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गुजरात चुनाव: 2024 का सेमीफाइनल

गुजरात चुनाव: 2024 का सेमीफाइनल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात से दिल्ली पहुंचने के बाद 2017 के बाद यह गुजरात का दूसरा ऐसा विधानसभा चुनाव है जिसमें मोदी सीधे भाजपा का नेतृत्व नहीं करेंगे। पिछले चुनावों में कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली थी और भाजपा की सीटों का आंकड़ा 100 से कम रहा था। कांग्रेस ने भाजपा की सीटें घटने को अपनी नैतिक विजय बताया था। अपनी सरकार बनाने के बजाय विरोधियों की सीटें घटने को ही अपनी जीत मानने के लिए भले ही कांग्रेस का मखौल उठाया जाए लेकिन यह सच है कि 2017 में कांग्रेस ने चुनाव प्रचार और इसके मुद्दे निर्धारित करने में भाजपा को कड़ी चुनौती दी। ऐसे में 2022 के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक विश्लेषकों की यह जानने में दिलचस्पी थी कि क्या कांग्रेस अपनी गतिशीलता बरकरार रख पाएगी और भाजपा को कड़ी चुनौती देगी। इस बारे में अंतिम निर्णय हालांकि मतगणना के दिन ही होगा फिर भी गुजरात विधानसभा चुनावों के बारे में सभी प्रमुख चुनाव-पूर्व सर्वेक्षणों में भाजपा की भारी जीत की भविष्यवाणी की गई है। सीटों का आंकड़ा भी 110 से ऊपर रहने की उम्मीद जताई जा रही है।

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि गुजरात में भाजपा ने ऐसा क्या किया है कि 1995 से अब तक गुजराती लगातार भाजपा को जिता रहे हैं। गुजरात में भाजपा ने इस विचार पर काम किया है कि सरकार का काम विकास को नियंत्रित करने का नहीं है बल्कि विकास को प्रोत्साहित करने का है। भाजपा के विरोधी दल अंबानी-अडानी को भ्रष्ट और जमाखोर बताने में जुटे हैं जबकि गुजरात में भाजपा सरकार ने बहुत पहले यह सीधी सी बात समझ ली थी कि अगर हमें भारतीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना है तो भारतीय उद्यमियों को हेय दृष्टि के बजाय सम्मान की दृष्टि से देखना होगा। राजनीतिक चश्मों से विश्लेषण करने वाले विशेषज्ञ अकसर गुजरात के विकास को आंकड़ों की बाजीगरी या गैर-समावेशी विकास बताते हैं। हालांकि सच यह है कि मोदी के राजनीतिक विरोधी भी जब आंक़ड़ों की तुलना करते हैं तो मोदी के कार्यकाल में हुए गुजरात के विकास को नकार नहीं पाते। इसका ही एक उदाहरण है कि 2005 में खुद सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राजीव गांधी फांउडेशन ने आर्थिक स्वतंत्रता सूचकांक में नंबर 1 पाया। रिपोर्ट में अपराध नियंत्रण, सुरक्षा, प्रभावी पुलिस व्यवस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुद्दों पर गुजरात सरकार की प्रशंसा की गई। मोदी और अमित शाह के केंद्र में जाने के बाद भी राज्य सरकार ने विकास को सर्वोपरि प्राथमिकता बनाए रखा। गुजरात की आर्थिक नीतियों की सफलता को इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि वित्त वर्ष 2020-21 में राज्य ने देश सर्वाधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अर्जित किया। पूरे देश के कुल एफडीआई का 37 प्रतिशत हिस्सा गुजरात को मिला। ऐसे समय में जब विरोधी दल सब कुछ मुफ्त में देने की राजनीति कर रहे हैं, गुजरात ने आर्थिक विकास का मार्ग चुनकर युवाओं को सशक्त करने का मार्ग चुना।

अगर इन चुनावों में संभावनाओं के अनुसार भाजपा की जीत होती है तो इसके लिए कांग्रेस का लचर प्रचार और गुजरात की लगातार अनदेखी भी जिम्मेदार होंगे। पिछले चुनावों में अपेक्षाकृत अच्छे प्रदर्शन के बाद गांधी परिवार स्थानीय स्तर पर नेतृत्व के झगड़े सुलझाने में विफल रहा। 2017 के चुनावों के बाद कांग्रेस के 15 विधायक भाजपा में शामिल हो गए और भाजपा की विधायक संख्या 112 तक पहुंच गई। राज्य में लगातार झटकों के बावजूद कांग्रेस को इस राज्य में अपनी राजनीतिक जमीन की कितनी चिंता है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा में गुजरात शामिल नहीं है। ऐसे में उम्मीद यही है कि हिमाचल प्रदेश की तरह राहुल गांधी गुजरात में भी चुनाव प्रचार से बाहर रहेंगे। ऐसे में कांग्रेस जब अपनी राजनीतिक जमीन खुद छोड़ रही है तो आम आदमी पार्टी इस जमीन को हासिल करने के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रही है। केजरीवाल की पार्टी राज्य में अपना राजनीतिक रसूख बढ़ाने के लिए किस हद तक बेचैन हैं, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कथित तौर पर ईमानदारी की राजनीति करने वाली आम आदमी पार्टी के बारदोली सीट से उम्मीदवार राजेंद्र सोलंकी की गाड़ी से 20 लाख की नकदी पकडी गई। सोलंकी इस नकदी के बारे में कोई संतोषजनक जबाव नहीं दे पाए। अब पुलिस को शक है कि यह पैसा हवाला का है और आम आदमी पार्टी चुनावों के लिए हवाला के जरिए धन भेज रही है। इसके अलावा गुजरात में चुनाव आयोग अब तक करीब 72 करोड़ की नकदी, शराब, ड्रग्स या चीजें जब्त कर चुका है। चुनाव पूरे होने में अभी तीन सप्ताह से अधिक का समय बाकी है, ऐसे में साफ है कि जब्ती का ग्राफ अभी और अधिक बढ़ेगा।

बहरहाल, गुजरात के इन विधानसभा चुनावों के बारे में राजनीतिक विश्लेषक एक बात पर एकमत हैं कि इन चुनावों के नतीजे सिर्फ राज्य नहीं बल्कि देश की राजनीति की दशा तय करेंगे। इन चुनावों में धमाकेदार जीत से भाजपा 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए अपनी दावेदारी पुख्ता करेगी, वहीं अगर परिणाम भाजपा के प्रतिकूल रहते हैं तो विरोधी दल इसे केंद्र सरकार के खिलाफ जनमत के रूप में दर्शाएंगे।

प्रेरणा कुमारी

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