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राफेल खरीद के बाद नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर : राहुल गांधी को एक और झटका

राफेल खरीद के बाद नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर : राहुल गांधी को एक और झटका

कांग्रेस पार्टी के राजकुमार राहुल गांधी ने लड़ाकू हवाई जहाज राफेल खरीद और उसकी कीमत पर केवल प्रश्न ही नहीं उठाये थे, उसकी खरीद रोकने के लिये जितना संभव हो सकता था, उसके पग-पग पर रोड़े अटकाये थे। भारतीय सेना विश्व की महानतम लड़ाकू बहादुर सेनाओं में गिनी जाती है पर आज का युद्ध बिना नवीनतम हमलावर हथियारों और आधुनिक उपकरणों के नहीं जीता जा सकता। कांग्रेस की 10 जनपथ से सोनिया गांधी और राहुल गांधी द्वारा नियंत्रित की जाने वाली मनमोहन सरकार को 10 वर्ष तक राफेल जैसे हवाई जहाज खरीदनें से रोका गया। भारतीय सेना की बार-बार लड़ाकू जहाज की खरीद की मांग को ठुकरा दिया गया। जब मांग ने जोर पकड़ा तो तत्कालीन रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी ने वजट की कमी बता कर खरीद को टाल दिया।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार ने जब कांग्रेस सरकार द्वारा डाली धूल हटा कर राफेल की फाइल निकाली और हर कीमत पर राफेल खरीदने की बात कही, बजट का भी इन्तजाम किया तो कांग्रेस पार्टी ने इस खरीद पर रोक लगाने के लिये कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। नरेन्द्र मोदी अपनी बात पर डटे रहे और भारत को आत्म निर्भर बनानें के लिये सेना को पूरे 36 राफेल खरीद कर दिये। राहुल गांधी को दुर्भावना और गलत प्रचार आदि के लिये सुप्रीम कोर्ट से माफी मांगना पड़ी। कोर्ट में राफेल खरीद के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगा कर पिटीशन भी डाला गया। सारी बहस सुनने ंऔर फाइल के सारे गुप्त रिकाॅर्ड देखने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने राफेल खरीद मे कोई गलती नहीं पायी।

इसके बाद भी राहुल गांधी मिध्या प्रचार मे लगे रहे किसी तरह पूरी 36 राफेल हवाई जहाज न आ पाये। चीन को भी राफेल के भारत की आर्मी को मिलने से डर सता रहा था। राहुल गांधी के विरोध से चीन को कुछ राहत मिली। कांग्रेस की प्रत्येक चाल मोदी के आगे फेल हो गयी। राफेल भी आये, जनता ने राहुल की बात पर ध्यान नहीं दिया और सुप्रीम कोर्ट ने भी खरीद को सही पाया। जनता ने वोट देकर और कोर्ट ने खरीद पर मुहर लगा कर नरेन्द्र मोदी के निर्णय को सही ठहराया फिर भी राहुल गांधी ने राफेल विरोधी अपनी रट और मुहिम नहीं छोड़ी।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार द्वारा की गयी नोटबन्दी यानि पुराने 500 और 1000 के नोटों का चलन बन्द करके नये नोट छापने को सही ठहरा दिया। इससे राहुल गांधी की नोटबन्दी विरोधी मुहिम को भारी झटका लगा। नोटबन्दी का विरोध राहुल गांधी के नेतृत्व मे कांग्रेस द्वारा, उसके नेताओं द्वारा पूरे देश में जोर शोर से किया गया था। राहुल गांधी ने तरह तरह के चार्ज नरेन्द्र मोदी पर लगाये। घर-घर जा कर कहा कि वे अपने मित्रों अडानी और अम्बानी आदि को लाभ पहुंचाना चाहते थे। पुराने नोट बन्द करके अपने लोगों को लाभ पहुंचाना चाहते थे। पुराने नोट बदलने के लिये खुद बैंक की लाईन में लगने का नाटक किया पर उनकी सभी चालें फेल हो गयी। जनता ने नोटबन्दी को देश और गरीबों के लिये लाभकारी समझा और दुबारा नरेन्द्र मोदी की सरकार को चुना। उसके बाद पूरे पांच साल राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस मुंह फाड़-फाड़ कर नोटबन्दी के खिलाफ चिल्लाते रहे। देश-विदेश में अंतर्राष्ट्रीय जगत में मोदी की ही नहीं देश की साख पर बट्टा लगाने से भी नहीं चूके। अब अगला लोक सभा चुनाव भी आने को है पर राहुल गांधी अभी भी नोटबन्दी के नाम पर लगातार नरेन्द्र मोदी पर देश को लूटने जनता का धन हड़पनंे का आरोप लगाते रहते हैं। जब जनता पर उनकी बात का कोई असर नहीं हुआ तो सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन डाल दिया गया।

नोटबन्दी के खिलाफ इतना प्रचार किया गया, उद्योगपति गौतम अडानी और मुकेश अम्बानी के खिलाफ भी भ्रष्ट तरीके से कमाई के आरोप की झड़ी लगा दी। आम आदमी की नजर में नरेन्द्र मोदी को भ्रष्ट, बेईमान बनानें के लिये हर चाल चली। प्रेस के माध्यम से कोर्ट पर दबाब बनानें के प्रयास किये गये। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे एक बड़ा मामला मानते हुये पांच जजों की बेंच द्वारा सुनने के आदेश किये। 5 न्यायाधीशों द्वारा किसी विषय को सुना जाना आम बात नहीं है। खैर बेंच ने एक-एक फाईल देखी रिकाॅर्ड खंगाला। रिजर्व बैंक से सारे संबंधित प्रपत्र मंगाये गये। गहन जांच की गयी, वादी को पूरी तरह सुना गया और सरकार से उस हर बिन्दु पर जबाब मांगा गया जो वादी ने उठाये थे। सारा रिकाॅर्ड देख कर स्पष्ट निर्णय दिया कि नोटबन्दी करने के लिये पूरी कार्यवाही नियमानुसार की गयी। सरकार ने इस पर पूरा अध्ययन किया विचार विमर्श किया और नोटबन्दी का सरकार का फैसला नीतिगत पाया गया। यानि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राहुल गांधी को दूसरा बड़ा झटका लगा जहां उन्होनें नरेन्द्र मोदी के नहीं सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये निर्णय से मात खायी।

सवाल ये है अब राहुल गांधी क्या नयी चाल चलेंगे, देश की सुरक्षा संबंधित जितने मामलों पर कांग्रेस ने आवाज उठायी उन सभी पर मुंह की खानी पड़ी। चाहे वो भूटान बाॅर्डर पर डोकलाम में चीन द्वारा कब्जा करने का हो या बालाकोट में पाकिस्तान को भारतीय सेना द्वारा उसे घर में घुस कर मारनें का हो या गलवान घाटी में चीनी फौज को पीछे ढकेलने का हो। फिर भी वे अपनी सरकार या भारतीय सेना को बदनाम करने से बाज नहीं आये। अभी हाल में भारत जोड़ो यात्रा कर रहे राहुल ने फिर एक बेतुका ब्यान अरूणांचल में तवांग क्षेत्र के सीमावर्ती इलाके पर दे दिया कि भारतीय सिपाही चीन के सिपाहियों द्वारा पीटे गये। चीनी सेना से मुकाबला करनें के लिये उनको हथियार भी नहीं दिये गये । मन में प्रधानमंत्री बननें की ललक पाले हुये कांग्रेस के राजकुमार को ये भी नहीं पता कि शान्ति क्षेत्र में बाॅर्डर पर गश्त के समय हथियार लेकर नहीं जा सकते। भारतीय सेना ने उल्टे चीनी फौजियों की पिटाई की थी फिर भी हमारी ही सेना की पिटाई कहना भारतीय फौजियों की बदनामी थी। लगता नहीं कि राहुल गांधी कभी एक परिपक्य नेता की तरह व्यवहार करेंगे। उन्हें नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत बुराई छोड़ कर या इंडियन आर्मी पर शक व्यक्त करना छोड़ कर उसे कमजोर और निरीह बताना छोड़ कर देश की समस्याओं और उनके निदान के बारे में बात करना चाहिये, गरीब जनता के दुख दर्दों की बात उठाना चाहिये और उन्हें दूर करनें के उपाय सुलझाना चाहिये।

यहां में नोटबन्दी के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर एक बात और कहना चाहूंगा कि 5 न्यायाधीशों की बंेच ने जब इस पर निर्णय सुनाया तो चार न्यायाधीश तो एक तरफ थे और नोटबन्दी में सरकार की कोई कमी या खामी नहीं बता रहे थे। एक न्यायाधीश की असहमति व्यक्त करनें वाली टिप्पणीं ने सभी को चैंका दिया। बहुत से कानूनविद मेरी तरह भौंचक्के भी रह गये होंगे कि असहमित व्यक्त करने के कारण में कोई ठोस बात दिखाई नहीं देती। माननीय न्यायाधीश ने कहा कि नोटबन्दी पर पहले संसद में बहस होना चाहिये थी, उसके बाद ही कोई फैसला लिया जा सकता था। खैर ये तो उनके विवेक की बात थी। मैं एक साधारण नागरिक जानना चाहूंगा कि यदि संसद में बहस होती तो देश की सारी अर्थव्यवस्था  चरमरा जाती, बेईमान लोग या तो पुराने नोटों को बाजार में फेंक देते या उनके चलन पर संकट पैदा कर देते जिसे चाह कर भी सरकार नहीं रोक पाती। ब्लेक मार्केट और दो नम्बर का धंधा करने वालों को पूरा अवसर मिलता और नम्बर दो की कमाई वाले अपने सारे नोट निकाल कर सोना या प्राॅपर्टी की खरीद में खपा देते। नोटबन्दी का निर्णय ही काली कमाई रोकनें के लिये किया जा रहा था,  फिर काली कमाई वालों को बता कर कैसे ये निर्णय लिया जा सकता था। इसका मतलब ये हुआ कि चोर को पहले उसे पकड़ने का रास्ता बतायंे ताकि वो भाग जाये। सरकार का निर्णय सौ प्रतिशत सही था और यही माननीय न्यायाधीशों ने पाया। असहमति व्यक्त करने वाला निर्णय न तो अन्य न्यायाधीशों ने सही माना न ही लोग उसे सही समझ रहे।

 

डॉ. विजय खैरा

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