ब्रेकिंग न्यूज़ 

असहमति या व्यवधान जीएसटी पर कांग्रेस पार्टी की स्थिति

असहमति या व्यवधान जीएसटी पर कांग्रेस पार्टी की स्थिति

कांग्रेस पार्टी और उसके नेता राजनीतिक कारणों से सरकार से परेशान हो सकते हैं। वे 2014 के फैसले के लिए मतदाताओं से परेशान हो सकते हैं। देश में सबसे ज्यादा समय तक शासन करने के बाद अब कांग्रेस पार्टी को गंभीरता से इसे स्वीकार कर आत्मचिंतन करना चाहिए की नकारात्मकता से देश को नुकसान होता है। क्या इनकी इसी नकारात्मक और विकास के रास्ते में रोड़ा अटकाने की प्रवृत्तियों ने देश की आर्थिक स्थिति को बदहाल किया है…और अर्थव्यवस्था को एक चोट पहुंचाई है?

राज्यसभा में माल और सेवा कर पर प्रवर समिति की रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी गई है। संविधान संशोधन विधेयक को पहले से ही लोकसभा द्वारा अनुमोदित कर दिया गया है। प्रवर समिति ने उन राज्यों के लिए पांच साल की मुआवजे की सिफारिश की है, जिन्हें जीएसटी के कारण किसी भी तरह के राजस्व का नुकसान हुआ है।

इतिहास

जीएसटी की शुरूआत का प्रस्ताव सबसे पहले पी.चिदंबरम ने वर्ष 2006-07 के अपने बजट भाषण में दिया था। राज्यों के वित्त मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समिति से विस्तृत विचार-विमर्श और बातचीत के बाद तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी द्वारा 115वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया था। इसे संसदीय स्थायी समिति को भेजा गया जिसने अगस्त 2013 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। हालांकि यह विधेयक पंद्रहवीं लोकसभा के विघटन के साथ ही समाप्त हो गया।

इसके बाद राजग सरकार ने फिर से अधिकार प्राप्त समिति के साथ वार्ता की और एक जबरदस्त आम सहमति के बाद इस विधेयक को कुछ परिवर्तनों के साथ पेश किया, जिस बदलाव की संसदीय स्थायी समिति द्वारा सिफारिश की गई थी। अधिकार प्राप्त समिति जो कि पूर्ण रूप से कांग्रेस शासित राज्यों द्वारा समर्थित थे, उसके लगभग सभी सुझावों को सूचीबद्ध करते हुए संविधान में संशोधन करने के लिए समापक विधेयक तैयार किया गया। इसे मेरे द्वारा 122वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया गया।

28

औचित्य

विधेयक का औचित्य देश में जटिल अप्रत्यक्ष कर ढांचे को सरल बनाना है। वर्तमान व्यवस्था में करों की बहुलता, कराधान के समरूप दरों का अभाव और ‘टैक्स के ऊपर टैक्सÓ का व्यापक प्रभाव शामिल है। यह देश भर में माल और सेवाओं के निर्बाध हस्तांतरण में एक बाधा है। जीएसटी अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था को सरल बनाता है। इसका मुख्य काम उत्पादन लागत, मुद्रास्फीति, करों की बहुलता और असमान कराधान को कम करना है। गौरतलब है कि इससे देश भर में माल और सेवाओं की निर्बाध आवाजाही के लिए एक पारिस्थितिकी प्रणाली का निर्माण होता है और लेन-देन की लागत में भी कटौती होती है।

यह कर आधार को व्यापक बनाएगा, बेहतर कर अनुपालन परिणाम प्राप्त होंगे और अंतत: देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होगी। बेहतर कर अनुपालन के परिणामस्वरूप जीएसटी राज्यों के राजस्व में सुधार करेगी और निश्चित रूप से देश के कम विकसित राज्यों में से अधिकांश के साथ न्याय करेगी। यही कारण है कि अधिकतम राज्य और क्षेत्रीय दल जीएसटी के समर्थक हैं।

कांग्रेस की असहमति

कांग्रेस पार्टी के तीन सदस्यों ने असहमति की एक प्रति प्रसारित की है जो प्रवर समिति की एक आम सहमति की रिपोर्ट के विपरीत है। मैं असहमति के अपने नोट में कांग्रेस पार्टी द्वारा उठाए गए बिंदुओं में से प्रत्येक पर टिप्पणी करना चाहता हूं।

  • कांग्रेस के सदस्यों ने प्रस्ताव दिया है कि जीएसटी की दर संविधान में 18 से अधिक नहीं के रूप में तय हो। यह सुझाव प्रणब मुखर्जी द्वारा प्रस्तावित विधेयक में नहीं था। जब पी. चिदंबरम ने अधिकार प्राप्त समिति के साथ बातचीत की तो उसमे भी यह सुझाव मौजूद नहीं था। कराधान की दर आम तौर पर संविधान में तय नहीं होती हैं। हम एक गतिशील और परिवर्तनशील दुनिया में रहते हैं। दरों को जीएसटी समिति द्वारा सिफारिश किया जाना है जो आर्थिक स्थिति, राजस्व में उछाल आदि विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है। कांग्रेस पार्टी की दरों की सिफारिश में कुछ तर्क हो सकता है। हालांकि, यह निर्णय जीएसटी परिषद द्वारा लिया जाना है और यह संविधान का एक हिस्सा नहीं हो सकता। जीएसटी दर मेजबान के कारकों के आधार पर निर्भर करेगा और उसी हिसाब से तय होंगे।
  • कांग्रेस ने आगे प्रस्तावित किया है कि अभिव्यक्ति ‘आपूर्ति’ एक कंपनी की एक ईकाई से उसी कंपनी की दूसरी ईकाई को आपूर्ति की गयी वस्तुओं और सेवाओं के लिए लागू नहीं किया जाना चाहिए। इस तरह का कोई प्रस्ताव ना तो प्रणब मुखर्जी के विधेयक में था और ना ही चिदंबरम द्वारा मंजूर किये गए प्रस्ताव में। हालांकि वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति पर लगाया गया जीएसटी, वैट की श्रेणी में आएगा और इसका कोई व्यापक प्रभाव नहीं है।
  • कांग्रेस का प्रस्ताव है कि राजस्व उछाल में स्थानीय निकायों का प्रस्तावित संविधान संशोधन में एक हिस्सा होना चाहिए। यह संविधान के 73वें संशोधन के विपरीत जाता है। जो राज्य वित्त आयोग की स्थापना के लिए प्रदान की जाती है और ऐसी सिफारिशों की जिम्मेदारी उनकी है। हालांकि ना ही प्रणब मुखर्जी ने और ना ही चिदंबरम ने इस तरह के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार किया था।
  • कांग्रेस ने अगला प्रस्ताव दिया है कि इस तरह केे राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों को विशेष दर्जा दिया जाना चाहिए चाहे उनके पास विधायिका हो या न हो तथा जिनकी जनसंख्या बीस लाख से अधिक नहीं हो। प्रणब मुखर्जी या चिदंबरम का ऐसा प्रस्ताव कभी नहीं था। हालांकि, विशेष श्रेणी के अनुमोदन के लिए प्रावधान कारकों में से एक मेजबान पर आधारित है। कांग्रेस गोवा को जीएसटी के तहत एक विशेष श्रेणी का राज्य बनाना चाहती है, लेकिन गोवा की प्रति व्यक्ति आय देश में सबसे अधिक है।
  • 27कांग्रेस का अगला प्रस्ताव है कि संशोधन विधेयक में पेट्रोलियम की ही तरह मानव उपभोग की चीजों बिजली, तम्बाकू उत्पादों और शराब को भी भाव मिलना चाहिए। कांग्रेस के किसी भी वित्त मंत्री ने यह प्रस्ताव नहीं रखा था। अगर कांग्रेस के इस सुझाव को स्वीकार कर लिया गया तो राज्यों के साथ एक आम सहमति बुरी तरह से बिखर जाएगी। पेट्रोलियम को जीएसटी में शामिल किया गया है, लेकिन जीएसटी किसी उत्पाद पर तभी लगाया जाएगा और इस पर तभी शुल्क लिया जाएगा जब समिति इस पर कोई निर्णय लेती है।
  • कांग्रेस ने आगे प्रस्ताव दिया है कि जीएसटी परिषद में राज्यों के मतदान प्रतिनिधित्व जिसे दो-तिहाई पर रखा गया है, उसे बढ़ाकर तीन-चौथाई किया जाना चाहिए। यह प्रभावी रूप से केंद्र के मतदान शक्ति को एक तिहाई से घटाकर एक-चौथाई पर सीमित कर देगा। यह चिदंबरम के 30 अप्रैल 2013 के विशेष रूप से लिए गए निर्णय के विपरीत है। वास्तव में, कांग्रेस के प्रस्ताव का यह मतलब होगा कि यदि सभी राज्य एक साथ मिलकर यह निर्णय ले लें कि केंद्र की जीएसटी दर कम होनी चाहिए तो वे केंद्र के राजस्व को लगभग पूरी तरह से खत्म कर देंगें। भारत राज्यों का एक संघ है। क्या कांग्रेस का यह प्रस्ताव है कि संघ आर्थिक रूप से जीवित रहने के लिए संघर्ष करता रहे? क्या उनका यह प्रस्ताव है कि केंद्र को राष्ट्रीय कराधान की व्यवस्था में कोई दखल नहीं देना चाहिए? लगता है कि कांग्रेस ने बिना पर्याप्त दिमाग लगाये हुए इस प्रस्ताव का यह संशोधन मसौदा तैयार किया है।
  • कांग्रेस ने आगे प्रस्ताव दिया है कि जीएसटी से सम्बंधित किसी भी विवाद का निपटारा उच्चतम न्यायलय के न्यायाधीश या फिर उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित की गई जीएसटी ट्रिब्यूनल द्वारा होना चाहिए। विवादों के निपटारे और अधिनिर्णय के तौर-तरीकों को तय करने की शक्ति वर्तमान विधेयक में जीएसटी समिति के पास है। राजनीतिक मुद्दों का समाधान राजनीतिक तौर पर ही किया जाना चाहिए, न्यायाधीशों द्वारा नहीं। जीएसटी के मूल प्रस्ताव में उल्लेखित विवाद निवारण ट्रिब्यूनल के गठन को स्थायी समिति और राज्यों के वित्त मंत्रियों की अधिकार प्राप्त समिति द्वारा अस्वीकार कर दिया गया था। यूपीए सरकार ने स्थायी समिति के सुझाव को स्वीकार कर लिया था। यह बाद का सुझाव है जो केवल कांग्रेस के प्रस्ताव को पुनर्जीवित करने के लिए चुना गया है।
  • कांग्रेस पार्टी ने निर्यात करने वाले राज्य को 01 प्रतिशत अतिरिक्त कर का क्रेडिट दिए जाने के दो साल के क्षणिक प्रावधान का विलोपन करने के लिए कहा है। यह प्रावधान कुछ उत्पादक राज्यों के डर को दूर करने के क्रम में जोड़ा गया है, जिन्हें यह महसूस हो रहा था कि उन्हें आरम्भ में राजस्व का नुकसान होगा। यह अधिकार प्राप्त समिति के एक सर्वसम्मत निर्णय पर आधारित है जिस पर कांग्रेस शासित सभी राज्य सहमत हैं।

यह कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार थी, जिसने 2006-07 के बजट में जीएसटी का प्रस्ताव किया था। संविधान संशोधन यूपीए सरकार द्वारा संचालित किया गया था। अधिकार प्राप्त समिति और स्थाई समिति द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों को यूपीए सरकार द्वारा स्वीकार कर लिया गया था। उत्पादक और उपभोक्ता राज्यों के बीच एक आम सहमति बनाने

को छोड़कर वर्तमान सरकार ने कोई भी महत्वपूर्ण संशोधन नहीं किया है। कांग्रेस पार्टी से संबंधित राज्य सरकारों ने लगातार प्रस्ताव का समर्थन किया है। क्या केवल बाधा डालने का रवैये से कांग्रेस पार्टी ने एक नकारात्मक भूमिका अपनाई है? चूंकि कांग्रेस के इन्हीं नकारात्मक राजनीति के कारण संसद में कार्य नहीं हो रहा है और इन बिंदुओं को स्पष्ट करने के लिए कोई और रास्ता बाकी नहीं रह गया है, इसलिए मैं उपरोक्त तथ्यों को स्पष्ट करने के उद्देश्य से इसे सार्वजनिक करने को विवश हूं।

कांग्रेस पार्टी और उसके नेता राजनीतिक कारणों से सरकार से परेशान हो सकते हैं। वे 2014 के फैसले के लिए मतदाताओं से परेशान हो सकते हैं। देश में सबसे ज्यादा समय तक शासन करने के बाद अब कांग्रेस पार्टी को गंभारता से इसे स्वीकार कर आत्मचिंतन करना चाहिए की नकारात्मकता से देश को नुकसान होता है। क्या इनकी इसी नकारात्मक और विकास के रास्ते में रोड़ा अटकाने की प्रवृत्तियों ने देश की आर्थिक स्थिति को बदहाल किया है और अर्थव्यवस्था को एक चोट पहुंचाई है?

अरुण जेटली

wobs.uaвертолеты на пульте управления

Leave a Reply

Your email address will not be published.