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बीजेपी के लिए गुजरात है शक्ति, हिमाचल एक संदेश

बीजेपी के लिए गुजरात है शक्ति, हिमाचल एक संदेश

आठ दिसंबर के दिन दो राज्यों हिमाचल और गुजरात के आए नतीजे भारतीय जनता पार्टी के लिए एक साथ दो तरह के संकेत लेकर आए हैं। भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में गुजरात से आए रिकॉर्डतोड़ नतीजों से साफ है कि पार्टी के लिए गुजरात शक्ति का अजस्र केंद्र बन गया है। जिससे मिली ताकत उसे लोक के मानस में गहरे तक पैठाने में मददगार होगी। हालांकि हिमाचल के नतीजों ने संकेत दिया है कि अगर उसने अनुशासन का साथ छोड़ दिया, संकुचित हितों को पार्टी और संगठन हित पर तवज्जो दी, तो जनता उसका कान भी ऐंठ सकती है। अगर इन नतीजों में दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजों का भी संदर्भ जोड़ें तो भाजपा के लिए संकेत और व्यापक हैं। हिमाचल और दिल्ली के नतीजे बताते हैं कि लोक का मानस भाजपा से दूर नहीं हुआ है, लेकिन संगठन के अंदर बढ़ रही गुटबाजी और अहं के टकराव उसे स्वीकार्य नहीं है। इसके संकेत यह भी है कि लोक पार्टी के नाम पर आए किसी भी व्यक्ति को समर्थन देने से रहा। अब उसे भी परख है कि कौन किस काबिल है? इसलिए पार्टी अपने सिद्धांतों के पैमाने पर परखी शख्सियतों को चुनावी मैदान में नहीं उतारेगी तो उसे किनारे लगाने में लोग देर नहीं करेगें।

दलीय राजनीति के लिहाज से गुजरात और हिमाचल प्रदेश के नतीजे भले ही विरोधाभाषी हों, लेकिन दोनों में एक चीज समान है। दोनों ही राज्यों में दोनों ही पार्टियों की मिली जीत लोक आकांक्षाओं के उभार का प्रतीक है। गुजरात की जहां नरेंद्र मोदी से उम्मीदें बढ़ गईं हैं, वहीं हिमाचल प्रदेश के लोगों को अपने निजी हित कांग्रेस के जरिए पूरे होते नजर आ रहे हैं। हिमाचल की जनाकांक्षाएं जहां पुरानी पेंशन स्कीम और तीन सौ यूनिट प्रति माह फ्री बिजली मिलने के इर्द-गिर्द है तो गुजरात के लोगों की उम्मीदें बेहतर और शांत भविष्य की है। लेकिन बहुधा जनाकांक्षाएं राजनीतिक दलों के लिए चुनौती होती हैं। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या वह उन वायदों को हिमाचल में पूरा कर पाएगी, जो उसने लोगों से किए है तो वहीं गुजरात के जनाकांक्षाओं का उबाल भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे की घंटी हो सकती है।

जनाकांक्षाओं के उफान की चुनौतियों पर चर्चा से पहले गुजरात और हिमाचल के नतीजों के दूसरे संकेतों पर भी गौर करना जरूरी है। मजदूर दिवस के दिन 1960 में महाराष्ट्र से अलग अस्तित्व में आने के बाद गुजरात का यह पहला विधानसभा चुनाव है, जिसमें किसी पार्टी को इतनी बड़ी जीत मिली है। इस बार भारतीय जनता पार्टी ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 182 सदस्यों वाली विधानसभा में 156 सीटें जीत ली हैं। इसके पहले भारी जीत का रिकॉर्ड कांग्रेस के दिग्गज नेता माधव सिंह सोलंकी के नाम था, जिन्हें 1985 के विधानसभा चुनावों में 149 सीटें हासिल हुई थीं। हालांकि तब इंदिरा गांधी की हत्या हुए बहुत दिन नहीं हुए थे। इसलिए कह सकते हैं कि उससे उपजी सहानुभूति लहर का भी तब असर था। रही बात भारतीय जनता पार्टी की तो उसके विरोधी आरोप लगाते हैं कि भाजपा का उभार गोधरा कांड के बाद हुआ। 2002 के गोधरा कांड और उसके बाद फैले राज्य व्यापी दंगों के बाद हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को 127 सीटें मिली थीं। विपक्षियों के मुताबिक वह जीत हिंदुत्व की प्रयोगशाला का नतीजा थी। लेकिन इस बार की जीत के बारे में ऐसा नहीं कह सकते। इस बार की प्रचंड जीत सही मायने में गुजरात के माटी के सपूत नरेंद्र मोदी के प्रति राज्य के लोगों के असीम प्यार और उनसे बेहतर और शांत राज्य की उम्मीदों की विजय है। यह नरेंद्र मोदी और अमित शाह के सांगठनिक कौशल और कठिन मेहनत की जीत है।

नरेंद्र मोदी जानते हैं कि भले ही वे उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट का इन दिनों लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन उनकी बुनियाद की ईंट गुजरात है। अगर गुजरात बिखरा तो भाजपा का राजनीतिक शिराजा भी बिखरता नजर आएगा। इसलिए उन्होंने पूरा जोर लगा दिया। जरूरत पड़ी तो पुराने दिग्गजों को चुनाव न लड़ने के लिए मना लिया। भारतीय जनता पार्टी मानती है कि उसके यहां सत्ता विरोधी लहर पार्टी नहीं, व्यक्ति के प्रति होती है। लिहाजा वह व्यक्तियों को बदलने की कोशिश करती है। व्यक्ति बदलने का असर नजर भी आता है। 2017 के दिल्ली नगर निगम के चुनावों में दिल्ली भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष मनोज तिवारी ने सभी पार्षदों से इस्तीफा लेकर नए लोगों पर भरोसा जताया था। इसका असर दिखा था और सारी सत्ता विरोधी लहर हवा हो गई थी। कुछ ऐसा ही गुजरात में मोदी-शाह की जोड़ी ने किया। इसका नतीजा यह प्रचंड जीत है। गुजरात की जीत ने सत्ता विरोधी लहर की बजाय सत्ता समर्थक लहर की नई चुनावी परिभाषा और परिपाटी की शुरूआत की है। गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की भारी विजय को इस संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।

गुजरात में इस बार कांग्रेस लड़ती हुई भी नजर नहीं आई। यह भी कम हैरत की बात नहीं है कि जिस कांग्रेस को 2017 के विधानसभा चुनावों में 77 सीटें मिली थीं, वह पूरे पांच साल तक न तो विधानसभा में और नही सड़क पर सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ कोई संघर्ष करते नजर आई। उसके नेता राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा में जुटे हैं और कांग्रेस का बड़ा अमला भारत जोड़ने की उनकी कवायद के ही साथ जुड़ा हुआ है। नरेंद्र मोदी के उभार के बाद से ही कांग्रेस गुजरात को सबसे अहम राज्यों में रखती आई है। लेकिन इस बार के चुनावों में ऐसा नहीं लगा कि वह चुनाव लड़ भी रही है। इसके बावजूद भाजपा को मिले 52 प्रतिशत मतों के मुकाबले कांग्रेस को 27 फीसद से ज्यादा वोटरों का समर्थन मिलना जताता है कि पार्टी ने अपना रूख नहीं बदला तो वह इसी तरह अधोगति को प्राप्त होती रहेगी।

हालांकि हिमाचल ने कांग्रेस को संजीवनी दी है। हिमाचल ने गुजरात की सत्ता समर्थक परिभाषा को ठेंगा दिखाया है। जबकि हिमाचल सरकार ने कम काम नहीं किया है। कोरोना के दंश के बीच हिमाचल पहला राज्य रहा, जिसने शत-प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य सबसे पहले हासिल किया। बिलासपुर को एम्स की सौगात और रोहतांग सुरंग का निर्माण हो या ऊना तक चली वंदेभारत एक्सप्रेस, हिमाचल को मोदी और जयराम ठाकुर की सरकार ने तमाम सहूलियतें मुहैया कराईं, जयराम ठाकुर सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई बड़ा आरोप भी नहीं रहा। फिर भी जयराम ठाकुर सरकार हार गई।

सबसे बड़ी बात यह है कि जिस तरह गुजरात भाजपा के शीर्ष पुरूष मोदी-शाह का गृहराज्य है, उसी तरह हिमाचल भाजपा के अध्यक्ष जयराम ठाकुर का अपना राज्य है। ऐसे में भाजपा के अंदरूनी हलके में अगर नड्डा की नैतिक सत्ता पर सवाल उठने लगे तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

गुजरात में भले ही कांग्रेस कुछ करती नजर नहीं आई, लेकिन हिमाचल में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी सक्रिय नजर आईं। उनके लेफ्टिनेंट समझे जाने वाले राजीव शुक्ल और कांग्रेस के चुनाव प्रभारी भूपेश बघेल और सह प्रभारी सचिन पायलट ने मेहनत की। कायदे से हिमाचल की जीत का श्रेय इन नेताओं को मिलना चाहिए, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस जीत के लिए राहुल की भारत जोड़ो यात्रा को श्रेय दिया है। इससे साफ होता है कि कांग्रेस में अंदरखाने में दरअसल क्या चल रहा है और उसकी क्या सोच है। भूपेश बघेल और सचिन पायलट का नाम लेना तो कांग्रेस के आलाकमान कल्चर में संभव ना हो, लेकिन प्रियंका को श्रेय नहीं दिया जाना आखिर क्या संकेत करता है?

दोनों राज्यों के चुनाव नतीजों का संकेत है कि भारतीय जनता पार्टी को अपनी दूसरी पांत के नेताओं को उभारने पर तरजीह देनी होगी। जहां मोदी-शाह नहीं जाएंगे, जिस इलाके पर उनका फोकस नहीं होगा, वहां ताकतवर संगठन होने के बावजूद जीत मिलना मुश्किल है। पिछली सदी के नब्बे के दशक में भाजपा को अपनी दूसरी पांत के नेताओं पर गुमान होता था। भाजपा को अब इस दिशा में भी सोचना होगा। क्योंकि हिमाचल में मोदी-शाह की जोड़ी ने बहुत मेहनत नहीं की। बल्कि जेपी नड्डा को पूरा राज्य सौंप दिया था।

इन चुनावों  का एक संकेत यह भी है कि आम आदमी पार्टी वहीं उभर सकती हैं, जहां कांग्रेस खत्म हो सकती है। अगर कांग्रेस कमजोर नहीं है तो वहां उसका उभार संभव नहीं है। दिल्ली और पंजाब के बाद इन दोनों राज्यो के नतीजे इसका गवाह हैं। हिमाचल में कांग्रेस कमजोर नहीं है तो आम आदमी पार्टी कुछ नहीं कर पाई। दिल्ली के नगर निगम के चुनावों में भी वह भाजपा को उसने जितना नुकसान नहीं पहुंचाया, उससे ज्यादा उसके निशाने पर कांग्रेस रही है।

इन चुनावों ने साबित किया है कि मुफ्त चुनावी रेवड़ियों पर उन राज्यों की जनता का ध्यान ज्यादा है, जहां की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत कमजोर है या जहां सर्विस क्लास ज्यादा है। हिमाचल में तकरीबन हर घर में एक व्यक्ति सरकारी नौकरी में है। जबकि गुजरात कारोबारी मानसिकता वाला राज्य है। इसलिए हिमाचल में पुरानी पेंशन स्कीम और मुफ्त बिजली की रेवड़ी लोगों को आकर्षित कर जाती है, लेकिन गुजरात के लोग मुफ्तखोरी को नकार देते हैं।

आखिर में चर्चा जनाकांक्षाओं के उफान की…भाजपा के साथ एक अच्छी बात यह है कि उसके पास मजबूत सांगठनिक ढांचा है। वह जनाकांक्षाओं के उभार को संतुलित कर सकती है, जबकि इन दिनों वामपंथ की ओर झुकी कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा कमजोर हो गया है, इसलिए उसके लिए जनाकांक्षा का उभार खतरा हो सकता है। इस ओर उसे ध्यान देना ही होगा।

 

 

 

उमेश चतुर्वेदी

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