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आज के समाज का आईना

आज के समाज का आईना

15-08-2015वह एक जिद्दी और घमंडी दोपहर थी जो अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद एक उदास शाम में ढल रही थी’ अपने इन्हीं शब्दों के साथ लेखक आशुतोष ने अपनी पहली रचना की शुरूआत की जो कि युवा वर्ग को ध्यान में रख कर लिखी गई। लेखक आशुतोष ने अपनी इस पुस्तक में अलग-अलग कई कहानियों की रचना की हैं। लेखक ने ‘मरें तो उम्र भर के लिए’ अपनी रचना में बहुत से बिंदुओं पर ध्यान केन्द्रित किया है, लेकिन मुख्यत:-दो कहानियों ‘पिता का नाच और दादी का कमरा’ में मुख्य रूप से युवा वर्ग और बुर्जुग वर्ग के बीच के अंतर को दर्शया है। दादी का कमरा नाम की कहानी में लेखक ने साफ तौर पर इस अंतर को दर्शया है कि कैसे दादी और दादा के अथक प्रयासों के बाद वो अपना एक घर बना सके थे। जिसमें उन्होंने अपनी छोटी सी दुनिया बसाई थी, उन्होंने अपने पूरे जीवन में इज्जत अथाह कमाई। ये विरासत जब उनकी अपनी पीढ़ी के हाथ लगी तो दादा के स्वर्गवास के बाद दादी को घर का एक कमरा दे दिया गया। जिसमें फालतू का सामान रखा हुआ था। दादी भी बहुओं के लिए किसी फालतू सामान से ज्यादा नहीं थीं इसलिए वो भी उसी कमरे के एक कोने में चारपाई पर बस अपनी जिंदगी के आखिरी दिन काट रहीं थीं। लेकिन, दादी का वो कमरा घर में सभी के लिए रहस्यमय था किसी के लिए अचारों का जखीरा था तो किसी के लिए सूखे मेवों का भंडार, घर की बहुओं को वह चांदी के सिक्कों और जेवरों का खजाना लगता था। सभी के मन में कुछ-न-कुछ पाने की चाह थी, लेकिन दादी का ख्याल किसी को नहीं था। यहां दादी और उनकी पीढ़ी के बीच की खाई साफ नजर आ रही थी।

वहीं लेखक की दूसरी कहानी ‘पिता का नाच’ में नन्दू को उसके दोनों बेटे उनके नाचने-गाने पर रोकते हैं, लेकिन ये नाच-गाना ही नन्दू का पेशा है। जिससे उसने अपने परिवार का गुजर-बसर ही नहीं किया, बल्कि उन्हें ऐश-ओ-आराम की जिंदगी भी दी, लेकिन आज नन्दू के बेटों को उस पर नाज नहीं बल्कि, शर्मिंदगी होती है। उन्होंने नन्दू को घर से बाहर निकाल दिया, नन्दू तब भी अपने पेशे को आगे बढ़ाते हुए खुशी से एक झोपड़ी में अपना गुजर-बसर करता रहा। लेकिन, उसके दोनों बेटों को उसकी खुशी वहां भी रास नहीं आ रही थी। जिसके चलते नन्दू के बेटों ने नन्दू का सारा सामान उठा कर झोपड़े से बाहर फेंक दिया और उसके नाचने-गाने वाले सारे सामान को और झोपड़े को आग लगा दी। यहां भी दो पीढिय़ों के बीच की खाई साफ नजर आती है। वहीं इस पुस्तक की एक और कहानी ‘मरें तो उम्र भर के लिए’ में लेखक ने आज के युवा वर्ग की व्यापक सोच और समझ का परिचय दिया है साथ ही ये भी बताया है कि कैसे शहरी और ग्रामीण सोच में वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है।

लेखक ने आधुनिक और परंपरागत दोनों पहलूओं को अपनी पुस्तक ‘मरें तो उम्र भर के लिए’ में बखूबी दर्शाया है। जिसमें एक तरफ आधुनिक युग के युवाओं के तौर-तरीके, दिनचर्या, जीवनशैली को दर्शाया है तो वहीं दूसरी तरफ अपनी परंपराओं से जुड़े बुजुर्गों की कहानी के विषय में बताया है जो कि बदलते परिवेश को दर्शाता है। ‘मरें तो उम्र भर के लिए’ लेखक का पहला कहानी-संग्रह है। लेखक के पास किस्सा कहने की भरपूर दृष्टि, सामथ्र्य और कला है। उनकी भाषा शैली में भिन्नता साफ दिखाई देती है, जिसे आसानी से पहचाना जा सकता है। वह अपनी कहानियों का विषय भी आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन से ही उठाते हैं। लेखक ने कहानियों के बल पर ही अपनी पहचान कायम कर ली। लेखक की कहानियों को पढ़कर ऐसा लगता है जैसे समाज को नए नजरिये से देखा जा रहा हो। लेखक समाज के हर पहलू को बड़ी ही खूबसूरती से उकेरना जानते हैं। उनकी कहानियों मे जीवन की हकीकत नजर आती है।

प्रीति ठाकुर

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