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पूर्ण राज्य का दर्जा करेगा तबाह

पूर्ण राज्य का दर्जा करेगा तबाह

दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक जीत के बाद आम आदमी पार्टी भ्रम की स्थिति में है। उसे लगता है कि जब केंद्र में स्पष्ट बहुमत वाली बीजेपी की मोदी सरकार को दिल्ली की जनता ने बुरी पराजय देकर उसे अपनी आंखों पर बिठाया तो अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कम शक्तिशाली आखिर कैसे हैं? जबकि संवैधानिक सच्चाई तो यह है कि दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है, पूर्ण राज्य नहीं, जहां मुख्यमंत्री और उसकी कैबिनेट सभी बड़े फैसले करने में सक्षम हो। लेकिन केजरीवाल सरकार इसे किसी हाल में मानने को तैयार नहीं है।

कई संविधान विशेषज्ञ और पूर्व नौकरशाह मानते हैं कि, भारतीय संविधान में वर्णित कई उपबंध या दी गईं व्यवस्थाएं वर्तमान समय में अप्रासंगिक हैं। वहीं केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसे अपनी सरकार की बड़ी बाधा मानते हैं। वह अपने कई फैसलों में केंद्र सरकार को खुलकर चुनौती देते रहते हैं। इसके विपरीत पांडिचेरी सहित पांच और केंद्र शासित प्रदेश हैं, लेकिन यहां दिल्ली जैसी चुनौती कोई नहीं दे रहा। विधायिका और कार्यपालिका के सभी काम सुचारु ढंग से चल रहे हैं। सभी अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं।

आखिर केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली को लेकर क्या संवैधानिक प्रावधान हैं? दिल्ली के सीएम केजरीवाल कैसे और क्यों केंद्र की मोदी सरकार को आये दिन चुनौती देते रहते हैं? आखिर क्या है इसके पीछे सीएम केजरीवाल की सियासी रणनीति?

उपराज्यपाल से केजरीवाल सरकार की अदावत तो जगजाहिर है। दरअसल केजरीवाल सरकार बिना संवैधानिक बाधाओं वाले सपाट रोड पर फर्राटे भरने की ख्वाहिशमंद है। इसके लिये दिल्ली सरकार करीब रोज ही एक नया उपाय तलाश लेती है, जिससे कि दिल्ली में केंद्र सरकार के प्रतिनिधि और उपराज्यपाल नजीब जंग को चुनौती दे सके। इसलिए यह केजरीवाल सरकार बुद्धिजीवियों और आम जनता के बीच हंसी का पात्र भी बन रही है। हाल ही में दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्षा स्वाति मालीवाल की नियुक्ति के मामले में ऐसा ही हुआ। संवैधानिक पद पर स्वाति मालीवाल की नियुक्ति केजरीवाल सरकार ने बगैर उपराज्यपाल के मंजूरी के कर दी थी।

स्वाति मालीवाल ने भी एक प्रेस कॉफ्रेंस कर अपनी भावी रणनीति बताने में देर नहीं की, लेकिन उन्हें दिल्ली महिला आयोग का अपना दफ्तर ही बंद मिला। बाद में फाइल पर उपराज्यपाल की मंजूरी के बाद स्वाति मालीवाल ने दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष के रुप में कार्यभार संभाला।

ऐसी ही समस्या दिल्ली एंटीकरप्शन ब्रांच के नये चीफ और दिल्ली पुलिस के ज्वाइंट कमिश्नर बीएल.मीणा को अपना नया कार्यभार संभालने के पहले देखने को मिली। केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक नोटिफिकेशन के जरिये दिल्ली- एंटीकरप्शन ब्रांच के तत्कालीन प्रमुख एसएस यादव के सीनियर के रुप में बीएल.मीणा की नियुक्ति उपराज्यपाल नजीब जंग ने की थी। मीणा की नियुक्ति को दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में

चुनौती भी दी, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। हाईकोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय और उपराज्यपाल के फैसले पर रोक लगाने की दिल्ली सरकार की मांग खारिज कर दी। वहीं दिल्ली हाईकोर्ट ने मीणा के मामले में एक बात जरुर कही कि, वो संविधान के मुताबिक कार्य करेें।

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पूर्व में चीफ सेक्रेट्री की नियुक्ति के मामले में भी केजरीवाल सरकार ने उपराज्यपाल नजीब जंग के आदेश को बेवजह चुनौती देते हुए इसे सियासी नूरा-कुश्ती में तब्दील कर दिया था। जबकि उपराज्यपाल नजीब जंग केजरीवाल सरकार को उसके विधायी अधिकार समझा चुके थे। संविधान के तहत केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली में संविधान की धारा 44 के तहत उपराज्यपाल को ही विधायी और कार्यपालिका की शक्तियां हासिल हैं।

हाईकोर्ट इन मामलों में अंतरिम फैसले तो दे रहा है, लेकिन पूरा फैसला आना अभी बाकी है। इससे भ्रम की स्थिति भी पैदा हो रही है। पूरा फैसला इसलिए जरुरी है, क्योंकि हर कोई जानना चाहता है कि देश की राजधानी दिल्ली में उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार को क्या-क्या शक्तियां हासिल हैं? आम जनता और दिल्ली सरकार के अधिकारी भी इसकी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे हैं।

दिल्ली नगर निगम के सफाईकर्मियों को काफी देर से वेतन दिये जाने को लेकर भी बखेड़ा खड़ा हुआ। दिल्ली की ‘आप’ सरकार ने बीजेपी शासित एमसीडी कर्मचारियों का वेतन महीनों की देरी से रिलीज किया। इस पर दिल्ली में खूब सियासत और प्रदर्शन हुए। बीजेपी-कांग्रेस ने केजरीवाल सरकार पर एमसीडी के सफाईकर्मियों को जानबूझकर सैलरी न देने और उन्हें सैलरी देने के बदले सताने का आरोप लगाया। एमसीडी सफाईकर्मियों ने वेतन नहीं तो काम नहीं की नीति पर अमल करते हुए हड़ताल कर दी थी।

नतीजा दिल्ली की करीब हर गली और महत्वपूर्ण सड़कों पर कूड़े का अंबार लग गया था। बारिश से राजधानी दिल्ली में महामारी की स्थिति उत्पन्न हो गई थी।

आखिर में अदालत के आदेश के बाद दिल्ली सरकार ने एमसीडी सफाईकर्मियों को वेतन दिया। साथ ही सीएम केजरीवाल ने अगली बार से एमसीडी सफाईकर्मियों को अपना वेतन केंद्र सरकार और बीजेपी से लेने का बयान तक दिया था।

दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली विशाल जीत के बाद आम आदमी पार्टी भ्रम की स्थिति में है। उसे लगता है कि जब केंद्र में स्पष्ट बहुमत वाली बीजेपी की मोदी सरकार को दिल्ली की जनता ने बुरी पराजय देकर उसे अपनी आंखों पर बिठाया तो अरविंद केजरीवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कम शक्तिशाली आखिर कैसे हैं? जबकि संवैधानिक सच्चाई तो यह है कि दिल्ली एक केंद्रशासित प्रदेश है पूर्ण राज्य नहीं, जहां मुख्यमंत्री और उसकी कैबिनेट सभी बड़े फैसले करने में सक्षम हो, लेकिन केजरीवाल सरकार इसे किसी हाल में मानने को तैयार नहीं दिखना चाहती है।

केजरीवाल को यह समझना चाहिये कि, लोकतंत्र में कोई पार्टी किसी व्यक्ति विशेष से नहीं चलती। संविधान और संगठन ही लोकतंत्र की असली ताकत है। अरविंद केजरीवाल को यह दंभ है कि उनकी वजह से ही दिल्ली विधानसभा चुनाव में ‘आपÓ ने बीजेपी को ऐतिहासिक करारी मात दी है। पार्टी में हिटलरशाही दिखाते हुए अपने दो वरिष्ठ नेताओं प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को पार्टी से बाहर का दरवाजा दिखा दिया और खुद स्वास्थ्य संबंधी मामलों का हवाला देकर खांसी और दमा की चिकित्सा के लिये बेंगलुरु रवाना हो गये, जिससे कि जनता के बीच में वह खुद को इस मामले से अलग और पाक-साफ साबित कर सकें।

लेकिन, संविधान तो संविधान है। यह नियमों और वर्णित कानूनों से चलता है। संविधान की अपनी मर्यादाएं हैं। संविधान कोई राजनीतिक दल नहीं जहां किसी व्यक्ति या बड़े नेता का राज और आदेश लक्ष्मण रेखा की तरह माना जाता हो या पूजा जाता हो।

संविधान का 69वां संशोधन पांडिचेरी और दिल्ली के केंद्र शासित प्रदेश के खास दर्जे और चुनी गई सरकारों के अधिकारों की व्याख्या करता है, जिसमें पूर्ण राज्य और केंद्र शासित प्रदेश दोनों के बीच की बात कही गई है। इसमें शहर के रख-रखाव, पुलीसिंग यानी की कार्यपालिका, केंद्रीय सरकार के अधिकारियों और जमीन के मामलों में केंद्र सरकार ही कोई फैसले ले सकती है।

जबकि केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेता केंद्र सरकार के इन अधिकारों पर हमेशा ही सवाल उठाते हैं।

वर्ष 1991 में दिल्ली विधानसभा का चुनाव होने और सरकार गठन के बाद यहां बीजेपी और कांग्रेस की कई राजनीतिक हस्तियां मुख्यमंत्री रहीं। उदाहरण के लिये बीजेपी जब दिल्ली की सत्ता में थी तो कांग्रेस केंद्र की सत्ता पर विराजमान थी, लेकिन आज जैसे प्रतिकूल हालात और संवैधानिक संकटों की बात तो दूर कभी कोई बड़ा विवाद तक उत्पन्न नहीं हुआ था। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि कानून के अनुसार तब की दिल्ली सरकार काम करती रही। हालांकि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिये जाने की मांग बीजेपी के दिवंगत नेता और कभी दिल्ली के सीएम रहे मदनलाल खुराना ने जरुर उठाई थी। इसके अलावा कभी केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच कोई ऐसा बड़ा विवाद नहीं हुआ जिसे लेकर मामला कोर्ट में गया हो।

आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह संवैधानिक नियमों-कानूनों की छतरी से बाहर होकर काम करते हुए खुद को दिखाना चाहती है। इसके लिये ‘आपÓ के कई नेताओं को खुद के अराजक कहे जाने से भी परहेज नहीं है। उनकी दलील है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार को केंद्र सरकार खुलकर काम करने नहीं दे रही है जिससे दिल्ली में विकास कार्यों को जमीन पर उतारने में उन्हें काफी परेशानी आ रही है। ‘आपÓ पार्टी को लगता है कि दिल्ली के सीएम केजरीवाल हैं तो उपराज्यपाल से हर संवैधानिक मामलों में उनकी राय और सहमति क्यों लें? दिल्ली सरकार का आरोप है कि, दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र में आने वाले एसीबी में केंद्र सरकार उपराज्यपाल नजीब जंग के जरिये अपनी टांग अड़ा रही है। जिसकी वजह से विभिन्न विभागों में फैले करप्शन पर लगाम लगाने में दिक्कतें आ रही हैं। दिल्ली पुलिस केंद्र के अधिकार क्षेत्र में होने की वजह से राजधानी में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर लगाम नहीं लग पा रही है।

New Delhi: Delhi Lieutenant Governor Najeeb Jung addresses at the inauguration of `Roof Top Solar City Project` at a Delhi School, on April 21, 2015. (Photo: IANS)

दिल्ली की चुनी हुई सरकार संवैधानिक सीमाओं को समझकर काम करने की बजाय दिल्ली में केजरीवाल सरकार की तारीफ में कई होर्डिंग्स लगाए हैं। मीडिया में दिये गये विज्ञापनों में केजरीवाल को बड़े विकास पुरुष के रुप में पेश किया जा रहा है। इसके लिये दिल्ली सरकार ने 560 करोड़ रुपये के विशाल फंड का इंतजाम किया है। इन विज्ञापनों में केजरीवाल केंद्र सरकार पर यह आरोप लगाते हुए सुनें और देखें जा रहे हैं कि, ‘वो परेशान करते रहे, हम काम करते रहे Ó। इसके साथ ही सीएम केजरीवाल केंद्र से दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और प्रधानमंत्री से दिल्ली पुलिस को दिल्ली सरकार के अधीन लाने की मांग भी करते दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि अगर दिल्ली पुलिस उनके अधीन आ गई तो दिल्ली में कोई अपराध नहीं होगा। महिलाओं के खिलाफ होने वाले सभी अपराध रुक जायेंगे। दिल्ली में रामराज्य होगा, वगैरह-वगैरह।

इन विज्ञापनों के खिलाफ एक याचिकाकर्ता ने अदालत में एक याचिका दाखिल कर इस पर रोक लगाने की मांग की है कि किस तरह गैर-जिम्मेदारी से केजरीवाल सरकार जनता के टैक्स के पैसों को अपने महिमामंडन करने में बर्बाद कर रही है। अदालत ने भी केजरीवाल सरकार से इस मामले में जवाब मांगा है। डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया आलोचकों की परवाह न करते हुए केजरीवाल सरकार के विज्ञापनों को जायज ठहरा चुकेे हैं। जबकि सच तो यह है कि इन रुपयों को दिल्ली के विकास में लगाया जाता तो उसका लाभ यहां की जनता को मिलता।

इतने कम दिनों में ही दिल्ली सरकार के कानून मंत्री रहे जितेंद्र सिंह तोमर पर भी फर्जी सर्टिफिकेट के आरोप लगे और वह जेल भी गये। वहीं 49 दिनों की केजरीवाल सरकार में कानून मंत्री रहे सोमनाथ भारती पर भी दिल्ली पुलिस के एसीपी से बहस करने, खिड़की एक्सटेंशन में विदेशी महिलाओं के प्रति अनुचित शब्दों का प्रयोग करने के साथ ही अपनी पत्नी से मारपीट करने का भी आरोप है। फिलहाल खिड़की एक्सटेंशन वाला मामला अदालत में है तो उनकी पत्नी की शिकायत दिल्ली महिला आयोग के हवाले है। कोंडली से ‘आपÓ विधायक मनोज भी धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किये गये। दिल्ली कैंट से ‘आपÓ के विधायक सुरेंद्र सिंह पर भी धमकाने का मामला दर्ज हुआ है। इससे केजरीवाल सरकार की साख पर बट्टा तो लग ही चुका है। कानून मंत्री रहे जितेंद्र सिंह तोमर को पद से हटाने के मामले में अरविंद केजरीवाल की चुप्पी ने खुद उनकी ईमानदारी पर भी बड़ा प्रश्न चिन्ह तो लगा ही दिया है।

हकीकत तो यह है कि, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देना संभव नहीं है, क्योंकि राजधानी होने से लुटियन जोन की ईमारतों और वीवीआईपी की सुरक्षा और विदेशी राष्ट्राध्यक्षों की सुरक्षा जैसे कई बड़े-बड़े मुद्दे इसमें सबसे बड़ी बाधा हैं। जिनकी अनदेखी कभी नहीं की जा सकती है।

कईयों को डर इस बात का भी है कि अगर दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया जाये और दिल्ली पुलिस दिल्ली सरकार के अधीन कर दी गई, तो दिल्ली सरकार दिल्ली पुलिस का गलत इस्तेमाल करेगी। सियासी दुश्मनी निकालने के लिये किसी भी केंद्रीय मंत्री और सांसद को झूठे आरोपों के तहत गिरफ्तार किया जा सकता है। साथ ही चिंता यह भी कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और पुलिस को उसके अधिकार क्षेत्र में लाने से भारतीय गणराज्य, लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को खतरा पैदा हो जाएगा। इसलिये संविधान के 69वें संशोधन को संसद में प्रस्ताव लाकर तत्काल खत्म करना चाहिए। जिसके तहत दिल्ली को विशेष राज्य का दर्जा हासिल है, क्योंकि यही केंद्र पर हमले के लिए केजरीवाल का ब्रह्मास्त्र है।

एन.के. सिंह

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