उन्होंने अपने व्यवहार को निश्चित किया कि। दूसरे वह अपने समय और शक्ति को व्यर्थ ही संघर्ष तथा झगड़ों में नहीं लगाना चाहते थे। वह आगे बढ़े तो समुद्र की एक राक्षसी से सामना हुआ जो माया जाल से उडऩे वाले जीवो की जल में परछाई को देखकर ही उन्हें पकड़ कर खा जाती थी। हनुमान जी के साथ भी उसने ऐसा ही करना चाहा। उन्होंने राक्षसी के पेट में प्रवेश करके उसके अंगों को विदीर्ण करके उसको मार दिया। वीर हनुमान ने राक्षसी को कपट और इष्र्या का प्रतीक पाया और उसे मारने के सिवा अन्य विकल्प न होने के कारण उसे मौत के घाट उतार दिया। प्रबंधन विद्यार्थी के लिए यह आवश्यक है कि वह विरोधी के इरादों को समझ कर उनके अनुकूल ही कार्य नीति को अपनाए।

लंका की निशाचरी राक्षसी को मुक्के के एक ही प्रहार से मूर्छित कर दिया। तदुपरांत हनुमान जी लंका के महलों के चक्कर लगाते-लगाते रावण के अंत:पुर में पहुंच जाते हैं जहां वह रावण और उनकी स्त्रियों को सोए हुए देखते हैं। उन्होंने मंदोदरी को भी वहां देखा और उन्हें माता सीता समझ बैठे। यह भ्रम दूर हुआ। वह माता की तलाश कर रहे हैं। कभी निराश और कभी हताश होते हैं। फिर जल्दी ही संभल जाते हैं। वह धीरज धारण करते हैं। उनके सतत प्रयत्न और निरंतर तलाश से यह स्पष्ट है कि लक्ष्य प्राप्ति हेतु परिश्रम अनिवार्य है । प्रयास करते-करते मंजिल मिल ही जाएगी । प्रबंधन के शिक्षार्थी सतत प्रयास की महिमा का पाठ यहीं से सीख सकते हैं। वह अकस्मात रावण के अंत:पुर के पास एक छोटी सी कुटिया नुमा महल देखते हैं जिसकी दीवाल पर राम का चित्र बना हुआ है  और घर के एक दीवार पर तुलसी का बिरवा दिखाई पड़ा । हनुमान जी तुरंत समझ गए कि यहां कोई सत्पुरुष रहता है, उनसे मिलना चाहिए। क्योंकि साधु व्यक्ति से कभी किसी का बुरा नहीं हो सकता।  प्रकृति भी सद्पुरुषों की सहायता करती है और संयोगवश उनका मिलाप एक ऐसे व्यक्ति से करवा देती है, जिससे कार्य सिद्धि में सफलता मिल सके। हनुमान जी ने समय अनुकूल ब्राह्मण का रूप धारण किया। इस वेश में विभीषण उन्हें कोई रामभक्त अथवा स्वयं राम ही समझते है और उनका उचित अभिवादन करते हैं। इस पर हनुमान जी वानर रूप में आ जाते हैं और बड़ी विनम्रता से बताते हैं कि श्रीराम की मुझ पर अपार कृपा है। दयालु कृपालु प्रभु राम ने अपनी शरण में रखकर मुझे बढ़ाई दी कि। मेरे नायक को सम्राट बना दिया। वह शरणागत को पद, सम्मान और सुरक्षा प्रदान करते हैं। विभीषण ने हनुमान जी को बताया कि वह लंका में उसी प्रकार रहते हैं जैसे दांतो के बीच जीभ। हनुमान जी बातों-बातों में यह कहते हैं कि महाराज विभीषण जी आप जो व्यवहार अपनाए हुए हैं वह उचित नहीं। आपको रावण के कार्यों का विरोध करना चाहिए और सीता की खोज में हमारी सहायता करनी चाहिए। विभीषण  हनुमान जी को बताते हैं कि सीता जी अशोक वाटिका में बन्दी हैं। विभीषण का यह प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं है। गोस्वामी तुलसी दास जी का यह अत्यंत कलात्मक और सुंदर सृजन है जिस द्वारा उन्होंने लंका में अपने पक्ष का एक दमदार समर्थक और रावण का विरोधी खड़ा कर दिया। उनकी चतुराई, वाकपटुता के संचार की कुशलता है कि उन्होंने विभीषण के मन में यह बीज आरोपित कर दिया कि राम कृपालु है। विभीषण का कुछ समय के पश्चात इस पृष्ठभूमि में राम की शरण में पहुंचना नितान्त स्वाभाविक और संभावित लगता है।

हनुमान जी अशोक वाटिका के एक वृक्ष पर लघु रूप धारण करके बैठे होते हैं तभी लंकेश वहां आता है और सीता जी को प्रेम और प्रलोभन से जीतना चाहता है। परंतु सीता जी अपने निश्चय पर दृढ़ और अडिग रही। हाथ में तिनके की ओट करके उन्होंने रावण के प्रलोभन प्रलोभनो और प्रलापो का इतना दृढ़ उत्तर दिया कि वह रावण के वैभव और विलासिता को तिनके के समान हेय समझती हैं और रावण को ललकारते हुए कहती हैं  कि राम भानु है और तुम जुगनू।

तत्पश्चात सीता अत्यंत निराश हो अपना जीवन समाप्त करने की बात सोचती हैं। इसी अवसर पर हनुमान जी राम द्वारा प्रदत्त मुद्रिका को सीता जी के पास पहुंचा देते हैं। फिर वहां प्रकट होकर पूरी तरह अपने रामदूत होने का विश्वास दिलाते हैं और उन्हें आश्वस्त करते हैं कि अब उनके दुर्दिन समाप्त होने वाले हैं । शीघ्र ही दल-बल सहित राम जी लंका पर चढ़ाई करेंगे। रावण को मारेंगे और आपको बंदी ग्रह से मुक्त करवाएंगे । यह भी माता को बतलाते हैं कि जिस प्रकार आप राम के बिरहा में रात दिन तड़पती हैं ठीक उसी प्रकार उनकी भी दशा है । उन्हें न खाने-पीने की सुध है और न रात को नींद ही आती है। उन्होंने लंका से विदा होने से पूर्व माता सीता से प्रमाण चिन्ह के रूप में उनकी चूड़ामणि प्राप्त की। हनुमान जी ने लंका छोडऩे से पूर्व सोचा के प्रभु राम के बताए हुए सभी काम तो हो गए हैं मगर निज बल दिखाना अभी बाकी है। इस कार्य को करने के लिए हनुमान जी ने सीता से अशोक वाटिका में लगे फल- कंद खाने की आज्ञा प्राप्त करके अशोक वाटिका को बिल्कुल उजाड़ दिया।  विरोध के लिए सेना भेजी तो उनका संहार भी हनुमान जी ने कर दिया।

हनुमान जी को इंद्र जीत ने नागपाश से बांधकर रावण के दरबार में पेश किया तो हनुमान जी ने अपना पक्ष बड़ी दृढ़ता से रखा और रावण को बार-बार राम की महिमा का  भान करवाया। आखिर जब हनुमान जी को सजा देने की बात चली तो विभीषण का सुझाव था कि हनुमान की पूंछ को जला दिया जाए। हनुमान ने दीर्घ रूप धारण कर लिया उनकी पूंछ पर कपड़े आदि बांधकर जब मिट्टी का तेल डालकर आग लगाई गई तो हनुमान जी नभ में उड़ चले। उन्होंने लंका के प्रत्येक भवन महल को जलाकर राख कर दिया। चारों और चित्कार और हाहाकार थी । लोग त्राहि-त्राहि कर रहे थे। सभी के मुंह में यही था कि राम का एक वानर जब सारी लंका जला सकता है तब क्या होगा जब राम दल बल के साथ लंका पर चढ़ाई करेंगे। हनुमान जी ने वापस लौटकर श्रीराम से सीताजी और लंका के बारे में विस्तृत वर्णन देकर राम जी को प्रसन्न कर दिया। हनुमान जी को उन्होंने आलिंगन में लेते हुए कहा

सुनि कपि तेही समान उपकारी ।

नहिं कोउ सुर नर मुनि तनु धारी।।

तुलसी दास इसी प्रसंग के लिए चालीसा में लिखते हैं सब पर राम तपस्वी राजा तिनके काज सकल तुम सजा। श्री हनुमान जी के जीवन और चरित्र से सर्वोत्तम् प्रबंधन गुणों को समझने और सीखने की प्रेरणा मिलती है।

 

डॉ. प्रतिभा गोयल
(लेखिका प्रोफेसर,  पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना, हैं)

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