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त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्…

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्…

शिव के और भी कई अन्य नाम हैं-महादेव, शंकर, शंभू, महेश, नीलकंठ, भोलानाथ, कैलाशपति, उमापति, रूद्र, ईशान, ईश्वर तथा अन्य भी कई। शिव के अन्य रूप हैं- शिवलिंग, नटराज, अद्र्धनारीश्वर तथा दक्षिणामूर्ति।

ब्रह्मा एवं विष्णु के साथ ही भगवान शिव इस जगत की तीन अलौकिक शक्तियों में से एक हैं। शिव का अर्थ है-कल्याणकारी। शिव विनाश के सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस जगत में जो भी दृश्यमान वस्तु है, वह नश्वर है। शिव मूलत: जगत के विकास की प्राक्रिया में विनाश के कारक हैं। इसलिए उन्हें कभी गलती से ‘विनाश का देव’ भी कह दिया जाता है, यद्यपि निर्माण के लिए विनाश आवश्यक होता है। शिव को या तो ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए दिखाया जाता है अथवा पार्वती तथा पुत्र गणेश और कार्तिकेय के साथ बैठे हुए जो नंदी तथा अन्य गणों से घिरे रहते हैं। शिव अत्यंत सरल एवं पवित्र देव हैं। उन्हें बहुत ही थोड़े से वस्त्र, श्रृंगार एवं वस्तुओं की जरूरत होती है। वे तप, वैराग्य और ज्ञान की प्रतिमूर्ति हैं। वे हमेशा इस ब्रह्माण्ड के हित के लिए ध्यान में डूबे रहते हैं। इन सबका अर्थ क्या है।

उनकी जटाओं से निकलने वाली गंगा चिद्शक्ति (पवित्र चेतना, प्रज्ञा) का प्रतीक हैं, जो स्वर्ग से धरती की ओर बहती हैं। वह धरती पर शिव (कल्याण) के माध्यम से आती हैं। प्रज्ञा का प्रवाह केवल कल्याण के माध्यम से ही सम्भव है। उनके भाल पर स्थित द्वितीया का चन्द्रमा मस्तिष्क पर पूर्ण नियंत्रण का प्रतीक है। सामान्यत: बंद रहने वाली उनकी तीसरी आंख विशुद्ध ज्ञान का अर्थ देती है, जिसके खुलते ही समस्त द्वेषभाव नष्ट हो जाते हैं। उनकी देह पर लिपटी हुई भस्म का अर्थ है- विश्व की समस्त इच्छाओं के समाप्त होने के बाद बची हुई आध्यात्मिक सम्पत्ति। उनका नीला कंठ विश्व के प्रति उनकी असीम करूणा का प्रतीक है। उन्होंने विष को पूरी तरह पीने की बजाय अपने कंठ में धारण कर लिया है।

शिव के त्रिशूल का अर्थ है कि वे तीनों गुणों (सत्वगुण, रजोगुण और तामसगुण), चेतना के तीनों स्तर तथा तीनों काल (वर्तमान, भूत एवं भविष्य) से परे हैं। उनके डमरू की आवाज से एक ब्रह्माण्डीय लय स्थापित होती है। इससे विश्व में एक गतिक सामंजस्य और संतुलन आता है। सर्प जहां हमारी कुंडलिनी शाक्ति का प्रतीक है, वहीं विषैले जीव का भी। शिव पर इस विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। नन्दी शिव का वाहन है। यह धर्म के साथ-साथ आनंद का भी अर्थ लिये हुए है। बाघ की खाल अहंकार की समाप्ति तथा दुष्प्रवृतियों पर नियंत्रण का प्रतीक है।

दक्षिणामूर्ति के रूप में शिव विश्व गुरू हैं, जो अपने मौन में विश्व को ज्ञान देते हैं। नृत्य करते हुए शिव (नटराज) के रूप में ब्रह्माण्ड के नियम का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो लगातार गति में होने के बावजूद संतुलन से बाहर नहीं हैं। अद्र्धनारीश्वर के रूप में शिव इस विश्व की रचना के लिए नारी एवं पुरूष के परस्पर समान सहयोग का संदेश देते हैं। लिंग के रूप में शिव पूरी तरह स्वयं में ही लीन एक निराकार एवं जीनव के अंतिम सत्य को रूपायित करते हैं। भारत में कुल बारह ज्योर्तिलिंग हैं।

एक पुरानी कहावत है जो शिव का ध्यान करते हैं वे स्वयं शिव हो जाते हैं। ‘शिवमानसपूजा’ के प्रसिद्ध श्लोक में स्पष्ट रूप से कहा गया है ”मेरी आस्था शिव है, मेरी पवित्र बुद्धि पार्वती है, मेरे प्राण गण हैं, और मेरी देह शिव की देह है, इसलिए मैं जो कुछ भी करता हूं, वह शिव की पूजा को (मेरी अपनी आत्मा) अर्पित है।” यदि हम शिव की प्रतिमा के सच्चे अर्थ को समझ लेते हैं, तो यह हमारी उन्नति के लिए एक महान प्रेरणा का स्रोत बन जाता है।

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