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अंध-विकास की कीमत चुकाता जोशीमठ 

अंध-विकास की कीमत चुकाता जोशीमठ 
   विकास की अंधी दौड़ में एक शहर बदहाल हो गया है और किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेग रही। यह शहर सिसक रहा है,दरक रहा है, मौत की परछाई इस शहर पर मंडरा रही है लेकिन सरकार अपनी धीमी चाल से इस शहर के लोगों को इस मौत की तरफ धकेल रही है। हम बात कर रहे हैं जोशीमठ की।  जोशीमठ, उत्तराखंड का एक आध्यात्मिक शहर जहां आदि शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में ज्ञान प्राप्त किया, आज देश भर में चिंता का विषय बन गया है।जोशीमठ, 1890 मीटर की ऊंचाई पर गढ़वाल हिमालय में एक शहर है, और तीर्थयात्री और ट्रेकिंग सर्किट दोनों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। लेकिन 20,000 से अधिक आबादी वाला शहर भी एक नाजुक पहाड़ी ढलान पर है जो अनियोजित और अंधाधुंध विकास से और भी नाजुक हो गया है। लगभग 66 परिवार अपना घर खाली करने के लिए मजबूर हो गए हैं,एशिया के सबसे बड़े रोपवे को पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया है, दो होटलों ने अनिश्चित काल के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए हैं और स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए हैं।
जोशीमठ महज एक ऐतिहासिक और पौराणिक शहर नहीं है, यह सभ्यता और संस्कृति की जीती -जागती मिसाल है। यह बद्रीनाथ का द्वार भी कहलाता है और धार्मिक-पौराणिक गाथा को समेटता एकछोटा सा शहर है। लेकिन आज यह अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। कोई इसकी सुध नहीं ले रहा, कोई इसकी दरकती दीवारों,सड़को के भीतर से उठती चीख को समझ नहीं रहा है।  यह शहर चीख चीख कर कह रहा है मुझे बचाओ मुझे बचाओ, इस अंधाधुंध विकास के खतरे से बचाओ, लेकिन यह चीख नक्कारखाने में तूती  की तरह साबित हो रही है।
हांलांकि की ऐसा नहीं है की सरकार ने कदम नहीं उठाये हैं।  तपोवन-विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना और हेलंग बाईपास निर्माण , जिसे इन दरारों  के दो प्राथमिक कारणों में से एक माना जाता है, को चमोली जिला मजिस्ट्रेट के आदेश से तुरंत निलंबित कर दिया गया है।
उत्तराखंड सरकार ने 2022 में एक विशेषज्ञ समूह की स्थापना की थी । शोधकर्ताओं ने पाया कि जोशीमठ के कुछ क्षेत्र मानव निर्मित और प्राकृतिक दोनों कारकों के परिणामस्वरूप “डूब” रहे हैं। पैनल ने पाया कि संरचनात्मक दोष और क्षति जमीन के धंसने के कारण हुई है, जो कि उपसतह घटकों को हटाने या स्थानांतरित करने के कारण पृथ्वी की सतह का धीरे-धीरे डूबना या अचानक बसना है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि क्षेत्र में सभी निर्माण और पनबिजली परियोजनाओं को तुरंत रोक दिया जाए। आबादी को पहले एक सुरक्षित क्षेत्र में जाना चाहिए, और उसके बाद ही शहर की योजना को संशोधित किया जाना चाहिए ताकि नए चर और भौगोलिक परिस्थितियों को स्थानांतरित किया जा सके।
जांच और विकास की आवश्यकता वाले सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक जल निकासी योजना है। जैसे-जैसे अधिक से अधिक कचरा मिट्टी में रिसता है, इसे अंदर से ढीला कर देता है, शहर खराब जल निकासी और सीवर प्रबंधन से पीड़ित है। राज्य प्रशासन ने सिंचाई विभाग से स्थिति की जांच करने का आग्रह किया है।

क्षेत्र में मिट्टी की क्षमता को बनाए रखने के लिए, विशेषज्ञों ने विशेष रूप से संवेदनशील स्थलों पर फिर से पौधे लगाने की भी सिफारिश की है। जोशीमठ को बचाने के लिए सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) जैसे सैन्य संगठनों की मदद से सरकार और नागरिक संगठनों के बीच समन्वित प्रयास करने की आवश्यकता है।

प्रकृति बार-बार चेतावनी देती है। केदारनाथ में दिया था, आप नहीं माने। उल्टा, आपने केदारनाथ को पिकनिक-स्पॉट बना दिया। रील बनाने की आदर्श जगह बना दिया। तीर्थों को दुष्कर, दुरूह बनाने का एक विज्ञान था। आप वहां हेलिकॉप्टर सेवा देने लगे।

जोशीमठ में भूस्खलन का खतरा कोई नयी और चौंकाऊ बात नहीं है। सुनामी से लेकर भूकंप तक प्रकृति आपको बार-बार अलार्म देती है। बावजूद इसके, आप उसको लहूलुहान करने से बाज नहीं आते।

 

 

आप जब उत्तराखंड की विस्तृत यात्रा करेंगे, तो देखेंगे कि पहाड़ों का सीना चीर कर उनको क्षत-विक्षत कर दिया गया है, गंगा को जगह-जगह बांधने की कवायद ने गंगा का चरित्र ही बदल दिया है। आपको पता भी नहीं, पर आप जिसे गंगाजल समझकर हरिद्वार से लाते हैं, वह दरअसल नाला-जल है।।जोशीमठ में अभी तक दुर्घटना नहीं हुई है, पर कब तक रुकेगी…पहाड़ अपना बदला लेंगे ही, नदियां अपना बदला लेंगी ही। लोग बारूद के ढेर पर आग का खेल खेल रहे हैं। आप जनता जनार्दन हैं, आप ही फैसला कीजिये, इन सर्द  रातों में जिनके घर दरक गए, जो रात में सो नहीं पा रहे हैं, उनकी आवाज सुनी जानी चाहिए की नहीं।

लेखक: नीलाभ कृष्ण

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