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सच में टूट रहा है पहाड़ की जवानी और पानी का मिथक?

सच में टूट रहा है पहाड़ की  जवानी और पानी का मिथक?

पता नही कितनी सदियों से यह मिथक उत्तराखण्ड में प्रचलन में है कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नही आती। अंग्रेजों द्वारा गठित की गई सेनाओं में भर्ती होने के साथ भारत के महानगरों के आसपास उद्योगों के विकास के साथ आरंभ हुआ पलायन पिछले तीन सौ साल में कब पहाड़ की नियति बना यह किसी को पता ही नही चला। इस बात में कोई संदेह नही कि पहाड़ों की तलहटियों में बहने वाली नदियों से पहाड़ का पानी ढलानों से उतरते हुए मैदानों की ओर निकल जाता है और वहां करोड़ों लोगों को जीवन देता है लेकिन चोटी में बसे पहाड़ के गांवों के काम नही आता। ऐसे ही पहाड़ के युवा पहले शिक्षा ग्रहण करने के बाद महानगरों की ओर नौकरी के हो जाते हैं और उनकी जवानी भी इसी तरह पहाड़ या उनकी मातृभूमि के काम नही आती।

1911 में अंग्रेजों द्वारा दिल्ली को अपनी राजधानी बनाने के बाद कम पढे लिखे गरीब पहाड़ियों का अंग्रेज अधिकारियों के घरों में घरेलु कामगार बनने का सिलसिला शुरू हुआ तो 1932 से लेकर 1990 तक आधा उत्तराखण्ड दिल्ली महानगर में समा गया। 1990 के बाद तेजी से फैले अलग उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन तक नियति यही बनी रही, इसके बाद स्वतः स्फूर्त जनचेतना और शिक्षा के तेज प्रसार से पलायन का स्वरूप तो बदला लेकिन पलायन रूकने और कम होने का क्रम तो 9 नवंबर 2000 में अलग राज्य बनने के बाद भी जारी रहा। दो साल पहले इस संबंध में गठित एक आयोग के अध्ययनों की मानें तो अलग राज्य बनने के बाद पहाड़ों से पलायन कम होने के बजाय और बढ़ा है। अब तक पलायन के चलते उत्तराखण्ड के चार हजार गांव खाली हो चुके हैं और तीन हजार को भुतवा गांवों की उपाधी इसलिए मिली कि वे निर्जन हो चुके। हालांकि 1990 के बाद पहाड़ से होने वाले पलायन का स्वरूप बदला और इसमें घरेलू कामगारों के बजाय पढे-लिखे नौजवानों की संख्या बढ़ी और वर्ष 2000 के बाद पढे़ लिखे युवा अच्छी नौकरियों के लिए महानगरों की ओर जाने लगे हैं लेकिन इससे पहाड़ के गांवों और व्यवस्था को लाभ नही मिला।

बहरहाल पलायन का स्वरूप बदलने के बाद भी पहाड़ की आजीविका के श्रोतों, खेती-किसानी और व्यवस्था को संबल नही मिला। इसलिए अभी भी पहाड़ को इस बात के लिए शापित माना जा सकता है कि उसका पानी और उसके नौजवानों की जवानी पहाड़ के काम नही आती। हिमाचल में उत्तराखण्ड की अपेक्षा पलायन काफी कम है इसलिए यह मिथक उत्तराखण्ड को लेकर ही प्रचलन में है।

पिछले कुछ वर्षों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तराखण्ड को लेकर अपने हर संबोधन में यह कहना नही भूलते कि इक्कीसवीं सदी का तीसरा दशक उत्तराखण्ड का दशक होगा। पिछले वर्ष केदारनाथ में आदि शंकराचार्य की समाधि के उदघाटन के दौरान प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहाड़ की जवानी और पहाड़ के पानी के पहाड़ के काम न आने वाले मिथक का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने पहाड़ के पानी और जवानी को पहाड़ के काम लाने का बीड़ा उठाया है और जल्दी ही वे इस मिथक को हमेशा के लिए तोड़ देंगें। उनका कहना था कि वह दिन दूर नही जब पहाड़ का पानी आौर जवानी दोनों पहाड़ के काम आयेंगे। कुछ दिन पूर्व प्रधानमंत्री ने वर्चुअल संवाद में मसूरी के आसपास के गांवों की कुछ महिला ग्राम प्रधानों से संवाद में जाना कि कैसे घर-घर नल स्कीम से उनके घर में पानी आया है और वे इस जल से अपनी बागवानी और खेती बाड़ी को संबल दे रहे हैं और किस तरह होम स्टेट जैसे प्रयासों से वे अपनी आजीविका जुटाने और आय संवर्धन में कामयाब रहे हैं। इस बात में कोई संदेह नही कि हर घर जल योजना से उत्तराखण्ड के ग्रामीण इलाकों में पानी की समस्या का त्वरित समाधान हुआ है और छोटी-मोटी बागवानी और सब्जी, फल उगाने वाले काश्तकार थोड़े बहुत खुश हैं लेकिन अतीत के अनुभव इसे दीर्घकालिक समाधान नही मानते। पानी के श्रोतों की सततता पर ही इन योजनाओं का जीवन और लोगों की खुशहाली निर्भर होती है। पानी उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों में एक बहुत बड़ी समस्या रही है। गर्मियों में उत्तराखण्ड के सैकड़ों गांव भीषण जल संकट का सामना करते हैं। जलवायु परिवर्तन और और अंधाधुध वनों के दोहन से ऊंचाई पर स्थित जलश्रोत सूख गये हंैं या कुछ बचे भी हैं तो गर्मियों में सूख जाते हैं। इसके लिए ऐसी जल योजनाएं या जल श्रोत चाहिए जो सदा बने रहें।

आत्मनिर्भर उत्तराखण्ड 2025 के अंतर्गत आरंभ की गई मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की बोधिसत्व श्रंृखला का मजमून बताता है कि वे इस समस्या को भली-भांित समझते हैं इसलिए जलधारा पुनर्जीवीकरण उनका मुख्य संकल्प है। इसके लिए चालखाल और नौलेधारों का पुर्नजीवन जरूरी है। गंगा, हिमालय और शांत वातावरण उत्तराखण्ड का नैसर्गिक संसाधन जरूर है लेकिन इसके लिए इनका संरक्षण भी जरूरी है। बोधिसत्व की इस श्रंखला में जो प्राथमिकताये संवाद के बाद तय की जा रही है उनमें बड़ी योजनाएं नही हैं। 2000 में राज्य बनने के बाद उर्जा और पर्यटन की जो अवधारणा राज्य पर थोप दी र्गइ उसे सिरे से किनारे कर छोटी-छोटी येाजनाओं या उपक्रमों को उत्तराखण्ड की जवानी और पानी को उत्तराखण्ड के काम आने के अवदानों के रूप में समेटा जा रहा है। इनमें प्राकृतिक खेती को आंदोलन बनाने का संकल्प भी है जो पर्वतीय या ग्रामीण उत्तराखण्ड के लिए संजीवनी बन सकता है लेकिन यह ध्यान में रखते हुए कि बहुत बड़े इलाके में भूमि बंजर हो रही है उसे रिचार्ज करने के लिए जलश्रोतों के रिचार्ज होने और वनीकरण की तुरंत आवश्यकता है। असंगठित ही सही जैविक खेती उत्तराखण्ड के छोटे किसानों और महिलाओं के लिए पिछले तीन दशक से आजीविका का संबल बनी हुई है। 2004 में बनाई गई उत्तराखण्ड ग्राम्य विकास समिति उत्तराखण्ड ग्राम्य विकास विभाग की सरपरस्ती में ग्रामीण काश्तकारों और उद्यमियों की आय संवर्धन के लिए रूरल इंटरप्राइज एक्लीअरेशन प्रोजक्ट (रीप) जैसे जो उपक्रम आईफैड जैसे अंतराष्ट्रीय सस्थानों के सहयोग से चला रहे हैं यदि ये असल में जमीन पर सार्थक प्रयास करते हैं तो संदेह नही पहाड़ी प्रदेश का ग्रामीण खुशहाल हो सकता है।

धार्मिक पर्यटन 2025 आत्मनिर्भर उत्तराखण्ड की रीढ है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद इसे पुनः पटरी पर लाना कठिन था लेकिन समय ने केदारनाथ आपदा के धाव भर दिये और 9 साल बाद केदारनाथ बद्रीनाथ में रिकार्ड पर्यटक आये। उत्तम रोड नेटवर्क और अन्य सुविधाओं के चलते तय है कि भविष्य में इसी तरह अन्य आस्था एवं पर्यटक स्थल सालभर गुलजार रहेंगे। राज्य को धार्मिक पयर्टन का हब बनाने के लिए सरकार कई किस्म के पर्यटन सर्किट बना रही है ये सब भविष्य में सरकार के उस मिशन को तो आगे बढा सकती हैं जिसमें सरकार अगले 10 वर्ष में राज्य के लोगों की आमदनी तीन गुना बढा सकती है लेकिन युवाओं के लिए इस आमदनी में बहुत कुछ नही है। धार्मिक पर्यटन युवाओं के लिए भी लाभप्रद हो इसमें उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। हिमालय, गंगा और शांत वातावरण के बीच युवाओं को होम स्टे जैसे विकल्प रोजगार दे सकते हैं हालांकि सरकार ने इस तरह की योजनाऐं आरंभ की हैं और युवा इस ओर सरकार की सहायता से उद्यम लगाने के प्रयास कर रहे हैं लेकिन अभी इस दिषा में बहुत कुछ किया जाना बाकी हैं।

जड़ीबूटी और औषधीय पादपों की खेती राज्य के युवाओं को भी आकर्षित करती है। राज्य में बहुत क्षेत्रों में लोग इस तरह के उपक्रमों में लगे हैं लेकिन राज्य से युवा पीढी के पलायन की गति देखी जाय तो अभी भी लग रहा है इन प्रयासों में युवा वर्ग टिक नही पा रहा है। खेती किसी भी तरह की हो उसमें नगदी की भरमार के बिना युवाओं को रोका नही जा सकता। युवाओं की इन उद्यमों के प्रति सोच बदलने के साथ-साथ उनके मन से नौकरी की मानसिकता तब निकल सकती है जब ये प्रयास उन्हें प्रर्याप्त मात्रा में नकदी दें। इसे राज्य का दुर्भाग्य ही कहा जायोग कि अलग राज्य बनने के 22 साल बाद भी हम नियोजन के पहले पायदान पर खड़े हैं। बडी बड़ी जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर घोषित उर्जा राज्य और पर्यटन प्रदेश के तमगे में असफल होने के बाद राज्य को खनन और शराब प्रदेश बनाने का विजन देने की कोिशशोंं में उन तमाम छोटी और महत्वपूर्ण चीजों को छोड़ दिया गया जो तेजी से पिघलते ग्लेशियरों और उतनी ही तेजी से गरम होती धरती की सेहत के लिए रामबाण साबित हो सकती हंैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उत्तराखण्ड में धार्मिक पर्यटन व विकास के लिए सुविधाओं का संजाल देकर और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी बोधिसत्व अवधारणा के अंतगर्त 25 साल के उत्तराखण्ड के आत्मनिर्भर होने का जो नारा दे रहे हैं उसके लिए तमाम सारे संकल्प भी पूरे करने हैं और सबसे बड़ी चिंता इसमें राज्य में शिक्षित युंवाओं के लिए रोजगार की व्यवस्था कर उनका पलायन रोकना है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के जिस दावे पर लोग गाहे-बगाहे चर्चा कर रहे हैं कि वे भविष्य में पहाड़ की जवानी और पहाड़ के पानी के पहाड़ के काम न आने वाली अवधारणा को खत्म कर देंगे अर्थात पानी और जवानी दोनों पहाड़ के काम आयेंगे। इसे एक उददात सोच कहा जा सकता है लेकिन ऐसा करना समय और श्रम साध्य काम है। उनका यह कहना कि उन्होंने इस बात का बीड़ा उठाया है प्रशंसनीय है लेकिन ऐसा हो पाना उत्तराखण्ड की नियति और अतीत से उसको मुक्ति मिलना होगा और यह तभी संभव है जब उत्तराखण्ड की आमदनी तीन गुनी हो जाय और राज्य को केन्द्र ग्रीन बोनस के रूप में हर साल पांच हजार करोड़ की क्षतिपूर्ति दे। वरना पलायन रोकना बहुत असंभव है।

नीरज जोशी

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