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भारत का गौरव

भारत का गौरव

एक पखवाड़े पहले तक सुंदर पिचई के नाम से कुछ ही लोग परिचित थे लेकिन, अब सारी दुनिया उन्हें गूगल के नए सीईओ के रूप में जानती है। इससे हमें अपने एक देशवासी की सफलता पर गर्व करने का मौका मिला है। पिचई की कामयाबी वाकई जश्न के काबिल है। हम सबके लिए ऐसे शख्स की कामयाबी पर गौरवान्वित होना स्वाभाविक है जिसने, अपनी काबिलियत और लगन से सबसे ऊंचा मुकाम हासिल किया है। लेकिन, इससे हमें एक-दो सबक भी मिलते हैं। इस पद पर उनकी नियुक्ति में परंपरा की नहीं, बल्कि नए विचारों और नई संभावनाओं की तलाश की अहम भूमिका रही है। बेशक, उनकी नियुक्ति में गूगल ने जिस लोकतांत्रिक और सेक्युलर मर्यादाओं का परिचय दिया है, उसे हमारी राजनैतिक व्यवस्था में भी अपनाया जाना चाहिए। यहां तो हम बड़ी वफादारी के साथ किसी मुखिया के पद पर उसके पारिवारिक उत्तराधिकारी को बैठा देते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में भारतीय मूल के किसी पेशेवर का दुनिया की एक सबसे बड़ी कंपनी के शिखर पर पहुंचना भारत के लिए किसी लाभ से अधिक गौरव की बात है। पिचई अपने आसपास के लोगों के उन्नयन और विकास में यकीन रखते हैं इसलिए उनके निर्देशन में कुछ और भारतीयों के ऊपर पहुंचने की संभावना है।

वैसे, पिचई के लिए भी गूगल का सीईओ बनना कोई बच्चों का खेल नहीं था। अमेरिका के स्थापित कॉरपोरेट में हर सफल शख्सियत को स्थानीय लोगों से दोगुना काम करना होता है। यह बात सुंदर पिचई ही नहीं, सत्या नडेला, इंद्रा नुई, विक्रम पंडित, पुनीत रंजन और बाकी सभी भारतीय अप्रवासियों के मामले में लागू होती है। अगर पिचई भारत में जमे रहते तो शायद उन्हें किसी आला विश्वविद्यालय में दाखिला भी नहीं मिल पाता क्योंकि, इस देश में योग्यता का ऐसा ही सम्मान बच गया है। आरक्षण के नाम पर योग्यता को बाहर का दरवाजा दिखा दिया जाता है। भारत में योग्यता का सम्मान जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था के कारण नहीं हो पाया है, जो आजादी के बाद से वंचितों के उत्थान के नाम पर लागू की गई, लेकिन बाद में यह सत्ता पाने के साधन में तब्दील हो गई और इसकी वजह से ऐसे राजनेता उभर कर आए जो सत्ता में बने रहने के लिए वोट बैंक की राजनीति करते हैं। मौजूदा परिदृश्य तो ऐसा है कि अगर गरीबी और पिछड़ापन पूरी तरह दूर भी हो जाए तब भी जाति आधारित आरक्षण नहीं हटेगा क्योंकि, यह सत्ता पाने का साधन बन गया है और कोई भी पार्टी इसे हटाने की बात तो छोडि़ए, इसे कुछ हल्का करने को भी तैयार नहीं है।

यह कहना गलत नहीं होगा कि योग्यता की भारत में कोई पूछ नहीं है। एक राष्ट्र के नाते यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रतिभावान और महत्वाकांक्षी भारतीयों को देश छोडऩे पर मजबूर होना पड़ता है, भले वे अपने क्षेत्र में महत्वपूर्ण नवाचार करने की तमन्ना रखते हों। असल में, जो प्रतिभावान लोग भारत में ही रहने का विकल्प चुनते हैं, वे अमूमन बौद्धिकआत्महत्या ही कर रहे होते हैं। इसी वजह से लगातार इस देश से प्रतिभा का पलायन हो रहा है। बुरी तरह अनियोजित व्यवस्था उन लोगों को दंडित ही करती है जोअपनी मातृभूमि के लिए कुछ करने की तमन्ना रखते हैं। यह देशभक्ति के नाम पर किसी बड़े बलिदान से कम नहीं है।

पिचई के गूगल का सीईओ बनने के बाद हर भारतीय उनकी काबिलियत और व्यक्तिगत गुणों की चर्चा कर रहा है लेकिन, कोई भी यह नहीं बता रहा है कि भारतीय पृष्ठभूमि से ही उनमें ये गुण पैदा हुए हैं, जिससे आज वे सीईओ बन पाए हैं। इससे पता चलता है कि हमारी संस्कृति, सामाजिक वातावरण और शिक्षा व्यवस्था मिलकर अनोखे विश्व नेताओं को जन्म दे रही है। हमें अपनी युवा आबादी के रूप में एक वरदान मिला हुआ है। इसे तो सिर्फ एक सकारात्मक दिशा देने भर की दरकार है। एक आकलन के मुताबिक, देश में हर साल करीब 15 लाख इंजीनियर पास होकर शैक्षिक संस्थानों से बाहर निकलते हैं। हमें उन्हें बस बदलते विश्व परिदृश्य के मुताबिक ढालना है और उन्हें दुनिया की होड़ में टिके रहने के काबिल बनाना है। हमारे पास कच्चा माल है, हमें उसे समृद्ध करके उसे आगे बढऩे के अवसर उपलब्ध कराने हैं। सुंदर पिचई आईआईटी खडग़पुर के छात्र रहे हैं। बेशक, उनके शिखर पर पहुंचने से हमारे युवाओं

को अपने पेशेवर जीवन में बुलंदी हासिल करने की प्रेरणा मिलती है, चाहे वे अमेरिका में हों या भारत में।

वह दिन दूर नहीं जब हम पाएंगे कि गूगल, एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट की क्षमता वाले उद्यमी भारत में पैदा हो रहे हैं। अंत में, फिर इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि पिचई की सफलता से साबित हुआ कि अमेरिका में प्रतिभा के चयन में उसकी जाति, नस्ल या धर्म को नहंीं देखा जाता, जैसा कि अमूमन भारत में होता है। इसलिए हमें अमेरिका से यह सीखना चाहिए क्योंकि, हमारे देश में प्रतिभा का अकाल नहीं है। अमेरिका इसी मामले में सबसे अलग है कि वहां सिर्फ योग्यता की ही पूजा नहीं होती बल्कि, हमेशा बेहतर की तलाश जारी रहती है। असल में यही बाकी दुनिया और खासकर भारत को अमेरिका से सीखना चाहिए। यह भी सही है किभारत में बार-बार दुनिया के बेहतरीन दिमाग पैदा हुए हैं। अब सवाल यह है कि ये लोग भारत से बाहर जाकर क्यों अपनी प्रतिभा की रोशनी बिखेरने लगते हैं जबकि, हम युवा आबादी के लाभ के साथ भी क्यों पिछड़ते जा रहे हैं? इनका जवाब कठिन नहीं है लेकिन, सवाल यह है किक्या हम इस समस्या से निजात पा सकते हैं? जी हां, यह संभव है, बस जरूरत है दृढ़ राजनैतिकइच्छाशक्ति और जमीनी स्तर पर प्रभावी अमल की है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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