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मकर संक्रांति भारतीय मनीषा के पुरुषार्थ चतुष्टय का अनुष्ठान

मकर संक्रांति भारतीय मनीषा के पुरुषार्थ चतुष्टय का अनुष्ठान

सनातन संस्कृति ने विश्व के कल्याण हेतु सर्वथा पथप्रदर्शक की भूमिका का निर्वहन किया है। इस संस्कृति ने अपने उदार चरित्र का परिचय यथा समय दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया है। भौगोलिक परिधि से परे जाकर यह संस्कृति समस्त चेतन एवं अचेतन जगत के कल्याण की चिंता करती है-  वसुधैव कुटुम्बकम एवं ॐ सर्वे भवन्तु सुखिन: का पाठ इसी संस्कृति ने पढ़ाया है। इस संस्कृति के त्यौहारों में ज्ञान, विज्ञान, प्रकृति, स्वास्थ्य एवं आयुर्वेद के तमाम रहस्य छुपे हुए हैं। इसकी प्राचीनतम वैज्ञानिकता एवं बौद्धिक सम्पन्नता का आभास इस तथ्य द्वारा परिलक्षित होता है कि जिस कालखंड में विश्व के अन्यान्य भागों में आदिम जीवन शैली प्रचलन में थी तब भारतीय मनीषी ग्रह-नक्षत्रों जैसे प्रकृति के गूढ़ रहस्यों की जानकारी प्राप्त करने में संलग्न थे।

लोककल्याणार्थ भारतीय मनीषियों द्वारा स्थापित ज्ञान के समस्त आयाम वर्तमान विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरते हैं। भारतीय खगोलशास्त्र अंतरिक्ष विज्ञान के अधुनातन तथ्यों से प्राचीन काल से ही परिचित रहा है। तदनुसार ज्योतिषशास्त्र की रचना हुई। इसके अंतर्गत 12 राशियों की गणना की जाती है। इन्हीं 12 राशियों में से एक मकर राशि में सूर्य का प्रवेश करना मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। वैदिक साहित्य सूर्य नारायण की महिमा, जीवन-जगत को गति प्रदान करने और सूर्योपासना के सद्परिणामों के विवरणों से परिपूर्ण है। सूर्य समस्त चलायमान चेतना सम्पन्न वस्तुओं के अधिपति हैं। उनकी किरणें अन्त:प्रज्ञा तथा प्रकाशपूर्ण विवेक की द्योतक हैं। सूर्य के संबंध में ऋग्वेद की ऋचा है- उतेशिषे प्रसवस्य त्वमेक इदुत पूषा भवसि देव यामभि:। उतेदं विश्वं भुवनं वि राजसि श्यावाश्वस्ते सवित: स्तोममानशे।।

सम्पूर्ण भारतवर्ष के साथ ही नेपाल, बांग्लादेश, थाईलैण्ड, लाओस, म्यांमार एवं श्रीलंका में भी मकर संक्रांति पर्व का उत्सव मानव जीवन के समस्त पहलुओं को गतिशीलता प्रदान करता है। अतएव यह अनेकता में एकता का अनुपम प्रतीक है।

ध्यातव्य है कि प्रत्येक वर्ष अनेक संक्रांतियां घटित होती हैं किन्तु भारतीय मनीषियों द्वारा मकर संक्रांति को ही सबसे पवित्र एवं शुभफलदायी स्वीकार किया गया है। मकर संक्रांति शिशिर ऋतु की समाप्ति और वसंत की ओर बढऩे का आगाज़ भी है। इसे भगवान भास्कर की उपासना एवं स्नान-दान का पवित्रतम पर्व माना गया है। मकर संक्रांति पर्व को जीवन में संकल्प लेने का अवसर भी माना गया है। संक्रांति यानी सम्यक क्रांति। इस दिन से सूर्य की कांति में परिवर्तन होने लगता है। वह दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर अभिमुख हो जाते हैं। उत्तरायण से रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। अंधकार घटने लगता है एवं प्रकाश में बढ़ोत्तरी शुरू हो जाती है। प्रकाश कर्म की प्रेरणा देता है। जब प्रकृति शीत ऋतु के पश्चात वसंत के आगमन का इंतजार कर रही होती है, तब हमें भी अज्ञान के तिमिर से ज्ञान के प्रकाश की ओर मुडऩे और कदम तेज करने का दृढ़ संकल्प लेना चाहिए। हिंदुत्व में सूर्य रोशनी, ताकत और ज्ञान का प्रतीक होता है। यह त्यौहार हमें अँधेरे से उजाले की तरफ बढऩे एवं नए तरीके से जिंदगी शुरू करने की प्रेरणा देता है। इस दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक पर्यावरण अत्यधिक चैतन्य रहता है एवं इसमें दिव्य जागरूकता होती है, जो मानव समाज के लिए हितकारी होती है। इस पर्व की उपादेयता, शिवत्व एवं लोकग्राह्यता संस्कृत के इस श्लोक में परिलक्षित होती है- भास्करस्य यथा तेजो मकरस्थस्य वर्धते। तथैव भवतां तेजो वर्धतामिति कामये।। अर्थात- जैसे मकर राशि में सूर्य का तेज बढ़ता है, उसी तरह आपके स्वास्थ्य और समृद्धि की हम कामना करते हैं।

सनातन संस्कृति में मकर संक्रांति से सम्बद्ध एकाधिक पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। मकर संक्रांति ही वह तिथि है जब सूर्य धनु राशि का साथ  छोड़कर मकर राशि में प्रवेश कर जाता हैं। पौराणिक मान्यता है कि कर्म फल दाता युवराज शनि महाराज का अपने पिता सौरमंडल के राजा सूर्य से वैर भाव था, क्योंकि सूर्य देव ने उनकी माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा द्वारा उत्पन्न पुत्र यमराज से भेद-भाव करने से कुपित होकर सूर्य-देव ने छाया एवं शनि को अपने घर से निष्कासित कर दिया था। फलत: शनि और छाया के शाप की वजह से सूर्य देव कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गए थे। तब सूर्य देव ने क्रोधित होकर शनि महाराज की राशि यानि की उनके निवास स्थान कुंभ को जला दिया था, जिससे शनि और उनकी माता छाया को कष्ट भोगना पड़ रहा था। इस घटना से यमराज बहुत व्यथित हुए एवं उन्होंने सूर्यदेव को कुष्ठ रोग से मुक्ति दिलाने हेतु कठिन तपस्या की। साथ ही उन्होंने अपनी सौतेली माता और भाई शनि को कष्ट में देखकर उनके कष्ट निवारण हेतु पिता सूर्य को मनाया। परिणामत: सूर्य देव ने कहा कि जब भी वह शनि के दूसरे घर मकर में प्रवेश करेंगे तब शनि का घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाएगा। इससे प्रसन्न होकर शनि महाराज ने कहा कि मकर संक्रांति के दिन जो भी मनुष्य सूर्यदेव की पूजा-अर्चना करेगा उसे शनि की दशा में भी कष्ट नहीं भोगना पड़ेगा।

शनि को ही मकर राशि का अधिष्ठाता भी माना जाता है। धनु और मकर राशि के इसी संयोग को मकर संक्रांति की संज्ञा दी गयी है। मान्यता यह भी है कि इसी दिन भगीरथ के तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने सनातन सभ्यता की पोषक माँ गंगा को अपने शीश पर धारणकर उनका आगमन धरती पर सुनिश्चित किया था। पौराणिक मान्यता यह भी है कि देवताओं और असुरों के मध्य अमृत कलश को लेकर बारह दिन तक चले युद्ध के दौरान छीना-झपटी में अमृत की चार बूंदे हरिद्वार, उज्जैन, नासिक एवं प्रयागराज में गिरी थीं अतएव इन्ही चार पवित्र स्थानों पर  कुंभ मेला लगता है। चूँकि देवताओं का एक दिन मनुष्य के एक वर्ष के समान होता है इसलिए देवताओं के बारह दिन चले युद्ध के अनुसार बारह वर्ष में कुम्भ का विधान है। ऐसी भी मान्यता है कि इसी दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार खुलते हैं एवं इस दिन माँ गंगा के प्रवाहित पवित्र जल में स्नान करने से आत्मा को उच्चतम लोक की प्राप्ति सहजता से होती है। अतएव इस अतिविशिष्ट दिवस को भारतीय जनमानस विशेष रूप से इन चार पवित्र स्थानों पर अथवा यथासुगम किसी भी प्रवाहित जल में ब्रह्म मुहूर्त में आस्था की डुबकी लगाकर जीवनावलोकन हेतु अपने आराध्य सूर्य देव की पूजा-अर्चना करता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन से सूर्यदेव की गति एवं ऊष्मा तिल-तिल करके बढ़ती है। इसी कारण इस दिन स्वास्थ्य के लिए लाभकारी एवं इम्यून सिस्टम को प्रबल करने वाले तिल एवं गुड़ के मिष्टान्न बनाने एवं खाने की प्रथा प्रचलित है।

ऐसी मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अन्य दिनों के दान से 100 गुणा अधिक फलदायी होता है। मान्यता यह भी है कि संक्रांति के दिन ही सूर्यपुत्र दानवीर कर्ण अपने समस्त भंडार दान के लिए खोल देते थे। इस दिन सूर्य नारायण की तांबे की प्रतिमा को घृत से स्नान कराकर एवं  आदित्य हृदय स्तोत्र के पाठ के पश्चात दान करने से पाप एवं निर्धनता दूर हो जाती है और धन एवं यश की प्राप्ति होती है।

माघे मासे महादेव: यो दास्यति घृतकम्बलम। स भुक्त्वा सकलान भोगान अन्ते मोक्षं प्राप्यति॥

अर्थात, जो भी व्यक्ति मकर संक्रांति के दिन घी और कम्बल का दान करता है वह अपनी मृत्यु के पश्चात जीवन मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करता है। इस दिन दोपहर के समय अपने पितरों के निमित्त भी अन्न दान या श्राद्ध करने का विधान है। ऐसा करने से पितरों को तृप्ति एवं पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। कृषि प्रधान देश भारत में नए फसल से प्राप्त चावल और तिल मिश्रित खिचड़ी, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी एवं पाचन तंत्र को दुरुस्त करती है, का सेवन और दान भी उत्तम माना गया है।

ऐसी भी मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन ही देवताओं का दिन आरम्भ होता है। संक्रांति के दिन ही यज्ञ द्वारा दिए गए हव्य को ग्रहण करने हेतु देवता पृथ्वी पर अवतरित होते हैं। उत्तरायण की अवधि देवताओं का दिन है और दक्षिणायण को देवताओं की रात्रि माना जाता हैं। अत: मकर संक्रांति देवताओं का प्रभात काल है। इसके विषय में कहा गया है- माघ मकरगत रवि जब होई। तीरथपतिहि आव सब कोई।। माघ मास में मकर संक्रांति के दिन ही समस्त देवी-देवता तीर्थराज प्रयाग में आकर स्नान करते हैं, अत: तीर्थराज प्रयाग में इस दिन आस्थापूर्वक स्नान करने से अत्यधिक शुभ फल प्राप्त होता है। शिव पुराण के अनुसार इसी दिन भगवान शिव ने भगवान विष्णु को आत्मज्ञान दिया था। शास्त्रों के अनुसार प्रकाश में अपना शरीर छोडऩे वाला प्राणी पुनर्जन्म नहीं लेता जबकि अंधकार में मृत्यु को प्राप्त होने वाला प्राणी जन्म-मरण के चक्र में फँसा रहता है। इसी कारण जब अर्जुन के बाणों ने पितामह भीष्म को शर-शैया पर सुला दिया था तब उन्होंने शरीर त्यागने से मना कर दिया था क्योंकि सूर्यदेव उस समय दक्षिणायण थे। पितामह भीष्म ने सूर्यदेव के उत्तरायण में प्रवेश की प्रतीक्षा करते हुए आज ही के दिन युधिष्ठिर को अंतिम शिक्षा देने के पश्चात अपने शरीर का परित्याग किया था।

धारयिष्याम्यहं प्राणान पतितोस्पि महीतले। उत्तरायणमन्वि’छन सुगतिप्राप्तिकांक्षया।।

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से भी देखें तो मकर का अर्थ है ‘कौन्स्टोलेशन ऑफ़ कैप्रिकॉनÓ जिसे मकर राशि कहते हैं। संक्रांति से तात्पर्य संक्रमण अथवा ट्रांजिशन से है। यह विंटर सोलिस्टिस के पश्चात आता है। सरल भाषा में समझें तो इसका अर्थ है सूर्य का किसी तारा समूह (राशि) के सामने आ जाना। मकर संक्रांति के दिन से ही सूर्य का दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की तरफ़ आना शुरू हो जाता है। यह प्रक्रिया समर सोलिस्टिस के दिन पूरी होती है, जब दिन सबसे लंबा होता है। इधर कई वर्षों से मकर संक्रांति का दिन 14 जनवरी को होने से लोगों में यह भ्रम पैदा हुआ है कि मकर संक्रांति का दिन निश्चित होता है। ज्योतिष आंकलन के अनुसार सूर्य की गति प्रतिवर्ष 20 सेकंड बढ़ रही है। हर वर्ष सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट विलम्ब से होता है इसी कारण प्रत्येक तीन वर्ष के उपरान्त सूर्य एक घंटे और हर 72 वर्ष बाद 1 दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। तात्पर्य है कि सन् 2080 के बाद मकर संक्रांति 14 की जगह 15 जनवरी को मनाई जाएगी।

मकर संक्रांति पर्व के उपलक्ष्य में स्नान का विधान जाति, पंथ, लिंग, भाषा, क्षेत्र आदि समस्त भेद-भावों को भूलकर जनमानस द्वारा समभाव से भावित होकर गंगा में श्रद्धा की डुबकी लगाना है। राष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में विविध नामों से मनाये जाने के बावजूद इस त्यौहार की मूल आत्मा स्वयं को प्रकृति से जोडऩा ही है। इस दौरान ऐसा प्रतीत होता है कि मानो एकता के सूत्र में बंधकर सम्पूर्ण भारत मोतियों की अखंड माला का स्वरूप धारण कर लिया हो। मकर संक्रांति का यह त्यौहार मानव जीवन में प्रकृति प्रेम, करुणा, दया, सहजता, आतिथ्य सत्कार, पारस्परिक सौहार्द, सद्भावना, परोपकार जैसे नैतिक गुणों का सतत विकास कर उनको चारित्रिक एवं भावनात्मक संबल प्रदान करता है।

सनातनी पर्व भारतीय समाज के साधारणत्व को सर्वथा भिन्न एवं असाधारण पहचान देते हैं। ये पर्व भौतिक विषमता की परिधि से परे जाकर भाव के स्तर पर सामाजिक समरसता एवं विश्वबन्धुत्व को प्रतिष्ठित करते है एवं अंत:करण की शुद्धिकरण द्वारा मानवता का मार्ग प्रशस्त करते है। अत: यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि लोकतांत्रिक मूल्यों के सबसे सहज एवं अलक्षित संवाहक भारतीय त्यौहार ही हैं। इन त्यौहारों की धुरी पर आम जनमानस है जो सर्वत्र उल्लास के अवसरों का केंद्र बिंदु रहा है। इस प्रकार जीवन के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं बौध्दिक पक्षों को समाहित करने वाला यह त्यौहार हिन्दू मनीषा के पुरुषार्थ चतुष्टय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को फलीभूत करता है।

 

 

आचार्य राघवेंद्र प्रसाद तिवारी
कुलपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा

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