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महामना : महान राष्ट्रभक्त एवं दूरदर्शी शिक्षाविद

महामना : महान राष्ट्रभक्त एवं दूरदर्शी शिक्षाविद

भारत रत्न महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी एक महान राष्ट्रभक्त, लोकप्रिय जननेता, स्वतंत्रता सेनानी, प्रभावी विधिवेत्ता, समाज सुधारक, प्रखर पत्रकार एवं मानवीय गुणों से युक्त एक दूरदर्शी शिक्षाविद  थे जिन्होंने ब्रिटिश शासन काल के दौर में गौरवशाली भारतीय संस्कृति के  मूल्यों एवं आदर्शों से अनुप्राणित, प्राचीन भारतीय ज्ञान और आधुनिक ज्ञान के समन्वय पर आधारित शिक्षा का एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया जिससे छात्र विभिन्न क्षेत्रों में ज्ञानार्जन, कौशल एवं उद्यमिता विकास के साथ–साथ  समृद्ध सनातन संस्कृति के मूल्यों को आत्मसात कर सकें, तथा  धर्म और नीति को शिक्षा का अभिन्न अंग मानकर छात्रों का चारित्रिक एवं सर्वांगीण विकास सुनिश्चित हो सके। दिनांक  25 दिसंबर 1861 को प्रयागराज में महामना का जन्म हुआ था।

बचपन से ही महामना की सोच पर सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का गहरा प्रभाव था।  वर्ष 1891 में कानून में स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद वे प्रयाग के जिला न्यायालय और 1893 में प्रयाग उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्य करना प्रारंभ कर दिए। वे एक सफल अधिवक्ता थे और उनकी  वकालत खूब चलती थी, लेकिन तत्कालीन ब्रिटिश शासन के द्वारा स्थापित पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली, जिससे छात्रों में पाश्चात्य संस्कृति का प्रवाह होता था तथा छात्र अपनी भारतीय सांस्कृतिक जड़ों से दूर हो रहे थे, महामना अत्यंत दुखी थे।  इसलिए  महान राष्ट्रभक्त महामना ने  ब्रिटिश शासन तंत्र के दबाव से मुक्त, एक ऐसे ज्ञान के मंदिर, राष्ट्रीय विश्वविद्यालय की परिकल्पना की जो प्राचीन भारत के गौरवशाली शिक्षा मंदिर ‘तक्षशिला’, ‘नालंदा’, विक्रमशिला को प्रतिबिंबित करता हो। ऐसा विश्वविद्यालय जहाँ छात्र प्राचीन भारत की समृद्धशाली  ज्ञान सम्पदा के साथ-साथ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का अध्ययन कर  सकें, ज्ञान और कौशल विकास के अतिरिक्त जहाँ भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के आलोक में छात्रों का चरित्र निर्माण हो सके, राष्ट्रभक्त छात्रों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सके। अपनी इसी परिकल्पना को  साकार करते हुए महामना  ने वर्ष 1916 में ज्ञान, अध्यात्म और सनातन संस्कृति की राजधानी काशी में  भव्य विद्या मंदिर काशी हिन्दू  विश्वविद्यालय की स्थापना की।

ब्रिटिश शासन काल में  काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना से पूर्व भारत में पाश्चात्य शिक्षा –पद्धति के अलोक में पांच विश्वविद्यालयों की स्थापना हो चुकी थी। वर्ष 1857 में कलकत्ता, बम्बई, मद्रास, 1882 में लाहौर तथा 1887 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय ब्रिटिश-भारत  सरकार द्वारा स्थापित किये जा चुके थे। लेकिन महामना का मानना था कि हमारे उच्च शिक्षण संस्थानों में आधुनिक ज्ञान, विज्ञान, तकनीकी की शिक्षा के अतिरिक्त छात्रों में राष्ट्रीयता की शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए,  जिससे छात्रों में राष्ट्रीय चरित्र का विकास हो सके । भारतीय धर्म-ग्रन्थ, भारतीय ज्ञान सम्पदा, सनातन संस्कृति के मूल तत्वों तथा नीति की शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे भारतीयता के आलोक में छात्रों का चारित्रिक उन्नयन हो सके तथा छात्र शिक्षित होकर,  देश भक्त बनकर, राष्ट्र निर्माण में योगदान देते हुए भारत के गौरव को समृद्ध कर सकें।

भारतीय शिक्षा-दृष्टि के अनुरूप विश्वविद्यालय की स्थापना सम्बन्धी अपनी योजना को महामना ने  सर्वप्रथम काशी नरेश महाराजा प्रभु नारायण सिंह जी के समक्ष अक्टूबर 1904 में बनारस के नदेसर स्थित मिंटहाउस की एक सभा में रखा और सभा की  स्वीकृति प्राप्त की। उसके बाद 1905 और 1906 की अनेक जनसभाओं में उन्होंने जनता को भावी विश्वविद्यालय की आवश्यकता का उद्देश्य समझाया। जनवरी, 1906 में प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर कुम्भ मेले  में विशाल जन समुदाय के समक्ष उन्होंने अपने संकल्प को दोहराया। 15 दिसंबर, 1911 को ‘हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसाइटी’ की  स्थापना हुई, जिसके अध्यक्ष महाराजा दरभंगा नरेश  ‘श्री रामेश्वर सिंह’ तथा सचिव   इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रमुख बैरिस्टर ‘श्री सुंदरलाल जी ‘ थे। वर्ष 1915 में केंद्रीय विधानसभा द्वारा  ‘हिन्दू यूनिवर्सिटी ऐक्ट’ पारित हुआ।  वाराणसी में गंगा तट के पश्चिम,  महाराजा ‘प्रभु नारायण सिंह जी’ द्वारा प्रदत्त विस्तृत भूखंड पर विश्वविद्यालय स्थापना समारोह का आयोजन पांच दिन तक 4 फरवरी 1916 से 8 फरवरी 1916 तक हुआ। महामना चाहते थे कि विश्वविद्यालय का शिलान्यास वसंत पंचमी के दिन हो, लेकिन इस दिन तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिंग की उपलब्धता  नहीं होने के कारण विश्वविद्यालय का शिलान्यास 4  फरवरी 1916  को हुआ तथा स्थापना समारोह की पूर्णाहुति वसंत पंचमी के दिन 8 फरवरी, 1916 को हुई। पांच दिन तक चलने वाले स्थापना समारोह में अनेक शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों एवं राजनेताओं ने विश्वविद्यालय की भावी रूपरेखा हेतु व्याख्यान दिया जिसमें राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, श्रीमती एनी बेसेंट, डॉ. जगदीश चन्द्र बोस, डॉ. प्रफुल्ल चन्द्र रे, सर सी.वी. रमन, डॉ.सैम हिग्गिन्बोटम, श्री हेरोल्ड मान, कविराज गणानाथ सेन, आदि प्रमुख थे। महामना ने अपने उद्घाटन व्याख्यान में कहा कि   “मैं एक ऐसे  विश्वविद्यालय की स्थापना कर रहा हूँ, जो प्राचीन भारत के ज्ञान का आधुनिक भौतिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी के ज्ञान के साथ समन्वय स्थापित करेगा।” अर्थात महामना ने प्राचीन भारत के ज्ञान-विज्ञान की परम्पराओं के साथ  विश्व के आधुनिक विश्वविद्यालयों की अद्यतन ज्ञान-विज्ञान की परंपरा के साथ  अद्भुत मेल स्थापित करने हेतु इस विश्वविद्यालय की स्थापना की।

भारत में पहली बार महामना ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग, ग्लास टेक्नोलॉजी, फार्मास्युटिकल केमिस्ट्री, माइनिंग और मेटलर्जी के विभागों की स्थापना की। इसी के साथ ही उन्होंने विज्ञान के  उन्नत विषयों के विभाग  तथा प्राचीन भारत के  ज्ञान –विज्ञान सम्बन्धी आयुर्वेद, इंडोलॉजी, प्राचीन भारतीय संस्कृति, दर्शन, प्राच्य विद्या धर्म विज्ञान और उच्च संस्कृत शिक्षा जैसे विषयों की शुरुआत की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय महामना के चिंतन, उनके स्वप्न, राष्ट्र प्रेम, भक्ति, अदम्य साहस और शक्ति का जीवंत स्वरुप है। महामना ने  आचार्य चाणक्य की भांति शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण और सामाजिक पुनरुथान का संकल्प लिया। महामना की शिक्षा दृष्टि के मूल में छात्रों के सर्वांगीण अर्थात शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक विकास की अवधारणा थी। उनका मत था  कि शिक्षा के माध्यम से ही  छात्रों में चरित्र निर्माण, देशभक्ति, मातृभूमि के प्रति समर्पण, सांस्कृतिक विरासत और धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा की भावना का विकास संभव है। वे छात्रों में चरित्र-निर्माण के लिए धर्म और  नीति की शिक्षा को अनिवार्य मानते थे। वे जहाँ ज्ञान-विज्ञान तथा प्रोद्योगिकी शिक्षा को भौतिक विकास एवं समृद्धि के लिए आवश्यक मानते थे वहीँ  मानवता और मानव सभ्यता के विकास के लिए चरित्र-निर्माण को अनिवार्य मानते थे । भौतिकता का आध्यात्मिकता के साथ समन्वय उनकी  शिक्षा दृष्टि के मूल में था । वे छात्रों से कहते थे कि “इस विश्वविद्यालय की स्थापना विद्यार्थी के भीतर शारीरिक बल के साथ धर्म की ज्योति और ज्ञान का बल भरने के लिए हुई है ।” आध्यात्मिक विकास के लिए वे ईश्वर में विश्वास, भक्ति और मानव सेवा को आवश्यक मानते थे। वह कहते थे कि “यह शरीर परमात्मा का मंदिर है । ईश्वर को सदैव अपने भीतर अनुभव करो और इस मंदिर को कभी अपवित्र न होने दो । इस पवित्र मंदिर का रक्षक ब्रह्मचर्य है ।” महामना देशभक्ति को सर्वोत्तम शक्ति मानते थे जिससे  मनुष्य को उच्च कोटि की नि:स्वार्थ सेवा करने  के लिए और आत्मत्याग के लिए प्रेरणा मिलती है। वे सदा छात्रों से कहते थे कि “तुम समाज में सम्मान के योग्य तभी होगे जब तुम सत्य बोलो, ब्रह्मचर्य का पालन करो, व्यायाम करो , विद्योपार्जन करो, देश-भक्त बनो और आत्म-त्याग की भावना रखो” –

‘सत्येन ब्रह्मचर्येण व्यायामेनाय विद्यया। देशभक्त्यात्मत्यागेन  सम्मानर्ह: सदाभव ।।‘

महामना सनातन धर्म के अनन्य उपासक थे । वे कहते थे कि “इस पृथ्वी मंडल  पर जो वस्तु मुझको सबसे अधिक प्यारी है वह धर्म है और वह सनातन धर्म है।”  वे कहते थे की हिन्दू जाति सृष्टि में सभी जतियों में प्राचीन है और पीपल के वृक्ष की तरह हिन्दू सभ्यता की जड़ें बहुत गहरी और बहुत दूर तक फैली हैं । वे िनत्य गीता का पाठ किया करते थे । उनके द्वारा विश्वविद्यालय में प्रारंभ की गयी गीता-प्रवचन की परंपरा आज भी जारी है । महामना माँ गंगा के पुजारी थे और गंगा की धारा के अविरल प्रवाह के प्रबल पक्षधर थे ।  वर्ष  1914 में जब  अंग्रेजी  सरकार ने हरिद्वार में गंगा के  अविरल प्रवाह को बांध द्वारा अवरुद्ध कर, हर की पौड़ी में प्रवाहित करने  की कोशिश की तो सर्व प्रथम महामना ने लाखों गंगा भक्तों को साथ लेकर जनांदोलन किया जिसके फलस्वरुप अंग्रेजी सरकार को योजना रद्द करनी पड़ी । महामना ने ही वर्ष 1916 में हरिद्वार में  गंगा सभा की स्थापना की और उन्हीं के द्वारा हर की पौड़ी में आरंभ कराई गई गंगा आरती की परंपरा आज भी निर्बाध रूप से जारी है। महामना ने  प्रयाग में 1885 में ‘मध्य हिंदू समाज’, 1887 में ‘भारत धर्म महामंडल’ और 1906 में ‘अखिल भारतवर्षीय सनातन धर्म महासभा’ की स्थापना की थी। हिन्दू समाज की उन्नति तथा हर क्षेत्र में हिन्दुओं की सहभागिता बढ़ाने के लिए महामना के नेतृत्व में ही प्रयाग में वर्ष 1915 में हिन्दू महासभा की स्थापना हुई । वर्ष 1923 में महामना की अध्यक्षता में काशी में हुई बैठक में  हिन्दू महासभा के प्रमुख लक्ष्य निर्धारित किये गए।

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय  समाज में समरसता लाने हेतु महामना ने देश के विभिन्न स्थानों पर अछूतोद्धार के कई कार्यक्रम चलाए और स्वयं मंत्र-दीक्षा देते रहे । वे  गंगा, गऊ और गायत्री को सनातन संस्कृति के प्रतीक मानते थे ।‘गौ रक्षा’ को उन्होंने  देश व्यापी जनान्दोलन का स्वरुप दिया तथा देश में कई गौशालाएं स्थापित कीं। वर्ष 1935 में उन्होंने मथुरा-वृंदावन मार्ग पर ब्रज क्षेत्र में एक हजार एकड़ भूमि पर हासानंद गौशाला  की स्थापना की, जो  आज हजारों  गायों के साथ एक अग्रणी गौशाला है।

हिंदी भाषा के उत्थान और हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित कराने हेतु महामना ने जीवन पर्यंत संघर्ष किया। वे मानते थे कि साहित्य और देश की उन्नति अपने देश की भाषा द्वारा ही संभव है। वे राष्ट्रीयता के विकास के लिए मातृभाषा के उन्नयन और अधिकाधिक प्रयोग के पक्षधर थे। उनका मानना था की हमारे मौलिक चिंतन की अभिव्यक्ति मातृभाषा में ही संभव है। वे चाहते थे कि शिक्षण संस्थानों में अध्ययन-अध्यापन की भाषा  हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएँ हों, लेकिन तत्कालीन सरकार के दुराग्रह से यह संभव नहीं हो सका।  महामना के सतत  प्रयासों से ही वर्ष 1900 में हिंदी को न्यायालय की भाषा के रूप में स्वीकार किया गया। इसके लिए महामना ने आन्दोलन किया था और 60 हजार लोगों द्वारा हस्ताक्षरित प्रतिवेदन सौंपा था। उनका मानना था  कि ‘हमारे देश के भाइयों के जीने-मरने का न्याय हो और वह न्याय दूसरी भाषा में हो, यह आश्चर्य की बात है। न्याय उस भाषा में होना  चाहिए जिसका एक-एक शब्द समझ में आ जाए।‘ वर्ष 1910 में महामना के नेतृत्व में प्रयाग में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना हुई।

भारत के वर्तमान औद्योगिक विकास की दिशा तय करने में महामना का अमूल्य योगदान है। जब ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1916 में भारत में उद्योगों की स्थापना के लिए ब्रिटिश हुक्मरानों को केंद्र में रखकर ‘इंडस्ट्रियल कमीशन” की घोषणा की तब महामना ने अस्सी पृष्ट का  असहमति पत्र देते हुए भावी भारत के उद्योग-नीति का खाका तैयार कर दिया।  उन्होंने प्राचीन भारत की औद्योगिक समृद्धि का बखान करते हुए साबित कर दिया कि प्राचीन भारत केवल कृषि प्रधान ही नहीं बल्कि औद्योगिक प्रधान देश भी था।  महामना के उद्योग नीति को कई विश्वविद्यालयों ने कालांतर में अपने पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया।

आजादी के हर दीवाने के लिए महामना के दिल में अगाध प्रेम था। जब तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने 1919 में रौलट बिल पास किया तब महामना  लगभग 6 घंटे तक बिल के विरोध में सदन में बोलते रहे। अप्रैल 13, 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में जनरल डायर के नेतृत्व में 1650 राउंड गोलियां चलीं और भीषण नरसंहार हुआ जिसमें 1000 लोग मारे गए और अनगिनत लोग घायल हुए । वह महामना थे जो  घटना के तुरंत बाद स्वयं अमृतसर गए तथा कई दिनों तक अकेले प्रत्येक पीड़ित परिवार से मिलते रहे, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किये तथा घटना सम्बन्धी तथ्यों को एकत्र किये।  वे  सितंबर 1919 में इस नरसंहार के विरोध में लेजिस्लेटिव काउंसिल में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ  लगातार तीन दिन तक बोलते रहे, जिसकी गूँज ब्रिटेन तक गई । अंतर्राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने इसे प्रमुखता से छापा। फलस्वरूप 8 जुलाई 1920 को ब्रिटिश संसद द्वारा  कड़े शब्दों में इस नरसंहार की भर्त्सना की गयी।

आजादी के लिए संघर्षरत दीवानों और बलिदानियों के लिए महामना सदा प्रेरणास्रोत रहे। वर्ष 1922 में असहयोग आन्दोलन के दौरान गोरखपुर के समीप चौरी-चौरा कांड हुआ, जिसमें  क्रांतिकारियों ने  पुलिस थाने में आग लगा दी और  22 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई। गाँधी जी ने हिंसा से क्षुब्द्ध होकर  असहयोग आंदोलन वापस ले लिया गया। गोरखपुर सत्र न्यायालय द्वारा 172 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुना दी गयी और वे सभी जेल में बंद कर दिए गये। देश में उस समय एक से एक बड़े ख्यातिलब्ध वकील थे, लेकिन इन क्रांतिकारियों की आवाज किसी ने नहीं सुनी। अंत में क्रांतिकारियों के मित्र महामना के पास आये और मुकदमे की पैरवी का अनुरोध किये। महामना उस समय  1922 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति थे  तथा बारह वर्ष पूर्व वकालत छोड़ चुके थे। उसके बावजूद  महान राष्ट्रभक्त महामना ने क्रांतिकारियों को खुला समर्थन देते हुए ऐतिहासिक निर्णय लिया  और प्रयाग उच्च न्यायालय में आरोपियों की तरफ से बिना कोई फीस लिए डबल बेंच के सम्मुख मुकदमा लड़े। क्रांतिकारी वीरों के समर्थन में, मूर्धन्य अधिवक्ता महामना ने न्यायालय में  ऐसे मार्मिक और राष्ट्रभक्ति से सराबोर तर्क प्रस्तुत किये जिससे 153 अभियुक्त पूर्ण रूप से बरी हो गए । बहस के दौरान महामना ने अपने  ओजस्वी वाणी और तर्कपूर्ण तथ्यों से  सुनवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश ‘सर ग्रीनवुड पीयर्स” और न्यायमूर्ति ‘पीगट” को ऐसा प्रभावित किया कि दोनों ने  खड़े होकर महामना का कई बार अभिवादन किया । सम्भवतः भारतीय न्याय प्रक्रिया के इतिहास में इतनी मार्मिक और अनोखी घटना  कहीं और नहीं मिलेगी।

महामना हिंदी पत्रकारिता के उन्नायक थे। अंग्रेजी  शासन के अत्याचार के  विरूद्ध उन्होंने एक पत्रकार के रूप में जनता को जागृत किया, जनमानस में राष्ट्रीयता का संचार किया  तथा स्वतंत्रता  आंदोलन को गति प्रदान की। अपनी पत्रकारिता की जीवन-यात्रा का आरंभ उन्होंने वर्ष  1887 में ‘हिन्दुस्थान” समाचार पत्र के संपादक के रूप में  किया। प्रयाग में उनके द्वारा वर्ष  1907 में बसंत पंचमी के दिन साप्ताहिक पत्र ‘अभ्युदय” का प्रकाशन आरम्भ किया गया। उन्होंने वर्ष  1909 में अंग्रेजी दैनिक पत्र ‘लीडर” तथा 1910 में हिंदी पत्रिका ‘मर्यादा” का प्रकाशन आरंभ कराया। महामना ने राष्ट्र भक्ति को जीवन का ध्येय मानकर  पत्रकारिता के माध्यम से तत्कालीन समाज में राष्ट्रीय चेतना लाने के साथ-साथ अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध जन-जागरण का कार्य किया । काशी से उन्होंने 1933 में ‘सनातन धर्म” साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन किया। वे  23 वर्ष तक अंग्रेजी दैनिक ‘हिंदुस्तान टाइम्स” के अध्यक्ष रहे।

आज हम आजादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। महामना एक राष्ट्र-ऋषि थे और उनके द्वारा राष्ट्र के लिए दी गयीं सेवाएँ तथा उनके द्वारा फैलाई गयी ज्ञान की ज्योति युग-युगांतर तक हमें आलोकित करती रहेंगीं। उनके द्वारा शिक्षा के माध्यम से सनातन संस्कृति की नींव पर राष्ट्र निर्माण का लिया गया संकल्प हमें निरंतर प्रेरणा देता है कि हमारे लिए राष्ट्रहित और राष्ट्रभक्ति सर्वोपरि है। आज आवश्यकता है कि हम महामना की शिक्षा दृष्टि को केंद्र में रखकर शिक्षा के मूलभूत उद्देश्यों जैसे युवाओं में ज्ञान, कौशल और उद्यमिता विकास के साथ-साथ सनातन संस्कृति के मूल्यों के अलोक में उनका सर्वांगींण विकास और चरित्र निर्माण सुनिश्चित करें, मातृभाषा और मातृभूमि के प्रति उनके समर्पण भाव को मजबूती प्रदान  करें। गौरवशाली भारतीय संस्कृति के आदर्शों  को आत्मसात करते हुए ही , वैश्विक नागरिक बनकर हम समर्थ और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में अग्रणी भूमिका सकते हैं।

 


रमाशंकर दूबे
कुलपति, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, गांधीनगर

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