ब्रेकिंग न्यूज़ 

सनातनी पारिवारिक मूल्यों का कमजोर होता बंधन

सनातनी पारिवारिक मूल्यों का कमजोर होता बंधन

भारत की अब भी करीब 68 फीसद जनसंख्या ग्रामीण इलाकों में रहती है। भारत जब आजाद हुआ था, तब तकरीबन अस्सी फीसद आबादी गांवों में रहती थी, जबकि बाकी बीस फीसद ही शहरों में रहती थी। भारतीय समाज सदियों से ग्राम प्रधान रहा है। इसका असर आज भी कमोबेश ग्रामीण समाज पर दिखता है। बेशक पहले की तुलना में स्थितियां बदली हैं। सामाजिक परिवेश का अंदरूनी धागा कमजोर हुआ है। लेकिन हजारों साल से हमारे जीन में आ रहे पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों का पूरी तरह लोप नहीं हुआ है। लेकिन शहरी समाज में ये मूल्य कमजोर हो रहे हैं। बदली आर्थिक परिस्थितियां संयुक्त परिवारों के लिए मुफीद नहीं रहीं। इसलिए पारिवारिक और सामाजिक मूल्य कमजोर हुए। इसका असर बच्चों के पालन-पोषण पर पड़ा। पश्चिमोन्मुखी शिक्षा व्यवस्था ने भी परिवार और समाज व्यवस्था को कमजोर किया है। यही वजह है कि अब बच्चों को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा आजादी दी जा रही है। दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चों पर पारिवारिक और सामाजिक अनुशासन कमजोर हुआ है। इस अनुशासन लोप के इस दौर ने ‘मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मेरी मर्जी’ जैसी अवधारणा और सोच बच्चों में बढ़ती जा रही है। परिवार और समाज की अपेक्षाओं की डोर भी कमजोर हुई है। पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर यह विचलन हिंदू परिवारों में ज्यादा बढ़ा है। यही वजह है कि आज हिंदू समाज की लड़कियों को आसानी से शिकार बनाया जा रहा है और वे कभी खुद श्रद्धा वाकर बन जाती हैं और जो नहीं बनतीं, उन्हें असमय ही उनके विजातीय प्रेमी कभी गोली मारकर तो कभी तेजाब फेंककर मार डालते हैं या घायल कर देते हैं।

हम जैसे लोगों की जिंदगी के शुरूआती दो दशक गांव में गुजरे हैं। उस दौर में कुछ शरारत करने के पहले भी बच्चे देख लेते थे कि अपने गांव-मुहल्ले का कोई बड़ा व्यक्ति तो नहीं देख रहा है। तब बच्चे चाहे दुश्मन के ही क्यों ना हों, वे पूरे गांव के बच्चे होते थे। बेटी तो गांव के शान से जुड़ी हुई थी। बेटियों के शादी-ब्याह, गौना-दोंगा में पूरा गांव जैसे श्रद्धानत होकर मदद करता था। भारतीय समाज की दुर्व्यवस्था के लिए जाति को सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन यह भी सच है कि ग्रामीण व्यवस्था में बेटी चाहे किस भी जाति या समूह के परिवार की हो, पूरे गांव की बेटी होती थी। कमोबेश अब भी यही व्यवस्था है। इसलिए कभी बेटियों पर अगर किसी ने गलत निगाह डाल दी तो हो सकता है कि परिवार के लोग उस वक्त ना हों,  लेकिन गांव वाले उसे अपनी इज्जत का सवाल बना लेते थे। गांव से मेला-हाट में गई गांव की बेटी की हिफाजत का ध्यान गांव के लोग ही रखा करते थे। गांव के बच्चे को लेकर भी ऐसी ही स्थिति होती थी। इस व्यवस्था को आप चाहे भारतीय विशेषण दें या कुछ और, लेकिन हकीकत में यह व्यवस्था हिंदू व्यवस्था ही है। भारतीय मूल्य दरअसल सनातनी मूल्य ही हैं।

उदारीकरण के दौरान हमने जिस ट्रिकल डाउन सैद्धांतिकी वाली अर्थव्यवस्था को अपनाया, उसमें व्यक्ति की आकांक्षाएं बढ़ी हैं। आर्थिक चमक-दमक ने व्यक्ति और एक हद तक छोटे परिवार केंद्रित अवधारणा को बढ़ावा दिया है। आर्थिक दबाव और आकांक्षाओं के आकाश  के चलते परिवार से बुआ, चाचा, दादा-दादी , नाना-नानी, मामा-मामी, छोटे दादा, बड़े दादा, छोटी दादी, बड़ी दादी, चाची आदि की अवधारणाएं सिकुड़ती गई हैं। परिवार का मतलब अब पति, पत्नी और उनके एक या दो बच्चे ही रह गए हैं। शहरी व्यवस्था में बगल के फ्लैट का निवासी भी पड़ोसी को नहीं जानता तो वह क्या उनके बच्चों पर निगाह रखेगा। इस बदली व्यवस्था में पारिवारिक मूल्य भी बदले हैं। जिसका असर आज के बच्चों की सोच पर भी पड़ा है। इसलिए उनमें अनुशासन का भाव घटा है।

इस सोच को बढ़ावा देने में पिछली सदी के अस्सी के दशक में स्वीकार की गई शिक्षा व्यवस्था ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। इस शिक्षा व्यवस्था में भारतीय और सनातनी मूल्य की चींजें पढ़ाई जाना बंद हुईं। कभी परोक्ष तो कभी प्रकारांतर से पश्चिमी पारिवारिक धारणा और मूल्य केंद्रित पाठ्यक्रम को ही बढ़ावा दिया गया। सनातनी कथाओं और उद्धरणों के जरिए भारतीय और सनातनी मूल्यों की जो शिक्षा इसके पहले दी जा रही थी, उसका पूरी तरह लोप कर दिया गया। बच्चों को पश्चिमोन्मुखी आधुनिकता के जंगल में झोंक दिया गया। उसे ही विकास और प्रगति का पर्याय माना जाने लगा। इसमें उदारीकरण के बाद विकसित टेलीविजन ने और ज्यादा साथ दिया। घर-घर तक उच्छृंखल और अर्धनग्नता की कहानियां, सामाजिक घुन की तरह व्याप्त रिश्तों की राजनीति आदि पर फोकस कहानियां घर-घर पहुंचाई गईं। दरअसल इनके जरिए पश्चिमी व्यापारिक समाज अपने लिए बाजार बना रहा था। अपने इस लक्ष्य में वह कामयाब भी रहा। उसने भारत में करीब पचास करोड़ लोगों का ऐसा विशाल मध्यवर्गीय बाजार बनाया, जिसकी उपेक्षा कोई कारपोरेशन या बड़ा उद्योग नहीं कर सकता। बदलाव के इस कोलाज ने भारतीय मूल्य व्यवस्था को तहस-नहस करके रख दिया। भारतीय समाज में प्यार और स्नेह की ताकत उसकी गहराई और उदात्तता रही है। भारतीय परंपरा में प्रेम गहन अनुभूति और कई बार अध्यात्म का प्रतीक रहा है। लेकिन आधुनिक सोच ने इसे उथला बना दिया। प्यार मांसल सौंदर्य के साथ ही अनुशासनहीनता का महापर्व बनता चला गया। बाजार और आधुनिक शिक्षा निर्मित मानस ने इसे ही विकास और प्रगति का सोपान समझ लिया। इसकी वजह से पारिवारिक मूल्य कमजोर होते चले गए। सामाजिक संबंधों की दीवार दरकती चली गई। इसलिए समाज और बृहत्तर परिवार ने भी बच्चों या परिवेश पर गहन ध्यान देना बंद कर दिया। इसका असर होना ही था, जो अब कभी श्रद्धा वाकर तो कभी किसी और के तौर पर दिखता है।

भारतीय और सनातन साहित्य की ओर झांकिये तो पता चलेगा कि हिंदू समाज सदियों से सुसंस्कृत और समाज-परिवार केंद्रित रहा है। चाहे रामायण हो या महाभारत, प्रतिज्ञा यौगंधरायण हो या चंद्रापीड कथा या संस्कृत और भारतीय साहित्य के प्राचीन ग्रंथ, सबमें आप देखेंगे कि परिवार और समाज को प्रतिष्ठित किया गया है। भारतीय अवधारणा में व्यक्ति की महत्ता तो रही है, लेकिन उसे समाज की इकाई नहीं माना गया, बल्कि परिवार को इकाई को माना जाता रहा। समाज में परिवार महत्वपूर्ण था। लेकिन वक्त बदला, आर्थिकी बदली, स्थितियों में परिवर्तन आया और उसके बाद अपना समाज व्यक्ति केंद्रित होता चला गया। न्यूक्लियर फैमिली की अवधारणा बढ़ती गई।

हमने विकास का जो मॉडल अपनाया, उसमें शहरों को विकास का पर्याय मान लिया गया। गांव को पिछड़ेपन का प्रतीक माना जाने लगा। ऐसे में गांव के निवासी और उनकी सोच को पिछड़ा माना ही जाना था। इसका असर यह पड़ा कि गांव और समाज की ओर से बिना शुल्क लिए निगहबानी करने वाली हजारों आंखों की पलकें बंद होती चली गईं। पहले कहा जाता था कि ग्रामीण व्यवस्था में आंखें निगाहबानी करती हैं, जबकि शहरी समाज की आंखें या भीड़ दीवार बन जाती है। यही वजह है कि आज शहरी व्यवस्था और समाज में युवा जोड़े खुलेआम रति करते दिख सकते हैं। उनके लिए अनजान लोगों की भीड़ दीवार और ओट का काम करती है। जबकि छोटे शहरों या ग्रामीण समाज में हजारों आंखें वाचडॉग की भूमिका निभाती रही है।

इस बीच भारतीय परिवारों, विशेषकर हिंदू परिवारों ने आधुनिक बनने और दिखने के चक्कर में अपने बच्चों को भारी सहूलियतें देनी शुरू कीं। अनुशासन के बंधन को कम करना शुरू किया। हालांकि यह बंधन अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज में पहले की तुलना में विशेषकर लड़कियों के लिए कहीं ज्यादा कठोर हुए हैं। यानी एक तरह से दो समाजों के बीच इस मोर्चे पर दोहरापन भी दिख रहा है। यही वजह है कि आज हिंदू परिवारों की लड़कियों को प्रेम के जाल में अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय के युवाओं की ओर से फंसाना आसान हो गया है। अगर प्रेम सात्विक हुआ, आत्मिक हुआ तो कोई बात नहीं, लेकिन दुर्भाग्य, आजकल ज्यादातर ऐसे प्रेम श्रद्धा वाल्कर और आफताब जैसे दिखने लगे हैं। इसलिए जरूरी है कि फिर कोई सनातनी परिवार की लड़की श्रद्धा वाकर ना बन सके, इसके लिए सनानती पारिवारिक मूल्यों की ओर हमें बढ़ना होगा। हमें अपनी प्राचीन ग्रामीण संस्कृति वाली सामाजिक और सामुदायिक सोच एवं व्यवहार को अपनाना पड़ेगा।

Deepak Kumar Rath

 

उमेश चतुर्वेदी

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.