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भ्रष्टाचार कारण तथा निवारण

भ्रष्टाचार कारण तथा निवारण

भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है- अपने आचरण से भ्रष्ट होना। भ्रष्ट आचरण भी दो प्रकार का है-नैतिक रूप से भ्रष्ट होना जिसे हम सामाजिक रूप से भ्रष्ट होना भी कहते हैं अर्थात जो सामाजिक नियम-कायदे हैं उनका पालन न करना। जैसे पर स्त्री-पुरूष का एक दूसरे से अवैध संबंध होना और अपने माता-पिता गुरू का तिरस्कार करना आदि। अत: हम कह सकते हैं कि समाज स्वीकृत नियमों का उल्लंघन करना नैतिक भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है।

दूसरे प्रकार का भ्रष्टाचार वह होता है जिसमें सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों का उल्लंघन करके अवैध तरीकों से संपत्ति अर्जित की जाती है। इस प्रकार का भ्रष्टाचार सरकारी कर्मचारियों और व्यापारियों द्वारा तथा राजनेताओं द्वारा किया जाता है। इसमें मंत्री से लेकर संतरी और चौकीदार से लेकर नौकरशाह तक शामिल होते हैं। आजकल दूसरे प्रकार के भ्रष्टाचार की चर्चा अधिक है, क्योंकि इसमें रिश्वत का लेन-देन होता है, भाई-भतीजावाद भी इसी का एक अंग है और इसी भ्रष्टाचार से हमारे देश की अर्थव्यवस्था चरमरा जाती है, देश की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा पर भी खतरा मंडराने लगता है।

सरकारी कर्मचारी चाहे वह चपरासी हो या नौकरशाह जहां रिश्वत लेकर आय से अधिक संपत्ति अर्जित कर रहा है वहीं व्यापारी वर्ग तस्करी, अवैध व्यापार, जाली नोट का कारोबार, ड्रग्स का व्यापार, हिरोइन, गांजा आदि नशे का व्यापार, मिलावट का कारोबार जैसे खाद्य पदार्थों एवं खून में मिलावट, मानव अंगों का व्यापार करता है। राजनेताओं का भ्रष्टाचार तो जगजाहिर हो चुका है जिसमें 2जी स्पैक्ट्रम, कोयला घोटाला आदि हर व्यक्ति की जुबां पर है। जब यह त्रिगुट नौकरशाह, व्यापारी और राजनेता तीनों भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाते हैं तो उससे देश में विकास की गति अवरूद्ध हो जाती है। अन्तर्राष्ट्रीय जगत में भी देश की छवि धूमिल हो जाती है। पिछली सरकार के समय जो हुआ वह इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। अत: नैतिकता से गिर जाने एवं देश और सरकार द्वारा बनाए गए नियम कानूनों का उल्लंघन करना ही भ्रष्टाचार कहलाता है।

हमारे राजनैतिक जीवन और प्रशासन में भ्रष्टाचार का होना एक आम बात हो गई है संथानम कमेटी की रिपोर्ट इस बुराई का ज्वलंत एवं प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस रिपोर्ट के अनुसार यह बुराई ऊपर से लेकर नीचे तक मंत्री से लेकर कलर्क तक व्याप्त हैं। एक विदेशी पर्यवेक्षक के अनुसार दुनिया में भारत ही एक जैसा देश है, जहां सरकारी कर चुकाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। जो व्यक्ति कर अदा करने के लिए पांच-छह किलोमीटर चलकर कार्यालय में आता है आखिर में वह विवश होकर उसे कलर्क की मुट्ठी गर्म करनी पड़ती है, अन्यथा उसे तब तक चक्कर ही काटने पड़ेंगे जब तक कि वह क्लर्क को खुश नहीं कर देगा। किसी कार्यालय की फाइल तब तक एक मेज से दूसरे मेज पर नहीं जाएगी जब तक वह हर मेज वाले क्लर्क को खुश नहीं कर देगा। उसकी फीस चुकता नहीं कर देगा। ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार हमारे जीवन का एक आवश्यक अंग बन गया है लोगों को उसी के साथ जीना पड़ रहा है और हम बिना किसी ऐतराज के उसको भुगतते जा रहे है, इसीलिए हमारे देश में इस युग को भ्रष्टाचार का युग कहा जा रहा है।

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आज के इस युग में भ्रष्टाचार के इस रोग से कोई भी अछूता नहीं है। यह रोग प्रत्येक व्यक्ति की रग-रग में समा गया है। एक गैर सरकारी संगठन ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल के करप्शन बैरोमीटर नामक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में हर दूसरा व्यक्ति अपना काम कराने के लिए अधिकारियों को रिश्वत देता है। उसके अनुसार सरकारी संस्थानों में सबसे भ्रष्ट संस्थान पुलिस, स्वास्थ्य, शिक्षा और आयकर विभाग शामिल हैं। सर्वेक्षण के अनुसार 29 प्रतिशत लोगों ने पुलिस को रिश्वत दी। छोटे स्तर पर घूस देने का यह सर्वेक्षण 86 देशों में 91 हजार लोगों पर किया गया। सर्वे के अनुसार भ्रष्ट देशों के मामले में अफगानिस्तान, कम्बोडिया, भारत, इराक, नाईजीरिया, फिलीस्तीन सेनेगल, और युगांडा शीर्ष पर हैं। रूस में 32 प्रतिशत, अमेरिका में 23 प्रतिशत, तुर्की और दक्षिणी पूर्वी देशों में 19 प्रतिशत घूस देने की घटनाएं होती हैं। भारत आदि देशों में लोग परेशानियों से बचने के लिए विवश होकर रिश्वत देते हैं। मजेदार बात यह है कि कम आय वाले लोगों ने बेहतर आय वाले लोगों के मुकाबले अधिक रिश्वत दी। हमारे देश में यह समस्या एक विकराल रूप धारण कर चुकी है हर व्यक्ति, हर राजनैतिक दल तथा सामाजिक दल इस बीमारी को अपने-अपने तरीकों से परिभाषित एवं व्याख्या करने का प्रयास कर रहा है। लोग अंधाधुंध पैसा कमाने की होड़ में एक-दूसरे से आगे निकल जाना चाहते हैं। जबकि स्वयं को सबसे ज्यादा ईमानदार बताने में भी पीछे नहीं रहते। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे। बचपन में एक कहानी सुना करते थे कि एक बार किसी गांव के एक अध्यापक ने बच्चों से अपने घर में एक गिलास दूध लाकर बाल्टी में डालने के लिए कहा। सभी बच्चों ने दूध के स्थान पर पानी का गिलास लाकर बाल्टी में डाल दिया उन सभी ने यह सोचा कि दूसरे बच्चे तो दूध लाएंगे ही मेरे एक गिलास पानी से क्या फर्क पड़ेगा, अध्यापक यह देख कर हैरान रह गया कि बाल्टी पानी से भरी हुई है दूध की तो एक बूंद भी नहीं है। यही हाल आज हमारे देश का है। सभी अपने आपको ईमानदार कहते है परंतु वास्तव में वे स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं, और ईमानदारी का चोला पहने हुए हैं। ये बातें देखने में बहुत छोटी दिखाई देती हैं परंतु यदि इसकी गहराई में जाएं तो पता चलता है कि हम सभी कितना भ्रष्ट जीवन जी रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार नासूर बनता जा रहा है। हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार घुन की तरह लगा हुआ है। लोक धन की लूट मची हुई है। सरकारी भ्रष्ट कर्मचारी रिश्वत लेकर अपनी जेबें तो भर रहे हैं परंतु राजकोष खाली रह जाता है। सरकार को घाटा पूरा करने के लिए प्रतिवर्ष कुछ नये कर तक लगाने पड़ते हैं फिर भी भ्रष्ट कर्मचारियों के कारण राजकोष खाली ही रहता है। जैसे किसी बाल्टी को भरने के लिए उसमें लगातार पानी डालते जा रहे है और बाल्टी फिर भी पानी से नहीं भर रही है तो उसका कारण है कि बाल्टी के नीचे सुराग है। जिसकी वजह से पैसा रूपी पानी लगातार बाल्टी में से बाहर निकलता जा रहा है। आप स्वयं ही सोच सकते है कि ऐसी स्थिति में बाल्टी कैसे भरेगी। बाल्टी भरने की बजाय खाली ही रहेगी। इसी प्रकार सरकार जनहित के कार्यों को करने के लिए निरंतर नये कर लगाती जाती है परंतु सुराग रूपी भ्रष्ट कर्मचारियों के कारण राजकोष में समुचित धनराशि नहीं पहुंच पाती और निरंतर करों की मार से जनता त्रस्त हो जाती है। उसे महंगाई की मार झेलनी पड़ती है। विकास के कार्य अवरूद्ध हो जाते हैं। परिणाम यह होता है कि सरकार कंगाल हो जाती है और सरकारी कर्मचारी तथा व्यापारी वर्ग मालामाल।

एक बार किसी राजा के राज्य में प्रजा पर करों की मार बढऩे लगी। प्रतिदिन बढ़ते करों के बोझ से प्रजा पिसने लगी। राजा भी कर बढ़ाते-बढ़ाते परेशान हो गया। एक दिन राजा ने राज दरबार में इसी बात को लक्षित करते हुए राजसभा में मौजूद दरबारियों से प्रश्र पूछा कि प्रजा पर करों का भार बढ़ता जा रहा है परंतु फिर भी राजकोष खाली क्यों हैं? सभा में एकदम सन्नाटा छा गया। किसी में इतना साहस नहीं था कि राजा के सामने असलियत बयान कर सके। जब राजा ने बार-बार यही बात दोहराई तो एक वृद्ध मंत्री ने साहस बटोर कर कहा-”महाराज, क्षमा प्रदान करें तो इसका कारण मैं बता सकता हूं।” राजा ने क्षमादान देते हुए स्पष्ट बात बताने के लिए कहा। वृद्ध मंत्री ने एक बर्फ का टुकड़ा मंगवाया और उसे सबसे पीछे बैठे सभासद को देकर कहा कि इस बर्फ के टुकड़े को क्रमानुसार आगे वाले को देता जायें। ऐसा होने के बाद अंत में उस बर्फ का टुकड़ा राजा के पास पहुंचा तो आकार में बहुत छोटा रह गया था। यह देखकर राजा को समझते देर नहीं लगी कि सारा प्रशासन भ्रष्ट हो चुका है इसलिए राजकोष में पूरी राशि नहीं पहुंच पाती। लगभग यही हाल अब हमारे देश का है। भ्रष्टाचार की जड़ में व्यवस्था सर्वोपरि है और व्यवस्था को सुधारे बिना हम भ्रष्टाचार की लड़ाई से नहीं लड़ सकते। स्वच्छ प्रशासन न केवल हमारे आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है, बल्कि हमारी स्वतंत्रता के लिए भी आवश्यक है। यदि प्रशासन इस बारे में शिथिल हो जाये तो भ्रष्टाचार का फैलना स्वाभाविक है। प्रशासन सरकार के हाथ, पैर आंख, कान और नाक होते हैं। जब ये कार्य नहीं करेंगे तो शरीर कार्य कैसे करेगा।

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खाद्य पदार्थों में मिलावट जैसे नकली दूध, नकली घी, नकली मावा, हल्दी मिर्च मसालों में मिलावट यहां तक की खून में भी मिलावट करना और दवाईयों में मिलावट करना कुछ असामाजिक तत्वों का धंधा बन गया है। रोगी स्वास्थ्य लाभ के लिए दवाईयां लेता है परंतु उसे क्या पता कि यह दवाई नकली है जो उसके लिए प्राणघातक सिद्ध होगी, रोगी स्वस्थ होने के लिए दूध पीता है परंतु यूरिया रूपी दूध क्या मनुष्य को स्वस्थ रखेगा। आज इन मिलावटी दवाईयों के बिकने के कारण लाखों रोगी अस्पताल में ही दम तोड़ देते है अथवा एक बीमारी का ईलाज खत्म होने से पहले ही दूसरी बीमारी उन्हें घेर लेती है। इस प्रकार मिलावट का धंधा करने वाले ये पिशाच मासूम जनता की जान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इसी प्रकार सरकार जब कोई भवन, पुल आदि का निर्माण कार्य करवाती है तो त्रिगुट गैंग में शामिल व्यापारी, राजनेता तथा सरकारी कर्मचारी-मिलकर निर्माण कार्य में घपला करते हैं। सीमेंट, लोहा आदि आवश्यक सामान की पूरी मात्रा न लगाकर नाममात्र का सामान लगा कर खानापूर्ति कर देते हैं। ऐसा करके वे अपनी जेबें तो अवश्य भर लेते हैं परंतु इसका परिणाम कभी इतना भयंकर होता है कि निर्माणाधीन भवन, पुल निर्माण के समय ही या कुछ दिन बाद धाराशायी हो जाते हैं और बहुत से निरीह प्राणियों को कुछ व्यक्तियों की स्वार्थपूर्ण करतूतों के कारण हादसों का शिकार होकर असमय काल के गाल में समाना पड़ता है। न जाने कितने निर्दोष व्यक्तियों के परिवार तबाह हो जाते हैं। इसी प्रकार जब कोई सैन्य-असैन्य कर्मचारी जो सीमा की रक्षा के लिए तैनात होताा है अपने स्वार्थ में अंधा होकर शत्रु देश के सैनिकों, घुसपैठियों, आतंकवादियों को अपने देश में प्रवेश करा देता है तो वह समूचे देश की सुरक्षा के लिए खतरे का कारण बन जाता है। जब व्यक्ति इतने निकृष्ठ कार्य करने पर उतारू हो जाता है तो राष्ट्रीय चरित्र की बात करना व्यर्थ है।

जो भ्रष्ट साधनों को नहीं अपनाता वह भौतिक सुखों की दौड़ में पीछे रह जाता है और यही भौतिक सुखों की दौड़ उसे भ्रष्टाचार की ओर ले जाती है। पहले एक उक्ति होती थी-ईमानदारी सर्वश्रेष्ठ नीति है-आज यह उक्ति अर्थहीन हो गई है। आज बेईमानी के विरूद्ध यदि कोई मौखिक या मनोवैज्ञानिक प्रतिबंध बचा है तो वह है पाप का फल तो मिलता ही है। यह सत्य है कि शासन चलाने वाले योग्य व्यक्ति होने चाहिएं। हमारे देश में इसके विपरीत हो रहा है योग्यता की कसौटी चुनाव में बहुमत प्राप्त करना मात्र रह गया है। यहां तक की विजयी होने वाले बहुत से जनप्रतिनिधि अपने प्रभाव से प्रशासन को भ्रष्ट कर देते हैं और भ्रष्ट अधिकारियों के साथ मिलकर सारे प्रशासन को पंगु बना देते हैं। इस प्रकार देखा-देखी छोटे से लेकर बड़े अधिकारी तक सभी भ्रष्ट हो जाते हैं। अत: राजनैतिक भ्रष्टाचार वत्र्तमान भ्रष्टाचार के मां-बाप हैं। हमारे देश में जैसे-जैसे विकास हो रहा हैं भ्रष्टाचार की बीमारी भी बढ़ती जा रही है। आज यह बीमारी एक विकराल रूप धारण कर चुकी है और आम जनता इससे ग्रस्त है। गरीब और गरीब होता जा रहा है अमीर और अमीर होता जा रहा है। समाज में असमानता की खाई गहरी होती जा रही है। भ्रष्टाचार, भ्रष्टाचार है, चाहे वह निचले स्तर पर हो या ऊपर के स्तर पर। यह देश की अर्थव्यवस्था को खोखला किए जा रहा है। कई मामलों में जैसे फर्जी राशन कार्ड निचले स्तर पर क्लर्कों की मार्फत ही शुरू होता है। ये बाबू केवल सौ-दो सौ रूपये लेकर फर्जी राशन कार्ड बना देते है इन बाबूओं को इस बात का जरा सा भी अंदाजा नहीं कि सौ-दो सौ रूपये के लालच में वे कितना गंभीर अपराध कर रहे हैं, क्योंकि फर्जी राशन कार्ड से ही फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर आईडी कार्ड, आधार कार्ड यहां तक कि पासपोर्ट तक बनवाए जाते हैं। जरा सोचिए फर्जी राशन कार्ड के आधार पर जब फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बन गया तो वह अनाड़ी ड्राइवर कितने निरीह मनुष्यों के प्राण ले लेगा। यह सोच कर ही दिल कांप जाता है। इसी प्रकार जब फर्जी राशन कार्ड से वोटर आईडी या पासपोर्ट बन जाएगा । जिनको बनवाने वाले बांग्लादेशी या पाकिस्तानी होंगे तो देश की सुरक्षा-व्यवस्था को कितना गंभीर खतरा पैदा होगा। हजारों की संख्या में विदेशी जासूस भी इसका फायदा उठाएंगे जो हमारे देश में वैधानिक चोला पहन कर रह रहे हैं। जिससे हमारी सुरक्षा व्यवस्था पर ही प्रश्र चिन्ह लग जाता है। इन विदेशी जासूसों को फैलाने में वे बाबू शामिल हैं जिन्होंने सौ-दो सौ रूपयों के लालच में फर्जी राशन कार्ड बनाया था। ये हैं भ्रष्टाचार के गंभीर परिणाम जिन्हें प्राय: हम अनदेखा कर देते हैं। भ्रष्टाचार के किसी भी मामले को सरसरी तौर पर देखकर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। इसमें जो भी लोग शामिल हैं उन्हें कठोर-से-कठोर दंड देने की व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि छोटा सा भ्रष्टाचार भी गंभीर रूप धारण कर सकता है। जबकि समाज उसे नजरअंदाज कर देता है क्योंकि इसमें कही न कही वो स्वयं भी शामिल होता है।

29-08-2015नि:संदेह भ्रष्टाचार का उन्मूलन केवल कानून बना देने या जांच आयोग का गठन कर देने से नहीं होगा। भारत में ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ की कार्यकारी निदेशक अनुपमा झा की माने तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में न तो कानूनों की कमी है न भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों की कमी है। केवल कानून बना देने से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता। केन्द्रीय सतर्कता आयोग सीबीआई तथा विभागीय विजिलेंस विंग्स भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए ही बनाए गए हैं। भारत सरकार सन् 1962 में ही प्रथम बार लोकपाल बिल लेकर आई थी जो पास नहीं हो सका। इससे पता चलता है कि भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए सरकार 1962 से ही सक्रिय थी और उसके लिए प्रयास किए जा रहे थे। मोरारजी देसाई के नेतृत्व में दूसरी रिपोर्ट आई थी। सन् 1996 में ‘एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म कमीशन’ ने अपनी रिपोर्ट दी। सन् 1973 में ‘वोहरा कमेटी’ की रिपोर्ट आई। 1976 बैच की आईएएस ऑफिसर प्रमिला शंकर ने अपनी पुस्तक ‘गॉड्स ऑफ करप्शन’ में ब्यूरोक्रेसी और राजनेताओं के गठजोड़ का खुलासा किया था। इससे राजनैतिक तूफान अवश्य आया परंतु रास्ता कुछ नहीं निकला। सन् 1997 में प्रधानमंत्री तथा राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच इस बारे में बातें हुईं परंतु परिणाम शून्य रहा। केन्द्रीय सतर्कता आयोग भी इसी उद्देश्य से बनाया गया था। अब प्रश्न उठता है कि भ्रष्टाचार पर अंकुश क्यों नहीं लगा? स्पष्ठ है कि इस सबके लिए हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं। कभी छोटी-मोटी असुविधाओं से बचने के लिए और कभी गैर-कानूनी कार्य करवाने के लिए हम संबंधित कर्मचारी, अधिकारी को रिश्वत देते हैं। इस तरह रिश्वत देने की शुरूआत तो हम स्वयं करते हैं। आखिर क्यों देते हैं रिश्वत? क्या समाज के उन लोगों के काम बिल्कुल नहीं होते जो रिश्वत नहीं देते हैं? काम उनके भी होते हैं यह अलग बात है उनके काम देर से होते हैं। हमें स्वयं को इस परिस्थिति के लिए तैयार करना होगा। सरकार को अपनी नीतियों में भी सुधार करना होगा जो कि भ्रष्टाचार को बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुई हैं। जैसे आवश्यक वस्तुओं पर कंट्रोल और कोटा परमिट नीति। यह नीति भ्रष्टाचार तथा दूसरी बुराईयों की एक बड़ी जड़ सिद्ध हुई है। इस बारे में ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री चर्चिल ने अपने विचार इस प्रकार व्यक्त किए थे-”यदि आप खुले बाजार को नष्ट कर देते है तो काले बाजार को जन्म देते हैं। यदि आप दस हजार कानून बनाते हैं तो आप कानून के प्रति अपना सम्मान समाप्त कर देते हैं। वह देश सर्वाधिक भ्रष्ट होता है जहां कानूनी अधिकार ज्यादा होते हैं।’’ यह भी सच है कि प्रशासन कंट्रोल से जुड़ी हेराफेरियों से पूरी तरह से अवगत है परंतु उन्हें कम करने की कोशिश नहीं की गई। इसके विपरीत लगता है कि निहित स्वार्थों के कारण कंट्रोल-दर-कंट्रोल सामने आए। इस संबंध में आर्थिक प्रशासन सुधार आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष एल.के झा ने मुंबई में आर्थिक प्रबंध पर बोलते हुए उचित ही कहा था कि कंट्रोल से सभी उपभोक्ताओं की समस्याओं का निराकरण नहीं हो सकता क्योंकि, राशन से मिलने वाली वस्तुओं का निराकरण नहीं हो सकता। इसकी वजह ये है कि राशन से मिलने वाली वस्तुएं उन्हीं लोगों को मिल पाती हैं जो लाइन में सबसे आगे हों और इस तरह उन गरीब लोगों के साथ अन्याय होता है। जिन गरीबों के लिए ये कल्याणकारी योजनाएं चलाई जाती हैं। जब तक रिश्वत लेने के अपराध पर जितना जुर्माना भरना पड़ेगा उससे अधिक भ्रष्ट कमाई की गुंजाइश रहेगी। तब तक लोगों में भ्रष्टाचार उन्मूलन के प्रति सरकार की ईमानदारी पर विश्वास नहीं हो सकता। जनता को सरकारी कार्यालयों में रिश्वत मांगने की समस्या से गुजरना पड़ता है। इसके लिए एक लोकपाल की नियुक्ति कर देनी चाहिए। जिनके सदस्यों का चुनाव पारदर्शी हो। नौकरशाह, जज तथा प्रधानमंत्री सहित सभी नेता उसके दायरे में हों। लोकपाल सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो। सीबीआई भी उसके अधीन कार्य करे। सीवीसी और विभिन्न विभागों में कार्यरत विजिलेंस विंग्स का लोकपाल में विलय कर दिया जाए। जेल भेजने की सजा टैक्स चोरी की राशि से जुड़ी होनी चाहिए। सबके लिए नेशनल प्रॉपर्टी रजिस्टर बने, ताकि हर व्यक्ति की प्रॉपर्टी हस्तांतरण बैंक के माध्यम से हों। उस रजिस्टर में बैंक खाते का विवरण हो। क्रय-विक्रय करने वालों के फिंगर प्रिंट उसमें दर्ज हों। भ्रष्टाचार निरोधक कानून 1988 में सुधार किया जाए। उसकी धारा 19 को समाप्त कर देना चाहिए। यदि यह धारा न होती तो थॉमस जैसे व्यक्ति मुख्य सतर्कता आयुक्त नहीं बन सकते थे। सीवीसी एक्ट धारा 26 को समाप्त कर देना चाहिए। इसके तहत मुकदमा दर्ज करने के लिए अनुमति लेना आवश्यक है। यह प्रावधान विनीत नारायण के फैसले के अलावा 1971 के सिराजुद्दीन मामले में

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरूद्ध है। इसके अलावा जनप्रतिनिधि कानून में एक प्रावधान जोड़ा जाना चाहिए जिसके विरूद्ध चार्जशीट लगी हो उसे चुनाव में खड़े होने का अधिकार न हो।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा का कहना है कि प्रत्येक संवेदनशील उच्च पद पर बेदाग व्यक्ति की नियुक्ति होनी चाहिए। आम आदमी को भ्रष्टाचार के खिलाफ सतर्क रहना चाहिए। कामकाज में पूरी तरह पारदर्शिता होनी चाहिये, जवाबदेही तय होनी चाहिये। जिम्मेदार पदों पर आसीन व्यक्तियों एवं उनके परिवार की सदस्यों की संपत्ति का पूर्ण विवरण होना चाहिए। प्रसिद्ध न्यायवेत्ता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री एमसी छागला का यह कथन सत्य है कि भ्रष्टाचार नीचे से ऊपर नहीं वरन ऊपर से नीचे आता है। इसीलिए भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए हमारे जनप्रतिनिधियों को सादा जीवन बिताना चाहिए, जो जनता के लिए अनुकरणीय हो। जैसा कि अन्य देशों के शासनाध्यक्ष कर रहे हैं। उदाहरण के रूप में स्वीट्जरलैंड इंग्लैंड तथा तंजानिया आदि देशों का लिया जा सकता है। स्वीट्जरलैंड के राष्ट्रपति जिस मकान में रहते हैं उसका किराया वह स्वयं अदा करते हैं। उनकी पत्नी गृह कार्य स्वयं करती हंै। वे सरकारी अतिथियों को भी शानो-शौकत से नहीं रखते। जब तक वहां का राष्ट्रपति पद पर होता है उसे विदेशों में जाने की अनुमति नहीं मिलती। उसके पास यात्रा के लिए कार या अन्य वाहन नहीं होता। वह कार्यालय में अन्य नागरिकों की तरह जाता है। उसका न कोई अंगरक्षक होता न उसके कार्यालय पर पुलिस का पहरा होता है। उसके निजी सचिव से आसानी से मिला जा सकता है। उसका कार्यालय एक साधारण गली में होता है। इंग्लैंड में भी प्रधानमंत्री कार्यालय एक साधारण गली 10 डाऊनिंग स्ट्रीट में है। वहां सम्राट, साम्राज्ञी को भी लाल बत्ती पर साधारण नागरिक की तरह रूकना पड़ता है। कुछ वर्ष पहले तंजानिया के राष्ट्रपति जुलियस न्यरेरे का एक चित्र अखबार में प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्हें अपने मत का प्रयोग करते हुए अन्य लोगों के साथ पंक्ति में खड़ा दिखाया गया था। अब अन्य देशों के राजनेता ऐसा क्यों नहीं कर सकते? दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में भारत भ्रष्टाचार की लड़ाई में पिछड़ता जा रहा है। यह स्थिति तब है जब भारत में इस समस्या से निपटने के लिए कानूनों से लैस तमाम एजेंसियां मौजूद हैं, परंतु समस्या यह है कि इन कानूनों का कड़ाई से पालन नहीं होता। भ्रष्टाचार के खिलाफ केन्द्रीय एजेंसी केंद्रीय सतर्कता आयोग के दांत सिर्फ दिखाने भर के लिए हैं। जबकि न्यूजीलैंड, डेनमार्क, सिंगापुर जैसे सबसे ईमानदार देशों में भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियां ज्यादा स्वतंत्र हैं। अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया एवं यूरोपीय देशों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के लिए कामकाज को ज्यादा पारदर्शी बना रखा है और भ्रष्टाचार की सूचना जुटाने के लिए करोड़ों रूपये खर्च कर रहे हैं। फेयर ट्रेडिंग कंपनियों के कॉरटेल का पता लगाने के लिए इंग्लैंड हर साल करोड़ों पौंड खर्च करता है। अमेरिका में झूठी शिकायतों की भी जांच की जाती है और इसे बढ़ावा देने के लिए कानून तक बनाया गया है। जापान जैसे देश में भ्रष्टाचार के आरोप में एक बार घिरने के बाद राजनेताओं का दोबार जनता का समर्थन पाना बहुत मुश्किल हो जाता है। फिलीपिन्स में भ्रष्टाचार निवारण के लिए सात कानून और 13 एंटीग्राफ्ट एजेंसियां काम कर रही हैं 1955 में सबसे पहले आए कानून फॉरफीचर लॉ के तहत गैर-कानूनी रूप से अर्जित की गई संपत्ति को जब्त करने का अधिकार है। 1972 में मार्शल लॉ लागू होने के बाद राष्ट्रपति मारकोस ने चार प्रेसिडेन्सियल डिक्री जारी की थी। इसके अनुसार सभी सरकारी कर्मचारियों द्वारा अपनी संपत्ति और देनदारियों का विवरण अनिवार्य होगा। 1979 में राष्ट्रपति द्वारा एंटी ग्राफ्ट कोर्ट और ओम्बुड्समेन का गठन किया गया। सिंगापुर में 1937 में पोको (प्रीवेंशन ऑफ करप्शन आर्डिनेंस) नामक पहला भ्रष्टाचार निरोधी कानून बनाया गया। 1952 में क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन डिपार्टमेंट के भ्रष्टाचार निरोधक शाखा को समाप्त कर इंडिपेंडेंट करप्ट प्रेक्टिस इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो का गठन किया गया। 1960 में पोको नामक कानून बनाया और सीपीआईबी को मजबूत किया। इस नए कानून में सजा और जुर्माने की राशि में बढ़ोत्तरी की गई। भ्रष्टाचार के खिलाफ यह देश बहुत सख्त कानून के अधिकार की रक्षा करती है। यहां भ्रष्टाचार का स्तर असाधारण रूप से बहुत कम है। न्यूजीलैंड पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त देश के रूप में जाना जाता है। रिश्वतखोर सरकारी अधिकारियों और घूस देने वालों के लिए सख्त दंड का प्रावधान है। फिनलैंड में भ्रष्टाचार प्राय: अस्तित्व में ही नहीं है। कारोबार की स्वतंत्रता संपत्ति के अधिकार और भ्रष्टाचार से मुक्ति जैसे मामलों में यहां की अर्थव्यवस्था दुनिया की अगुवाई कर रही है। स्वीडन में भ्रष्टाचार के मामलों के लिए व्यापक कानून पूरी तरह से लागू हैं। इस देश ने 1997 ओईसीडी घूस निषेध संधि को भी अंगीकार कर रखा है। सरकारी सूचनाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए कानूनी तथा संवैधानिक व्यवस्थाएं की गईं हैं। कनाडा में रिश्वतखोरी तथा भ्रष्टाचार बहुत कम देखने को मिलता है। यह देश संयुक्त राष्ट्र की भ्रष्टाचार निवारक संधि का अधोहस्ताक्षरी है। नीदरलैंड में भ्रष्टाचार के विरूद्ध इतने सख्त कानून है कि वहां निचले स्तर पर भी भ्रष्टाचार न तो पनप पाता है न भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता हैं। चीन में भ्रष्टाचार के विरूद्ध बहुत सख्त कानून हैं आरोप सिद्ध होने पर भ्रष्टाचारी को मृत्युदण्ड भी दिया जाता है।

भ्रष्टाचार को लेकर हमारे देश में आया एक सर्वेक्षण कई आदर्शवादी लोगों को रियल्टी चेक का मौका दे सकता है। अर्नेस्ट एंड यंग द्वारा किए गए एक सर्वे में देश को 66 प्रतिशत कारोबारियों ने माना कि थोड़ी बहुत रिश्वत ठीक है। लगभग 80 प्रतिशत का मानना है कि भ्रष्टाचार अभी भी फैला हुआ है। जबकि 52 प्रतिशत का मानना है कि कारोबार में टिके रहना है तो बिजनेस डील पाने के लिए तोहफे देने ही होंगे। 27 प्रतिशत कारोबारियों ने अफसरों की हथेली गर्म करने के लिए कैश पेमेन्ट को भी सही माना। 35 प्रतिशत का तो यह मानना था कि भ्रष्टाचार को रोकने को लेकर लागू की जा रही नीतियों से बाजार में होड़ कर पाने की उनकी क्षमता पर बुरा असर पड़ेगा। 57 प्रतिशत ने कहा कि रेग्युलेशन बढऩे से उनके बिजनेस के विस्तार और सफलता के लिए चुनौतियां बढ़ गई हैं।

इस सर्वे में यह पता चलता है कि सरकार की बात तो अलग रही, समाज का एक बड़ा हिस्सा चाहता है कि भ्रष्टाचार समाप्त न हो क्योंकि यदि भ्रष्टाचार समाप्त हो गया तो उनके बिजनेस भी ठप्प हो जाएंगे। इसका सीधा सा तात्पर्य यह है कि सरकार को बदनाम करने के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में भीड़ का हिस्सा बनने के लिए कैंडल मार्च निकालने के लिए व्यापारियों के बच्चे शामिल हो सकते हैं। व्यापारी उनको आन्दोलन के लिए आर्थिक सहायता भी करने को तैयार हैं क्योंकि उनको पता हैं कि यह आन्दोलन भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए नहीं बल्कि, वत्र्तमान सरकार को बदनाम करने के लिए एक आन्दोलन है। इस सर्वे से यह साफ जाहिर है कि दिल से कोई भी नहीं चाहता कि भ्रष्टाचार वास्तव में समाप्त हो जाए क्योंकि उन्होंने जो संपत्ति अर्जित की है वह भ्रष्टाचार के कारण ही तो की है।

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सर्वे से साफ पता चलता है भ्रष्टाचार को लेकर भले ही एक बड़ा तबका नाराज हो पर वह आज के सिस्टम में इस कदर घुल मिल गया है कि लोगों ने इसे एक स्वाभाविक चीज मान लिया है। कारोबारियों ने मान लिया है कि सही रास्ते पर   चलने से उनका काम देर से होगा और वे अपने प्रतिद्वंदी से पिछड़ जाएंगे। इसलिए कारोबारी रिश्वत को निवेश का एक हिस्सा मानकर संबंद्धित अधिकारी को तोहफा या रिश्वत देकर अपना काम करा लेना चाहते हैं। सरकारी अधिकारी, कर्मचारी उनकी इसी मजबूरी का फायदा उठा कर उनसे रिश्वत ले लेते हंै। इस प्रकार भ्रष्टाचार के मामले में दोनों की मौन सहमति हो जाती है। कभी-कभी तीसरा वर्ग अपने प्रोडक्ट की कीमत बढ़ा कर उपभोक्ता पर लाद देता है। इसलिए कारोबार से जुड़ी सारी प्रतिक्रियाएं पारदर्शी और सरल होनी चाहिए, सिंग्ल विंडो क्लीयरेंस सस्टिम होना चाहिए। जिससे रिश्वत देने की नौबत ही न आए।

यह एक कटु सत्य है कि भ्रष्टाचार हमारे देश में एक बहुत बड़ी समस्या बन चुकी हैं। यह एक विकराल रूप धारण कर चुकी है। इससे आज देश का एक बहुत बड़ा जनमानस प्रभावित और परेशान है। भ्रष्टाचार आज देश की सबसे बड़ी सामाजिक और राजनैतिक समस्या बन गई है। भ्रष्टाचार को लेकर मध्यम वर्ग और युवाओं में भारी आक्रोश है, परंतु यह भी सत्य है कि भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए अनेक प्रयास किए जाते रहे हैं, परन्तु वे प्रयास हमने ईमानदारी से नहीं किये, इसी कारण लोगों के भीतर अब यह विश्वास ही नहीं बन पाया है कि हमारे देश से भ्रष्टाचार समाप्त भी हो सकता है। यह विश्वास तभी बनेगा जब राजनैतिक नेतृत्व साफ नीयत और दृढ़ ईच्छाशक्ति से भ्रष्टाचार से लड़ता हुआ दिखे। भ्रष्टाचार का वटवृक्ष चाहे कितना ही फैल चुका हो यदि हम उसकी जड़ों पर ईमानदारी से प्रहार करें तो भ्रष्टाचार रूपी वटवृक्ष को गिरने से कोई नहीं बचा पाएगा। अब तक हम उसके पत्ते शाखाएं ही नोचते रहे हैं, जबकि उसकी जड़ें ज्यों-की-त्यों ही बनी रही। यूं कहिये कि दिखावे के लिए पत्ते शाखाओं को काटते रहे और पर्दे के पीछे से उसकी जड़ों में खाद पानी डालकर उसे नष्ट होने से बचाते रहे। यह उपरोक्त सर्वे से साफ झलकता है। यह भी उतना ही सत्य है कि भ्रष्टाचार रूपी वटवृक्ष की जड़ें बालू के टीले में दबी पड़ी हैं और वे केवल एक ईमानदार झटके से ही उखड़ जाएंगी। बशर्ते कोई ईमानदारी से झटका मारने वाला हो। किसी वृक्ष को उखाडऩे के लिए उसकी पत्तियों को नहीं नोचा जाता, बल्कि उसकी जड़ों को भी नष्ट किया जाता है। भ्रष्टाचार को दलगत प्रश्र नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे एक गंभीर समस्या समझ कर शुद्ध एवं साफ मन से दूर करने का बीड़ा उठाना होगा। आमतौर पर कालाधन तस्करी आतंकवाद जैसी समस्याओं को अलग-अलग मान लेते हैं लेकिन, ये सब एक ही श्रृंखला की कडिय़ा हैं और इन सब का मूलस्त्रोत है-भ्रष्टाचार। इसलिए आवश्यक है कि देश में व्याप्त इन बुराईयों को दूर करने के लिए हमें भ्रष्टाचार से निपटना होगा और दूसरे देशों ने जिस प्रकार अपने देश को भ्रष्टाचार मुक्त किया वैसे प्रयास हमें अपने देश में करने होंगे। भ्रष्टाचार हमारे नैतिक मूल्यों पर सबसे बड़ा प्रहार है। यह विषैले विषधर के समान हमारे सारे समाज को डस रहा है। अत: इस भयानक विषधर का फन कुचलना अति आवश्यक है।

श्रीकृष्ण मुदगिल

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