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जिन मित्र, बैरी में भेद नाहीं, प्रभु होत सुलभ संदेह नाहीं

जिन मित्र, बैरी में भेद नाहीं, प्रभु होत सुलभ संदेह नाहीं

भगवान की बनाई इस दुनिया में हर प्राणी एक-दूसरे से अलग होते हैं। हम न केवल देखने में एक-दूसरे से अलग हैं, बल्कि हम सभी लोग आचार-विचार से भी एक दूसरे से अलग होते हैं। इंसान का चरित्र उसके वातावरण से प्रभावित होता है। हम सब का भिन्न होना बड़ी बात नहीं है, लेकिन सोचने की बात ये है कि इस भिन्नता को हम मानसिक रूप से आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते हैं। हम अपने स्वभाव को या हमें पसंद आने वाले स्वभाव को दूसरों में देखने का प्रयास करते हैं। जब इसमें थोड़ी सी व्यतिक्रम घटती है तब हम स्थित हो जाते हैं।

मनुष्य की प्रवृति कुछ हद तक जन्मजात होती है, लेकिन पारिवारिक संस्कार, संगत, आवश्यकताएं तथा हालातों के द्वारा उसमें परिवर्तन होता है। आज कल हर आदमी परेशानियों से जूझता है, वो अपनी खुशी के लिए दूसरों को बदलने का प्रयास करता है। जिससे केवल हालात ही बिगड़ते हैं। केवल बुद्धिमान व्यक्ति ही अपने आसपास होने वाली विसमता का एहसास करके मन में समता भाव को रखकर आगे बढ़ते हैं।

भला और बुरा इन दोनों के मिश्रण से ही दुनिया बनती है। बुरे व्यक्ति के बुरे बने रहने से भी कभी-कभी अच्छे का अस्तित्व बना रहता है। हम संतरे के रस का प्रयोग करते हैं। संतरे के छिलके या बीज की बात की जाए तो हम उसके विषय में अच्छा नहीं बोलते। लेकिन, संतरे को बनाने में छिलके का ही प्रधान योगदान होता है। बीज के बगैर उस संतरे की उत्पत्ति असंभव है। हर चीज का अपना-अपना स्थान है। बस हमारी नजर में उसका मूल्य होना चाहिए।

समभावपूर्ण होना एक मनुष्य का स्वभाव है। एक नारी के मां बनने के बाद उसकी नजर में हर बच्चा प्यारा होता है। मातृत्व तभी झलकता है, जब अपने बच्चे के लिए सोचने के साथ-साथ वह मां दूसरे बच्चों के लिए भी उसी भाव से सोचती है। समभाव में रहना कोई आसान बात नहीं। इस समता का तत्व समानता के साथ समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है –

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।

साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते।।

सुहृद, मित्र, बैरी, बांधव, मध्यस्थ, धर्मात्माओं और पापियों में भी समान भाव रखने वाले व्यक्ति अत्यन्त श्रेष्ठ मनुष्य कहलाते हैं। अपने अंदर यही समभाव रखना मानसिक स्थिति है, जिसे अभ्यास के द्वारा ही संभव बनाया जा सकता है। हम ईश्वर के बनाये हुए पूरे ब्रम्हांड को अपना लें तो ईश्वर अवश्य खुश हो जाएंगे। जब तक हम अपने अंदर से अहंकार को दूर नहीं कर पायेंगे, तब तक किसी को भी अपने मन में स्थान नहीं दे पायेंगे। स्वार्थ केन्द्रित होकर भी हम अपने भीतर समभाव को उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। दूसरों को अपने जैसा ही समझकर एक सामान्य से प्रयास से हम दूसरे के गुण को समझ कर, उसको अपना बनाने का प्रयास श्रेष्ठ है। एक समभाव व्यक्ति किसी योगी- मुनि से कम नहीं होता और ऐसे ही व्यक्ति सहज रूप से भगवान को प्राप्त कर सकते हैं।

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