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हिन्दी फिल्मों में देशभक्ति

हिन्दी फिल्मों में देशभक्ति

हिन्दी फिल्मों में देशभक्तिसे जुड़े कथानक और गीतों का प्रयोग धड़ल्ले से होता आ रहा है। देशभक्ति पर आधारित ज्यादातर फिल्में हिट हुईं हैं। यही वजह है कि फिल्मकारों ने हमेशा इस सब्जेक्ट पर काम किया है। चालीस के दशक से शुरू हुआ यह सिलसिला अब तक जारी है। देशप्रेम से जुड़ी कई ऐसी यादगार फिल्में भी बनीं। यह आज भी भारतीय जनमानस को झकझोरती हैं। कुछ फिल्मकारों ने तो इसी थीम पर हमेशा काम किया। इन्हीं तमाम पहलुओं का जिक्रकर रहे हैं संजय सिन्हा

देशभक्ति की चाशनी में डूबी फिल्में भारतीय जनमानस को हमेशा से झकझोरती रहीं हैं। आज भी अगर थियेटरों और सिनेमा घरों में देशभक्ति पर आधारित फिल्में दिखाई जाती हैं, तो दर्शक उन्हें देखने उमड़ पड़ते हैं। हर व्यक्ति में अपने मुल्क के प्रति एक प्रेम छिपा होता है। ये फिल्में उस देशप्रेम, उस जज्बे को उकेरने का काम करती हैं। ऐसी बात नहीं है कि हिन्दुस्तान की आजादी के बाद हिन्दी फिल्मों में देशभक्ति की मशालें जलीं, जंगे- आजादी से पहले भी इस विषय पर कई यादगार फिल्में बनीं। सबसे पहले मैं 1943 में बनी फिल्म किस्मत का जिक्र करना चाहंूगा। मुझे लगता है कि हिन्दुस्तान में बनी यह पहली सबसे बड़ी और हिट देशभक्ति फिल्म थी। ज्ञान मुखर्जी की इस फिल्म ने चालीस के दशक में काफी कामयाबी बटोरी। देश के मौजूदा हालात पर बनी इस फिल्म में जर्मनी और जापान के भारत के प्रति नजरिए को भी बखूबी उभारा गया। अगर ये कहा जाये कि देश की आजादी में हिन्दी फिल्मों का अनुकरणीय योगदान रहा है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। इन फिल्मों ने भारतवासियों के अन्दर छिपे देशभक्ति के जज्बे को जगाने का काम किया।

भारतीय फिल्मकारों को शहीद-ए-आजम भगत सिंह के व्यक्तित्व ने काफी हद तक प्रभावित किया। फलत: भगत सिंह के जीवन पर आधारित कई फिल्में बनीं। आजादी के फौरन बाद रमेश सहगल ने एक फिल्म बनाई थी शहीद। कामिनी कौशल, दिलीप कुमार और चंद्रमोहन अभिनीत इस फिल्म में भगत सिंह सहित दूसरे क्रांतिकारियों को दिखाया गया। इसमें दिलीप कुमार की अदाकारी काफी पसंद की गई। कामिनी कौशल भी खूब जमीं। यह फिल्म 1948 में प्रदर्शित हुई थी। इसी नाम से एस.राम शर्मा ने भी एक फिल्म बनाई। 1965 में रिलीज हुई इस फिल्म का कथानक शहीद-ए-आजम भगत सिंह के इर्द-गिर्द घूमता है। इसमें भगत सिंह को नेशनल हीरो के रूप में पेश किया गया। इस फिल्म में निरूपा रॉय, आनंद कुमार और कामिनी कौशल ने अभिनय किया है। शहीद नाम से बनी इन दोनों फिल्मों ने अपने समय में अच्छा बिजनेस किया। इसके बाद 1963 में रिलीज हुई शहीद भगत सिंह। इस फिल्म में अपने जमाने के लोकप्रिय अभिनेता शम्मी कपूर ने भगत सिंह की भूमिका निभाई। कुछ साल पहले बनी ‘लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ ने भी अच्छी सफलता अर्जित की। अभिनेता अजय देवगन भगत सिंह की भूमिका में पसंद किए गए। इस फिल्म के गाने भी काफी लोकप्रिय हुए।

भारत के इतिहास में 15 अगस्त का एक खास महत्व है। इस दिन को देशवासी लंबे समय तक नहीं भूल पाएंगे। इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर 1952 में हेमेन गुप्ता ने एक फिल्म बनाई आनंद मठ। मूर्धन्य उपन्यासकार बंकिम चंद्र चटर्जी की एक कृति पर आधारित इस फिल्म में राज कपूर, रंजना और प्रदीप कुमार मुख्य भूमिकाओं में थे। बंगाल की मिट्टी से जुड़ी इस फिल्म को उस जमाने में दर्शकों का भरपूर प्यार मिला। यह फिल्म भारतवासियों के लिए किसी धरोहर से कम नहीं। राज कपूर और रंजना की भावप्रवण अदाकारी ने आनंद मठ को और भी यादगार बना दिया। हेमेन गुप्ता ने दूसरी और भी कई देशभक्ति फिल्में बनाईं। जिनमें ‘रानी ऑफ झांसी’ का जिक्रन करना बेमानी होगा। यह फिल्म भी 1952 में रिलीज हुई थी। इसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की गाथाओं को पर्दे पर उतारा गया है। हेमेन गुप्ता का यह मानना था कि लक्ष्मीबाई का किरदार अपने आप में काफी बेमिसाल है। जिस बेबाकी और दिलेरी के साथ उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया, वह अवर्णनीय है। लक्ष्मीबाई के चरित्र से प्रभावित होकर उन्होंने यह फिल्म बनाई। 1952 में रिलीज हुई हेमेन गुप्ता की इन दोनों फिल्मों ने हिन्दुस्तानी दर्शकों को झंकृत किया।

देशभक्ति थीम ने कई कलाकारों को एक पहचान दिलाई। अब देखिए न, आज के महानायक अमिताभ बच्चन ने भी देशभक्ति फिल्म से ही अपने कैरियर की शुरूआत की थी। 1969 में के.ए.अब्बास ने एक फिल्म बनाई थी ‘सात हिन्दुस्तानी’। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन को पहली बार अब्बास साहब ने ब्रेक दिया। फिल्म हिट हुई और इसके बाद अमिताभ बच्चन भी हिन्दी फिल्म इडंस्ट्री में पहचाने जाने लगे। सात हिन्दुस्तानी के बाद अमिताभ बच्चन ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अमिताभ बच्चन इस फिल्म के जिक्र पर आज भी काफी संजीदा हो उठते हैं। यह उनके कैरियर का सबसे पहला पड़ाव था। साठ के दशक में ही चेतन आनंद ने हकीकत बनाई। इस फिल्म में बलराज साहनी, धर्मेन्द्र और विजय आनंद ने दमदार भूमिकाएं निभार्इं।

दरअसल चेतन आनंद ने यह फिल्म 1962 की लड़ाई में मारे गए भारतीय सिपाहियों पर बनाई थी। हकीकत में उन रणबांकुरों को श्रद्धांजलि है, जो देश के लिए शहीद हुए। इससे पहले एक फिल्म आई थी जिसमें गांधी के जीवन के ऐतिहासिक पलों को बड़े पर्दे पर रेखांकित किया गया था। इसी साल महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई थी।

हिन्दुस्तान में देशभक्ति से ओत-प्रोत सौ से भी अधिक फिल्में बनीं। दरअसल यह विषय ही ऐसा है, जो भारतीय दर्शकों को सिनेमाघरों और थियेटरों तक खींच लाता है। देशभक्ति गीतों की रवानी और उनमें मौजूद सोंधी मिट्टी की महक ने दर्शकों को हमेशा ही आकर्षित किया है। हिन्दुस्तानियों में आज भी देश के लिए वही जज्बा मौजूद है, तभी तो हाल के वर्षों में रिलीज हुई देशप्रधान फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हिट रहीं। लोग सुनहरे पर्दे पर हिन्दुस्तानी सपूतों के हाथों फिरंगियों को पिटते हुए देखते हंै, तो उनका जोश परवान चढ़ जाता है। देशप्रेम की भावनाएं हिलोरें मारने लगती हंै। कुछ साल पहले रिलीज हुई फिल्म ‘गदर’ सुपर-डुपर हिट हुई। सन्नी देओल और अमीषा पटेल अभिनीत यह फिल्म आज भी सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़ खींचने में सक्षम है। इस फिल्म के सारे गीत कर्णप्रिय है। ‘मदर इंडिया’, ‘क्रांति’, ‘तिरंगा’, ‘बॉर्डर’, ‘सरफरोश’, ‘लगान’, ‘कर्मा’, ‘1942 ए लव स्टोरी’, और ‘लक्ष्य’ जैसी फिल्मों ने भी काफी धूम मचायी। इन फिल्मों ने करोड़ों के बिजनेस किए। देशभक्ति ऐसा विषय है, जिसे फिल्मकारों ने समय-समय पर खूब कैश कराया है। आज भी इस थीम पर फिल्में बन रहीं हैं। स्वतंत्रता-संग्रामियों के जीवन को आधार बनाकर फिल्में बनाने का भी खूब प्रचलन रहा है। 2007 में हॉकी पर आधारित फिल्म ‘चक दे इंडिया’ रिलीज हुई। शिमित अमीन की यह फिल्म भारत में हॉकी की स्थिति पर प्रकाश डालती है। दरअसल देशप्रेम एक ऐसा जज्बा है जो हर देशवासी के दिल में बसता है। इन फिल्मों ने उन जज्बों को जगाने का काम बखूबी किया है। हिन्दी फिल्मों में अभिनेता मनोज कुमार का देशप्रेम सर्वविदित है। मनोज कुमार ने कई देशभक्ति फिल्मों में काम किया। यही वजह है कि उन्हें भारत कुमार और पंडितजी के नाम से जाना जाता है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हिन्दी फिल्मोद्योग से देशभक्ति फिल्मों का चोली-दामन का साथ रहा है। भारतीय फिल्मोद्योग में हर मजहब, हर धर्म के लोग हंै, मगर जब देश की अस्मिता की बात आती है, तो सारे लोग एक हो जाते हैं। फिल्म इंडस्ट्री प्रतिकूल हालातों में भी एकता और सदभाव का परिचायक रहा है। फिल्मों से इतर आम जिन्दगी में भी फिल्म वालों का देशप्रेम कई बार देखने को मिला है।

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