ब्रेकिंग न्यूज़ 

कार्यपालिका-न्यायपालिका में टकराव प्रजातंत्र के लिये खतरा

कार्यपालिका-न्यायपालिका  में टकराव प्रजातंत्र के लिये खतरा

ये हिन्दुस्तान के प्रजातंत्र की खूबी है कि जहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश तीन शीर्षस्थ पदों पर अति साधारण परिवार के व्यक्ति को बैठने का अवसर मिलता है। प्रधानमंत्री के पद पर चाय बेचने वाले का बेटा और राष्ट्रपति के पद पर दूर दराज पिछड़े क्षेत्र से आयी, गरीब परिवार में जन्मी आदिवासी महिला है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पद पर जस्टिस के जी बालकृष्णन विराज चुके हैं जो कि एक दलित परिवार से आये और उनके पिता क्लर्क की नौकरी करते थे। हाल मे उत्पन्न हो रहे न्यायपालिका और कार्यपालिका के टकराव से देश में मजबूत प्रजातंत्र की जड़ों पर कमजोर होने का खतरा मंडराने लगा है।

वैसे दोनो पक्षों की कार्यप्रणाली पर वक्त बे वक्त प्रश्न चिन्ह लगते रहें हैं। देश में चुनी हुयी सरकार की अपनी जिम्मेदारियां है तो न्यायपालिका के ऊपर संविधान की रक्षा की जिम्मेदारी है। आज एैसा लग रहा है कि दोनो में लक्ष्मण रेखा पार करनें के लिये एक दूसरे से मुकाबला हो गया है। जब मुख्य न्यायाधीश की बात सुनते हैं तो वही सही लगती है जब केन्द्रीय कानून मंत्री के तर्क सुनते हैं तो वही सही लगते हैं। यहां यह बताना आवश्यक है कि सरकार की जिम्मेदारी जनता के प्रति और जनता के चुने हुये प्रतिनिधियों द्वारा बनी सांसद के प्रति होती है। सरकार के ऊपर जनता, संसद और मीडिया की नजर रहती है और उसकी गल्तियों को सुधारने की भी प्रक्रिया है। सरकार के ऊपर एक और अंकुश है उसके निर्णय न्यायालय द्वारा संशोधित या निष्प्रभावी किये जा सकते हैं। उसके परीक्षण का पूरा अधिकार भी न्यायालय को है। स्वतंत्र न्यायपालिका का होना अति आवश्यक है। उन्हें ईश्वर का रूप भी दिया गया है पर वह केवल न्यायिक प्रक्रिया के लिये ही है। प्रशासनिक कार्यो के निष्पादन के लिये न्यायमूर्ति द्वारा न्यायालय के अधिकार के उपयोग को न्यायोचित कहना बहस का विषय है।

न्यायाधीशों की नियुक्ति पर एकाधिकार क्यों?

न्यायाधीश क्यों चाहते हैं कि उन्हीं में से कुछ वरिष्ठ न्यायाधीश आपस में बैठकर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति करें जबकि विश्व के किसी देश में कहीं भी एैसी प्रक्रिया नहीं है कि कुछ जज मिलकर अपने नये जजों का चयन करें। फिर भारत मंे न्यायाधीश ऐसा क्यों चाहते हैं कि उनके द्वारा ही न्यायाधीशों का चयन किया जाये। उनके द्वारा चयन की कोई जबाब देही नहीं होती है न ही कोई प्रयास सुप्रीम कोर्ट ने किया है।

कालेजियम द्वारा चयन में कमियां और समस्याएं

पहली बात तो ये है कि संविधान में या किसी अन्य कानून एक्ट में एेसा कोई प्रावधान नहीं है कि जज की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के जज करेंगे या उनका कोई विशेष समूह करेगा। संविधान के 124। में स्पष्ट किया गया है कि न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जायेगी। इसके लिये राष्ट्रपति आवश्यकतानुसार न्यायाधीशों से परामर्श ले सकते हैं। मतलब साफ है कि राष्ट्रपति (यानि समझो तो सरकार) ही न्यायाधीश की नियुक्ति के लिये सक्षम है। इसके अतिरिक्त संविधान में कोई अन्य व्यवस्था नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के खुद के जजमंेट से कालेजियम की व्यवस्था की गयी है। यदि मामला विस्तारित संविधान पीठ में सुना जाता है तो बहस उपरांत वास्तिविक स्थिति सामनें आ सकती है।

दूसरी बात: कालेजियम द्वारा की जाने वाली चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं लगती है क्योंकि इसके कोई नियम कानून नहीं न ही चयन प्रक्रिया के लिये कोई निर्धारित नीति नहीं बनायी गयी। जिसे कालेजियम ने चुन लिया बस वही जज बन गये। जजों की सूची सरकार को पुलिस को, गोपनीय या अन्य पूरी जांच के लिये उनके चयन से पहले जाना चाहिये जैसा कि प्रत्येक सरकारी सेवा में आवश्यक होता है।

तीसरी बात: यदि कालेजियम में सरकार का कोई प्रतिनिधि होता भी है तो इसमें कालेजियम को क्या परेशानी है। आखिर प्रतिनिधि कोई भी हो एक जिम्मेदार व्यक्ति ही होगा। वैसे भी चयन तो उसी का होगा जिसे कालेजियम के जज चाहेंगे। सरकार के एक या दो प्रतिनिधि भी चयन मंडल में हो तो उससे कालेजियम को मदद ही मिलेगी और प्रक्रिया तब एक तरफा नहीं कही जा सकती। सरकार अपने प्रतिनिधियों में एक भूतपूर्व सुप्रीम कोर्ट के जज को भी नियुक्त कर सकती है। एैसे प्राविधान किये जाने से बुद्धिजीवियों द्वारा उंगली उठाना बंद हो जायेगा।

चौथी बात: वर्तमान में कालेजियम की व्यवस्था स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने बना ली, बाद में सरकार के रूख को नामंजूर कर दिया गया। आये दिन चयन पर भाई भतीजावाद होने की संभावना बतायी जाती है। गांधी  नेे जब पहली भारत सरकार का गठन हो रहा था तो कांगेस पार्टी के लिये पांच सिद्धांत प्रतिपादित किये थे जिनमें से एक था भाई- भतीजावाद को पनपने से रोकना। मैं यह नहीं कह रहा कि न्यायाधीशों के चयन में भाई भतीजावाद हुआ है या होता है। पर इसकी संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता है।

यहां एक उदाहरण अभी अभी का है जब कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यू. ललित जजों के रिक्त पदों को भरने के लिये कालेजियम की मींटिंग बुलाना चाह रहे थे। कोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश धनंजय वाई चंद्रचूड़ जी रात्रि 9 बजे तक केस सुने रहे थे और मींटिंग नहीं हो सकी। बाद में मुख्य न्यायाधीश ने सूची चक्रानुसार कालेजियम के जजों के पास भेजी तो दो न्यायाधीशों ने हस्ताक्षर से मना कर दिया। इससे सुप्रीम कोर्ट के कालेजियम की किरकिरी हुयी। मुख्य न्यायाधीश जाते-जाते जजों की नियुक्ति करना चाहते थे पर अन्य साथियों ने सहमति व्यक्त नहीं की, मींटिंग भी नहीं हो पायी। इसका मतलब ये लगाया जा सकता है कि कालेजियम में भी पसंद को लेकर खींचातानी होती है।

एक और महत्वपूर्ण बिन्दु है उसी कोर्ट का वकील उसी हाई कोर्ट में जज बनाया जाना उचित नहीं लगता। जहां खुद उसके सीनियर जूनियर वकालत करते हो, जहां उसके रोज साथ उठने बैठने वाले मित्र वकील हो, जहां वह खुद सैकड़ों केस में वकील हो। एैसे वकील उसी कोर्ट में न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठतें हैं तो उन्हें बहुत फैसलों में मुश्किलों का सामना करना पड़ता होगा। जब जिला स्तर के अधिकारियों को उनके अपने जिलों में पोस्टिंग नहीं दी जाती है तो वकीलों को उसी हाई कोर्ट के बजाय किसी अन्य हाई कोर्ट में जज की नियुक्ति दी जाना चाहिये।

यदि ये कहें कि वकील जज बनते ही इन सब बातों से दूर केवल न्याय करता है तो सुप्रीम कोर्ट को सरकार द्वारा चयनित चुनाव आयुक्त पर शंका नहीं होना चाहिये  क्योंकि वो भी इन बातों से ऊपर उठ कर सत्य और न्यायपूर्ण निर्णय लेगा।

प्रसिद्ध विद्वान अधिवक्ता हरीष साल्वे का कहना है कि वे कालेजियम सिस्टम से कभी सहमत नहीं थे, न कभी होंगे। न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को राजनैतिक कार्यपालिका से पूरी तरह अलग रखने को वे सही नहीं मानते हैं। केवल जज ही जज की नियुक्तियां करे यह ठीक नहीं लगता। न्यायाधीशों की नियुक्ति या ट्रांसफर आदि पर जब प्रश्न चिन्ह लगता है तो कालेजियम या एपेक्स कोर्ट के पास उत्तर देने के लिये साधन, उपकरण और किसी हद तक सूचना विहीन होता हैं। ऐसे अवसर पर कालेजियम की कार्यप्रणाली सार्वजनिक दीर्घों में चर्चा का विषय बनती है जिससे उनकी छवि क्षीण होती है। न्यायाधीश की नियुक्ति करना कोर्ट का काम नहीं है उसके लिये कोई इन्स्टीट्यूसनल तरीका अधिक उपयुक्त होगा।

दशकों से न्याय के लियेे तरसते लोग: ये सच है कि अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते लोगों की पीढ़ियां निकल जाती है तो भी फैसले नहीं आते है। इस प्रक्रिया की सबसे दुखदायी बात ये है कि लगभग हर महीने दो महीने में तारीख लगती है, लोग गांव, शहर, जिलों से हाई कोर्ट पहुंचते है और हर महीने तारीख दे दी जाती है। यदि कोर्ट व्यस्त है तो तारीख 3 माह, 4 माह की दंे पर उस रोज सुनवायी अवश्य ही हो ताकि लोगों का समय और आने-जाने का प्रतिमाह व्यय बच सके। इसमे भी अधिकांश याचक वरिष्ठ नागरिक होते हैं और चक्कर लगाते लगाते वृद्ध हो जाते हैं।

प्रमाण के लिये अपना जाना एक केस उद्धत करना चाहूंगा। स्वतंत्रता सेनानी कोटे से गाजियाबाद विकास प्राधिकरण में श्री कृष्ण बिहारी लाल इन्दुरख्या को इन्द्रापुरम में एक प्लाट आवंटित हुआ था। जिसे कई साल बाद एक ही मुश्त में सारा रूपया जमा कराने का पत्र दिया गया वो भी समय सीमा के बाद भेजा गया इस बीच उस प्लाट को एक मंत्री को आवंटित कर दिया गया। उनकी मृत्यु हो गयी लेकिन इसकी सुनवायी लगभग 20 वर्षों से अधिक समय से चल रही है , बाद में उनकी पत्नी की भी मृत्यु हो गयी। पर इलाहाबाद हाई कोर्ट फैसला नहीं कर पाया। एैसे देश भर में हजारों केस हैं। इस तरह के प्रकरणों की सुनवायी की व्यवस्था होना चाहिये। खुद सुप्रीम कोर्ट का फैसला है Justice delayed is Justice denied यानि देरी से दिया गया न्याय का मतलब है न्याय नहीं दिया जाना। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाबजूद भी हजारों लाखों लोग न्याय से वंचित हो रहे हैं।

सवाल ये नहीं है जजों की नियुक्ति कौन करे सवाल ये है इसके लिये संवैधानिक व्यवस्था हो जो पारदर्शी हो और गठित नियमों के अनुसार हो ताकि न्यायपालिका में टिका हुआ जनता का विश्वास बना रहे। कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच लक्ष्मण रेखा होना चाहिये। एक दूसरे के अधिकारों पर अतिकृमण न हो। न्यायपालिका को प्रत्येक नियुक्ति को न्यायिक दृष्टि से देखने का अधिकार है। पर न्यायाधीशों की नियुक्ति के अतिरिक्त सरकारी अधिकारियों की भी नियुक्ति स्वयं करेगाी या नियुक्तियां में सम्मिलित होगी तो शिकायत कौन सुनेगा। सुप्रीम कोर्ट ही सुप्रीम है और सर्वशक्तिमान है जो संसद के भी बनाये नियमों को निरस्त कर कसता है पलट सकता है। एैसे में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को किसी भी सरकारी प्रक्रिया में सम्मिलित होने से बचना चाहिये।

हरीश साल्वे और अन्य बुद्धिजीवियों के विचारों को समझने से तो यही लगता है कि राष्ट्रीय जुडीशियल नियुक्ति आयोग के अपने पुराने एजेण्डा में कुछ सुधार और बदलाव करते हुये सरकार संसद से नया कानून पास करें जो स्वीकार योग्य हो। यदि वह सुप्रीम कोर्ट में बहस के लिये जाये यानि चेलेंज होता है तो वही समयानुकूल और सही प्लेटफॉर्म होगा जहां वर्तमान कालेजियम व्यवस्था की कमियां, त्रुटियां दर्शायी जा सकती है।

मेरे विचार में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये कोई उच्च स्तरीय संस्था बने जो विशुद्ध न तो राजनैतिक हो और न ही न्यायाधीशों के पूर्ण नियंत्रण या अधिकारों में हो। उसका नाम चाहे पुराना आयोग ही हो या कोई और पर कालेजियम सिस्टम को बदलना चाहिये। जो भी संस्था इस उद्देश्य से बने उसमें सुप्रीम कोर्ट का सेवानिवृत वरिष्ठ जज अध्यक्ष हो सकता है तथा एक प्रसिद्ध कानूनविद हो जिसे कम से कम 30 वर्ष का वकालत का अनुभव हो जिसमें 20-25 वर्ष का अनुभव हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में वकालत का हो। वेशक 1 जज सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान न्यायाधीशों में हो जिसे स्वयं सुप्रीम कोर्ट नामित करे। यह कमेटी संस्था या आयोग जजों की नियुक्ति के लिये सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और सरकार से नाम मांग सकती है, परामर्श ले सकती है। एैसी नियुक्तियां साधारणतः किसी अदालत में चेलेंज नहीं की जा सकेंगी। संस्था का सचिव या मेम्बर सचिव, भारत सरकार का अधिकारी हो जो कम से कम अतिरिक्त सचिव के समकक्ष हो। संस्था का कार्यकाल 3 वर्ष का रखा जा सकता है। राष्ट्रपति की अनुमति के बाद आयोग स्वयं नियुक्ति पत्र दे। आवश्यक ये भी होना चाहिये कि किसी भी जज की नियुक्ति उसके प्रैक्टिस करने वाले हाई कोर्ट में न की जाये।


विजय खैरा

Leave a Reply

Your email address will not be published.