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मैनपुरी लोकसभा उप-चुनाव महासंग्राम : मैनपुरी में डिम्पल की स्थिति कमजोर

मैनपुरी लोकसभा उप-चुनाव महासंग्राम : मैनपुरी में डिम्पल की स्थिति कमजोर

समाजवादी पार्टी के सूत्रधार मुलायम सिंह यादव के निधन से रिक्त हुई उत्तर प्रदेश की मैनपुरी लोकसभा सीट पर 5 दिसम्बर 2022 को होने वाले उपचुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपनी पत्नी यानि मुलायम सिंह की बहू को पार्टी प्रत्याशी बनाकर सहानुभूति के वोट बटोर कर जीतने की गणित लगायी। नेताजी के नाम से माने जाने वाले मुलायम सिंह उत्तर-प्रदेश ही नहीं राष्ट्रीय राजनीति के मंजे खिलाड़ी रहे हैं, वे एक बार तो प्रधानमंत्री भी बनने वाले ही थे पर आखरी वक्त पर बनने से रह गये। मैनपुरी लोकसभा सीट से वे कई बार सांसद रह चुके हैं। डिम्पल यादव को चुनाव में उतारने का दूसरा कारण है कि अखिलेश के चाचा शिवपाल सिंह जो कि अखिलेश से नाराज होते हुये भी परिवार की बहू होने के कारण डिम्पल का विरोध नहीं कर सकेंगे। लेकिन चुनावी गणित के हिसाब से इस उपचुनाव में डिम्पल का जीतना काफी कठिन होगा। कई कारणों से भाजपा का पलड़ा सपा से भारी दिखाई दे रहा है।

मुलायम सिंह की लोकप्रियता घटी

मैनपुरी क्षेत्र में मुलायम सिंह की लोकप्रियता घटती जा रही थी। यदि हम पिछले लोकसभा चुनावों के नतीजों पर नजर डालें तो इससे साफ हो जायेगा। 2004 के चुनाव में 3 लाख से अधिक वोटों से जीतने वाले मुलायम सिंह 2014 में भी 3.5 लाख के भारी मार्जिन से जीते थे। 2009 में भी लगभग पौने दो लाख वोटों से जीते थे। यानि तीन लाख वोटों से अधिक से जीतते रहे और कम से कम भी पौने दो लाख वोट से जीते हैं। पर पिछले 2019 के चुनाव में उनके जीतने का मार्जिन यकायक 3.64 लाख वोटों के मार्जिन से घट कर एक लाख से भी नीचे आ गया जबकि इस चुनाव में उन्हें बसपा का समर्थन भी प्राप्त था फिर भी जीतने का अन्तर 3.5 लाख से घटकर 96 हजार पर आ गया। पिछले चुनाव में उन्हें भाजपा ने टक्कर दी। खुद नेताजी जब अपने रहते हुये अपनी लोकप्रियता नहीं बनाये रख सके तो अखिलेश को इससे कोई फायदा नहीं होने वाला।

अखिलेश-डिम्पल की घटती लोकप्रियता

अखिलेश सारी ताकत और रात-दिन एक करके कई पार्टियों से समझौता करके भी 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को टक्कर नहीं दे पाये थे। सपा की करारी हार हुयी थी। उधर पिछले लोकसभा चुनाव में डिम्पल कन्नौज की सीट पर हार गयी थी। यहां तक कि सपा के लिये अजेय समझी जाने वाली आजमगढ़ की सीट पर भी सपा चुनाव हार गयी जो सीट अखिलेश ने विधायक चुने जाने पर खाली की थी। वहां पर उनकी जाति यादव का दबदबा भी है और यादव बाहुल्य सीट के साथ-साथ अल्पसंख्यक वोट भी अच्छी खासी संख्या में है। साफ है कि प्रदेश में सपा की लोकप्रियता घटी है और अखिलेश यादव की छवि भी धूमिल हुयी है।

सहानुभूति पर वोट नहीं मिलने वाले

मुलायम सिंह यादव के निधन से संवेदना के वोट मिलने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं, उसके कई कारण हैं, आम तौर से संवेदना या सहानुभूति के वोट किसी नेता की मौत पर उसकी पत्नी को मिलते हैं। परिवार के अन्य सदस्यों में कभी-कभी पुत्र को मिलते हैं। लेकिन एेसा आकस्मिक मौत पर होता है। जैसे इन्दिरा गांधी की मौत पर राजीव गांधी को मिला था और कांग्रेस पार्टी ने जीत का एक इतिहास रच दिया था। यहां नेताजी की मौत आकस्मिक नहीं हुयी है न किसी दुर्घटना से हुयी न ही किसी राजनैतिक कारणों से। प्राकृतिक मौत होने पर सहानुभूति के वोट मिलना मुश्किल होता है। नेताजी लम्बे समय से बीमार चल रहे थे। अखिलेश यादव ने उन्हें राजनीति से दरकिनार कर रखा था। यहां तक कि एक बार मंच पर उनसे माईक भी छीन लिया था । इन घटनाओं को उत्तर-प्रदेश की जनता ने टीवी पर खूब देखा था। ये कहावत भी उत्तर-प्रदेश में चली थी कि जो बाप का नहीं हुआ वो जनता का क्या होगा। एेसे बेटे को जनता कैसे सहानुभूति के आधार पर वोट दे सकती है। ऊपर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुलायम सिंह के प्रति आभार जताते हुये गहरी संवेदना प्रमाणित कर जनता की वाह-वाही लूटी थी।

जसवंत नगर विधान सभा फैक्टर

मुलायम सिंह  की भारी जीत के लिये जसवंत नगर की विधानसभा सीट मुख्य कारण रही है वहां वे भारी मार्जिन से जीत कर निकलते रहे। यहां नेता जी का सदा दबदबा रहा लेकिन इस चुनाव में जसवंत नगर के विधायक नेताजी के भाई शिवपाल यादव हैं जो जसवंत नगर के अतिरिक्त पूरे लोकसभा क्षेत्र की चुनावी गणित जानते हैं क्योंकि वही नेताजी का चुनाव देखते रहे है। वे अखिलेश से रूष्ट ही नहीं अन्दर से जले भुने पड़े हैं। अखिलेश ने उन्हें सपा की मींटिंग में भी नहीं बुलाया यहां तक कि डिम्पल जब चुनाव के प्रत्याशी का पर्चा भरने गयीं तो उन्हें साथ आने तक को नहीं कहा। शायद अखिलेश अपने चाचा को दिखाना चाहते थे कि वे उनके बगैर चुनाव जीत सकते हैं। नामांकन भरने के बाद डिम्पल अखिलेश के साथ चाचा शिवपाल से आशीर्वाद लेने गयीं उन्हें आशीर्वाद भी मिला लेकिन शिवपाल ज्यादा कुछ करेंगे या कर पायेंगे, एेसा नहीं लगता।

लोकप्रिय है भाजपा प्रत्याशी

रघुराज सिंह शाक्य को भाजपा ने प्रत्याशी बना कर एक और चाल चल दी। वे पहले विधान सभा सदस्य और दो बार लोकसभा सदस्य रह चुके है। क्षेत्र में जाना पहचाना चेहरा है। उनका संसदीय क्षेत्र भले ही इटावा रहा हो पर इस क्षेत्र में काम करते रहे हैं और पहले सपा में रहने के कारण नेताजी के लिये काम करते रहे हैं। उनकी गिनती शिवपाल सिंह के नजदीकी लोगों में है। वे पिछले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा में आये थे। विधानसभा चुनाव नहीं लड़ाने का कारण शायद यही रहा होगा कि उन्हें नेताजी के विरोध में 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ाया जाये क्योंकि वे शाक्य जाति के हैं और शाक्यों के वोट भी क्षेत्र में तीन लाख से अधिक हैं। रघुराज सिंह को प्रत्याशी बना कर भाजपा ने अखिलेश को सकते में डाल दिया। यही कारण है कि अखिलेश बार-बार कह रहे कि वे पूरे चुनाव में खुद रहेंगे।

योगी की बढ़ती लोकप्रियता

मुख्यमंत्री योगी की लोकप्रियता दिनों-दिन बड़ती ही जा रही है। उनका बुलडोजर कार्यक्रम असर दिखा रहा है। उन्होंने सभी उपचुनाव भी जीते हैं। आजमगढ़ और रामपुर जैसी सपा की अजेय लोकसभा सीटें योगी ने सपा से छुड़ा कर भाजपा की झोली में डाल दी। हाल ही में गोला गोकर्णनाथ में हुये विधान सभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की है। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी है कि देश के दूसरे प्रदेश चाहते हैं कि वे उनके प्रदेश के मुख्यमंत्री बन जायें। अपराधियों से जनता को मुक्त करना उनका एजेंडा लोकप्रिय हुआ है। लोग बुलडोजर बाबा को हर क्षेत्र में बुलडोजर के साथ देखना चाहते हैं। आजमगढ़, रामपुर फिर गोला में चला बुलडोजर मैनपुरी चुनाव में भी सपा पर चलेगा।

मायावती फैक्टर – सबसे बड़ा रोड़ा

प्रदेश की कई बार मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती बहुजन समाज पार्टी की मुखिया ने सपा को मिटाने की कसम खायी है। वे कई बार कह चुकी हैं कि सपा ने उन्हें लखनऊ गेस्ट हाउस में जान से मारने की योजना बनायी थी वे किसी तरह बच गयीं थी। बाद में उन्होंने सपा को माफ करके सबसे बड़ी गलती कर दी। चाहे कोई भी जीते पर वे हर सूरत सपा को हराएंगी। इस बात का असर उनके चाहने वाले दलित वोटों पर बराबर हुआ है। खासतौर से उनकी अपनी जाति के अहिरवार जिनका वर्चस्व सबसे अधिक है एक भी वोट सपा को मिलने वाला नहीं है। दलित वोटों की संख्या भी 3.5 लाख से अधिक है। यह एक  बड़ा राजनैतिक फैक्टर है, चुनाव के गणित में जो हर तरह से सपा के सिर पर शिला रखने का काम करेगी। मायावती यदि बसपा से प्रत्याशी लड़ाती तो भी लगभग आधे वोट भाजपा को मिल जाते जब तक कि वे खुद प्रत्याशी न हो। बसपा चुनाव नहीं लड़ रही है एेसी स्थिति में भाजपा को दो तीन लाख वोटों का समर्थन दलित वोटों से मिल जायेगी।

जातीय गणित भाजपा के पक्ष में

मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र में जहां कुल पिछड़ों में आधे, चार लाख से अधिक वोट यादवों के हैं और ये माना जाता है कि 80 प्रतिशत से अधिक उनके वोट सपा को जाते हैं यानि कुल चार लाख यादव वोट ही सपा का मुख्य आधार है बाकी जो जाति के वोटो में जिस जाति का प्रत्याशी होता था उस जाति के भी मिल जाते थे। अन्य बड़ी जातियां सपा की अपराधिक छवि होने के कारण सपा से छिटक गयी हैं। इसलिये बड़ी जातियांे के वोट सपा के खिलाफ जीतने वाले प्रत्याशी को मिलते हैं। अल्पसंख्यकों की संख्या केवल 5 प्रतिशत होने की वजह से अन्य क्षेत्र जैसे आजमगढ़, रामपुर, सम्बल, मुरादाबाद आदि की तरह चुनावी गणित मंे बहुत बड़ा बदलाव नहीं कर पायेंगे। वहीं दूसरी ओर भाजपा ने शाक्य जाति का प्रत्याशी उतार कर बड़ा खेल कर दिया जिसके वोट तीन लाख से अधिक हैं। लोधी, राजपूत के एक लाख वोट लगभग सभी भाजपा को मिलेंगे। लगभग एक लाख वोट कुर्मियों के हैं जो अधिकांश भाजपा को मिलने वाले हैं। अब ठाकुरों के वोट भी लगभग एक लाख हैं और ब्राह्मणों के सवा लाख से अधिक हैं। योेगी जी के मुख्यमंत्री बननें के बाद सपा सवर्ण वोटों में सेंध नहीं लगा पा रही है।

चाचा शिवपाल भले डिम्पल के पक्ष मंे हो गये हैं तो भी उनके कहने से उनके समर्थक शायद ही सपा को वोट करें। क्योंकि अखिलेश शिवपाल को कई बार बेइज्जत कर चुके हैं। वैसे भी यादवों के वोट तो डिम्पल को मिल ही रहे थे, िशवपाल के साथ रहने से 5-7 हजार वोटों से ज्यादा का फर्क नहीं पड़ने वाला। भाजपा के पास सुपर नेतृत्व है। नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और आदित्यनाथ योगी जैसे पांच पांडव चुनाव युद्ध में एक मजबूत सेना स्वयं में है।

भाजपा की इस चाल के बदले में सपा ने पार्टी का जिला अध्यक्ष शाक्य जाति के व्यक्ति को बना दिया है। उत्तर-प्रदेश में सपा की सरकार नहीं होने और केन्द्र में दो चार सांसद होने के कारण भी शाक्य वोटों में शायद ही कुछ वोट मिल पायें। भाजपा प्रत्याशी पूर्व में विधायक और सांसद रह चुका है इसलिये यहां जाति गणित पर भाजपा भारी ही पड़ेगी। दलित वोट किसी भी सूरत में सपा को नहीं मिलने वाला है।

भाजपा को शाक्यों के तीन लाख, दलितों के ढाई लाख से अधिक तो सीधे ही मिलने वाले हैं और अग्रणी जातियों के 80 प्रतिशत वोट मिलने पर चुनाव एक तरफा हो जायेगा। सपा को यादवों के 4 लाख वोट, अल्पसंख्यकों के और अन्य जाति के एक लाख वोट के बाद विराम लग जाता है। यदि एक लाख वोटों का समर्थन और भी मान लें तो छह लाख समर्थक वोट ही हो पायेंगे। भाजपा के पास तीन लाख शाक्य, एक लाख लोधी, तीन लाख दलित और कुर्मी आदि एवं बड़ी जातियों के मिला कर तीन लाख वोट उनका गणित 10 लाख के आस-पास हो जाता है। इनमें जहां सपा के यादवों और अल्पसंख्यकों के 90 प्रतिशत वोट पड़ते हैं तो शाक्यों और दलितों के भी 90 प्रतिशत वोट पड़ते हैं। यदि मतदान 60 प्रतिशत के लगभग होता है जो कि पिछले लोकसभा चुनाव में 58 प्रतिशत था इस तरह कुल मतदान 11 लाख के आस पास हो सकता है। एेसी स्थिति में सपा अधिक से अधिक 4 या 4.5 लाख वोट पा सकेगी जबकि भाजपा को 6.5 लाख वोट मिल सकते हैं। कुल विश्लेषण करने के बाद हम कह सकते हैं कि भाजपा प्रत्याशी को, सपा प्रत्याशी डिम्पल से कम से कम डेढ़ से दो लाख वोटो से विजयी होने की संभावना दिखाई देती है। अतः भाजपा प्रत्याशी की जीत जाति गणित के आधार पर, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री की छवि और मायावती का खुला विरोध आदि के कारण सुनिश्चित समझी जा सकती है।

 

Deepak Kumar Rath

डॉ. विजय खैरा

 

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