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राजनीति नहीं राष्ट्र-निर्माण है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य

राजनीति नहीं राष्ट्र-निर्माण है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य

 

 

 

 

दीपक कुमार रथ
(editor@udayindia.in)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना सन् 1925 में एक सामाजिक सांस्कृतिक संगठन के तौर पर नागपुर में हुई थी। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार इसके प्रथम सरसंघचालक बने, जिनके बाद गुरु गोलवलकर जी ने उनका उत्तराधिकार संभाला। वह दोनों प्रबल राष्ट्रवादी थे और साधु-संतों की तरह उच्च स्तर का आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करते थे। डॉ. हेडगेवार और गुरु गोलवलकर दोनों के जीवन का एकमात्र उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक चेतना को अक्षुण्ण रखते हुए देश को पूर्ण रुप से आत्मनिर्भर बनाना था। समय बीतने के साथ आरएसएस का भी विकास हुआ और आज इसका स्थान विश्व के सबसे बड़े सामाजिक संगठन के तौर पर बड़े सम्मान से लिया जाता है। लेकिन यह देखकर हर किसी को आश्चर्य होता है कि आखिर क्यों देश में होने वाली हर घटना के लिए राजनीतिक पार्टियां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर दोषारोपण करके उसे बदनाम करने की कोशिश करती हैं।

उदाहरण के तौर पर गांधी की हत्या होने पर बिना किसी सबूत के आरएसएस पर आरोप लगाया गया। लेकिन देश के स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल होने के लिए किसी भी राजनीतिक दल ने आरएसएस की प्रशंसा नहीं की। ऐसे कई मौके आए हैं, जब राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर आरएसएस ने केन्द्र में बैठे किसी भी राजनीतिक पार्टी के प्रधानमंत्री का खुलकर समर्थन किया। चाहे वो नेहरु हों या इंदिरा गांधी या फिर लाल बहादुर शास्त्री। आरएसएस ने अपने अनुशासित कार्यकर्ताओं के जरिए राष्ट्र निर्माण के कार्य में हर स्तर पर अपना सहयोग दिया है। संघ का विस्तार सिर्फ भारत तक सीमित नहीं बल्कि इसका प्रसार विदेश में भी हो रहा है। क्योंकि आरएसएस ने मानवता की सेवा और ईश्वरीय चेतना के प्रसार को अपना लक्ष्य बनाया है, जो किसी एक देश तक सीमित नहीं है। एक संगठन के तौर पर संघ लंबे समय से काम कर रहा है। लेकिन इस अंतराल में वह कभी भी अपने मूल उद्देश्यों से नहीं भटका। संघ की मूल विचारधारा है कि हिंदुत्व को मजबूत बनाया जाए और शाश्वत सनातन धर्म की पवित्रता अक्षुण्ण रखी जाए। इस उद्देश्य के लिए संघ के लाखों पूर्णकालिक प्रचारकों का समर्पण देखकर कोई भी आश्चर्यचकित रह जाएगा। आरएसएस की प्रतिदिन लगने वाला शाखाओं में स्वयंसेवकों को देशभक्ति और राष्ट्रनिर्माण का पाठ पढ़ाया जाता है। देश की लगभग हर पंचायत और नगर परिषदों में संघ की शाखा लगती है, जहां पर स्वयंसेवक युवा और बच्चों को भारत और भारतीयता का मूल उद्देश्य समझाते हैं। भारतीयों को उच्च नैतिकता वाला अच्छा मनुष्य बनाने की संघ की यह मुहिम लगातार जारी है। संगठन के निर्माण में अपना पूरा जीवन समर्पित करने वाले स्वयंसेवकों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बालासाहेब देवरस, दीन दयाल उपाध्याय, दत्तोपंत ठेंगड़ी, नानाजी देशमुख, बसंत राव ओक, जगन्नाथ जोशी जैसे अनगिनत दिग्गज शामिल हैं। इस व्यापक संगठन ने लाखों निस्वार्थ स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया है। जो कि राष्ट्रसेवा और देश को मजबूत करने के अनेक महान कार्यों जैसे- सांप्रदायिक सौहार्द्र, सामाजिक समरसता, भारतीय शिक्षा व्यवस्था में सुधार, प्राचीन संस्कृति और परंपराओं की बरकरार रखने में जुटे हुए हैं। संघ के स्वयंसेवक किसी भी राजनीतिक दल में शामिल होने के लिए स्वतंत्र हैं। आरएसएस ने राजनीति, शिक्षा, विज्ञान, कृषि, अर्थव्यस्था, विदेश नीति, सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड़ने वाले असंख्य कुशल लोगों का व्यक्तित्व विकसित किया है। इसी सतत जारी प्रक्रिया के परिणामस्वरुप संघ ने राजनीति के क्षेत्र में श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, भैरों सिंह शेखावत, लाल कृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी और अब नरेन्द्र मोदी जैसे दिग्गज राजनेता समर्पित किए हैं।

आरएसएस ने कभी भी इन राजनेताओं को यह सिखाने की कोशिश नहीं की है कि कैसे राजनीतिक दल को चलाया जाए। एक राजनीतिक दल के रुप में भाजपा ने सरकार बनाने के उद्देश्य से अपने स्वतंत्र राजनीतिक सिद्धांत और मूल लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए चरणबद्ध रणनीति तैयार की है। संघ ने भाजपा सरकार की रक्षा, आर्थिक या विदेश नीति को प्रभावित करने की कोई कोशिश नहीं की। जब अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री थे, तब सरकार चलाने के लिए न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार किया गया था। जिसमें राम मंदिर, समान नागरिक संहिता या धारा 370 हटाने जैसे भाजपा के मुख्य मुद्दों के लिए कोई जगह नहीं थी। अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल के दौरान स्वदेशी जागरण मंच जैसे संघ के अनुषांगिक संगठन ने आर्थिक नीतियों के कुछ प्रावधानों पर कड़ा विरोध दर्ज किया था। साल 2014 में जब लोकसभा में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तब विचारधारा से संबंधित मूल मुद्दों पर कार्यवाही शुरु कर दी। यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी के गुड गवर्नेन्स ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिया। नेतृत्व के बदलाव से भारत के आत्मविश्वास और राष्ट्रीय अस्मिता पर गर्व की भावना में असीम वृद्धि हुई। नरेन्द्र मोदी खुद ही संघ के पूर्णकालिक प्रचारक रहे हैं। वह संघ की उस विचारधारा के बीच विकसित हुए हैं, जो भारत को विश्वगुरु बनाने के लिए प्रेरित करती है। बदलती हुई परिस्थितियों के साक्षी समस्त भारतीय हैं। महामारी का सामना करते हुए वैश्विक आर्थिक मंदी की लहर के बीच आत्मनिर्भरता के रास्ते पर बढ़ता हुआ भारत 5 ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था का ताज पहनने जा रहा है।इसलिए जो भी लोग संघ के बारे में कोई जानकारी नहीं रखते, उसकी कार्यप्रणाली को नहीं समझते हैं, वह इसे सांप्रदायिक संगठन बताकर खारिज करना चाहते हैं। जहां तक मैं समझता हूं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वसुधैव कुटुंबकम् यानी संपूर्ण संसार ही मेरा परिवार है, पर विश्वालस रखता है। संघ अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की अवधारणा पर भरोसा नहीं करता है। संघ इस देश को अपनी मातृ और पुण्यभूमि समझने वाले तथा सनातन धर्म के आदिकालीन आध्यात्मिक और संस्कृतिक मूल्यों पर भरोसा करने वाले व्यक्तियों को एक छत के नीचे लाने आंदोलन है। आरएसएस ने किसी भी धर्म का विरोध नहीं किया है, क्योंकि भारत धर्म आधारित शासन व्यवस्था वाला देश नहीं है। लेकिन संघ और उसके कार्यकर्ता हिंदू धर्म पर किसी भी आक्रमण का प्रतिकार करने और हिंदुओं से जुड़े किसी भी मुद्दे पर संघर्ष करने से पीछे नहीं हटते। भारत में हिंदुओं पर हमेशा हमला किया जाता है, मुस्लिम आक्रमणकारियों ने हजारों मंदिर तोड़ दिए।

मोपला दंगों की भयानक कहानियां हर हिंदू के मनो-मस्तिष्क में ताजा हैं। आज भी भारत के कई हिस्सों में हिंदू जनता दोयम दर्जे की जिंदगी जीने के लिए मजबूर है। और तो और नरेन्द्र मोदी से ठीक पहले के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तो देश के सभी संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों को देना चाहते थे। गांधी और नेहरु भारत में हिंदुओं को मुद्दों को सांप्रदायिक बताकर खारिज करते रहे। अगर संघ जैसे संगठन नहीं होते तो आप सोच भी नहीं सकते हैं कि इस देश में हिंदुओं का भविष्य क्या होता। आरएसएस लगातार भारत की एकता और संप्रभुता की रक्षा में सन्नद्ध है। जब कांग्रेस पार्टी सत्ता में थी, तब समाज सेवा के नाम पर अरबों- खरबों डॉलर देश में लाकर उससे धर्म परिवर्तन या फिर देश विरोधी गतिविधियां चलाई जाती थीं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण नॉर्थ ईस्ट है, जहां जबरदस्त धार्मिक असंतुलन में उत्पन्न हो गया है। लेकिन अब नरेन्द्र मोदी के सौजन्य से विदेशी चंदे से देश तोड़ने का धंधा बर्बाद हो गया है। आरएसएस ने विदेशी फंडिंग से चलने वाले संदिग्ध देशविरोधी संगठनों और उनके दलालों की गतिविधियों पर हमेशा से नजर रखी है और सरकार को उसे लेकर सचेत भी किया है। अपने इस विशेष अंक में हम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर एक विशेषांक प्रकाशित कर रहा है। यह संघ और उसकी गतिविधियों के प्रति जागरुकता पैदा करने की एक कोशिश है। हम भारतीयों को बताना चाहते हैं कि संघ के राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया लगातार जारी है और इसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।

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