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आज़ादी भिक्षा में नहीं अधिकार में चाहिए: सुभाष चन्द्र बोस

आज़ादी भिक्षा में नहीं अधिकार में चाहिए: सुभाष चन्द्र बोस

तुम न जाने किस जहां में खो गए, भारत तो आज़ाद हुआ पर सपने तंहा हो गए ।
सुभाष चंद्र बोस के जन्म दिन पर कृतज्ञ राष्ट्र का प्रणाम !
सुभाष चंद्र बोस, बस नाम ही काफ़ी था !आज भी बस नाम ही काफ़ी है । इनके नाम से ‘नेताजी ‘ शब्द गौरव
पाता है बाक़ी जगह गाली बन जाता है ।
मेरी तरह 1962 में पैदा होने वालों के जो लाभ थे उनमें से एक था !स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अपनी
आँखों से देखना ! कांता त्यागी ,सुशीला नायर , विनोबा , आचार्य ,कृपलानी , अज्ञेय , काका कलेलकर
,भवानी प्रसाद मिश्र, मोरारजी देसाई , श्रीमती इंदिरा गाँधी ( वानर सेना की मुखिया जो पत्र इधर से उधर ले
जाती थीं) ।आदि बड़े नाम छोड़ भी दें तो भी हर मोहल्ले में कोई था जिसने अंग्रेजों की लाठियाँ खाई थीं। बस
अथवा ट्रेन में कभी कभी इनकी आरक्षित सीट पर कोई सच्चा वाला भी बैठा मिल जाता था ।जबलपुर से
रायपुर गए गणित के प्रोफेसर विष्णु कांत वर्मा जी ने जाँघ में गोली खायी थी और गिर गए, इसलिए बच गए
क्योंकि अगली गोली ने उनके नेता के प्राण ले लिए थे !
इतने सब लोगों से मिलकर भी वह जोश वह उत्साह कभी नहीं आया जो सुभाष जी के कथन को विद्यालय
की दीवार पर पढ़ कर आता था ।


“तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा “
( यह हमारे स्कूल की दिवार पर लिखा था और रोज़ाना आते जाते हम इसे देखते थे )
बचपन में अनेक झगड़ों में शामिल हुआ, जेबकतरे पकड़ने में , चेन खींचने वालों के पीछे दौड़ने का काम किया!
किंतु इस वाक्य ने मुझे रक्तदान के लिए कभी प्रेरित नहीं किया बल्कि देश के लिए रक्त बहाने की ही प्रेरणा
दी ! इतना वीर सुभाष क्षमाशील और उदार भी इतना ही था , उनके एक सहयोगी ने मुझे एक क़िस्सा
सुनाया था। कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव में सुभाष जी से पट्टाभि सीतारमैय्या जी की पराजय के बाद,
गांधी जी के कड़े विरोध के कारण जो स्थिति बनी उसमें विधिवत निर्वाचित सुभाष जी को इस्तीफ़ा देना
पड़ा। उन्होंने कोंग्रेस भी छोड़ दी । इसके बाद वे अपनी नयी पार्टी के प्रचार में लग गए ।

सुभाष जी की रैली कोलकाता में तय हो चुकी थी । इसी बीच महात्मा गांधी भी कोलकाता पहुँच गए ।
उन्होंने जब जन सभा की बात की तो स्थानीय लोगों ने बताया कि प्रस्तावित दिन तो सुभाष जी की रैली है
और यदि भीड़ दो सभा में बंट गयी तो सभा का प्रभाव समाप्त हो जाएगा ! बापू ने सुभाष को अपनी रैली का
समय बदलने को निवेदन भेजा ! सुभाष के सहयोगियों ने कड़ा विरोध किया । सारी तैय्यारी हो चुकी थी।
बरसात का समय था और समय बदलने में ख़तरा था ! सुभाष ने सहयोगियों की बात अनसुनी कर अपनी
सभा का समय बदल दिया ।

समय पर सूचना न पहुँचने के कारण अनेक लोग सुभाष जी के लिए आए और गांधी को सुन कर गए !
बाद में जब सुभाष जी की सभा शुरू हुई तो सच में बरसात आ गयी ! लोग उठ कर भागने लगे तो नेताजी
सुभाष ने गरजती आवाज में कहा,”जब आप पानी की बूँदें नहीं सह सकते तो अंग्रेजों की गोलियाँ कैसे
खाएँगे ?”
यह वाक्य सुन कर भीड़ रुक गयी और तेज बरसात में भी बिना हिले डुले सुभाष जी को सुनती रही ! कहा
जाता है जितने लोग उस दिन आए वह मैदान फिर कभी उतने लोग नहीं देख पाया ।
गांधी का विरोध
सुभाष ,गांधी के साबरमती प्रयोग के ख़िलाफ़ थे उनका कहना था कि यह आधुनिक शिक्षा के विरुद्ध है और
विकास को अवरुद्ध करेगा ! गांधी नहीं माने किंतु आज सत्तर से अधिक सालों के सरकारी संरक्षण के बाद
भी गांधी वादी संस्थान अपने पैरों पर खड़े होने में असमर्थ हैं । स्वयं नेहरू ने ही गांधी के सिद्धांतों को किनारे
कर आधुनिक शिक्षा दीक्षा को महत्व दिया ।

आज़ादी भिक्षा में नहीं अधिकार में चाहिए !
यहाँ यह प्रश्न भी उठ सकता है कि नेताजी का बापू से विरोध क्यों हुआ ! इसका मूल कारण था ‘ब्रिटेन की
कृपा से आज़ादी का गांधीवादी सपना ‘ । सुभाष जी का मत था कि
● इस स्थिति में ब्रिटेन का वर्चस्व बन रहेगा और वह भारत के ऊपर आर्थिक रूप से हावी रहेगा
● दूसरा वे dominion ( उपनिवेश) स्थिति में भारत का कोई लाभ नहीं देखते थे । गांधी अवश्य ही
अपनी बात मनवाने में विजयी रहे किंतु इसका बुरा परिणाम यह है कि आज भी भारतीय
व्यावसायिक विमानों पर VT लिखा है जो हमें विक्टोरीयन टेरिटरी बता रहा है ।
● तीसरा विरोध का कारण था कि ऐसी आज़ादी भारतीय जन मानस को मानसिक ग़ुलाम रखेगी
और लम्बे समय तक विदेशी शासन के शोषण में जीने वाली जनता पूर्ण विकसित नहीं हो पाएगी !
बोस सिर्फ़ राजनीतिक आज़ादी नहीं चाहते थे , वे तो शिक्षा, संस्कार और सोच में भी भारत को
आज़ाद देखना चाहते थे । बोस की बात न समझ पाने का ही परिणाम है कि आज भी भारत में
मानसिक ग़ुलाम भारतीय प्रेसीट्यूट, विचारक, और नेता हैं जो ग्रामीण भारत को, अंग्रेज़ी न बोलने
वाले भारत को आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं । गोरों से आज़ाद हुए भारत को उनकी ही प्रतिलिपि काले
अंग्रेजों का सामना करना पड़ा । अब जाकर नयी शिक्षा नीति भारत के बच्चों को उनकी मातृभाषा में
शिक्षा और उनकी संस्कृति से जुड़ी शिक्षा की बात कर रही है ।

महिला सशक्तिकरण

वर्ष 2007 छब्बीस जनवरी को कानपुर में भारतीय जीवन बीमा निगम के आयोजन में आज़ाद हिंद फ़ौज की
कैप्टन लक्ष्मी सहगल मुख्य अतिथि थीं । उन्होंने रानी झाँसी रेजिमेंट की स्थापना का संस्मरण सुनाया ।
अविवाहित लक्ष्मी स्वामिनाथन सिंगापोर में चिकित्सक थीं। दूसरे विश्व युद्ध में जापानी सेना ने अनेक
अंग्रेज सेना में कार्यरत भारतीय सैनिक़ बंदी बनाए थे।
इन बंदियों से आज़ाद हिंद फ़ौज की स्थापना करने की चर्चा के लिए सुभाष चंद्र बोस दो जुलाई 1943 को
सिंगापोर आए । लक्ष्मी जी भारतीय लोगों की चिकित्सा के कारण अनेक भारतीय नेताओं के सम्पर्क में थीं।
वे सेना की महिला यूनिट भी बनाना चाहती थीं। कड़ा प्रयास करने पर उन्हें सुभाष जी से मिलने का अवसर
मिला । उन्होंने अपना प्रस्ताव सुभाष जी को विस्तार से बताया। सुभाष जी को प्रस्ताव बहुत पसंद आया
और पूर्णतः महिला रेजिमेंट ‘ रानी झाँसी रेजिमेंट’ के प्रस्ताव को स्वीकृति मिली । लक्ष्मी जी के प्रयासों से
भारतीय महिलाये उत्साह से भर्ती के लिए आगे आयी । लक्ष्मी स्वामीनाथन ‘ कैप्टन लक्ष्मी’ हुईं और यही
नाम उनकी पहचान बना ।उन्हें दुःख था कि नेताजी के न होने के कारण महिलाओं को आज़ादी के बाद भी
सेना में अपना स्थान पाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है ।


नेता जी का असीमित, अमिट प्रभाव ! गांधी का नाम भी उनके प्रभाव से बच नहीं पाया ।ह
नेताजी को हाशिए पर लाने में बापू ने पानी सारी शक्ति झोंक दी। निर्वाचित सुभाष को अध्यक्ष पद ही नहीं
कांग्रेस भी छोड़नी पड़ी । गरम दल के उनके साथियों ने पाला बदलने में देर नहीं लगायी ।अंग्रेजों ने भी
नेताजी को नज़रबंद कर इसमें सहयोग किया । इन सबके बाद भी निर्भीक सुभाष अंग्रेजों को चकमा दे कर
जर्मनी होते हुए सिंगापोर पहुँचे । छः जुलाई 1944 को नेताजी ने अपने भाषण में गाँधी को ‘राष्ट्रपिता’ कहा
जो आज तक बापू के नाम पर भारी है । जबकि गांधी पूरी शक्ति लगा कर भी सुभाष को नेताजी बन पाने से
नहीं रोक पाए । प्रधान मंत्री लालक़िले से जो नारा बोलते हैं ,” जय हिन्द” यह भी आज़ाद हिंद फ़ौज का ही
नारा है ।
नेताओं ने जो भी किया हो भारत की जनता ने सच्चा न्याय किया है । वह आज भी सुभाष को दिल में बसाए
बैठी है ।मेरे बचपन में हर अफ़वाह जो सुभाष के जीवित होने की आस दिखती थी, करोड़ों भारतीय दिलों में
उत्साह भर देती थी ।
आज राष्ट्रपति भवन से राष्ट्रीय स्टेडियम जाने वाले मार्ग के बीच आठ सितम्बर 2022 को स्थापित 28
फ़ीट ऊँची नेताजी सुभाष चंद्र बोस की स्वाभिमानी मूर्ति बता रही है
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा..

लेखक- राकेश कुमार 

 

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