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सामाजिक-धार्मिक तौर से विवाह ग़लत, लिव-इन-रिलेशनशिप ठीक

सामाजिक-धार्मिक तौर से विवाह ग़लत, लिव-इन-रिलेशनशिप ठीक

हमारा क़ानून भी क्या चीज़ है! ठीक करने वालों को ही परेशान करता है| उसके पास भावना  का आदर करने के लिए कोई स्थान नहीं है| यही कारण है कि कई बार अपना उद्देश्य प्राप्त करने के लिए क़ानून स्वतः ही अपना ध्येय प्राप्त करने के लिए ग़लत तरीके अपनाने क ेलिए प्रेरित कर देता है|

ताज़ा उदाहरण है महाराष्ट्र के शोलापुर का| वहां एक परिवार में दो जुड़वां बहनों ने जन्म लिया| वह एक साथ इकट्ठी पढ़ी-लिखी और बड़ी हुईं। दोनों पढ़ने में एक समान होशियार निकलीं| दोनों ने मुंबई में सूचना प्राद्योगिकी में इंजीनियरिंग पास की| उन दोनों में इतना प्रेमभाव रहा कि वह एक दूसरे के बिना रह नहीं सकतीं थी| दोनों ही मुंबई में एक अच्छी कंपनी में इंजिनीयर के रूप में काम करती थीं|

अब उनकी शादी की उम्र भी हो गई| वह एक-दूसरे के साथ इतनी बंधी हुईं थी कि वह विवाह उपरान्त भी एक-दूसरे से अलग रहने का सोच भी नहीं सकतीं थीं| विवाह के उपरान्त भी इकट्ठा रहना भी एक समस्या थी| दो भाइयों के साथ इन दोनों का विवाह तो संभव हो सकता था पर कल को दोनों  भाइयों में भी किसी बात पर तकरार हो सकता था| ऐसी अवस्था में उन दोनों का एक-साथ रहने में परेशानी खड़ी हो सकती थी जो इन दोनों बहनों को किसी भी सूरत में मान्य नहीं था|

अंत में एक ही रास्ता निकला कि दोनों बहनें एक ही व्यक्ति से शादी कर लें| पर एक ऐसा व्यक्ति  ढूंढ पाना भी तो एक टेढ़ी खीर थी| मन सच्चा हो तो कोई न कोई हल निकल ही आता है| उन दोनों बहनों के प्यार को देखते हुए एक लड़का तैयार भी हो गया| अंततः वधु और वर दोनों के परिवारों की सहमति से हिन्दू रीति-रीवाज के साथ उनका विवाह भी संपन्न हो गया|

यह अनोखी घटना सोशल मीडिया में भी खूब प्रसारित हुई| अब इस में हमारा क़ानून खड़ा हो गया| क़ानून के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक पत्नी के होते दूसरा विवाह नहीं कर सकता| अब लड़के के विरुद्ध पुलिस ने मुकदद्मा दायर कर दिया है|

हम तो मानते ही हैं कि क़ानून अँधा होता है| यही नहीं उसमें भावनाओं के लिए भी कोई स्थान नहीं होता| तो फिर क़ानून स्वयं ही ग़लत रास्ते सुझाता है|

यह दोनों बहनें और दूल्हा यदि अपना धर्म परिवर्तन कर यह काम करते तो हमारे क़ानून को कोई तकलीफ न होती| हमारे कई छोटे-बड़े महानुभावों ने इस रास्ते को अपनाया है और मौज कर रहे हैं| कोई क़ानून रास्ते में खड़ा नहीं हुआ|

एक और दूसरा रास्ता है| क़ानून के अनुसार यह चाहे अपराध न हो, पर हमारे नैतिक मूल्यों के अनुसार ठीक नहीं बैठता| अब हमारा क़ानून कहता है कि यदि स्त्री-पुरुष व्यस्क और सहमत हैं तो कोई क़ानून आड़े नहीं आता और सब कुछ मान्य है| कहते भी है कि मियाँ -बीवी राज़ी तो क्या करेगा क़ाज़ी|

ऐसे हालात में क्या ठीक है और क्या ग़लत, इस पर निर्णय तो जनता ही करेगी सामाजिक तौर पर| क़ानून तो अंधा है ही| रहेगा भी|

 

अम्बा चरण वशिष्ठ
(लेखक राष्ट्रिय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् में वरिष्ठ सलाहकार रह चुके हैं| सामाजिक और क़ानूनी विषयों पर भी लिखते रहते हैं|)

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