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गहलोत और पायलट की खाई को पाटना हाईकमान के लिए चुनौती !

गहलोत और पायलट की खाई को पाटना हाईकमान के लिए चुनौती !

जब किसी राजनीतिक पार्टी के पास सरकार चलाने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं होता है तो उसको समर्थन देने वाले विधायकों के अनुरूप ही फैसले करने को मजबूर होना पड़ता है।  राजस्थान में वर्ष 2018 में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट की अगुवाई में चुनाव लड़ा गया और पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के कारण पार्टी हाईकमान चाहकर भी सचिन पायलट को सरकार का नेतृत्व  की जिम्मेदारी नहीं दे पायी। कांग्रेस के केंद्रीय संगठन महामंत्री के रूप में काम कर रहे अशोक गहलोत ने अपने निर्दलीय समर्थित विधायकों और राष्ट्रीय लोकदल के मात्र एक विधायक डॉ. सुभाष गर्ग के सहारे स्थाई सरकार का सपना दिखाकर मुख्यमंत्री का पद लेने में कामयाब हो गए। उस समय गहलोत ने पायलट से यह वादा करते हुए कहा था कि आने वाले समय में पार्टी हाईकमान जो भी निर्देश देगा वह पालन करते हुए अपनी जिम्मेदारी सौंप देंगे। उस समय सचिन पायलट ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष का पद कायम रखते हुए उपमुख्यमंत्री  की शपथ ले ली और अपने कई समर्थित कई विधायकों को मंत्री बनाने में कामयाबी हासिल कर ली थी।

समय परिस्थिति बदली और सचिन पायलट के समर्थित कई विधायक जिसमें खाद्य आपूर्ति मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास, खान मंत्री प्रमोद भाया जैन, सहकारिता मंत्री उदय आंजना और पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने भी अपना रुख बदला और और सीएम अशोक गहलोत के समर्थन में चले गए। यह बात भी सही है कि 10 निर्दलीय विधायकों और बीएसपी 6 विधायक राजेंद्र सिंह गुढ़ा, योगेंद्र सिंह अवाना,लाखन सिंह, संदीप कुमार,दीपचंद और वाजिद अली को कांग्रेस में शामिल कराकर स्थाई सरकार देने का वादा सोनिया गांधी  के समक्ष किया गया। पायलट के विरोध के बावजूद सीएम गहलोत में बीएसपी से कांग्रेस में शामिल हुए 6 विधायकों को सोनिया गांधी से भेंट कराकर यह जताया गया कि उनका निर्णय सोनिया गांधी के कहने पर किया है अब सरकार में वे उन्हें को जिम्मेदारी भी दे सकेंगे। समय  और परिस्थितियों के अनुरूप  सीएम गहलोत ने  राजेंद्र सिंह गुढ़ा को गृह सुरक्षा राज्यमंत्री बना पाया।

सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री के साथ-साथ  पंचायत राज और सड़क निर्माण विभाग का कामकाज दिया गया। यही नहीं वे पार्टी अध्यक्ष के रूप में काम करते रहे। सीएम गहलोत ने अपने राजनीतिक चाले चलते हुए पायलट को कमजोर करने का प्रयास किया यही नहीं उन्हें  खुले रूप से कामकाज नहीं करने दिया गया। डेढ़ साल का समय गुजर जाने के बाद भी सीएम गहलोत ने कैबिनेट की बैठक नहीं  की और पायलट को अधीनस्थ बनाने का प्रयास किया। सीएम गहलोत इस कार्य में सफल नहीं हो पाए इसी बीच सीएम गहलोत ने पायलट संबंधित मंत्रियों को अपने पक्ष में करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयास किए और इस कार्य में भी कुछ हद तक सफल भी रहे। सीएम गहलोत और पायलट की  नाराजगी के बीच ही राज्यसभा के चुनाव आ गए पार्टी नेतृत्व ने सीएम गहलोत के कहने पर संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल और नीरज डांगी उम्मीदवार बनाया गया। इस दौरान भी यह जताने का प्रयास किया गया कि सचिन पायलट और उसके समर्थित विधायक कांग्रेस के खिलाफ जा सकते हैं। आनन-फानन में विधायकों को पांच सितारा होटल में कैद रखा गया। जबकि कांग्रेस के दोनों  उम्मीदवार चुनाव जीते।

परिस्थितियां बदली और सचिन पायलट अपने कुछ समर्थकों के साथ हाईकमान से मिलने के लिए दिल्ली चले गए इसी बीच उन्होंने यह प्रचार प्रसार शुरू कर दिया कि पायलट और उनके समर्थक विधायकों ने पार्टी के साथ बगावत कर दी है यही नहीं परिस्थितियों के अनुरूप पायलट समर्थित विधायकों को गुड़गांव में एक रिसोर्ट में रहने को मजबूर होना पड़ा और  सीएम गहलोत ने पार्टी नेतृत्व केे माध्यम से सचिन पायलट सहित उनके समर्थित मंत्रियों और विधायकों को पदों से बर्खास्त करने का निर्णय के साथ ही पार्टी संगठन के पूरे ढांचे को ही बर्खास्त करने की कार्रवाई कर दी गई। यही नहीं सीएम गहलोत ने अपने समर्थित विधायक शिक्षा राज्यमंत्री गोविंद सिंह डोटासरा को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष, और सभी अग्रिम संगठन के अध्यक्ष मनोनीत करा दिए गए।

पार्टी के खिलाफ बगावत मानते हुए मंत्रियों और विधायकों को  पार्टी के सरकारी मुख्य सचेतक महेश जोशी के माध्यम से नोटिस जलाए गए और विधानसभा अध्यक्ष से इन विधायकों के खिलाफ कार्यवाही करने का आग्रह भी किया गया। विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी ने भी सीएम गहलोत के कहने पर इन विधायकों को नोटिस जारी किए यही नहीं कुछ विधायकों के खिलाफ दो एसओजी और एसीबी में मामले भी दर्ज किए गए। परिस्थितियां बदली और सचिन पायलट और उनके संबंधित विधायकों के साथ प्रियंका गांधी के माध्यम से समझौता हुआ और सभी को पार्टी में वापस लेने का ऐलान किया गया इसके बाद सीएम गहलोत सरकार जोकि 34 दिन तक जयपुर और जैसलमेर के होटलों में कैद रहकर सुरक्षित रखने का  काम किया गया। इसके बाद परिस्थितियां बदली और सीएम गहलोत को  पायलट समर्थित कुछ विधायकों को मंत्री बनाना पड़ा। यही नहीं राजनीतिक नियुक्तियों में भी उनके लोगों को कुछ हिस्सेदारी दी गई।

राजसभा के चुनाव में पार्टी के अनुरूप मुकुल वासनिक, रणदीप सुरजेवाला और प्रमोद तिवारी को जिताया गया। इसी दौरान पार्टी में सीएम गहलोत को बदलने की मांग उठने लगी। यही नहीं सीएम गहलोत को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने और उनकी जगह सचिन पायलट को सीएम बनाए जाने की बात तय की गई। लेकिन सीएम गहलोत ने हाईकमान के समक्ष कुछ अपनी शर्ते रखते हुए पार्टी अध्यक्ष बनने की बात स्वीकार तो कर ली। राहुल गांधी और  और प्रियंका गांधी ने गहलोत से स्पष्ट तौर पर कहा कि वे सीएम पद छोड़ दें और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाए। इस स्थितियों को साकार रूप देने के लिए पार्टी ने मलिकार्जुन खरगे और राजस्थान के प्रभारी अजय माकन को पर्यवेक्षक बनाकर  जयपुर भेजा गया। विधायक दल की बैठक 25 सितंबर को मुख्यमंत्री के सरकारी निवास पर  होना निश्चित किया गया इस विधायक दल की बैठक को विफल करने के लिए रणनीति तैयार की गई। सीएम गहलोत ने पार्टी पर्यवेक्षक मलिकार्जुन खरगे और प्रभारी अजय माकन की अगवानी करने की जगह  वे अपने साथ पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और खाद्य आपूर्ति मंत्री प्रताप सिंह खचारियावास को लेकर जैसलमेर के तनोट माता के दर्शन करने के लिए चले गए। इसी बीच पर्यवेक्षकों का जयपुर में आगमन हुआ उनकी अगवानी नहीं की गई और देर शाम तक सीएम गहलोत प्रदेश अध्यक्ष डोटासरा और प्रताप सिंह खाचरियावास को लेकर जयपुर लौटे और उन्होंने होटल जाकर  दोनों पर्यवेक्षकों से भेंट की। इसी बीच सरकारी मुख्य सचेतक और जलदाय मंत्री डॉ. महेश जोशी ने संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल के सरकारी निवास पर  25 सितंबर को ही विधायक दल की बैठक से पहले शाम 5:00 बजे समानांतर एक बैठक आयोजित कर ली। इस बैठक में बुलाए जाने के लिए सरकारी मुख्य सचेतक डॉ जोशी के माध्यम से फोन कराया गया। इस कार्ययोजना को मूर्त रूप देने के लिए राजस्थान पर्यटक विकास निगम के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौड़ की भूमिका भी अहम रही। इस बैठक में कांग्रेस के सात मंत्री और निर्दलीय सहित बीएसपी कांग्रेस में शामिल हुए राजेंद्र सिंह गुढ़ा को छोड़कर सभी लोगों की बैठक आयोजित कर ली। समानांतर बैठक के कारण विधायक दल की बैठक में यह लोग नहीं जा सके और वहां यह माहौल बनाया गया कि हाईकमान ने विधायक दल की बैठक बुलाई है उसमें नहीं जाएंगे दबाव बनाने के लिए सामूहिक इस्तीफे देने का निर्णय किया गया। इन मंत्रियों और विधायकों को दो बसों के माध्यम से विधायक दल की बैठक में ले जाने के बजाय उन्हें विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी के निवास पर ले जाकर इस्तीफे देने की नौटंकी की गई। नौटंकी में विधानसभा अध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी ने भी कुछ सहयोग किया और उन्हें आश्वस्त किया कि वे उनके साथ न्याय करेंगे। इन परिस्थितियों के चलते विधायक दल की बैठक में पायलट समर्थित सहित 28 विधायक मौजूद रहे देर रात तक विधायक दल की बैठक नहीं हो सकी।

पार्टी के दोनों पर्यवेक्षकों भरपूर कोशिश की कि किसी तरह से विधायक दल की बैठक हो जाए और हाईकमान के निर्देशों की पालना हो जाए। लेकिन यह संभव नहीं हो सका और दोनों पर्यवेक्षकों नाराजगी प्रकट करते हुए सीएम गहलोत और उनके समर्थित लोगों को बगावत  बगावत का दोषी मानकर सोनिया गांधी को रिपोर्ट सौंपी गई। सोनिया गांधी ने भी दोनों पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर मामला अनुशासन समिति को सौंप दिया गया। अनुशासन समिति के सदस्य तारिक अनवर ने भी सरकारी मुख्य सचेतक और जलदाय मंत्री डॉ महेश जोशी, संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल और राजस्थान पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौड़ को  नोटिस जारी कर 10 दिन में जवाब मांगा।

इसी बीच सीएम गहलोत ने इन सब परिस्थितियों  की जिम्मेदारी ली और उन्होंने माना कि  वे हाईकमान के   निर्देशों के अनुरूप कांग्रेस की परंपरा के अनुपालन नहीं करा पाए जाने की बात को स्वीकार किया। यही नहीं वे मुकुल वासनिक, के.सी. वेणुगोपाल और प्रमोद तिवारी के सहयोग से सोनिया गांधी तक पहुंचे और उन्होंने खुले रूप में माफी मांगी।

परिस्थितियां बदली लेकिन सीएम गहलोत ने वातावरण को शांत करने के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव नहीं लड़ने की बात कही यही नहीं कांग्रेस नेतृत्व ने भी उन्हें चुनाव नहीं  लड़ाने का निर्णय किया और मलिकार्जुन खरगे को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने का निर्णय किया गया। नामांकन भरा गया और स्वयं अशोक गहलोत भी उनके प्रस्तावक बने। इस बीच यह निर्णय किया गया कि शीघ्र ही सीएम के बारे में मैंने कर लिया जाएगा। बगावत करने वाले तीनों नेताओं में से डॉ. महेश जोशी को छोड़कर दोनों ने जवाब प्रस्तुत कर दिया और डॉ जोशी ने यह बहाना बनाया कि उन्हें अनुशासन समिति का नोटिस ही नहीं मिला है। इसके बाद नोटिस प्राप्त हुआ और उन्होंने अब जवाब दे दिया है।

इसी बीच हिमाचल और उसके बाद गुजरात के चुनाव घोषित कर दिए गए। इसके अलावा प्रदेश में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा भी आ गई लेकिन सीएम गहलोत को बदले जाने के निर्णय नहीं हो सका। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने सीएम अशोक गहलोत को निर्देशित किया कि वे सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने का प्रस्ताव अपनी ओर से प्रस्तुत करें। सीएम गहलोत को यह सबकुछ मंजूर नहीं था उन्होंने एक बार फिर से राष्ट्रीय स्तर के न्यूज़ चैनल को सचिन पायलट के खिलाफ खुली बगावत करते हुए कई आरोप और प्रत्यारोप लगाते हुए यह खुले तौर पर जता दिया कि अगर सीएम पद से गहलोत को हटाया गया तो सरकार गिर जाएगी। माहौल खराब ना हो इसके लिए निर्णय टाल दिया गया। मौजूदा स्थिति में प्रदेश में भारत जोड़ो यात्रा जोर शोर से चल रही है राहुल गांधी ने इस दौरान बयान देते हुए कहा कि सीएम गहलोत और सचिन पायलट दोनों  नेता पार्टी की  धरोहर है। राहुल के इस बयान के बाद सीएम गहलोत और पायलट के बीच चल रहे विवाद में कुछ समय के लिए विराम लगा।

मौजूदा परिस्थितियों में सीएम गहलोत किसी भी तरीके से अपना पद छोड़ने के लिए तैयार नहीं है उन्होंने बजट लाने की तैयारी पूरी तरह से कर ली है। यह भी माना जा रहा है कि सीएम गहलोत बजट 1 महीने पहले जनवरी में प्रस्तुत कर देंगे। अब कोशिश हो रही है कि किसी तरह से दोनों नेताओं के बीच समझौता करा दिया जाए। सोमवार को यह अफवाह उड़ाई गई की बगावत करने वाले संसदीय कार्यमंत्री शांति धारीवाल, सरकारी मुख्य सचेतक और जलदाय मंत्री डॉ महेश जोशी के साथ ही राजस्थान पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौड़ को माफी दे दी गई है। लेकिन  बुधवार को संगठन महामंत्री के.सी. वेणुगोपाल ने यह स्पष्ट कर दिया कि फिलहाल तीनों बगावत करने वाले नेताओं के खिलाफ कार्रवाई अनुशासन समिति के समक्ष लंबित है उन्हें किसी प्रकार की कोई माफी नहीं दी गई है।

गुजरात चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद अब परिस्थितियां बदली बदली नजर आ रही हैं और यह माना जा रहा है कि शीघ्र सत्ता और संगठन में परिवर्तन संभव है। यह बात भी सही है कि सोनिया गांधी ने अपना 76 वां जन्मदिन  सवाई माधोपुर रणथंबोर में मनाया। इस कार्यक्रम को पूर्णतया निजी रखा गया और कार्यक्रम में प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के साथ परिवार के सदस्य शामिल हुए। लेकिन अब भारत जोड़ो यात्रा का अंतिम चरण राजस्थान में है और 24 दिसंबर को यात्रा राजस्थान से विदा हो जाएगी। लेकिन इस विदाई के साथ ही सीएम गहलोत और सचिन पायलट के बीच राजनीतिक जंग फिर से शुरू हो जाने की स्थितियां बन रही है। पार्टी नेतृत्व किसी तरह से दोनों नेताओं के बीच सुलह कराने की कराने की कोशिश की जा रही है। लेकिन सीएम गहलोत इस बात के लिए राजी नहीं है कि मुख्यमंत्री का पद सचिन पायलट को दे दिया जाए। यह बात भी सही है कि राजस्थान में प्रदेश अध्यक्ष पद के निर्णय का प्रस्ताव हाईकमान के समक्ष पड़ा हुआ है।

मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष के बारे में निर्णय किया जाना बाकी है अब यह चर्चा भी जोरों पर होने लगी है कि सचिन पायलट को कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाए और आगामी वर्ष 2023 में होने वाले विधानसभा का चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा जाए। यह भी कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को बजट पेश करने दिया जाए और उसके बाद कोई डमी कैंडिडेट को मुख्यमंत्री बनाया जाए। यह चर्चा भी जोरों पर है कि इसके लिए सीएम गहलोत सहमति दे सकते हैं ऐसे में हेमाराम चौधरी को मुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा भी अब होने लगी है और यह कहा जाने लगा है कि अगर मारवाड़ और नागौर शेखावटी के 4 मतदाताओं को कांग्रेस के पक्ष में लेने के लिए यह निर्णय पार्टी के लिए एक नया संदेश देने का काम भी कर सकता है। इस निर्णय से प्रदेश में जाट नेता को मुख्यमंत्री बनाए जाने की मांग भी पूरी हो सकेगी। निर्णय अभी हुआ नहीं है चर्चाओं के आधार पर यह कहा जा रहा है।

डॉक्टर सी.पी. जोशी और डॉ. बीडी कल्ला भी मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल है। ब्राह्मण नेता को यह जिम्मेदारी दी जाती है तो इनका नंबर भी आ सकता है। लेकिन अभी तक किसी प्रकार का कोई निर्णय नहीं हुआ है बल्कि राजनीतिक तौर पर विभिन्न स्तर पर समीक्षा और वर्ष 2023 के चुनाव जीतने की रणनीति के तहत यह सब कुछ सोचा जा रहा है। मौजूदा परिस्थिति में सीएम गहलोत आने वाले राजनीतिक परिपेक्ष में अपने आप को बनाए रखने के लिए पार्टी नेतृत्व के ऊपर आप भी दबाव बनाए हुए हैं। वर्ष 2023 के चुनाव में टिकट बांटने का अधिकार किसे मिले इसको लेकर भी अभी भी द्वंद की स्थिति बनी हुई है। पार्टी नेतृत्व इस बात की चिंता तो कर रहा है कि अगर दोनों नेताओं में एकता नहीं रखी गई तो पार्टी को नुकसान हो सकता है ! लेकिन परिस्थितियों में बदलाव जरूर आया है निर्णय हाईकमान के अनुरूप होगा या नहीं होगा यह कहना भी संभव नहीं लगता लेकिन यह बात तो निश्चित है कि सत्ता और संगठन में व्यापक बदलाव आएगा।

जयपुर से श्याम सुंदर शर्मा

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