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विमुद्रीकरण था सही, विपक्षी नेता थे गलत

विमुद्रीकरण था सही, विपक्षी नेता थे गलत

आज आप सबके सामने सवाल लेकर आया हूँ। सवाल जो आपके और आपके बच्चों के भविष्य से जुड़ा है।  सवाल यह है की क्या देश को आगे नहीं बढ़ना चाहिए ? दुनिया जिस गति से आगे बढ़ रही है, क्या भारत को उससे कदमताल मिला कर नहीं चलना चाहिए? डिजिटल होती इस दुनिया में, क्या भारत को भी उस ओर  नहीं बढ़ना चाहिए ?  एक फैसला जो देश की तस्वीर बदलने वाला था, और जिसने बदली भी, उसपर पिछले छह साल से सवाल उठाये जा रहे थे, लेकिन कहते है ना, साँच को आंच नहीं होती।   सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के अपने पहले कार्य दिवस पर ₹500 और ₹1000 मूल्यवर्ग के करेंसी नोटों को बंद करने के केंद्र सरकार के 2016 में लिए गए फैसले को बरकरार रखा। 5 जजों की बेंच में 4 जजों ने नोटबंदी के पक्ष में वोट दिया जबकि एक जज ने असहमति जताई। न्यायमूर्ति एस ए नजीर की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाया। इसने  500 और रु 1000 के करेंसी नोट के विमुद्रीकरण के केंद्र के 2016 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक पुरे बैच को खारिज कर दिया। और कहा कि निर्णय, कार्यकारी की आर्थिक नीति होने के कारण, उलटा नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के इस दलील  को स्वीकार किया कि नोटबंदी से पहले केंद्र और आरबीआई के बीच विचार-विमर्श हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के उपाय को लाने के लिए एक उचित व्यवस्था थी और हम मानते हैं कि नोटबंदी आनुपातिकता के सिद्धांत (Doctrine of Proportionality) से प्रभावित नहीं हुई थी।

अब जब सरकार के आर्थिक फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है तो नोटबंदी को राजनीतिक चाल बताते हुए और इस पर शोर मचाते हुए समाज में जहर घोलने वाले नेता क्या कहेंगे। विमुद्रीकरण के उन दिनों में, जब पूरा देश कठिनाइयों के बावजूद इस कदम के समर्थन में था, ये नेता लोगों की पीड़ा और नियमित दैनिक जीवन में व्यवधान पर फूट-फूट कर रोए, और मौकापरस्तों की तरह इस कदम को मोदी की लोकप्रियता में कमी और उनके समर्थन आधार में दरार के रूप में देखा। विमुद्रीकरण को, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, जो राष्ट्रीय मंच पर चमकने के लिए उत्सुक रहे हैं, और निश्चित रूप से राहुल गांधी, जिनका पास-टाइम और शौक मोदी को गाली देना और बदनाम करना है, ने मोदी को उनके पहले कार्यकाल के बीच में ही  नेस्तनाबूद करने के अवसर के रूप में देखा। उन सभी ने अपने साझा शत्रु को हराने के लिए एक आर्थिक उपाय को राजनीतिक हथकंडे में बदल दिया। लेकिन वास्तव में अगर इच्छाएं नरेंद्र मोदी को बेदखल कर सकती थीं, तो वे अभी चाय बेच रहे होते।

हालाँकि, नरेंद्र मोदी को इस बात का पछतावा है कि सिस्टम में छिपे और जमा किए गए धन को वापस लाने की उनकी योजना का वीपी सिंह की तरह ही राजनीतिकरण किया गया था, जिन्होंने कहा था कि उन्हें खेद है कि मंडलीकरण का राजनीतिकरण किया गया और लालू और मुलायम जैसे जाति के नेताओं को जन्म दिया। हालाँकि, मोदी के विमुद्रीकरण ने मनमोहन सिंह और एम. चिदंबरम जैसे आलोचकों के अलावा, घातक राजनीतिक शत्रुओं, ममता, केजरीवाल और राहुल को जन्म दिया।

इंडिया टुडे और एक अन्य स्वतंत्र एजेंसी द्वारा विमुद्रीकरण के समय एक जनमत सर्वेक्षण से पता चला कि लगभग 84 प्रतिशत लोग अत्यधिक अभावों को झेलने को तैयार थे ताकि जमाखोरों, रिश्वत लेने वालों, कालाबाजारी करने वालों का पर्दाफाश हो सके। नोटबंदी के खिलाफ विपक्षी एकता की दलाली करने की कोशिश भी नहीं चल सकी, क्योंकि ममता हों, केजरीवाल हों या राहुल गांधी, सभी मोदी को मात देने वाले नेता बनना चाहते थे।

बैंकों के सामने घंटों खड़े रहने या एटीएम से बिना कैश के लौट रहे लोगों को जगाने में इन नेताओं की नाकामी का कारण राजनीतिक कम भावनात्मक अधिक था।  वंचित और गरीब मोदी का समर्थन कर रहे थे क्योंकि उन्हें पता था  कि बेईमानों पर संकट आ गया है। उनका मानना था कि एक बड़े पैमाने पर हेराफेरी करने या “विशाल त्रासदी” खड़ा करने,  जैसा पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने मोदी पर आरोप लगाया था; के उलट वास्तव में मोदी अर्थशास्त्री डॉ सिंह द्वारा अर्थव्यवस्था के विशाल कुप्रबंधन को सही कर रहे थे।

एक दूरदर्शी राजनेता मोदी ने आकांक्षी भारतीय और गरीबों को छुआ, जो मानते हैं  कि एक बार अमीर जमाखोरों, रिश्वत लेने वालों और भ्रष्ट लोगों से पैसा निकाला जाएगा, तो अच्छे दिन आ जाएंगे। आपको याद होगा जब लगभग 60 की एक महिला से पूछा गया कि उसे कितनी परेशानी झेलनी पड़ी, तो उसने हंसते हुए कहा, ‘हां, लेकिन मेरी समस्या जल्द ही खत्म हो जाएगी, लेकिन मैं जिस परिवार के लिए काम करती हूं, वह लंबे समय तक रोएगा। उन्हें पांच करोड़ से ज्यादा का नुकसान हुआ। उन पर छापा मारा गया।’

यही क्रक्स  है। जिन लोगों ने एमनेस्टी ऑफर के तहत घोषणा की थी और जिन पर जुर्माना लगाया गया था, उन सभी को भविष्य में टैक्स देना था। इससे वैसा राजस्व मिलना शुरू हुआ था जो अब तक उपलब्ध नहीं था।

विमुद्रीकरण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने आखिरकार मोदी सरकार द्वारा किए गए फैसले को मान्य कर दिया, जिसने देश में “डिजिटल अर्थव्यवस्था” का युग लाया। अब एक सब्जीवाला भी बैंक और ई-वॉलेट से जुड़ गया है, आरबीआई ने “डिजिटल रुपिया” जारी किया है, लोगों को अपनी उंगलियों पर अपनी सभी बैंकिंग सेवाएं मिल रही हैं और क्या नहीं। लेकिन सिर्फ मोदी का विरोध करने के लिए विरोध … कब तक  इस देश में “स्टेटस को” की राजनीती चलती रहेगी, कब यह विपक्षी नेता समझेंगे की हमें अपने देश को भविष्य के लिए भी तैयार करना है , कब तक यह २ रुपये किलो चावल, फ्री ये फ्री वो का खेल चलता रहेगा? आप जनता जनार्दन हैं, आप ही को सोचना है, आप ही के कंधे पर यह देश टिका है, अब आप ही फैसला कीजिये।

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