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आगामी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण दिशा-सूचक

आगामी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण दिशा-सूचक

दिसंबर 2022 भारत की आगामी राजनीतिक यात्रा का महत्वपूर्ण दिशा सूचक है। गुजरात-हिमाचल विधानसभा, दिल्ली नगर निगम और विभिन्न राज्यों के उपचुनावों के परिणाम हमारे सामने हैं। गुजरात-हिमाचल विधानसभा और दिल्ली नगर निगम इन तीनों ही जगह पर भाजपा काबिज थी। गुजरात में भाजपा की धमाकेदार जीत हुई है, वहीं हिमाचल-दिल्ली में पार्टी सत्ता से बाहर हो गई है। ऐसे में सरसरी तौर पर चुनावों को भाजपा की हार के रूप में भी देखा जा सकता है क्योंकि कांग्रेस-आप के पास गंवाने के लिए कुछ नहीं था। ये दोनों पार्टियां दावेदार की भूमिका में थीं। ऐसे में यह जनादेश क्या भाजपा के लिए खतरे की घंटी है?

स्थानीय नेतृत्व की जरूरत

उत्तर प्रदेश और असम में भाजपा ने मुस्लिम मतों के ध्रुवीकरण के बावजूद बड़ी जीत हासिल की। ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि दोनों राज्यों योगी और सरना के रूप में पार्टी के पास निर्णायक और सशक्त नेतृत्व था। वहीं हरियाणा में लोकसभा चुनावों की बंपर जीत के तुरंत बाद हुए चुनावों में पार्टी बहुमत से पीछे रह गई क्योंकि कहीं न कहीं खट्टर प्रभावी नेता के रूप में अपनी छाप छोड़ने में विफल रहे हैं। दिल्ली में भी लोकसभा चुनावों में जीत और स्थानीय चुनावों में हार के लिए स्थानीय नेतृत्व के अभाव को जिम्मेदार माना जा सकता है। ऐसे में पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ जैसे ऐसे राज्य जहां शीघ्र ही चुनाव होने वाले हैं, वहां नेतृत्व का मसला सुलझाया जाए और बूढ़े हो चुके नेताओं की जगह नए चेहरे सामने लाए जाएं। मोदी की लोकप्रियता भी राज्य स्तर पर तभी आवर्धित होती है जब राज्य स्तर भी कोई सशक्त और लोकप्रिय चेहरा मौजूद हो।

अगर इन चुनावों के परिणाम को 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों के लिए संकेत के रूप में देखा जाए तो इसमें सभी पार्टियों के लिए गहरा सबक है। सबसे पहले सबसे नई पार्टी की बात करते हैं। दिल्ली नगर निगम में आप की जीत के बावजूद भाजपा और आप के मत प्रतिशत में मात्र तीन प्रतिशत का अंतर हैं। विधानसभा चुनावों की तरह यह एकतरफा जीत नहीं है। 2015 में दिल्ली विधानसभा में अपनी पहली जीत में आप ने 54.3 प्रतिशत और भाजपा ने 32.2 प्रतिशत मत हासिल किए और 70 में से 67 जीतें हासिल कीं। इस चुनाव में कांग्रेस ही नहीं बल्कि बसपा का भी करीब-करीब पूरा मत प्रतिशत आप की तरफ खिसक गया था। इसके बाद 2020 में हुए विधानसभा चुनावों में भी आप ने धमाकेदार जीत हासिल की हालांकि भाजपा का प्रतिशत 32 से बढ़कर 38 तक पहुंच गया। इसके बाद हाल ही में हुए नगर निगम में दोनों पार्टियों का अंतर तीन प्रतिशत तक सिमट गया है। इस तरह साफ है कि भाजपा हार के बावजूद अपना मत प्रतिशत लगातार बढ़ा रही है। अब भाजपा के लिए बड़ी चुनौती यह है कि पार्टी आप से आगे कैसे निकले। अभी तक दिल्ली का स्थानीय नेतृत्व आप को घेरने में नाकाम साबित हुआ है। पार्टी को ऐसे स्थानीय नेताओं का नेतृत्व खड़ा करना होगा जो केजरीवाल सरकार को स्थानीय मुद्दों पर घेर सकें। नगर निगम चुनावों में यह बात भी सामने आई है कि दिल्ली के सिख मतदाताओं ने भाजपा से दूरी बना ली है। सिख मतदाता प्रभाव वाले राजौरी गार्डन, मादीपुर, तिलकनगर, हरीनगर, जनकपुरी विधानसभा क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी ने लगभग एकतरफा जीत हासिल की है। परिणामों से पहले ही एक टीवी चैनल द्वारा किए गए सर्वे में दावा किया गया था कि इन चुनावों में 56 फीसदी सिख वोट आप, 26 फीसदी भाजपा और 8 फीसदी कांग्रेस को मिले हैं।

पहाड़ी राज्य हिमाचल में पांच वर्ष में सरकार बदलने का रिवाज जारी रहा है। मत प्रतिशत में बेहद मामूली अंतर के बावजूद भाजपा सत्ता की दौड़ में काफी पीछे रह गई। भाजपा की इस हार के लिए कांग्रेस के मुफ्त रेवड़ियों के वादों को श्रेय दिया जा रहा है लेकिन भाजपा की हार में टिकट वितरण की खामियों और बागियों की बड़ी भूमिका है। प्रदेश में सरकार से ज्यादा स्थानीय प्रतिनिधियों के विरुद्ध असंतोष था। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मुख्यमंत्री और उनके दो मंत्रियों के अलावा सभी कैबिनेट मंत्री अपना चुनाव हार गए हैं। तीन जगह पार्टी के बागी भाजपा के अधिकृत उम्मीदवारों को हराकर विजयी रहे हैं। इन सीटों में नालागढ़ सीट का विशेष जिक्र होना चाहिए। यहां भाजपा ने कांग्रेस के वर्तमान विधायक को पार्टी में शामिल करके टिकट दिया। यहां स्थानीय भाजपा नेता ने निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल की और भाजपा तीसरे स्थान पर रही। इसी तरह ऊना जिले के गगरेट में भाजपा की टिकट नहीं मिलने पर कांग्रेस की तरफ से लड़ने वाले उम्मीदवार विजयी रहे।

गुजरात में भगवा पार्टी ने स्वतंत्रता के बाद के सारे रिकार्ड तोड़ते हुए अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। मोदी-अमित शाह के गुजरात से जुड़ाव और राज्य में अलग-अलग वर्गों को साधने की रणनीति से पार्टी ने यह करिश्मा कर दिखाया है। गौरतलब है कि राज्य में 14 महीने पहले ही मुख्यमंत्री विजय रूपाणी समेत उनकी पूरी केबिनेट बदल दी गई थी। टिकट वितरण में भी 182 में से 103 नए चेहरों को अवसर दिया गया। इन सब साहसिक परिणामों का भाजपा को लाभ मिला और पुराने सारे रिकार्ड इतिहास बन गए। आम आदमी पार्टी ने यहां जोरदार चुनाव अभियान चलाया हालांकि पार्टी ने भाजपा के बजाय कांग्रेस के वोट बैंक को ज्यादा नुकसान पहुंचाया।

इन चुनावों को समग्र रूप से देखा जाए तो इससे 2024 के लिए क्या संकेत मिलते हैं। इन परिणामों की सबसे महत्वपूर्ण सीख यह है कि सरकार के प्रति नाराजगी के साथ-साथ स्थानीय प्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी से निपटना भी बेहद जरूरी है। यदि भाजपा अगले लोकसभा चुनावों में फिर से जीत का परचम लहराना चाहती है तो पार्टी को स्थानीय स्तर पर जनता का समर्थन गंवा चुके सांसदों की टिकटें काटने में सख्ती दिखानी होगी। अब 2024 के चुनावों में चूंकि डेढ़ वर्ष से भी कम समय बचा है तो यदि कमतर प्रदर्शन वाले मंत्रियों को कैबिनेट से बाहर किया जाना है, इसके लिए यह आखिरी मौका है। इसके अलावा केंद्र सरकार के लिए यह भी जरूरी है कि महत्वपूर्ण बिल और पार्टी की विचारधारा से संबंधित कार्य तुरंत पूरे किए जाएं। गौरतलब है कि हिमाचल में भाजपा ने समान अचार संहिता लाने का वायदा किया था लेकिन लोगों के मन में इससे प्रश्न उमड़े कि आखिर राज्य में सत्ता में रहने के दौरान पांच वर्षों के दौरान ऐसा क्यों नहीं किया गया। आगामी लोकसभा चुनावों में कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना और मुफ्त सुविधाओं के वादे भी भाजपा के लिए बड़ा सिरदर्द बनने वाले हैं। इनकी काट के लिए पार्टी को सब के लिए आय जैसा कोई अभिनव समाधान तलाशना पड़ेगा। आम लोगों पर कर का बोझ बढ़ाए बिना ऐसा कैसे किया जा सकता है, पार्टी को यह पहेली सुलझानी होगी। इन चुनावों में एक अन्य बात सामने आई है कि गुजरात जैसे ऐसे राज्य जहां कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला होता रहा है, वहां आप के रूप में तीसरा विकल्प भी उभर रहा है। भाजपा को आप की जनता से सीधे जुड़ने की क्षमता, युवाओं में इसके प्रति आकर्षण और सब मुफ्त में देने के वादों की भी काट ढूंढ़नी होगी। बहरहाल, इन चुनावों ने साबित किया है कि ब्रांड मोदी की लोकप्रियता बरकरार है, ऐसे में पार्टी अगर संगठनात्मक खामियां दूर कर ले तो केंद्र में तीसरी बार जीत का इतिहास रच सकती है।

 

प्रेरणा कुमारी

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