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जब भगवान शिव बने अपने भक्त के सेवक

जब भगवान शिव बने अपने भक्त के सेवक

सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्… भक्त तो सभी श्रेष्ठ हैं, लेकिन ज्ञानी तो स्वयं ईश्वर स्वरुप है। पुण्यभूमि भारत पर भक्तों की विशाल परंपरा है जिसमें एक भक्त पुंडलिक की कहानी मैं आपको पहले बता चुकी हूं। जिनकी फेंकी ईंट पर श्रीकृष्ण विट्ठल विराजमान हैं। आज मैं आपको भक्त विद्यापति की की कहानी बताती हूं। जिनकी भक्ति में डूबकर भगवान शिव उनके नौकर बन गए। विद्यापति उत्तर बिहार और बंगाल के प्रसिद्ध कवि हैं। वह आज से लगभग 650 साल पहले हुए थे, विद्यापति की शिव और पार्वती आराधना पर आधारित पद आज भी  गुनगुनाए जाते हैं। वह बेहद गरीब थे और अपने कच्चे घर के आंगन में बैठकर महादेव की भक्ति करते थे। लेकिन उनकी रची भक्ति कविताओं में इतना भोलापन हुआ करता था कि कैलाश पर बैठे शिव उसने सुनकर मुस्कुराने लगते थे। जब माता पार्वती ने उनसे मुस्कुराने का कारण पूछा, तो शिव ने कहा कि मैं विद्यापति के पद सुनकर मुस्कुरा रहा हूं। तब देवी ने एक क्षण के लिए रुठकर शिव से कहा कि फिर आप विद्यापति के साथ ही रहिए। भगवान ने मनुष्य का रुप धारण किया और तुरंत विद्यापति के पास आ गए।  उन्होंने विद्यापति को अपना नाम उगना बताया और उनके नौकर बनने की इच्छा जाहिर की। महाकवि ने जवाब दिया,”मैं तो एक साधारण कवि हूँ, मेरे पास तुम्हें देने के लिए पैसे नहीं है। उगना बने भगवान ने कहा कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, सिर्फ खाना दे दीजिएगा। विद्यापति की पत्नी सुशीला ने उगना रुपी भगवान शिव को नौकरी पर रख लिया। उगना की स्वामीभक्ति से वह दोनों पति पत्नी बेहद प्रसन्न थे। विद्यापति को तो उगना पर इतना विश्वास हो गया कि वे जहां भी जाते अपने साथ उगना को साथ ले जाते।

एक बार महाकवि विद्यापति अपने गाँव विसपी से राजदरबार जा रहे थे। सेवक उगना भी साथ था। जेठ के महीने में गरमी चरमोत्कर्ष पर थी। विद्यापति और उगना भरी दोपहर पैदल चले जा रहे थे। रास्ते में एक निर्जन स्थान पर विद्यापति गर्मी और प्यास से बेहाल होकर रास्ते में बैठ गए और उगना से कहा कि मेरे लिए पानी लाओ, वरना मैं मर जाऊंगा। आसपास कहीं पानी नहीं था। विद्यापति बेहोश हो गए थे, ऐसे में उगना रुपी महादेव ने अपनी जटा से गंगा की धारा निकाली और लोटे में भर कर विद्यापति को पिला दिया। पानी पीकर उन्हें होश तो आ गया, लेकिन पानी का लोटा देखकर वह चौंक गए कि वह तो पवित्र गंगाजल था, बिल्कुल शीतल और पवित्र। विद्यापति ने उगना को कसम देते हुए पूछा कि तुम कौन हो, मुझे बताओ वरना मैं यहीं प्राण दे दूंगा। भगवान शिव अपने असली रुप में आ गए और कहा कि तुम्हारी भक्ति और कविता से मैं तुम्हारे पास खिंचा चला आया लेकिन अगर तु्मने किसी से कहा कि मैं उगना न होकर महादेव हूँ तो मैं उसी पल चला जाऊँगा। विद्यापति की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं रहा। स्वयं भगवान सदैव जिसके साथ रहें उसकी खुशी का अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं। लेकिन मन में दुख इस बात का था कि तीनों लोकों के स्वामी उनके घर नौकर उगना बने हुए थे। वह दोनों घर तो आ गए, लेकिन उगना को लेकर महाकवि की बदली भावना उनकी पत्नी सुशीला की नजरों से बच नहीं पाई। एक बार रात को तो उन्होंने महाकवि विद्यापति को अपने नौकर उगना के पैर दबाते हुए देखा। वह तो जानती नहीं थीं कि उगना नौकर नहीं बल्कि साक्षात् महेश्वर हैं, इसलिए वह बेहद नाराज हुईं। इस दौरान 12 वर्ष बीत गए। नौकर-मालिक के इस अनोखे प्रेम से सुशीला ईर्ष्यालु हो गईं। यह भी दैवी माया थी क्योंकि भगवान शिव के विरह से देवी आदिशक्ति व्याकुल हो गई थीं, उन्होंने सुशीला की मन में जलन और क्रोध की भावना भर दी।

एक बार विद्यापति एक नई कविता की रचना में लगे हुए थे, भक्ति में डूबी उनकी भावपूर्ण कविता को सुनकर उगना रुपी महादेव भाव विभोर हो रहे थे। तभी आंगन के दूसरे छोर पर रसोई में खाना बना रही सुशीला देवी को पानी की जरुरत पड़ी। उन्होंने उगना से कुएं से पानी निकालने को कहा। लेकिन भक्त और भगवान तो अपनी अलग दुनिया में डूबे थे। उगना और विद्यापति को सुशीला देवी की पुकार सुनाई ही नहीं दी। उधर पानी की कमी से उनकी रसोई जलने लगी। जगदंबा की माया से विद्यापति की पत्नी का क्रोध बुरी रह भड़क गया। उन्होंने चूल्हे से जलती लकड़ी निकाली और उगना रुपी भगवान शिव को पीटने के लिए दौड़ीं, लेकिन जलती लकड़ी के भगवान पर पड़ने से पहले विद्यापति सामने आ गए। उनके मुंह से निकल गया ये क्या करती हो। ये कोई तुम्हारे नौकर नहीं बल्कि समस्त ब्रह्मांड के स्वामी हैं। उनके मुंह से इतना निकलते ही महादेव अदृश्य होकर कैलाश पहुंच गए। देवी पार्वती अपनी इस सफलता पर मुस्कुराईं, लेकिन  विद्यापति का तो जैसे संसार ही लुट गया। वह कटे पेड़ की तरह गिर पड़े। सैकड़ों साल बाद आज भी उगना रुपी भगवान के विरह में गाए हुए विद्यापति के गीत गाते और सुनते हुए लोग रो पड़ते हैं। उनकी कातर पुकार सुनकर भगवान शिव ने अदृश्य रुप में उनके साथ रहना स्वीकार किया। अपने आखिरी समय में  महाकवि विद्यापति स्वयं शिव में विलीन हो गए। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु पर गंगा नदी की एक धारा सैकड़ों मील दूर से चलकर उस स्थान पर आई और उनकी अस्थियां अपने अंदर समेट लीं। महाकवि विद्यापति बिहार में मैथिली साहित्य की दुनिया में एक चिर परिचित नाम हैं। उनकी रचनाएं शैक्षणिक संस्थानों में साहित्यिक अध्याय के रुप में शामिल की गई हैं। उनकी कहानी यह बताती है कि अगर भक्ति में शक्ति है तो ईश्वर को भी अपना स्थान छोड़कर उनके पास आना ही पड़ता है।

 

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