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आप की झाड़ू से भाजपा उड़ी धूल में

आप की झाड़ू से भाजपा उड़ी धूल में

By रंजना

चुनाव हो या लड़ाई का मैदान, युद्ध योद्धा जीतता है। दिल्ली भाजपा इस मामले में अपवाद रही। न तो योद्धा मन से युद्ध के मैदान में उतरे और न ही उसके हथियारबंद सैनिक। नतीजा सामने है। सबसे दिलचस्प है कि पार्टी ने इस प्रकरण का कांग्रेस से भी सबक नहीं लिया। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भी यही गलती की थी।

दिल्ली का चुनाव नतीजा अलहदा आया है। 14 महीने बाद अहंकार, अविश्वास और अवसरवादी राजनीति के मोह से ग्रस्त भाजपा को विधानसभा की 70 सीटों में से केवल 3 सीटें मिली हैं। महज दो साल की आम आदमी ‘आप’ ने 67 सीटें हासिल की है। भाजपा के शीर्ष पंक्ति के नेताओं का इस नतीजे से जहां मुंह सूजा हुआ है, वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए नतीजे ‘लिटमस टेस्ट’ माने जा रहे हैं। क्योंकि केन्द्र में राजग की सरकार के सत्ता में आने के बाद यह पहला राज्य विधानसभा चुनाव है जहां भाजपा ने सभी हथकंडे अपनाए। चुनाव में जीत हासिल करने के लिए हर संभव कोशिश की और पार्टी हारी ही नहीं बल्कि ‘आप’ का झाड़ू चल गया। भाजपा उससे उड़ी धूल में खो गई तो कांग्रेस दिल्ली से बाहर चली गई। खाता ही नहीं खुला।

खबर है कि भाजपा की इस करारी हार पर संघ के सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल और भाजपा महासचिव राम लाल ने एक रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट में हार के लिए पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया है। इसको आधार बनाकर 13 फरवरी को भाजपा के सबसे शक्तिशाली संसदीय बोर्ड ने हार के कारणों पर मंथन करने का निर्णय लिया है।

28-03-2015

इस वक्त स्थिति यह है कि दिल्ली में भाजपा ही नहीं हारी बल्कि इसके सभी दिग्गज हार गए। हालांकि भाजपा को मिले वोट प्रतिशत में कोई खास कमी नहीं है। इस मामले में कांग्रेस को भारी पराजय का मुंह देखना पड़ा। उसके 63 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई और एक भी सीट पर सफलता नहीं मिली। यानी खाता ही नहीं खुला। जबकि भाजपा का खाता खुल गया। रोहिणी से विजेन्द्र गुप्ता समेत दो अन्य चुनाव जीतने में सफल रहे। पूर्व आईपीएस अधिकारी और भाजपा की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी सबसे सुरक्षित सीट कृष्णा नगर से हार गईं। जनकपुरी से जगदीश मुखी हार गए। भाजपा के लगभग सभी गढ़ ध्वस्त हो गए और पूरे किले की झाड़ू ने सफाई कर दी। दिल्ली विधानसभा चुनाव के भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पूरी ताकत झोंक दी थी। पहले राज्यसभा और लोकसभा के सांसदों को प्रचार अभियान में लगाया गया और बाद में सभी केन्द्रीय मंत्री इस अश्वमेध में कूद पड़े।

पार्टी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इस हवन में उतारा। इतना ही नहीं गुरमीत सिंह राम रहीम की फिल्म एमएसजी की मंजूरी, गृह सचिव अनिल गोस्वामी की विदाई के जरिए सख्त और ईमानदार प्रशासक का संदेश देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी गई। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने वह हर बाजी चली जिसे उनकी टीम चाह रही थी। बजट तैयार करने के व्यस्ततम दौर में भी केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने दिल्ली प्रदेश भाजपा कार्यालय में चुनाव प्रचार, मीडिया मैनेजमेंट, प्लानिंग की कमान संभाली। केन्द्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी, निर्मला सीतारमण सब आए, लेकिन वार पूरी तरह से खाली गया। जबकि कांग्रेस का मटियामेट हो गया। राज्य में 15 साल राज करने वाली पार्टी को एक भी सीटें नहीं मिल पाई।

आप की कोर टीम

मनीष सिसोदिया मनीष सिसोदिया टीवी पत्रकार रह चुके हैं। ये दिल्ली की पटपडग़ंज सीट से विधायक हैं और पूर्व सरकार में मंत्री रहे हैं। ये सक्रिय आरटीआई कार्यकत्र्ता भी हैं। इन्हें अरविंद केजरीवाल का सीधा हाथ कहा जाता है।
आशुतोष
पेशे से पत्रकार रह चुके आशुतोष आम आदमी पार्टी के चुनाव कंपेनिंग कमिटी के सदस्य हैं। आशुतोष 2014 में लोकसभा चुनाव में चांदनी चौक से कांग्रेस के धुरंधर कपिल सिब्बल और बीजेपी के हर्षवर्धन के सामने विरोधी प्रत्याशी रहे। आशुतोष आप के दिल्ली चुनाव का प्रभार देख रहे थे।
कुमार विश्वास
विश्वास अपनी कविताओं की वजह से युवाओं में काफी चार्चित हैं। साथ ही ये अपने प्रचार-प्रसार के तरीके के लिए भी जाने जाते हैं। पार्टी के लिए प्रचार-प्रचार में विश्वास के साथ पंजाब के सांसद भगवंत मान और गुल पनाग भी जुड़े, जिसकी वजह से जनता का बड़ा वर्ग इनके साथ जुड़ा। मोदी समर्थक और महिला विरोधी टिप्पणी करने के कारण विवादों में रहे। लेकिन इस बार विवादों से दूर रहने की कोशिश की।
संजय सिंह
अण्णा आंदोलन से जुड़े रहे संजय सिंह उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। ये पार्टी की राजनीतिक मामलों की समिति से जुड़े हैं। आप पार्टी में उम्मीदवारों के चयन के लिए सिसोदिया के साथ संजय भी शामिल रहे। इन्हें ये सुनिश्चित करने के लिए सिसोदिया के साथ रखा गया कि किसी आपराधिक मामले या संदिग्ध प्रवृति के लोगों को टिकट नहीं दिया जाए।
अतिशी मार्लेना
मार्लेना लोकसभा चुनाव से पहले आप के साथ जुड़ी थीं। इन्होंने लोकसभा चुनाव के घोषणा पत्र के साथ-साथ 2015 के विधानसभा चुनावों की घोषणा पत्र तैयार की। सेंट स्टीफेंस कॉलेज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की पृष्टभूमि और भारतीय गांवों में काम करने की वजह से जनता की नब्ज की इन्हें बखूबी पता था। अतिशी टीवी पर आम आदमी पार्टी का चेहरा बन चुकी हैं।
आशीष खेतान
खेतान पेशे से खोजी पत्रकार रह चुके हैं। एप्पल के पूर्व अधिकारी आदर्श शास्त्री के साथ-साथ खेतान भी आप आदमी पार्टी और जनता के बीच संवाद के सूत्र रहे। खेतान नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र से आप के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं। खेतान ने विकास पर विचार के साथ शिक्षा, स्वास्थ्य, महिलाओं की सुरक्षा और लोगों के साथ अपने संबंध अच्छे बनाते हुए आप में पहचान बनाईं।
अंकित लाल
ये पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और सोशल मीडिया के ज्ञाता हैं। आप पार्टी के ट्विटर, फेसबुक और ब्लॉग्स पर आप के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी इन्होंने ली। अण्णा अंदोलन के बाद से ये लोगों के बीच उभर कर सामने आये। इन्होंने सोशल मीडिया आउटरीच में मदद करने के लिए 2012 में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अण्णा के साथ जुड़ गए। अब ये एक छोटी सी टीम के प्रमुख हैं, जो कि मीडिया में आप का प्रचार करती है। इन्होंने ही दिल्ली में आप के अभियानों को बढ़ावा दिया और केजरीवाल को मफलरमैन के नाम से प्रसिद्ध किया।
राघव चड्ढा
चड्ढा पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट रहे हैं। आप पार्टी के लिए फंड जुटाने में इनका विशेष योगदान है। चड्ढा ने पार्टी के लिए नवीन और पारदर्शी फंडिग ड्राइव शुरू की और पार्टी का सहयोग किया। आप की ओर से बीजेपी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं पर जो भी आरोप लगए गए उनके पीछे चड्ढा ने ही सारी जानकारी जुटाई थी।
दुर्गेश पाठक
दिल्ली में सिविल सर्विस की तैयारी करने के लिए आये दुर्गेश अण्णा आंदोलन से जुड़ गए और वॉलेंटियर बन कर काम किया। इन्होंने आप के लिए घर-घर जाकर प्रचार-प्रसार किया।
पंकज गुप्ता
पंकज ने 25 साल तक सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में कार्यरत रहने के  बाद इंडस्ट्री से त्यागपत्र दे दिया और केजरीवाल से जुड़ गए। इन्हें पार्टी के लिए फंड जुटाने का कार्यभार सौंपा गया, जो कि एक चुनौती भरा कार्य था। पार्टी ने 2013 में माइक्रो फाइनेंसिग के जरिए 20 करोड़ का फंड जुटाया था। हालांकि लोकसभा चुनाव के लिए 30 करोड़ का लक्ष्य था, लेकिन पार्टी 18 करोड़ ही जुटा पाई थी।
प्रीति ठाकुर

 

हार का अंतर

1,000 या उससे ज्यादा वोट की मार्जिन से हारे उम्मीदवार

  • कृष्ण नगर से बीजेपी की किरण बेदी आप के एस.के.बग्गा से हारीं।
  • लक्ष्मी नगर से बीजेपी के बी.बी. त्यागी आप के नितिन त्यागी से हारे।
  • मुस्तफाबाद से कांग्रेस के हसन अहमद बीजेपी के जगदीश प्रधान से हारे।
  • नजफगढ़ से इंडियन नेशनल लोकदल के भरत सिंह आप के कैलाश गहलोत से हारे।
  • रोहिणी से आप के सी.एल.गुप्ता बीजेपी के विजेन्द्र कुमार से हारे।
  • रोहतास नगर से बीजेपी के जितेन्द्र महाजन आप की सरिता सिंह से हारे।
  • शकूर बस्ती से बीजेपी के एस.सी. वत्स आप के सतेंद्र जैन से हारे।

10,000 या उससे ज्यादा वोट की मार्जिन से हारे उम्मीदवार

  • बिजवासन से बीजेपी के सत प्रकाश राणा आप के देवेन्द्र सेहरावत से हारे।
  • चांदनी चौक से बीजेपी कीसुमन कुमार गुप्ता आप की अलका लांबा से हारीं।
  • दिल्ली कैंट से बीजेपी केकरण सिंह तंवर आप के सुरेन्द्र सिंह से हारे।
  • गांधी नगर से बीजेपी के जितेंद्र आप के अनिल कुमार वाजपेयी से हारे।
  • घोंडा से बीजेपी के साहब सिंह चौहान आप के श्रीदत्त शर्मा से हारे।
  • ग्रेटर कैलाश से बीजेपी के राकेश कुमार गुल्लिया आप के सौरभ भारद्वाज से हारे।
  • कालकाजी से बीजेपी के हरमीत सिंह आप के अवतार सिंह से हारे।
  • कस्तूरबा नगर से बीजेपी के रविन्द्र चौधरी आप के मदन लाल से हारे।
  • मलवीय नगर से बीजेपी की डॉ. नन्दनी शर्मा आप के सोमनाथ भारती से हारीं।
  • मेहरौली से बीजेपी की सरिता चौधरी आप के नरेश यादव से हारीं।
  • मॉडल टाउन से बीजेपी के विवेक गर्ग आप के अखिलेश पति त्रिपाठी से हारे।
  • मोती नगर से बीजेपी के सुभाष सचदेवा आप के शिव चरण गोयल से हारे।
  • आर.के.पुरम से बीजेपी के अनिल कुमार शर्मा आप के प्रमिला टोकस से हारे।
  • राजौरी गार्डन से शिरोमणी अकाली दल के मनजिंदर सिंह सिरसा आप के जरनैल सिंह से हारे।
  • शहादरा से बीजेपी के जितेन्द्र सिंह शंटी आप के आप के रामनिवास गोयल से हारे।
  • शालीमार बाग से बीजेपी की रेखा गुप्ता आप की वंदना कुमारी से हारीं।
  • तिलक नगर से बीजेपी के राजीव बब्बर आप के जरनैल सिंह से हारे।
  • विश्वास नगर से आप के डॉ. अतुल गुप्ता बीजेपी के ओम प्रकाश शर्मा से हारे।

50,000 या उससे ज्यादा वोट की मार्जिन से हारे उम्मीदवार

  • बवाना से बीजेपी के गुगन सिंह आप के वेद प्रकाश से हारे।
  • नरेला से बीजेपी के नील दमन खत्री आप के शरद कुमार से हारे।

60,000 या उससे ज्यादा वोट की मार्जिन से हारे उम्मीदवार

  • बुराड़ी से बीजेपी के गोपाल झा आप के संजीव झा से हारे।
  • देवली से बीजेपी के अरविंद कुमार आप के प्रकाश से हारे।
  • ओखला से बीजेपी के ब्रह्म सिंह आप के आमानतुल्लाह खान से हारे।
  • सुलतानपुर माजरा से बीजेपी के प्रभु दयाल आप के संदीप कुमार से हारे।

70,000 या उससे ज्यादा वोट की मार्जिन से हारे उम्मीदवार

    • विकासपुरी से बीजेपी के संजय सिंह आप के महेन्द्र यादव से हारे।

कहां हुई चूक
‘आप’ के योगेन्द्र यादव इस बारे में सही कहते हैं। योगेन्द्र यादव का कहना है कि भाजपा अपने नकारात्मक प्रचार के चलते चुनाव हारी। मतगणना के कुछ समय बाद से ही इस चुनाव को मोदी बनाम केजरीवाल बताए जाने को गलत बताना शुरू कर दिया था। योगेन्द्र यादव का कहना है कि प्रधानमंत्री ने नाहक इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से खुद ही जोड़ लिया। ‘आप’ के विश्लेषकों पर गौर तो करें तो उनका मानना है कि भाजपा में आत्मविश्वास और जुझारूपन की कमी थी, जो चुनाव में हार के रूप में सामने आ गई। इसके बाद पार्टी एक के बाद एक गलतियां करती गई। गलतियों के सुधारने के बजाय जो प्रयास हुए वह ‘घाव पर मरहम’ के बजाय ‘जले पर नमक साबित हुए’।

आ बैल मुझे मार
भाजपा की हार और उसकी चुनावी रणनीति में यह कहावत फिट बैठती है। दिल्ली में भाजपा ने डॉ. हर्ष वर्धन को पिछली बार चुनाव में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। विजय गोयल समेत अन्य ने जी-जान से चुनाव लड़ा था। तब भाजपा 32 सीटों के साथ पहले नंबर पर आई थी और डॉ. हर्ष वर्धन पर ‘आप’ पार्टी के रणनीतिकार एक भी दाग नहीं लगा सके थे। मई 2014 में लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत मिलने के बाद केन्द्र में राजग सरकार बनी तो प्रधानमंत्री ने डॉ. हर्ष वर्धन को स्वास्थ्य मंत्री बनाया और छह महीने के भीतर उनका विभाग बदल दिया। इससे एक गलत संदेश गया।

पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व में बदलाव हुआ। अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने और उन्होंने दिल्ली भाजपा का चेहरा तय करना शुरू कर दिया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जब से कुर्सी संभाले थे, पार्टी के अल्पमत में होने के बाद भी सरकार बनाने का दावा करते रहे, जबकि ‘आप’ के कजरीवाल हमलावर भूमिका में रहे। टर्निंग प्वाइंट तब आया जब भाजपा दिल्ली में चुनाव की घोषणा होने के बाद सफलता पाने के तरीकों को लेकर उतावली हो गई।

10 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राम लीला मैदान में जनसभा में कुर्सियों का खाली रह जाने की स्थिति ने आग में घी का काम किया। दूसरे, प्रधानमंत्री ने भी बिना नाम लिए अरविंद केजरीवाल को अराजक बता दिया और जंगल में जाने की सलाह दे दी। यहां से भाजपा को लेकर नकारात्मक माहौल बनना शुरू हो गया। बाद में अचानक पार्टी ने आईपीएस अधिकारी किरण बेदी को न केवल भाजपा में शामिल किया, बल्कि प्रदेश भाजपा कार्यालय में उनका बेदी का संबोधन तक करा दिया और मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। इससे पार्टी के वफादार कार्यकर्ताओं और नेताओं को गहरा धक्का लगा। चुनाव पर बारीकी से नजर रखने वालों के मुताबिक इसके बाद भाजपा के प्रदेश के सभी बड़े नेता दिखावे के लिए पार्टी के साथ थे, लेकिन उनके मन में अपनी उपेक्षा का भाव लगातार हिलोरे मारता रहा।

कांग्रेस से भी सबक नहीं
चुनाव हो या लड़ाई का मैदान, युद्ध योद्धा जीतता है। दिल्ली भाजपा इस मामले में अपवाद रही। न तो योद्धा मन से युद्ध के मैदान में उतरे और न ही उसके हथियारबंद सैनिक। नतीजा सामने है। सबसे दिलचस्प है कि पार्टी ने इस प्रकरण का कांग्रेस से भी सबक नहीं लिया। 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने भी यही गलती की थी। चुनाव के सप्ताह भर पहले से पार्टी के शीर्ष नेताओं को घोर निराशा ने घेर लिया था। 2015 में चुनाव से कुछ दिन पहले ऐन वक्त पर पार्टी इसका शिकार हो गई। हालांकि प्रदेश कार्यालय, पंत मार्ग में बैठने के बाद अरूण जेटली ने विजय कुमार मल्होत्रा समेत पुराने नेताओं की सलाह को चुनाव प्रचार में अपनाने की कोशिश की, लेकिन तब तक दिल्ली बहुत दूर हो चुकी थी।

क्यों नहीं चल पाई किरण
किरण का कोई जादू नहीं चला। चुनाव विश्लेषक बताते हैं कि किरण बेदी पुलिस अधिकारी की छवि से उबर ही नहीं पार्इं। पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं के साथ उनका यह व्यवहार जारी रहा। मतदाताओं के बीच में भी वह जनसेवक कम हेडमास्टर और समाज सुधारक की भूमिका में ज्यादा रहीं। लिहाजा जनता बेदी को देखने को उमड़ी, लेकिन बेदी जनता में अपनी छाप नहीं छोड़ पार्इं।

कांग्रेस का गेम प्लान
कांग्रेस ने चुनाव से पहले हार मान ली थी। शीला दीक्षित साफ कहती हैं कि उन्हें इसका अंदाजा था। चुनाव से दो-तीन पहले ऐसा लग रहा था कि शायद कांग्रेस खाता भी न खोल पाए। माना जा रहा है कि इस आकलन के आधार पर कांग्रेस ने ‘डमी इलेक्शन’ लड़ा। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस थोड़ा भी चुनाव मैदान में प्रभावी होती और उसके वोट प्रतिशत महज पांच प्रतिशत और होते तो नतीजा ही कुछ और होता।

खैर, जो भी हो चर्चा यह भी है कि शीला ने इस दौरान राजनीतिक गोट चलकर चुनाव का फंदा कांग्रेस महासचिव अजय माकन के गले में डाल दिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली को यह रास नहीं आया और अंदरूनी कलह में जहां कांग्रेस का खाता नहीं खुला वहीं शीला के विरोधी भी चित हो गए।

28-03-2015

नहीं चले किराए के हथियार
भाजपा को उम्मीद थी कि कृष्णा तीरथ अपना चुनाव जीत जाएंगी, आप से आए एम.एस. धीर सफल होंगे और बिनोद कुमार बिन्नी मनीष सिसोदिया को कड़ी टक्कर दे देंगे। बताते हैं कि पार्टी के इस प्रयोग ने पार्टी कार्यकर्ताओं को तो निराश किया ही, बाहर से आए ये किराए के हथियार भी नहीं चल पाए। अब इनको लेकर पार्टी के भीतर भारी घमासान की स्थिति है।

गरम भाजपा तो विनम्र ‘आप’
चुनाव के दौरान रोचक रणनीति देखने को मिली। पहले ‘आप’ हमलावर थी, लेकिन बाद में जब भाजपा हमले की भूमिका में आई तो रणनीति के तौर ‘आप’ ने सहानुभूति बटोरने की राह को चुन लिया। चंदे के विवाद पर केवल सकारात्मक जवाब देने की लाचारी दिखाई। आरोप-प्रत्यारोप से खुद को दूर कर लिया। जबकि जनता के दिल को छूने के लिए ‘कांग्रेस और भाजपा से पैसे लो और ‘आप’ को वोट दो’ जैसी मतदाताओं से अपील करने में भी पीछे नहीं रही।

हार सुनते ही बेदी ने फोड़ा ठीकरा
कृष्णा नगर सीट से हार सुनिश्चित होते ही किरण बेदी मीडिया के सामने आई और हार की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने से बचने की कोशिश की। उन्होंने हार का पूरा ठीकरा भाजपा पर फोड़ दिया।

अमित शाह ने फेसबुक से हटाया
दिल्ली में जिस दिन मतगणना थी, उसी दिन भाजपा अध्यक्ष शाह के बेटे जय शाह की रिशिता से शादी थी। शादी अहमदाबाद में हो रही थी, लेकिन पार्टी की करारी हार की सूचना आते ही शाह ने अपने फेसबुक अकाउंट से किरण बेदी की तस्वीर को हटाने का फर्मान जारी कर दिया। उनके फेसबुक की स्क्रीन पर फिर भाजपा सदस्यता बढ़ाने से जुड़ा अभियान फिर आ गया।

मोदी बड़े दिल वाले

प्रधानमंत्री की सोच उम्दा है। उन्होंने दिल्ली विधानसभा चुनाव मतगणना शुरू होने के कुछ घंटे बाद और नतीजा आने के कुछ घंटे पहले ही अरविंद केजरीवाल को फोन करके उन्हें बधाई दे दी। बाद में केजरीवाल जब शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू, गृह मंत्री राजनाथ और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलने पहुंचे तो मिलकर आगे बढऩे और दिल्ली का विकास करने में पूर्ण सहयोग देने का भाव साफ नजर आया।

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