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मौत पर राजनीति

मौत पर राजनीति

21 साल से जेल में बंद 1993 मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन को गवर्नर और सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली। मेमन को नागपुर सेंट्रल जेल में 30 जुलाई 2015 को सुबह 7 बजे फांसी दे दी गई। मेमन ने अपने बचाव में आखिरी कोशिश के तौर पर राष्ट्रपति के पास रहम की गुहार लगाते हुए एक फैक्स भेजा था। राष्ट्रपति ने याकूब की आर्जी की फाइल गृह मंत्रालय के पास सलाह के लिए भेजी थी, लेकिन याकूब को राहत नहीं मिल सकी। गौरतलब है कि उच्चतम न्यायालय ने यह कहते हुए याकूब की फांसी टालने का अनुरोध ठुकरा दिया था कि याचिका में कोई नया तथ्य नहीं दिया गया है और जो तथ्य बताए गए हैं उस पर 29 जुलाई 2015 की सुनवाई में ही स्पष्टीकरण दे दिया गया था। न्यायलय के इस फैसले के साथ ही याकूब की फांसी तय हो गई थी। जिसकी प्रक्रिया पहले से ही शुरू हो गई थी।

सुप्रीम कोर्ट में याकूब के वकील और राकांपा नेता माजिद मेमन ने महाराष्ट्र सरकार पर याकूब को फांसी देने की जल्दबाजी को काफी दुखद बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘महाराष्ट्र सरकार याकूब मेमन को राजनीतिक, सांप्रदायिक कारणों से जल्द से जल्द फांसी देना चाहती है। महाराष्ट्र सरकार के इस तरह के आचरण के बारे में तो खुदा ही जानता है, लेकिन ये निश्चित रूप से महाराष्ट्र सरकार का संदेहास्पद व्यवहार है। उसकी जल्द फांसी इसलिए हो सकती है, क्योंकि वे एक मुस्लमान है, जो कि बहुत दुखद है।’

याकूब मेमन के क्यूरेटिव पिटिशन के खारिज होने के विरोधी कह रहे हैं कि 1993 में हुए सिलसिलेवार मुंबई बम ब्लास्ट में याकूब मेमन, एक मात्र अकेला मौत की सजा पाने वाला अभियुक्त है, जो सांप्रदायिक राजनीति का शिकार हुआ। 12 मार्च 1993 को पीपल के पेड़ के नीचे बम फटने से हुए विस्फोट में वर्ली स्थित मलकानी महल के जो लोग मारे गए थे, उनके परिजनों का कहना है कि ब्लास्ट में मारे गए लोगों के परिवार का तत्कालीन मुख्य मंत्री शरद पवांर ने 5 लाख रुपए का मुआवजा देने का वादा किया था, आज तक पूरा नहीं हुआ। याकूब की सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्यूरेटिव पिटिशन अस्वीकृत किए जाने के बाद राज्य सभा के सदस्य माजिद मेमन की प्रतिक्रिया को देखकर एक प्रमुख टीवी एकंर ने विस्फोट में घायल हुए कीर्ति अजमेरा, जिसका हाथ बुरी तरह से घायल हो गया था, जिसके लिए उसे लगभग 40 ऑपरेशन करवाने पड़े से पूछा कि क्यूरेटिव पिटिशन के अस्वीकृत हो जाने के बाद क्या एक विशेष वर्ग समुदाय पर विपरित प्रभाव पड़ेगा। उसने आगे पूछा कि टेलिविजन पर माजिद मेमन की याकूब की याचिका खारिज होने पर की गई टिप्पणी पर क्या कहना चाहेंगे। इस पर अजमेरा का कहना था कि माजिद मेमन का अपने समुदाय के सदस्य को सपोर्ट करते देखना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। जबकि हर कोई इस बात से सहमत है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। ऐसे में 21 जुलाई को याकूब की याचिका खारिज होने पर उसका सांप्रदायिक राजनीतिकरण किया जा रहा है। क्यों याकूब मेमन के लिए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, राजनेताओं और यहां तक कि मीडिया द्वारा इतनी सहानुभूति दिखाई जा रही है? यह सहानुभूति उन 257 लोगों के लिए नहीं दिखाई जा रही हैं, जिन्होंने इस हादसे में अपनी जान गवा दी या उन 700 लोगों के प्रति जो इस विस्फोट में बुरी तरह से घायल हुए। इस धमाके से पूरी मुंबई बुरी तरह से हिल गई थी।

सितंबर 2006 में याकूब मेमन को टाडा कोर्ट द्वारा दोषी पाया गया। 2007 में उसे फांसी की सजा सुनाई गई। न्यायधीश कोडे ने याकूब और उसके 10 अन्य साथियों को सजा सुनाने से पहले 13 साल तक जमा किए गए सभी साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन किया था। ऐसा कहा जाता है कोडे ने इस मामले के दौरान अपने माता-पिता की मृत्यु हो जाने पर भी छुट्टी नहीं ली थी और न ही तब जब उनके हाथ की हड्डी टूट गई थी। ये सब उस जज की अपने काम के प्रति पूर्ण निष्ठा को ही दर्शाता है। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने याकूब मेमन को टाडा कोर्ट द्वारा फांसी की सजा का समर्थन किया। 10 अप्रैल 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने मेमन की याचिका पर पुन:विचार की अर्जी को खारिज कर दिया। पिछले साल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा याकूब की दया याचिका अस्वीकृत करने के बाद मेमन परिवार की उम्मीद सुप्रीम कोर्ट में दायर क्यूरेटिव पिटिशन पर टिकी थी। 21 जुलाई को याकूब की क्यूरेटिव पिटिशन खारिज कर दी गई। वकील फरहाना शाह, जोकि मेमन को छोड़कर विस्फोट में शामिल दोषियों के लिए कई बार सामने आई हैं, ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि ‘याकूब के इस विस्फोट में शामिल होने के खिलाफ कोई सबूत नहीं है।’ इस पर ‘कोर्ट का कहना है कि फरहाना ने सिर्फ सह-आरोपियों के बयान पर भरोसा किया।’ क्या फरहाना शाह ये कहना चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट गलत है?

21 मार्च को सुप्रीम कोर्ट द्वारा याकूब की मौत की सजा को बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपना फैसला देने में उसने अप्रूवर के कंफेशन पर उतना ही विचार किया जितना उसके परिवार की पृष्ठभूमि पर। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार याकूब मेमन ऐसी स्थिति में था, जिससे उसके बम विस्फोट के प्रकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की बात साफ दिखती है, जो उसकी मौत की सजा के लिए निर्धारक रही। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोग पक्ष ने विस्फोट में प्रयोग किए गए हैंड ग्रेनेड आदि की रिकवरी को साबित कर दिया है। इस ब्लास्ट से पहले गोला बारूद और हथियारों की ट्रेनिंग के लिए दुबई होते हुए पाकिस्तान जाने वाले लोगों के लिए हवाई टिकट्स की खरीद, पासपोर्ट और वीजा आदि का प्रबंध करने में उसकी भूमिका थी। कोर्ट ने इस बात को माना कि याकूब उन लोगों में से नहीं था, जिनके पास हथियार और गोला-बारूद था, लेकिन वह उनके पीछे था और ही है, शुरू से लेकर अंत तक इस विस्फोट में शमिल रहा है। वीजा षडयंत्र, पाकिस्तान में हथियार और गोला-बारूद की ट्रेनिंग देने के लिए लोगों को एकत्र करने तक में याकूब पूरी तरह से सक्रिय था।

समाजवादी पार्टी के अबू आजिम के अनुसार ‘याकूब मेमन आत्मसमर्पण के लिए आया था और उसे फंसा लिया गया।’ जबकि पुलिस अपनी इस बात पर कायम है कि याकूब ने आत्मसमर्पण नहीं किया, बल्कि उसे गिरफ्तार किया गया। विस्फोट से दो दिन पहले मेमन परिवार अपने घर के गैराज में लगभग 10 मीलियन के गहने, जिसमें हीरे और सोने के गहने शामिल है छोड़ गया था- जो 1993 से टाडा कोर्ट में रखे हुए है। मेमन परिवार सेंट्रल मुंबई के महीम में अल-हुसैनी बिल्डिंग के शानदार डुप्लैक्स फ्लैट्स का मालिक था। जिसे देखकर ऐसा लगता है कि याकूब को पाकिस्तान अपनी 10 मीलियन की संपत्ति लेने के लिए भेजा गया था और मेमन के परिवार को मुंबई की संपत्ति पर अधिकार करने के लिए लाया गया न कि आत्मसमर्पण के लिए।

मेमन परिवार ने याकूब के केस के मामले में सभी कानूनी विकल्पों को अपनी आखिरी सांस तक तलाशने की कसम खाई है। पिछली दया याचिका जो खारिज कर दी गई थी, उसे याकूब के भाई ने दायर किया था। 21 जुलाई को क्यूरेटिव पिटिशन के खारिज हो जाने के बाद याकूब ने महाराष्ट्र राज्य के राज्यपाल चौधरी के. विद्यासागर राव को दया याचिका देने के बारे में विचार किया। मैंने मौलाना जहीर अब्बास, जो कि मुस्लिम समुदाय के प्रमुख सदस्य है, से याकूब की क्यूरेटिव पिटिशन खारिज होने पर उनकी प्रतिक्रिया जानी। उन्होंने कहा कि ‘यदि याकूब कसूरवार है तो उसे सजा मिलनी ही चाहिए और अगर वह बेकसूर है तो उसे रिहा किया जाना चाहिए। हालांकि मुझे अभी तक उसकी मौत की सजा में कोई परिवर्तन होते नहीं दिख रहा है।’ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने कहा ‘सुप्रीम कोर्ट ने फैसला ले लिया है, महाराष्ट्र सरकार को जो भी निर्देश दिये जाएंगे, हम उसके अनुसार ही काम करेगे। समय आने पर हम और जानकारी मुहैया करवाएंगे।’

30 जुलाई को याकूब 53 साल के हो गए। इसी दिन को नागपुर में उन्हें फांसी देना मुकर्रर किया गया है। हालांकि कानूनी जानकार महसूस करते हैं कि याकूब को 30 जुलाई को फांसी नहीं हो पाएगी। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सामने याकूब ने नई दया याचिका दायर करके अपनी फांसी की सजा स्थगित करने की कोशिश की। इससे पहले उसके भाई ने राष्ट्रपति से दया की याचिका की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुसार दया याचिका के एक बार खारिज होने और मृत्यु की सजा दिये जाने के बीच 14 दिनों का अंतर होना चाहिए। नियम कहते है कि मौत की सजा प्राप्त व्यक्ति को फांसी देते समय शारीरिक और मानसिक रूप से दुरूस्त होना चाहिए। इस समय एक विचित्र अफवाह फैली हुई है कि मेमन का परिवार अब कोर्ट में याचिका दायर करने की कोशिश कर रहा हैं, जिसमें याकूब मेमन 1996 से दिमागी बीमारी से पीडि़त है, इसलिए याकूब को फांसी की सजा नहीं दी जा सकती है। जबकि जेल में रहते हुए याकूब ने इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय से दो मास्टर डिग्रियां प्राप्त की। वह जेल में अपने साथियों को अंग्रेजी पढ़ाता है। ऐसे में इस बात पर विश्वास करना मुश्किल है कि जो व्यक्ति दिमागी बीमारी से ग्रसित है, वह कैसे दो स्नात्कोत्तर उपाधियां हासिल कर सकता है।

मैंने बम्बई हाई कोर्ट के अधिवक्ता एस.वेंकटेशवर से याकूब मेमन की क्युरेटिव पिटिशन खारिज होने पर उनकी प्रतिक्रिया जानी। उनका कहना है कि ‘याकूब की क्यूरेटिव पिटिशन के खारिज होने का मतलब है कि फांसी की सजा बरकरार है। हालांकि बहुत से लोग दाउद के अनुयायी को मौत की सजा होने की खुशी मना सकते हैं, लेकिन हमें दाउद को पकडऩे के लिए ठोस योजना बनानी चाहिए।’ हालांकि 1993 में हुए धमाके के शिकार लोगों और उनके परिवार वालों को काफी समय बाद न्याय मिला।

इंदिरा सत्यानारायण

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