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काशी हिन्दू विश्वविद्यालयः ये मालवीय जी की देशभक्ति, ये उनका साहस ये उनकी शक्ति, प्रकट हुई है नवीन होकर ये कर्मवीरों की राजधानी

काशी हिन्दू विश्वविद्यालयः ये मालवीय जी की देशभक्ति, ये उनका साहस ये उनकी शक्ति, प्रकट हुई है नवीन होकर ये कर्मवीरों की राजधानी

भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी की विगत 25 दिसंबर को जन्म-जयंती देश भर में मनायी गई l प्रस्तुत है इस अवसर पर उनके जीवन, व्यक्तित्व और कृति पर शोधपरक आलेख। महामना ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अपने संकल्प को ईंट दर ईंट मूर्त रूप किस प्रकार दिया, आलेख में इस पर विशेष रोशनी डाली गई है l आलेख के शोधकर्ता और लेखक प्रोफेसर राकेश कुमार उपाध्याय

भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में भाषा पत्रकारिता विभाग के निदेशक हैं l पूर्व में प्रोफेसर उपाध्याय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में भारत अध्ययन केंद्र के संस्थापक सेंटेनियल चेयर प्रोफेसर रह चुके हैं l आप आजतक, Zee न्यूज, न्यूज 24, लाइव इंडिया समेत राष्ट्रीय मीडिया के अनेक प्रतिष्ठानों से बतौर पत्रकार जुड़े रहे हैं l

मालवीय जी शिक्षाविद् थे, साथ ही पत्रकार, संपादक, लेखक, कवि और साहित्यकार भी थे। मालवीय जी राजनेता थे, साथ ही प्रतिष्ठित विधिविशेषज्ञ, प्रतिष्ठित वकील, भाषाविद्, संस्कृत, अंग्रेजी के साथ हिन्दी और ऊर्दू के भी प्रकांड विद्वान थे।

मालवीय जी सद्गृहस्थ सनातनधर्मी आचारनिष्ठ संस्कृतज्ञ थे, साथ ही सर्वहितकारी, जीवों के प्रति दयालु, प्रकृति प्रेमी, आयुर्वेद के उद्धारक, सभी को जोड़कर चलने वाले, मित्रों के मित्र, विद्वेषियों से भी प्रेम रखने वाले और सर्वसाधारण समाज के प्रति ममतामयी दृष्टि रखने वाले थे।

मालवीय जी भागवत कथा प्रेमी, कथा-कीर्तन में सदा मन रखने वाले धार्मिक थे किन्तु छुआछूत के कट्टर विरोधी, समाज के वंचित वर्गों की शिक्षा के हिमायती, स्त्री शिक्षा के पुरोधा और राष्ट्र जीवन के सभी क्षेत्रों में सभी के सतत कल्याण की कामना कर चलने वाले महामनुष्य थे।

उन्होंने शिक्षा की ओर दृष्टि उठाई तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय जैसा महान कीर्ति कलश खड़ा किया। मंदिरों की ओर दृष्टि उठाई तो संसार में सबसे ऊंचे मंदिरों में शुमार बीएचयू के केंद्र में विश्वनाथ मंदिर और मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के उद्धार का मार्ग प्रशस्त किया। जन-जन तक अत्यंत सस्ती दरों पर आध्यात्मिक-धार्मिक साहित्य पहुंचाने के लिए गीताप्रेस, गोरखपुर की स्थापना में भी केंद्रीय भूमिका निभाई।

विधि और कानून की ओर देखा तो देश के सबसे प्रतिष्ठित वकील बने। चौरी चौरा कांड में फांसी की सजा पाए 172 आरोपियों में 157 लोगों को फांसी के फंदे से बचा लिया। शेष की सजा भी उम्रकैद में परिवर्तित कराने में सफलता प्राप्त की। इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य बने। इंडस्ट्रियल कमीशन की रिपोर्ट में भारतीय मेधा और नवोन्मेषी भारतीय उद्यमी परंपरा को नकारे जाने के खिलाफ न केवल अभियान चलाया बल्कि उस पर विस्तृत विद्वत्तापूर्ण आपत्ति पत्र लिखकर ब्रिटिश सरकार को बताया कि अंग्रेजों के आने के पहले भारत प्रत्येक क्षेत्र में महान तरक्की कर रहा था। भारत की औद्योगिक और आर्थिक दुर्दशा हुई है तो उसका कारण अंग्रेज और अंग्रेजीराज है।

अंग्रेज जब गंगा की अविरल और निर्मल धारा को अवरूद्ध कर उसे सदा के लिए रोक देना चाहते थे और गंगा जल को नहरों से निकालने की योजना पर काम कर रहे थे तब मालवीय जी ने खुला विरोध किया, अनशन किया। हरिद्वार में गंगा सभा की स्थापना की। और भारत सरकार और हिन्दू समाज के प्रतिनिधियों के बीच समझौता कराया कि गोमुख से गंगासागर तक गंगा की धारा सदा ही निर्बाध अबाधित बहती रहेगी। इसके जल को संपूर्णतया कभी नहीं रोका जा सकेगा।

मालवीय जी ने राजनीति की ओर देखा तो कांग्रेस में इतिहास रच दिया। उन्हें कांग्रेस ने चार बार राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित किया। आजादी के पहले वो एकमात्र राजनेता थे जो चार बार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। जलियांवाला बाग हत्याकांड के खिलाफ अंग्रेज अफसरों को ब्रिटिश संसद तक में कटघरे में खड़ा कराया। 13 अप्रैल 1919 को उस नृशंस हत्याकांड के बाद अमृतसर रेलवे स्टेशन पर उतरने वाले वह पहले भारतीय नेता थे जिन्होंने मॉर्शल लॉ का विरोध करते हुए घटनास्थल का मुआयना किया, पीड़ित परिवारों से मिले। आंसुओं के सैलाब में डूबे अमृतसर के लोगों के ज़ख्मों पर मरहम रखा।

एक समय में वह सनातन धर्म महासभा, हिन्दू महासभा और कांग्रेस के भी अध्यक्ष रहने वाले देश के एकमात्र नेता थे। जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन के खिलाफ देश के हिन्दुओं को डटकर खड़े होने का आह्वान भी मालवीय जी ने किया। जो अवर्णनीय अत्याचार हिन्दुओं पर बंगाल समेत अनेक इलाकों में ढाए गए, उसकी सही रिपोर्टिंग के लिए कल्याण के विशेषांक के प्रकाशन के लिए रिपोर्टर की पूरी टीम उन्होंने दंगाग्रस्त क्षेत्रों में भेजी।

उन्होंने पत्रकारिता की ओर देखा तो देश को दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स समूह, अभ्युदय, लीडर जैसे समाचार पत्रों की मालिका प्रदान की। राष्ट्रीय भाव प्रेरित उर्दू पत्रकारिता के अनेक पत्रों को भी उन्होंने खूब सहायता दिलवाई और प्रेरित किया। देसी समाचार पत्रों में आलेख लिखने वाले पत्रकारों को नियमित मानधन भेजने की परिपाटी मालवीय जी ने अपने समाचार पत्र से शुरु की। 1910 में जब प्रेस एक्ट बनाकर प्रेस का गला घोंटने की अंग्रेजों ने कोशिश की तो मालवीय जी ने इसके खिलाफ अभियान छेड़ दिया। वह प्रेस की आजादी के सबसे बड़े पक्षधर थे। हिन्दी साहित्य सम्मेलन की नींव उन्होंने रखी। हिन्दी को नागरी लिपि मिले, हिन्दी राजभाषा के रूप में सभी मानदंडों पर खरी उतरे, इसका गंभीर प्रयास उन्होंने सभी हिन्दी प्रेमियों के साथ मिलकर किया।

भारतीय उद्योग धंधों, कुटीर उद्योंगों को संजीवनी देने के लिए तकनीकी, इंजीनियरिंग शिक्षा के शिक्षण में वो देश में प्रवर्तक महापुरुष थे। विज्ञान और तकनीकी शिक्षा को उन्होंने अपनी ज्ञान परंपरा में और विश्वविद्यालय में सर्वोपरि स्थान दिया। पूर्व और पश्चिम की ज्ञान परंपरा में जो अच्छा है, उसे समन्वित कर वो भारतीय शिक्षा को आगे ले जाने के पक्षधर थे।

गौरक्षा के लिए काशी से मथुरा तक शानदार गौशालाओं की मालिका खड़ी की। देशी गौनस्लों के उन्नयन, कृषि में तकनीकी और नए प्रयोगों के सूत्रधार बने।

अमृतसर से लाहौर तक हिन्दू-सिख एकता के लिए निरंतर काम किया। अमृतसर में सुप्रसिद्ध दुर्ग्याणा मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। भारतीय खेलों को नई ऊंचाई दी।

हिन्दी भाषा को अपने जीवन से ऊंचाई दी और सरकार, समाज में प्रतिष्ठित किया। हिन्दू धर्म को अपने चरित्र और आचरण से नई ऊंचाई दी। उच्च शिक्षा के दरवाजे बगैर भेदभाव सभी के लिए खोले। हिन्दुस्तान का मान दुनिया के मंचों पर बढ़ाया। राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस, लंदन में जब देश के अनेक नेताओँ में मतभेद आए तो उसे सुलझाने का काम किया। महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अम्बेडकर में पूना पैक्ट के अगुवा बनकर वो देश में सामाजिक गैरबराबरी मिटाने के अभियान के भी अगुवा बने।

वह गुलाम भारत में जन्में थे, हिन्दू भारतीय थे किन्तु संपूर्ण मानव मात्र और संपूर्ण विश्व के प्रति उनके मन में कुटुंब की तरह असीम प्रेम और करुणा थी। अकबर इलाहाबादी जैसे महान शायर उन्हें अपने बीच देखते थे तो चहक उठते थे कि

‘हजार शेखों ने दाढ़ी बढ़ाई सन की सी, मगर वो बात कहां मालवीय मदन की सी’।

भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने न केवल काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का स्वप्न देखा बल्कि उसे अपने बुद्धिबल, मित्रबल और सबसे बढ़कर उनके भीतर जागृत ईश्वरीय प्रकाश के बल पर जीवित रहते ही साकार कर दिखाया।

महामना अत्यंत निर्धन परिवार में पैदा हुए थे जहां कि भिक्षावृत्ति से, कथा-प्रवचन से, पूजा-पाठ से और संस्कृत की परंपरा से उनके पुरखे जीवन निर्वाह की .व्यवस्था कर पाते थे। आजादी के आंदोलन में जितने भी बड़े नेताओँ के नाम दिखाई देते हैं, संभवतः मालवीय जी उनमें एकमात्र ऐसे थे जिनका बचपन घोर गरीबी में व्यतीत हुआ।

जिस समयचक्र में मालवीय जी पैदा हुए, उनकी निर्धनता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि घर में दो जून की रोटी का भी सही बंदोबस्त नहीं था। घर में बच्चे पिता की प्रतीक्षा करते कि किसी जजमान का दिया शायद आज कुछ पौष्टिक व्यंजन लेकर वो घर आ जाएं। मालवीय जी के पुरखे मालवा प्रांत के किसी स्थान से कई सौ वर्ष पूर्व स्थानांतरित हुए थे और पटना, बिहार होते हुए गंगा किनारे मीरजापुर में स्थायी रूप से रहने लगे।

पिता-दादा सभी भारद्वाज गोत्रीय चातुर्वेदीय शाखा के ब्राह्मण थे और उन्होंने तमाम अवरोधों, मतांतरण के दुष्चक्रों, बादशाहों की टेढ़ी नज़रों से बचते-बचाते अपने स्वधर्म को छोड़ा नहीं था। अपने पारंपरिक कार्य से भी किसी तरह का समझौता नहीं किया था। संभवतः मन में भरोसा था कि एक दिन आएगा जबकि भारत में फिर से धर्म-संस्कृति और संवाद के दिन बहुरेंगे, फिर से सहिष्णुता की बेल फलेगी-फूलेगी, सनातन वैदिक हिन्दू धर्म की ध्वजा अपने सुन्दरतम, प्रखरतम और शुद्धतम रूप में फिर से संसार को जोड़ने, सत्य को सर्वोपरि रखने और हिंसा-बर्बरता से सामान्य समाज को दूर रखने का कार्य करेगी।

मीरजापुर से निकलकर मालवीय समाज के कुछ लोगों की एक शाखा संगम नगरी प्रयाग में बसी। यहीं मालवीय जी 25 दिसंबर 1861 की शाम 6 बजकर 54 मिनट पर प्रयाग में भारती भवन के पास एक गन्दे नाले के किनारे निर्मित छोटे से झोपड़युक्त कच्चे मकान में पैदा हुए थे। उस दिन बुधवार था। पौष कृष्ण अष्टमी की शुभ तिथि थी।

अपने पुरखों और पिता-पितामह की धर्मपरायणता का प्रभाव मालवीय जी पर सबसे गहन पड़ा। बचपन विकट अभावों में था किन्तु मालवीयजी का चेहरा सूर्य की तरह उज्जवल चमकता था। शरीर सामने से कमजोर दिखता था लेकिन वह भीतर से आत्मबली थे। बाहर से लोग भले ही उनके हड्डियों का ढांचा जैसे दिखने वाले शरीर की सारी नसें गिन सकते हों लेकिन भीतर तो उनमें फौलादी शक्ति भरी थी। साधना-पथ का अथक साधक। बचपन में उनका जनेऊ संस्कार हुआ। पढ़ने के लिए संस्कृत गुरुकुल में पंडित हरदेव की पाठशाला में जाने लगे।

पंडित हरदेव के साधारण योगपूर्ण जीवन का उनके मन पर अमिट संस्कार पड़ा। पंडित हरदेव जी बच्चों को परंपरागत धार्मिक शिक्षा, संस्कृत भाषा, कर्मकांड, योग, गणित आदि निःशुल्क पढ़ाते थे। उन्होंने अपने छोटे से गुरुकुल में गौशाला भी बना रखी थी। गुरुकुल आने वाले सभी बच्चों को वह नित्य शुद्ध दूध पीने के लिए देते थे। मालवीयजी के जीवन में नित्य योग, प्राणायाम, व्यायाम और त्रिकाल संध्या का प्रारंभिक बीजारोपण उन्हीं सदगुरु की कृपा से हुआ। मालवीय जी अक्सर अपने गुरु की याद करते तो उनकी आंखें गीली हो जातीं।

गुरुजी स्वयं धोती और सूती या ऊनी कंबल में लिपटे रहते, केवल एक समय ही भोजन करते। बच्चों को पढ़ाने के बाद सारा समय पूजा-पाठ और कथा-वार्ता में ही बिताते। उसी में प्राप्त दक्षिणा और भिक्षा को गुरुकुल की व्यवस्था पर खर्च कर देते। वो प्रयाग में जिस घर पर खड़े होकर हरि ओम बोलते तो उन्हें उनकी जरूरत के अनुसार भिक्षा मिल जाती। अगर कहीं से भिक्षा नहीं मिलती तो वो चुपचाप वापस चले जाते। ऐसे महान गुरु की शरण में मालवीय जी ने साक्षात् परमात्म तत्व के ही दर्शन किए। उनकी रूचि संस्कृत, योग, गणित और वैदिक हिन्दू धर्म के शास्त्रों में जग गई। कर्मकांड, कथा आदि उनके पिता-दादा से उन्हें विरासत में मिला ही था। पंडित हरदेव जी प्रयागराज में कोतवाली के पास अक्सर भागवत-कथा बांचने जाते थे, मालवीय जी भी गुरुजी के साथ वहां नित्य जाने लगे। सार्वजनिक सभा में उन्हीं गुरु हरदेव जी के कथामंच से उन्होंने पहली बार महज 8 साल की उम्र में संस्कृत श्लोकों का पाठ और अर्थ प्रयाग की जनता को सुनाया था।

कालांतर में मालवीयजी पंडित देवकीनंदन की पाठशाला में भी जाने लगे। विलक्षण प्रतिभा थी। इसलिए तेजी से वह सभी विषयों में पकड़ बना लेते थे। वह बड़े हुए तो प्रयाग चौक में घंटाघर के पास एक मिशनरी संचालित अंग्रेजी स्कूल में मैट्रिक कक्षा में उनके चाचा ने उनका दाखिला कराया। पढ़ने-लिखने के प्रति मालवीयजी की गहन रुचि थी। घर में तो ज्यादा जगह नहीं थी, संयुक्त कुटुम्ब जिसमें मालवीय जी खुद ही 8 भाई-बहन थे। उनके दादा प्रेमधर मालवीय के चार पुत्र। मालवीयजी के पिताजी पंडित ब्रजनाथ सबसे छोटे थे। ज्यादातर कुटुंब के लोग साथ ही कच्चे घर में रहते थे। मालवीयजी के पिताजी के भाइयों में कई के परिजन दोबारा मीरजापुर में ही बसने को मजबूर हुए क्योंकि प्रयाग के पैतृक निवास में इतनी जगह नहीं थी कि सभी साथ रह सकते। बच्चों के पढ़ने को घर में एकांत नहीं था। लिहाजा मालवीयजी घर से 10 मिनट की दूरी पर स्ट्रीट लाइट में रात में पढ़ने के लिए एक चुनी हुई जगह पर जाते थे, जहां गली में बोरा बिछाकर उन्होंने मैट्रिक की पढ़ाई का पाठ्यक्रम पूरा किया। 1878 में कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा उन्होंने टॉप रैंकिंग के साथ उत्तीर्ण की। म्योर सेंट्रल कॉलेज, प्रयाग में उन्हें बीए कक्षा में दाखिला मिला। यहीं उनकी भेंट महान आचार्य आदित्य राम भट्टाचार्य से हुई और उनके जीवन की दिशा बदली।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय :- मालवीय जी के मन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का विचार कब आया?

पंडित मदन मोहन मालवीय जी के जीवन पर रचनाकर्म करने वाले प्रख्यात पत्रकार भरत राम भट्ट ने अपनी पुस्तक आलोक-पुरुष में लिखा है कि मालवीय जी के मन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की रूपरेखा तो 1886 से 1890 के बीच ही जन्म ले चुकी थी जबकि वह कालाकांकर में राजा रामपाल सिंह द्वारा शुरु किए गए दैनिक हिन्दुस्तान अखबार के संपादक के रूप में कार्य कर रहे थे। उस जमाने में एक बड़े अखबार का वैतनिक संपादक पद छोड़कर तब वो दोबारा प्रयाग आ गए और कानून विषय में डिग्री हासिलकर उन्होंने जब वकालत का रूख किया तो भी उनके मन में विश्वविद्यालय का विचार बार-बार आता था। वह भारत की धरती पर नालंदा और तक्षशिला फिर से जीवित करने के विचार से प्रेरित हो उठे थे।

वाराणसी में जब साल 1905 में कांग्रेस का 21वां अधिवेशन आयोजित हुआ था तब लोकमान्य तिलक स्वदेशी, स्वराज और राष्ट्रीय शिक्षा के सवाल पर बेहद मुखर होकर कांग्रेस के नरम दल पर हमलावर थे। उसी अधिवेशन में मालवीयजी ने पहली बार सार्वजनिक मंच पर हिन्दू विश्वविद्यालय की रूपरेखा प्रस्तुत की थी।

1905 में तो कांग्रेस के मंच पर गांधीजी या नेहरुजी का दूर दूर तक कोई नामोंनिशां तक नहीं था, तब मालवीय जी ने कांग्रेस के मंच से राष्ट्रीय शिक्षा और हिन्दू यूनिवर्सिटी की संकल्पना पर प्रस्ताव रखा।

लोकमान्य तिलक उनके इस प्रस्ताव पर बहुत ही प्रसन्न हुए और उन्हें सलाह भी दी कि मालवीयजी आपने विचार तो बहुत ही श्रेष्ठ प्रस्तुत किया है लेकिन क्या आप अपना शेष जीवन इस संकल्प को समर्पित करने का मन बना चुके हैं? इस कार्य के लिए आपको अपना जीवन समर्पित करना होगा। गोपाल कृष्ण गोखले ने भी उनकी प्रशंसा की और कहा कि आप इसे शीघ्र प्रारंभ करिए। सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने कहा कि मैं एक अध्यापक के रूप में सेवा देने के लिए तैयार हूं।

मालवीय जी इसके पहले म्योर सेंट्रल कॉलेज जो आगे चलकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रूप में परिवर्तित हुआ, उसमें विद्यार्थियों के हित में अनेक योजनाएं शुरु कर चुके थे। यह बात सन 1900 की है। मुस्लिम विद्यार्थियों की आधुनिक शिक्षा के लिए आवासीय विद्यालय अलीगढ़ मुस्लिम एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज धीरे धीरे बड़ा रूप हासिल कर चुका था ताकि आवासीय सुविधा के साथ मुस्लिम युवक अंग्रेजी और आधुनिक शिक्षा में महारत हासिल कर सकें।

इसके पहले कोलकाता, मुंबई(बंबई), मद्रास (चेन्नई) में 1857 में अंग्रेजी परंपरा के विश्वविद्यालय शुरु हो चुके थे। अलीगढ़ में मुस्लिम कॉलेज, चंडीगढ़ में इंग्लिश कॉलेज(बाद में पंजाब यूनिवर्सिटी) और प्रयाग में म्योर सेंट्रल कॉलेज भी शुरु हो चुका था। रूड़की में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई और अंग्रेज सरकार के अफसरों की ट्रेनिंग के लिए इंजीनियरिंग ट्रेनिंग कॉलेज भी शुरु हो चुका था।

मालवीय जी की पैनी निगाह शिक्षा क्षेत्र में हो रहे इन बदलावों पर टिकी थीं। उन्हें ये समझने में देर नहीं लगी कि अंग्रेज सरकार शिक्षा क्षेत्र में भेदभाव कर रही है। हिन्दुओँ को उनके पारंपरिक संस्कारों से दूर करने का कोई कुचक्र चलाया जा रहा है। परंपरा से पढ़कर आ रहे छात्रों के सामने उच्च शिक्षा के इन नए केंद्रों पर रहने और अपने धार्मिक आचार का पालन करने का भी कोई बंदोबस्त नहीं है। मालवीय जी ने प्रयाग में म्योर सेंट्रल कॉलेज में पढ़ने आने वाले हिन्दू छात्रों के लिए एक बड़े छात्रावास के निर्माण का संकल्प लिया। दो सौ हिन्दू विद्यार्थियों के लिए उन्होंने काशी नरेश समेत अनेक गणमान्य लोगों की मदद से हिन्दू बोर्डिंग हाउस की स्थापना प्रयाग में की जिसे अब हिन्दू हॉस्टल के रूप में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में जाना जाता है।

भारतीय शिक्षा समेत सभी पढ़े लिखे लोगों का यूरोपीयकरण उस वक्त के ब्रिटिशराज का महान लक्ष्य था ही। मैकाले ने जिस शिक्षा नीति की बुनियाद रखी थी उसमें से सनातन परंपरा के गुरुकुलों, जातिगत हुनर और स्किल से जुड़ी पाठशालाओं के सामने बंद हो जाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा था।

1904 के यूनिवर्सिटी एक्ट ने स्थिति को और दुरूह बना दिया। सभी महाविद्यालय और स्कूलों को यूनिवर्सिटी सिस्टम के अन्तर्गत लाए जाने की शर्तें कड़ी कर दी गईं और लगभग सभी शिक्षा संस्थान कोलकाता, मुंबई और मद्रास यूनिवर्सिटी के अन्तर्गत संबद्ध किए जाने लगे।

ध्यान रहे कि इसी दौर में लोकमान्य तिलक राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लेकर ब्रिटिश शासन पर हमलावर थे। स्वदेशी, स्वराज्य और राष्ट्रीय शिक्षा के साथ विदेशी माल का बहिष्कार उनकी नीति के प्रमुख स्तंभ थे।

जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है कि मालवीय जी ने 1905 के बनारस कांग्रेस अधिवेशन में हिन्दू यूनिवर्सिटी की रूपरेखा प्रस्तुत की थी। इस प्रस्ताव की रूपरेखा उन्होंने 1904 के शुरुआती महीने में काशी नरेश महाराजा प्रभुनारायण सिंह के सामने रख दी थी। काशी नरेश प्रयाग हिन्दू हॉस्टल के निर्माण में मालवीय जी की योजना, क्रियान्वयन कौशल, समझदारी और समझ-बूझ से भलीभांति परिचित हो चुके थे। मालवीय जी ने उन्हीं की अध्यक्षता में हिन्दू हॉस्टल का कार्य पूरा कराया था। 1905 में मालवीय जी ने हिन्दू यूनिवर्सिटी की विवरण पुस्तिका चर्चा के लिए देश के अनेक गणमान्य लोगों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत की और इसे कांग्रेस अधिवेशन में भी स्वयं वितरित किया। कांग्रेस अधिवेशन की पृष्ठभूमि में ही 31 दिसंबर 1905 को मालवीय जी ने टाउन हाल, वाराणसी में वरिष्ठ शिक्षाविदों और देश भर से आए प्रमुख हिन्दू चिंतकों को एकजुटकर हिन्दू यूनिवर्सिटी के निर्माण के लिए एक समिति के गठन का ऐलान किया।

साल 1906 में प्रयाग कुंभ में 20-29 जनवरी के मध्य मालवीय जी ने शंकराचार्य जगद्गुरु- गोवर्धनपीठ की अध्यक्षता में सनातन धर्म महासभा की बैठक में हिन्दू यूनिवर्सिटी के निर्माण को लेकर गहन चर्चा चलाई। इसी बैठक में सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी के गठन का संकल्प सार्वजनिक किया गया जिसके संस्थापक सचिव पद पर सभी ने एक सुर से पंडित मदन मोहन मालवीय को चुने जाने की घोषणा की।

टाउन हाल, वाराणसी की बैठक में शामिल सभी लोग इस हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी के सदस्य बनाए गए। इसी बैठक के उपरांत मालवीय जी ने हिन्दू यूनिवर्सिटी के निर्माण के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने का संकल्प संगम किनारे गंगाजल हाथ में लेकर उठाया और फिर पीछे मुडकर नहीं देखा।

सोसायटी गठन का प्रारूप, विश्वविद्यालय के उद्देश्य, विवरणिका, फैकल्टी, पाठ्यक्रम आदि की रूपरेखा को संशोधित रूप से 12 मार्च 1906 को मालवीय जी ने सार्वजनिक कर दिया। यह भी तय हुआ कि जब तक सोसायटी पंजीकृत नहीं हो जाती, इसके नाम पर जुटाया जाने वाला पैसा बैंक ऑफ बंगाल, वाराणसी शाखा में जमा रखा जाए। यूनिवर्सिटी स्थापना के लिए समिति के द्वारा होने वाले अन्य सामान्य खर्चे सनातन धर्म महासभा के कोष से किए जाएं। एक करोड़ रूपये की संचित निधि जो कि नए नियमानुसार विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए सरकार द्वारा खजाने में जमा की जानी अनिवार्य की गई थी, इसे एकत्रित करने के लिए मालवीय जी समेत सोसायटी से जुड़े अन्य गणमान्य जनों की टीम को अधिकृत कर दिया गया।

विश्वविद्यालय के जो उददेश्य 1904-05 की सोसायटी के उद्देश्य में तब बताए गए वो आज भी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना के उद्देश्य के रूप में अधिकृत दस्तावेजों में अंकित हैं-

1-विशेष रूप से हिन्दुओँ और सामान्य रूप से समस्त संसार की भलाई के लिए हिन्दू शास्त्रों और संस्कृत साहित्य को संरक्षित करना और लोकप्रिय बनाना तथा हिन्दू विचारधारा एवं संस्कृति और प्राचीन भारतीय सभ्यता में जो कुछ भी उत्तम एवं महान है, के अध्ययन को बढ़ावा देना

2-कला एवं विज्ञान की समस्त शाखाओं में शिक्षा और शोध को बढ़ावा देना

3-व्यावहारिक प्रशिक्षण युक्त ऐसे वैज्ञानिक, तकनीकी एवं व्यावसायिक ज्ञान को उन्नत बनाना तथा इसका प्रसार करना जो देशी उदयोग-धंधों को बढ़ावा देने तथा देश के संसाधनों को विकसित करने हेतु सर्वाधिक उपयुक्त हो, तथा

4-धर्म एवं नीतिशास्त्र को शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाकर युवाओं में चरित्र निर्माण को प्रोत्साहित करना।

मालवीय जी ने हिन्दू यूनिवर्सिटी की रूपरेखा प्रस्तुत की तो दूसरी ओर 1907 में श्रीमती एनी बेसेंट ने भी वाराणसी में अनेक ख्यातलब्ध विद्वानों और राजपुरुषों को एकत्रित कर ब्रिटिश सरकार के सामने द यूनिवर्सिटी ऑफ इंडिया की स्थापना का प्रस्ताव भेजा। वह 1898 में वाराणसी में सेंट्रल हिन्दू स्कूल स्थापित कर चुकी थीं। मद्रास में भी उन्होंने अपने आध्यात्मिक संगठन थियोसॉफिकल सोसायटी के जरिए आध्यात्मिक और धार्मिक शिक्षा के लिए बहुत से कार्य शुरु किए थे। उन्होंने लंदन से लेकर कोलकाता तक बार बार भारत का ध्यान इस ओर रेखांकित भी किया कि भारत को अपने स्वराज, शिक्षा, साहित्य और संस्कृति के मामलों में ब्रिटिश सरकार पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। बल्कि अपने सद्प्रयत्नों से इसे अपने बूते ही स्वतंत्र रूप से फिर से जागृत करना चाहिए।

मार्च 1911 में श्रीमती एनी बेसेंट और मालवीय जी की भेंट हुई जिसमें दोनों ने बनारस में एक हिन्दू यूनिवर्सिटी के निर्माण पर सहमति जतायी और यह भी सहमति व्यक्त की कि दोनों प्रस्ताव संशोधित कर एक प्रस्ताव के रूप में ब्रिटिश सरकार के सामने प्रेषित किए जाएँ। 11 अप्रैल 1911 को श्रीमती एनी बेसेंट ने दी यूनिवर्सिटी ऑफ इंडिया को यूनिवर्सिटी ऑफ बनारस के रूप में परिवर्तित करने और मालवीय जी की सोसायटी के हिन्दू यूनिवर्सिटी के प्रस्ताव से खुद के प्रस्ताव को जोड़ते हुए ब्रिटिश सरकार के सामने एक प्रस्ताव रखने के लिए मालवीय जी को अधिकृत कर दिया ताकि सम्राट जॉर्ज पंचम के 1911 के भारत दौरे में विश्वविद्यालय निर्माण की प्रक्रिया को सरकार की मंजूरी मिल सके। इस संबंध में अपना प्रस्ताव और वक्तव्य सार्वजनिक कर श्रीमती एनी बेसेंट 22 अप्रैल 1911 को इंग्लैंड चली गईं ताकि भारतीय सांस्कृतिक पुनरोदय की दिशा में अन्य लंबित मुद्दों पर वह गहराई से लंदन में विशिष्ट लोगों का समर्थन प्राप्त कर सकें।

श्रीमती एनी बेसेंट ने न केवल मालवीय जी के हिन्दू यूनिवर्सिटी के प्रस्ताव का अनुमोदन किया बल्कि दी यूनिवर्सिटी ऑफ इंडिया के अपने प्रस्ताव को भी उसी में सम्मिलित कर दिया। इसी के साथ उन्होंने प्रस्तावित हिन्दू यूनिवर्सिटी के अन्तर्गत सेंट्रल हिन्दू कॉलेज ट्रस्ट को भी सम्मिलित करने का प्रस्ताव किया। प्रस्ताव में सभी मानित ट्रस्टियों ने हस्ताक्षर के साथ मान्य किया कि- ‘सेंट्रल हिन्दू स्कूल ट्रस्ट की यह परिषद बनारस में हिन्दू यूनिवर्सिटी जिसका कि सेंट्रल हिन्दू कॉलेज आंतरिक हिस्सा होगा, की स्थापना को प्रोत्साहित करने के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय तथा श्रीमती एनी बेसेंट का हर तरह से सहयोग करने के लिए और उनका साथ देने के लिए संकल्पित है।’

इस प्रस्ताव के पारित होते ही महामना मालवीय जी ने सचिव के रूप में हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रयाग कार्यालय से 15 जुलाई 1911 को एक पत्र विवरणिका के साथ फिर से सभी सोसायटी सदस्यों के नाम जारी किया ताकि सोसायटी को पंजीकृत कर इसके जरिए धन संग्रह और विश्वविद्यालय निर्माण का कार्य आगे बढ़ाया जा सके। इस सोसायटी के सदस्यों में सचिव रूप में महामना मालवीय जी तो थे ही, साथ में महामहिम महाराजा दरभंगा रामेश्वर प्रसाद सिंह, महाराजा कासिम बाजार, एन. सुब्बाराव, मद्रास, वीपी माधवराव, बैंगलुरु, विट्ठल दामोदर ठाकरे, मुंबई, हरचंदराय विशनदास-कराची, आरएन मुधोलकर-अमरावती, लाला लालचंद-लाहौर, लाला हरीचंद-मुल्तान, रामशरण दास, लाहौर, राजा माधोलाल-बनारस, बाबू मोतीचंद, बनारस, राजा रामपाल सिंह, बाबू गंगा प्रसाद वर्मा, लखनऊ, ठाकुर सूरजबख्श सिंह, सीतापुर, चौ. सुखबीर सिंह, मुजफ्फरनगर, पंडित आदित्य राम भट्टाचार्य, प्रयागराज, सतीश चंद्र बनर्जी, तेज बहादुर सप्रू शामिल थे।

मालवीय जी ने जनता के नाम एक करोड़ रूपये शीघ्रातिशीघ्र जुटाने के लिए मार्मिक अपील अपने हस्ताक्षर से 15 जुलाई को जारी की। इसमें अपील की गई थी कि दिसंबर 2011 में महामहिम सम्राट के भारत आगमन के पूर्व तक 50 लाख रूपये अवश्य ही एकत्र हो जाएं, इसमें से 25 लाख रूपये सितंबर 2011 तक अग्रिम जुटाने का लक्ष्य सभी के सामने रखा गया।

मालवीय जी के हस्ताक्षर से बैंक ऑफ बंगाल में हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी का बैंक अकाउंट भी खोले जाने की जानकारी सार्वजनिक की गई ताकि चंदा देने के इच्छुक अकाउंट में सीधे भी पैसा दे सकें। मालवीय जी ने सोसायटी के सचिव पद के लिए पहले सर सुन्दर लाल का नाम प्रस्तावित किया था किन्तु किसी कारण से उस समय सर सुन्दर लाल तैयार नहीं हुए हालांकि वह मालवीय जी को पीछे से सभी प्रकार का सहयोग करने को राजी हो गए।

सुन्दर लाल सरकारी नियमों के बड़े जानकार और देशभक्त थे। मालवीय जी को उन पर अगाध भरोसा था। दोनों का मित्रवत संबंध अनन्य था l म्योर सेंट्ल कॉलेज के इलाहाबाद यूनिवर्सिटी बन जाने के बाद 1906 में सर सुन्दर लाल इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कुलपति भी रह चुके थे। उन्हें विश्वविद्यालय चलाने के नियमों की बारीक जानकारी थी। वो दोबारा 1912 से 1916 के बीच भी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के कुलपति रहे।

इस प्रकार हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी के संस्थापक अध्यक्ष महाराज दरभंगा और सचिव के रूप में महामना मालवीय जी के साथ प्रमुख सदस्यों ने स्थान स्थान पर धनसंग्रह का विशाल अभियान शुरु किया। प्रत्येक प्रांत में सोसायटी की उपसमितियां गठित की गईं। महाराजा दरभंगा की अध्यक्षता में और मालवीय जी के संयोजन में अभियान आगे बढ़ने लगा। महाराजा दरभंगा पहले बनारस में एक शारदा हिन्दू यूनिवर्सिटी के प्रस्ताव पर काम कर रहे थे किन्तु मालवीयजी के साथ चर्चा के उपरांत उन्होंने श्रीमती एनी बेसेंट की तरह ही अपने प्रस्ताव को भी हिन्दू यूनिवर्सिटी के प्रस्ताव के साथ एकीकृत कर दिया। 21 अक्टूबर 1911 को जब श्रीमती एनीबेसेंट भारत लौटकर वाराणसी आईं तो वहां मालवीयजी और महाराजा दरभंगा के साथ उनकी विस्तृत बैठक हुई। सेंट्र्ल हिन्दू कॉलेज की न्यासी परिषद की बैठक बुलाई गई जिसमें श्रीमती एनी बेसेंट ने महाराज दरभंगा के प्रस्ताव के साथ अपने प्रस्ताव को मालवीय जी की ओर से प्रस्तावित हिन्दू यूनिवर्सिटी के प्रस्ताव में जोड़ने की घोषणा विधिपूर्वक सम्पन्न की। 22 अक्टूबर 1911 को महाराजा दरभंगा रामेश्वर प्रसाद सिंह, सर सुन्दर लाल, बाबू गंगा प्रसाद वर्मा, बाबू भगवान दास, मुंशी ईश्वर शरण, श्रीमती एनी बेसेंट और मालवीय जी के संयुक्त हस्ताक्षर से हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी और सेंट्रल हिन्दू कॉलेज ट्रस्ट के एकीकरण का प्रस्ताव भारत के राज्य सचिव (भारत सरकार) की सेवा में प्रेषित कर दिया गया।

23 अक्टूबर 1911 को ब्रिटिश भारत सरकार के शिक्षा सचिव हरकोर्ट बटलर को भी यही प्रतिवेदन भेजा गया। श्रीमती एनी बेसेंट ने अपने इंडिया यूनिवर्सिटी के प्रस्ताव को वापस लेने की घोषणा की और हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी के प्रस्ताव को समर्थन दिया।

अक्टूबर में ही इस बैठक के बाद 1860 के सोसायटी अधिनियम के अंतर्गत मालवीय जी ने हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी के पंजीकरण का दस्तावेज प्रयाग में स्थित सोसायटी रजिस्ट्रार के सम्मुख प्रस्तुत किया। इस सोसायटी के प्रस्तावक मालवीय जी थे, अध्यक्षता महाराजा दरभंगा रामेश्वर सिंह जी ने स्वीकार की और सोसायटी के सचिव पद पर कार्यभार ग्रहण करने की जिम्मेदारी मालवीय जी के आग्रह के अनुसार सर सुन्दर लाल जी ने संभाल ली। सर गुरुदास बनर्जी, श्रीमती एनी बेसेंट, डॉ. रास बिहारी घोष इसके उपाध्यक्ष मनोनीत हुए। बाबू भगवानदास, पंडित गोकर्णनाथ, पंडित कृष्ण राम मेहता, इकबाल नारायण गुर्टू, बाबू मंगला प्रसाद इसके संयुक्त सचिव नियुक्त हुए। प्रारंभिक सोसायटी में 61 गणमान्य लोग नामित थे।

15 दिसंबर 1911 को हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी का विधिवत् पंजीकरण हो गया।

यूनिवर्सिटी स्थापना का कार्य अब अगले चरण में पहुंच गया जहां केंद्रीय शासन से इसे प्रारंभ करने का निर्देश जारी होना था। पांच शर्तें हरकोर्ट बटलर, शिक्षा सदस्य-वायसराय परिषद (तत्कालीन शिक्षा मंत्री) ने उपस्थित कीं।

1-उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराया जाए

2-सेंट्रल हिन्दू कॉलेज यूनिवर्सिटी को भौतिक रूप से स्थानांतरित किया जाए

3-50 लाख रूपये की निधि प्रस्तुत की जाए।

4-विश्वविद्यालय का संविधान

5-सेंट्रल हिन्दू कॉलेज में विश्वविद्यालय प्रारंभ हो सकता है, इस पर समिति की रिपोर्ट प्राप्त की जाए।

हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी ने जमीन चयन के लिए डॉ. सुन्दर लाल, महामना मालवीय, राय गंगा प्रसाद वर्मा, बाबू भगवान दास, बाबू मोती चंद, पंडित गोकर्ण नाथ की उपसमिति को जिम्मेदारी प्रदान की। 2 जून 1913 को सेंट्रल हिन्दू कॉलेज हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी में विलीन कर दिया गया। 30 जनवरी 1915 को सेंट्रल हिन्दू कॉलेज, बनारस के पुस्तकालय के सभागार में हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी की सभा आयोजित हुई। सर गुरुदास बनर्जी ने इसकी अध्यक्षता की। न्यायमूर्ति ए चौधरी, सर सुन्दर लाल, मालवीय जी, डॉ. तेज बहादुर सप्रू, डॉ. गंगानाथ झा, पंडित गोकर्ण नाथ, राय दीनदयाल, डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी, रायबहादुर जीएन चक्रवर्ती, तथा श्री बर्ट्राम केटली इसमें शामिल थे।

विधेयक के मसौदे को तैयार करने के लिए दरभंगा महाराज, डॉ. सुन्दर लाल, पंडित मदन मोहन मालवीय, बाबू भगवान दास, डॉ. गंगानाथ झा और सर गुरुदास बनर्जी के साथ वाली उपसमिति को जिम्मेदारी दी गई। इसी उपसमिति ने सरकार के साथ हिन्दू यूनिवर्सिटी बिल के मसौदे पर चर्चा की और उसे अंतिम रूप दिया। 22 मार्च 1915 को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल की बैठक में सर हरकोर्ट बटलर ने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी विधेयक को प्रस्तुत करने की अनुमति मांगी।

सर हरकोर्ट बटलर ने विधेयक प्रस्तुत किया और इस प्रस्ताव के समर्थन में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने प्रेरक भाषण दिया l मालवीय जी तब इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल के निर्वाचित सदस्य भी थे l

इस प्रकार विधेयक पारित हुआ और इसे आम लोगों की राय के लिए 10 मई 1915 तक सार्वजनिक किया गया। विधेयक को लेकर सरकार और हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी के सदस्यों की एक संयुक्त उप-समिति का भी गठन हुआ। इसमें श्री क्लाउड हिल, महाराज दरभंगा, डॉ. सुन्दर लाल, पंडित मदन मोहन मालवीय, बाबू भगवान दास, पंडित आदित्य राम भट्टाचार्य, पंडित गंगानाथ झा, मा. श्री एच शॉर्प शामिल थे। सितंबर 1915 में शिमला में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल की पहली बैठक में सर हरकोर्ट बटलर ने हिन्दू यूनिवर्सिटी बिल को प्रवर समिति के हवाले किया जिसमें सर अली इमाम, सर सीएम चिटनवीस, पंडित मालवीय, डॉ. केनरिक, श्री एच शार्प, श्री कॉव, डॉ. सुन्दर लाल, श्री सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, कर्नल गोर्डन, और सर हरकोर्ट बटलर उपस्थित थे।

प्रवर समिति के सम्मुख भी पंडित मदन मोहन मालवीय ने विधेयक के समर्थन में अपना भाषण प्रस्तुत किया।

प्रवर समिति की ओर से सहमति मिलने के बाद विधेयक पुनः इम्पीरियल लेजस्टिव काउंसिल में प्रस्तुत हुआ जहां से इसे पारित कर दिनांक 1 अक्टूबर 1915 को भारत के गवर्नर जनरल ने अनुमोदित कर दिया।

मौलिक लेखन-डॉ. राकेश कुमार उपाध्याय

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