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संसार सारम भुजगेन्द्र हारम…

संसार सारम भुजगेन्द्र हारम…

सावन का महीना आते ही चारों तरफ बम-बम भोले की गूंज सुनाई देने लगती है। जहां एक ओर बारिश की नन्ही-नन्ही बूंदे लोगों को सराबोर कर रही होती हैं, तो वहीं दूसरी ओर शिव भक्तों के लिए भी ये महीना अपने देव को मनाने के लिए खास होता है। शिवभक्त अपने आराध्य को मनाने में कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते इसलिए नंगे पांव ही कोसों दूर की यात्रा करने निकल पड़ते हैं, बस इस आस्था के साथ की उनकी कोसों दूर की ये यात्रा शायद उनके आराध्य देव शिव को मनाने में कामयाब हो जाए और वो भोले बाबा से अपनी मनोकामना पूरी करने का वरदान मांग सकें।

कांवड़ यात्रा विराट धार्मिक आयोजन है जिसमें अनेक तरह के रूप रंग और आकार वाली सजी कांवड़ों को उठाकर लंबी यात्रा करना कांवडिये का काम तो है ही, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है इस परम पवित्र आयोजन से संबंधित नियम आदि का कठोरता और निष्ठापूर्वक पालन जो शिव भक्त को अपने इष्टदेव और जलाभिषेक करते समय उनकी भावना की दृष्टि से लगभग एकाकार कर देता है। यह यात्रा विराट कुंभ मेले के समान ही अनंत धारा की तरह होती हैं। कांवड़ का मूल शब्द है ”कांवर’’ जिसमें शिव भक्त अपने कंधे पर पवित्र जल का कलश लेकर पैदल यात्रा करते हुए इष्ट शिवलिंगों तक पहुंचते हैं। पितृभक्त श्रवण कुमार को प्रथम कांवड़ चढ़ाने वाला माना जाता है। भारत में श्रावण मास में शिवभक्ति का विराट रूप और आस्था का अनंत प्रवाह कांवड़ यात्रा के रूप में देखने को मिलता है। हिंदू धर्म में माना जाता है कि भगवान शिव इस पूरे जगत के संचालक और संहारक हैं। यही कारण है कि धर्मशास्त्रों में श्रावन मास में भगवान शिव की आराधना का शेष मासों की तुलना में अधिक महत्व है। शास्त्रों में श्रावण मास के महत्व को बताने वाले अनेक धार्मिक प्रसंग है। इनमें अमरनाथ तीर्थ में भगवान शंकर द्वारा माता पार्वती को सुनाई गई अमृत्व की कहानी का सबसे अधिक धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि श्रावण के महीने में इस कथा का पाठ करने वाला या सुनने वाला जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।

15-08-2015

मुख्य रूप से उत्तर भारत में गंगा किनारे के क्षेत्र के प्रदेशों में कांवड़ का बहुत महत्व है। राजस्थान के मारवाड़ी समाज के लोगों के यहां गंगोत्री, यमनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ तीर्थ से पुरोहित जो जल लाते थे और प्रसाद के रूप में देते थे, शास्त्रीय मत के अनुसार उन्हें ही कांवडिय़ा कहते थे। ये लोग गोमुख से जल भरकर रामेश्वरम में भगवान शिव का जलाभिषेक करते थे, ये परंपरा थी। लगभग 6 महीने की पैदल यात्रा करके वहां पहुंचा जाता था। इसके पौराणिक तथा सामाजिक दोनों महत्व हैं। एक तो हिमालय से लेकर दक्षिण तक संपूर्ण देश की संस्कृति में भगवान का संदेश जाता था साथ ही भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की लौकिक और शास्त्रीय परंपराओं का बोध होता था।

कांवड़ शब्द के अनेकार्थ हैं और सभी अर्थ परमात्मा और आत्मा को जोडऩे वाले हैं।

  • क (ब्रह्म+जीव)+अवर अर्थात ब्रह्म और जीव का मिलन यानी जीवत्व का त्याग करके ब्रह्मत्व की प्राप्ति।
  • क का अर्थ शीश जो सारे अंगों में प्रधान है वैसे ही शिव के लिए कावंड़ का महत्व है, जिससे ज्ञान की श्रेष्ठता का प्रतिपादन होता है।
  • क का अर्थ कामदेव और अ का अर्थ शिव और वरण का अर्थ निग्रहण अर्थात काम भाव का नियंत्रण करके उसे शिव भाव (समस्त जगत का कल्याण) में लीन करें।
  • क का अर्थ विष्णु और आवर का अर्थ है अपने जीवन में उतारना। अर्थात हम विष्णु तत्व यानी सारे लोकों के पालन-पोषण, समाज और संस्कृति के रक्षण का भाव रखकर उसके लिए कार्य करें।
  • क का अर्थ राजा और कांवड़ का अर्थ रक्षण-पोषण अर्थात साधक को अपनी दुष्ट प्रवृत्तियों पर पूर्ण नियंत्रण करके देवी वृत्तियों के लिए अनुकूल अवसर प्रदान कराना चाहिए।

15-08-2015

कांवडिय़ों को अपनी यात्रा के दौरान कुछ नियमों का पालन करते हुए ही आगे बढऩा होता है जो इन बातों का ध्यान रखते हुए आगे बढ़ता है उसकी यात्रा को ही शिव कृपा प्राप्त होती है। लोग कांवड़ यात्रा का सिर्फ धार्मिक पक्ष ही जानते है, जबकि उसका मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। कावंड यात्रा वास्तव में एक संकल्प होता है, जो श्रृद्धालुओं द्वारा लिया जाता है।

  • कांवड़ यात्रियों के लिए किसी भी प्रकार का नशा वर्जित होता है।
  • बिना स्नान किए कावंड़ यात्री कावंड़ को नहीं छू सकते।
  • कांवड़ यात्रियों के लिए चारपाई पर बैठना या किसी भी वाहन पर चढ़कर यात्रा पूरी करना निषेध होता है।
  • चमड़े से बनी वस्तु का स्पर्श एवं रास्ते में किसी वृक्ष या पौधे के नीचे कांवड़ रखना वर्जित है।
  • कांवड़ यात्रा में भोले बाबा के नाम का उच्चारण करना तथा कांवड़ को सिर के ऊपर से लेने तथा जहां कांवड़ रखी हो उसके आगे बिना कांवड़ के जाना नियम के विरुद्ध है।

इस तरह कथित नियमों का पालन करके कांवडि़ए अपनी यात्रा को पूर्ण करते हैं। वैदिक परंपरा के अनुसार गंगाजल तथा तीर्थों का जल लाकर विभिन्न स्थलों के शिवलिंग पर अभिषेक करने का विशिष्ट महत्व है। लोक कथाओं के अनुसार पवित्र नदियों का जल अपनी श्रद्धास्थली के शिवलिंग पर अर्चन करने वालों ने अपनी मनोकामनाओं को भगवान शिव से वरदान रूप में प्राप्त किया। यही वजह है कि लोग कांवड़ उठा कर आज भी पूरी भक्ती और आस्था के साथ इस परंपरा को आगे बढ़ा रहें हैं।

प्रीति ठाकुर

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