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नए परिप्रेक्ष्य में देखने और लीक से हटकर सोचने का समय

नए परिप्रेक्ष्य में देखने और लीक से हटकर सोचने का समय

नए साल में नई शुरुआत और नई जिम्मेदारियां; नई चीजें हमारे भीतर नई उमंगें और नई उम्मीदें लाती हैं। इसी तरह नववर्ष से भी हमें चीजों को नए परिप्रेक्ष्य में देखने और लीक से हटकर सोचने का अवसर मिलता है। नए वर्ष में प्रवेश करने और भविष्य पर नजर डालने से पहले अतीत में झांकना जरूरी है। हमारा जीवन प्रवाह अंततः एक श्रृंखला है, हमारे पिछले कार्य हमारे आज की स्थिति का कारण बनते हैं और हमारे आज के कार्य भविष्य की नींव रखते हैं। 2022 को राजनीति और कूटनीति के चश्मे से देखा जाए तो यूक्रेन-रूस के विवाद के बीच पहली बार दिखा कि भारत किसी एक पक्ष के आगे हथियार डाले बिना और विदेशी मीडिया के गढ़े नैरेटिव को दरकिनार कर अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार काम कर सकता है। आने वाले वर्ष में उम्मीद यही है कि भारत की मीडिया, इसके बुद्धिजीवी और शब्दजीवी विदेशी नजरिए से लिखे हमारे इतिहास और हमारे कथानक को कूड़े के ढेर में डालकर स्वयं अपनी कहानी लिखेंगे। हमारे इतिहास के उत्थान और पतन दोनों को स्वीकार करके हम विश्वासपूर्वक विश्व के समक्ष खड़े होंगे।

पिछले वर्ष यह देश वाराणसी में ज्ञानपीठ और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि को पुराना स्वरूप और वैभव दिलाने के संघर्ष का साक्षी बना। इस वर्ष भी उम्मीद है कि हम इस संघर्ष का सैद्धांतिक विस्तार करें। हम कृतसंकल्प हों कि आक्रांताओं और कट्टरपंथियों ने जहां-जहां भी हमारी संस्कृति, हमारे ज्ञान और हमारे अध्यात्म के प्रतीकों का ध्वंस किया है, हम फिर से उनका पुराना वैभव लाएं और इस देश के उज्ज्वल माथे से पराजय और अपमान के कलंक मिटाएं। हमारी सांस्कृतिक धरोहरों के संबंध में इतिहास के इन आक्रमणों के अलावा पिछला वर्ष ऐसे कई अन्य घटनाक्रमों का भी साक्षी बना जिनसे हमारे वर्तमान की विफलताएं उजागर होती हैं। 2022 की शुरूआत माँ वैष्णो देवी मंदिर में भगदड़ के बीच 12 लोगों की मौत और 13 लोगों के घायल होने से हुई। इसी वर्ष बांके बिहारी में भगदड़ से दो लोगों की मौत हुई। इस वर्ष की शुरुआत सबरीमाला अग्निकांड में तीन लोगों के घायल होने से हुई। यह घटनाक्रम हमारे मंदिरों के प्रबंधन और व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। मंदिरों पर काबिज सरकारें पूजा स्थलों के चढ़ावे और संपत्तियों का मनमर्जी से उपयोग करती हैं लेकिन व्यवस्था भगवान भरोसे रहती है। नए वर्ष में उम्मीद है कि सरकार और समाज दोनों में सकारात्मक बदलाव आएगा। सरकारें मंदिर प्रबंधन में संवेदनशील होंगी और समाज सभी वर्गों को शामिल करते हुए इसमें सशक्त होगा कि यह मंदिरों को सरकार से अपने कब्जे में लेकर स्वयं इसका प्रबंधन कर सके।

बीते वर्ष हमने मजहबी जज्बात भड़काने के मामले में कट्टरता और हिंसा भी देखा। नूपुर शर्मा के वक्तव्य का बहाना बनाकर पूरे देश में एक के बाद एक कई लोगों पर जानलेवा हमले किए गए। हिंदू देवी-देवताओं की नग्न तस्वीरें तक बनाने की अनुमति देने वाले देश में नूपुर शर्मा को अभी भी छिपकर रहना पड़ रहा है। इसी तरह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सैटेनिक वर्सेस के लेखक सलमान रुश्दी भी मजहबी कट्टरता के शिकार हुए और उन्हें मारने की कोशिश की गई। 2023 शायद नया सवेरा लाएगा। अपने संविधान में मजहब विशेष को थोपने वाले देश पंथ निरपेक्षता के उदार मूल्यों का महत्व समझेंगे। भारत भी अलग-अलग धर्मावलंवियों के लिए अलग-अलग कानूनों की बजाय समान कानूनों की तरफ बढ़ेगा।

पिछले वर्ष भारत और ईरान में दो परस्पर विरोधी घटनाक्रम देखे गए। भारत में महिलाएं शिक्षण संस्थानों तक में हिजाब पहनने के लिए अड़ी हुईं थीं, वहीं ईरान में महिलाएं पर्दे से आजाद होने के लिए जान तक दांव पर लगाने को तैयार हैं। ईरान में महिलाओं का संघर्ष और सऊदी अरब में शासकों द्वारा स्वयं अपने शासन-तंत्र को उदार बनाने और महिलाओं को अधिक अधिकार देने से ऐसा लगता है कि मध्य एशिया में भी उन्मुक्तता की हवा पहुंची है। कभी कट्टर इस्लामी शरीयत का पालन करने वाले सऊदी अरब में आज संगीत कार्यक्रम हो रहे हैं और महिलाएं बुलेट ट्रेन चला रही हैं। उम्मीद है कि नवजागरण की यह हवाएं अफगानिस्तान में भी पहुंचेगी। वहां भी महिलाएं विश्वविद्यालयों में पढ़ सकेंगी और पुरुषों से समानता पा सकेंगी। कभी बौद्ध परंपरा के केंद्र रहे अफगानिस्तान से हिंदूओं और सिखों के पलायन की नौबत नहीं आएगी। बमियान तोड़ने वाले कट्टरपंथी इस ध्वंस की गंभीरता को समझेंगे और अपने इतिहास पर गर्व करना सीखेंगे।

कूटनीति और विदेश नीति के मोर्चे पर पिछले वर्ष भारत ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया। रूस-यूक्रेन विवाद में भारत ने पश्चिम के नैतिकता के मापदंड़ों के आगे झुकने के बजाय एक तरफ रूसी हमले की आलोचना की, वहीं पश्चिमी देशों को भी यह आईना दिखाया कि पाकिस्तान जब भारत में आंतकवाद फैला रहा था तब उनके नैतिक मापदंड कहां गए थे। इसी तरह तवांग में चीनी सेना की घुसपैठ का जोरदार प्रतिकार करके भारत ने स्पष्ट किया कि हम चीन-पाकिस्तान दोनों की संयुक्त चुनौती से निपटने के लिए तैयार हैं। आने वाले वर्ष में भी उम्मीद है कि भारत इन दोनों देशों से निपटने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगा। चीन-पाकिस्तान को हम सामरिक और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में पछाड़ेंगे। सीमा पार के साथ हम देश के भीतर रहने वाले चीनी और पाकिस्तानी तत्वों को भी खत्म करेंगे।

अंततः बेहद महत्वपूर्ण बात, भारत की नई शिक्षा नीति वर्षों बाद किसी सरकार का यह प्रयास है कि हम भारत के सांस्कृतिक मूल्यों, इतिहास और गुरुकुल व्यवस्था को अपनी शिक्षा प्रणाली में शामिल करें। इस शिक्षा नीति में भारतीय मूल्यों के साथ-साथ भारतीय भाषाओं के संवर्धन पर भी बल दिया गया है। उम्मीद है कि 2023 में यह शिक्षा नीति फाइलों और शैक्षणिक चर्चाओं से बाहर निकलकर मूर्त रूप लेगी। भारत विश्व का शायद एकमात्र ऐसा देश है जो अपनी भाषा में बात करने पर शर्मिंदा है। हजारों भाषाओं-बोलियों वाला यह देश आपसी बातचीत के लिए विदेशी भाषा पर निर्भर है। उम्मीद है कि नए वर्ष में हम अपनी संस्कृत और संस्कृति पर गर्व करेंगे। हम मातृभाषा में पढ़ाई करेंगे और सरकारें भी भारतीय भाषाओं को रोजगार और व्यवसाय से जोड़ेगी। न्यायालय हमारी भाषाओं में न्याय देंगे और शासन-तंत्र लोगों से लोगों की भाषा में संवाद करेगा। भाषायी विविधता हमारी कमजोरी के बजाय हमारी ताकत बनेगी।

 

प्रेरणा कुमारी

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