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बार-बार ‘हिन्दुओं” पर निशाना क्यों

बार-बार ‘हिन्दुओं” पर निशाना क्यों

सतीश जारकीहोली का हिन्दू समाज और धर्म संबंधी बयान सुना। वह उनकी पढ़ाई-लिखाई और वैचारिकी की ओर संकेत करता है। इसमें पार्टी-वार्टी का कोई विषय नहीं है। वो किस पार्टी के हैं, इससे अपना कोई सरोकार भी नहीं है क्योंकि सियासी नेताओं का दीन-ईमान सत्ता और पद के साथ बनता और बिगड़ता रहता है। कथित ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ और कुछ हिन्दू विरोधी पोर्टल और भटके संगठनों के नेताओं से ही संभवतः सतीश जारकीहोली को ये ज्ञान मिला है कि हिन्दू शब्द का इस्तेमाल गाली के रूप में पर्शियन भाषा में होता था। उन्हें ये ज्ञान जिन स्रोतों से हुआ है, वो बेहद ही छिछले हैं जिनके लेखकों के अध्ययन और चिंतन में भारत और उसकी परंपराओं के प्रति रंचमात्र श्रद्धा नहीं दिखती है।

वामपंथी नैरेटिव जो अंग्रेजों के जमाने से अनेक रूपों में भारत में पाला-पोसा गया है, उसी का नतीजा है कि भारत में चिंतन विशेष से जुड़े नेता तो नेता, बड़े बड़े शोध विद्वान और आचार्य भी भटके दिखाई देते हैं।
इस बारे में मैं पहले भी सन्दर्भ के साथ बता चुका हूं कि ईसा पूर्व छठी सदी में जबकि एक मज़हब के रूप में इस्लाम का प्रारंभ नहीं हुआ था, बड़े आदर से ईरान की भूमि पर हिन्दू नाम भारत के लिए ही प्रयुक्त होता था। ईरान के सूसा में प्राप्त छठी सदी ईसा पूर्व के शिलालेख में वर्णन मिलता है कि पिरूष ह्य ईदा कर्त हचा कुष आ उता हचा हिन्दुव उता हचा हरउवतिया अवरिव। अर्थात इस राजमहल में जो हाथी दांत की नक्काशी है वह हरहती ( सुरसती) कुश (हिन्दुकुश) के पार हिन्दु देश से लाई गई है। यह सन्दर्भ प्रमाण सहित आचार्य वासुदेव शरण अग्रवाल के रचना संचयन में दर्ज है।

साहित्य अकादमी, दिल्ली से प्रकाशित है। विख्यात विदुषी प्रो. कपिला वात्स्यायन जी इसकी संपादक रही हैं। हैरानी की बात ये है कि विगत 50 साल के भारतीय इतिहास अध्यापन से ये सन्दर्भ पूरे तौर पर नदारद है। जानबूझकर ये किया गया है या अनजाने में? इस सवाल पर चर्चा फिर कभी। हिन्दू शब्द सदा से आदर के साथ दुनिया भर में प्रयुक्त होता रहा है, इसके अनेक प्रमाण हैं। इस्लामिक इतिहास में पैगंबर साहेब की पत्नी खदीजा बेगम के विवाह पूर्व बच्चों के नाम इस सन्दर्भ में प्रमाण हैं। खदीजा के पहले पति अबू हाला से उन्हें हिन्द नाम का बेटा था। अतीक-बिन से हुई एक संतान जो शायद बेटी थी, उनका नाम भी हिन्दाह था। पैगंबर मोहम्मद साहेब के बाद उम्मेद कबीले से जो पहले खलीफा बने, उन हजरत मुआविया की मां का नाम भी हिन्द था जो अबू सूफियान की पत्नी थीं। मतलब साफ है कि हिन्द नाम इस्लामिक जगत में कभी गालीसूचक नहीं रहा। वरन इसका इतना आदर था कि लोग अपने बच्चों का नाम भी हिन्द के नाम पर रखकर गौरवान्वित होते थे। हिन्दू शब्द अवेस्ता में आने के बहुत पहले एक अन्य ग्रंथ में भी आया था। इसका इस समय प्रचलित नाम वेन्दीदाद है जबकि वास्तविक नाम विद-एव-विदाद भी माना जाता है। अनेक बड़े विद्वानों ने माना है कि वेदों की तरह ही वेन्दीदाद भी श्रुत परंपरा से कंठस्थ किया जाता था। इसका कंटेंट भी वेदों से काफी साम्यता रखता है। इसका आरंभिक रचना काल ईसापूर्व आठवीं सदी माना जाता है जिसे अंतिम रूप पाचवीं-छठी सदी में जरथ्रुस्त्र ने दिया था। जरथ्रुस्त्र के बाद अवेस्ता की तरह इसका भी शुद्ध संकलन का प्रयास हुआ।

इस सन्दर्भ में उल्लेखनीय बिन्दु ये है कि वेन्दीदाद में हिन्दू शब्द अनेक अवसरों पर आया है और सबसे बड़ी बात ये है कि इसमें सप्त सिन्धु को हफ्त हिन्दु लिखा गया है। मतलब साफ है कि तत्कालीन सिन्धु नदी और उसकी सहायक नदियों को स्पष्टतः हफ्त हिन्दु कहकर पुकारा गया है। जाहिर तौर पर सिन्धु नदी के साथ लगी धर्म और संस्कृति के लिए भी हिन्दू शब्द सम्मान के साथ प्रचलित था। मूल फारसी शब्दकोश में कहीं भी हिंद शब्द का नकारात्मक या गालीसूचक अर्थ नहीं दिया गया है। भारत का नाम हिंद बताया गया है। हिंदबा, हिंदसः, हिंदसःदॉं, हिंदसःदानीं, हिन्दुआन, हिन्दुए-चश्म, हिंदुए-चर्ख़, हिंदूज़ादः आदि अनेक शब्द हिन्द से जुड़े हैं। जिसमें हिंदबा एक दवा विशेष का नाम है। हिंदसः को भारत से संसार में फैली गणित विद्या के लिए इस्तेमाल किया जाता है।इन सब बिन्दुओं को ध्यान में रखें तो स्पष्ट दिखाई देता है कि कोई ना कोई खतरनाक मनोवृत्ति सतीश जरकीहोली समेत उन तमाम नेताओं के ज़ेहन से प्रकट होती दिखाई देती है जिसका ज्ञान से संंबंध कम है, नादानियत या अज्ञान या नफरती सियासत से जिसका संबंध ज्यादा है। जिस हिन्द को गालीसूचक बताया जाता है, उसका स्रोत वस्तुतः फारसी भाषा या अवेस्ता ग्रंथ नहीं है, ये बदनीयती से अर्थ का अनर्थ करने का प्रयास वस्तुतः कुछ भ्रमित या भटके या किसी स्वार्थ से भटकाए गए भारतीय लेखकों ने ही किया है। हिंदुए-फ़लक या हिंदुए-चश्म का इस्तेमाल फारसी समाज सदा से अपने बच्चों की खूबसूरती बताने के लिए भी करता रहा है। इसी में एक अर्थ ये भी है कि जो बच्चा इतना मोहक और आकर्षक है कि किसी का दिल चुरा लेता है, वो हिंदुए-चश्म है। यहां चोर का सन्दर्भ चितचोर के सन्दर्भ में है और ये प्रयोग सकारात्मक है। किन्तु कुछ वामपंथी विद्वानों ने गंदी मानसिकता से अपने चित को चोर पर ही अटका दिया और एक तरह से भारतीय अकादमिक लेखन में हिन्दू शब्द को लेकर भ्रामक और गंदी मानसिकता को घुसेड़ दिया गया। इसी का शिकार सतीश जरकीहोली समेत वो पूरी जमात है जिन्हें उस हिंद देश का आधुनिक पुनरोदय सियासी कारणों से आंखों में चुभता और दर्द देता प्रतीत होता है। प्रख्यात साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी ने इस सोच को खतरनाक माना था। वो कहते थे कि ”आज कुछ लोगों को देशभक्ति भी अप्रासंगिक लगने लगी है। देशभक्ति से प्रेरित जो स्वतंत्रता संग्राम था और जिसे सच्चाई से देखने और आंखों के सामने रखने की हिम्मत होती तो हम मानते कि अभी वो समर पूरा नहीं है। किन्तु एक विशेष सोच वालों के लिए, उनकी सेक्युलर भावनाओं को जो चीज ठेस पहुंचाती है तो उनके लिए वो हर चीज़ अप्रासंगिक है। कभी-कभी तो लगता है कि इस मानसिकता वालों के लिए यह देश भी अब अप्रासंगिक हो चुका है।”अज्ञेय जी ने 22 अप्रैल 1983 को भोपाल में माखनलाल चतुर्वेदी स्मृति समारोह में अपने व्याख्यान में ये बात कही थी। जाहिर तौर पर पंक्ति तो पुरानी है लेकिन उसके निहितार्थ सदा ही अग्रगामी और नवीन सामयिक सन्दर्भो के जरिए गहरे समझ में आते हैं।

 

 

Deepak Kumar Rath

राकेश उपाध्याय

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