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इस सिरे से उस सिरेतक सब शरीके जुर्म हैं

इस सिरे से उस सिरेतक सब शरीके जुर्म हैं

संसद का मानसून सत्र भी हंगामे की बलि चढ़ गया। पिछले कुछ दिनों से विपक्ष जिस तरह सरकार को भ्रष्टाचार के आरोपों के चक्रव्यूह में घेरने की तैयारी कर रहा था और सत्तारूढ़ दल उसके चक्रव्यूह को भेदने की रणनीति बना रहा था उससे ऐसा लग रहा था कि सरकार और विपक्ष संसद की कार्यवाही में नहीं कुरूक्षेत्र की लड़ाई में हिस्सा लेने की तैयारी कर रहे थे। दो प्रतिस्पर्धी बहस की नहीं वरन दो दुश्मन युद्ध की तैयारी कर रहे थे। दोनों की भाषा और तेवर भी कुछ ऐसे ही थे। कांग्रेस पहले ही धमकाने के अंदाज में कह चुकी थी कि जब तक विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के इस्तीफे नहीं होते तब तक संसद चलने नहीं दी जाएगी। तीनों के इस्तीफे होने के बाद ही किसी मुद्दे पर चर्चा होगी। कांग्रेस का यह रवैया समझ से परे है। वह इस मुद्दे को इतना क्यों तान रही थी? बहुत से राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बात तो स्पष्ट है कि सुषमा स्वराज ने कोई आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं किया। हां, जो किया उसे नैतिक गड़बड़ी जरूर कहा जा सकता है। वैसे ललित मोदी पर इतना बड़ा हंगामा हो रहा है, उसको कोई सजा होना तो दूर रहा उसके खिलाफ आरोप तक फ्रेम नहीं हुए हैं। ऐसे में सुषमा स्वराज के इस्तीफे के लिए संसद ठप्प करने के कांग्रेसी कदम को कतई सही नहीं माना जा सकता।

कांग्रेस सुषमा स्वराज ही नहीं भाजपा शासित तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भी इस्तीफा मांग रही है, जिसका केंद्र सरकार और संसद से सीधा सरोकार नहीं है। राज्यों के इन मसलों को केंद्र सरकार कैसे हल कर सकती है? यदि केंद्र सरकार उन्हें हल करने लगी तो राज्यों की स्वायत्तता के क्या मायने रह जाएंगे? राज्यों के मामले विधानसभाओं में तय होने चाहिए। यदि देश के 29 राज्यों के मामले संसद में गूंजने लगेंगे तो संसद अपनी जिम्मेदारी कब निभाएगी? अपवाद के तौर पर कुछ प्रादेशिक मुद्दों पर संसद में चर्चा की जा सकती है। लेकिन उनके लिए नियम अलग हैं। विपक्ष उन नियमों के तहत चर्चा का नोटिस दे सकता है। लेकिन, इस कारण संसद के पूरे सत्र को ठप्प करने की धमकी शोभा नहीं देती। मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले की सीबीआई जांच के आदेश दिए जा चुके हैं। उसकी जांच के नतीजों का कांग्रेस को इंतजार करना चाहिए। लेकिन, जांच के नतीजों का इंतजार किए बगैर वह मुख्यमंत्री का इस्तीफा चाहती है। इस मामले में केंद्र सरकार कुछ नहीं कर सकती। लेकिन कांग्रेस इन मामलों पर कोई चर्चा नहीं, सिर्फ इस्तीफा चाहती है। यह तो असंसदीय परंपरा होगी। लेकिन कांग्रेस के लिये ये सारे तर्क मायने नहीं रखते। कांग्रेस के नेताओं के जेहन में यह बात बैठ गई है कि सरकार के खिलाफ आक्रामक रूख अपना कर ही पार्टी अपनी खोई हुई जमीन वापस पा सकती है। कहना न होगा कि यह उसकी बहुत बड़ी गलतफहमी है, जिसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ सकता है। यह नजारा बहुत अद्भुत है। लोकसभा में केवल 44 सदस्यों की संख्या वाली कांग्रेस जिसे विपक्षी दल के तौर पर मान्यता तक हासिल नहीं है, वह एक तरह से सारी संसद को ही मानसून सत्र में बंधक बनाए हुए थी। इसकी वजह यह है कि कांग्रेस जो लोकसभा में हाशिये की पार्टी है लेकिन, राज्यसभा में सबसे बड़ी शक्ति है। मोदी सरकार को इस सत्र में 24 बिल पास कराने थे और यह, कांग्रेस के सहयोग के बगैर पास होना मुश्किल था।

ऐसे में यदि संसद ठप्प रही तो कोई भी कामकाज होना मुश्किल था। बहुत सारे महत्वपूर्ण बिल पास नहीं हो पाए। लेकिन, कांग्रेस को इन विधायी कामकाजों की कोई चिंता नहीं है। उसकी चिंता एक ही है कैसे भाजपा से हार के अपमान का बदला लिया जाए? कैसे उसे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेरा जाए?

दूसरी तरफ भाजपा भी किसी का इस्तीफा कराने को राजी नहीं है। वह आरोपों का जवाब आरोपों से देना चाहती है। उसने कांग्रेस के तीन नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के नए आरोप खोज निकाले हैं। इनमें से दो आरोप कांग्रेस के गोवा के पूर्व और असम के वर्तमान मुख्यमंत्री के खिलाफ है तो, तीसरा एक कांग्रेस के नेता द्वारा कोयला कांड के अभियुक्त संतोष बगरोडिया को डिप्लोमेटिक पासपोर्ट के लिए दबाव डालने के बारे में है। इस तरह भाजपा ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार के आरोपों का उसी की भाषा में जवाब देने की पूरी तैयारी की हुई है। हालांकि भाजपा किसी भी मुद्दे पर बहस करने को तैयार है पर कांग्रेस का कहना है, पहले इस्तीफा फिर बहस। यह बात गले नहीं उतरती। आखिर संसद बहस के लिये है या धमकियां देने के लिए? बिना बहस के फैसले कैसे लिए जा सकते हैं?

यह पहली बार नहीं है कि संसद का कामकाज ठप्प हुआ हो। 15वीं लोकसभा का उदाहरण हमारे सामने है, लेकिन इसे नजीर नहीं बनाया जाना चाहिए। संसद की अपनी एक गरिमा है, जहां जनता से जुड़े कई अहम निर्णय लिए जाते हैं। यदि संसद के इस उद्देश्य की अनदेखी की जाएगी तो इससे उसकी गरिमा और मर्यादा प्रभावित होगी। सभी विवादित मुद्दों का हल सदन में चर्चा से होना चाहिए। यह चर्चा ही दिनोंदिन कम होती जा रही है। कई महत्वपूर्ण बिल बिना गंभीर और विस्तृत चर्चा के ही पारित हो जाते हैं।

वैसे संसद की गरिमा को कलंकित करने के लिए केवल कांग्रेस को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वह तो केवल भाजपा की विद्या भाजपा को ही पढ़ा रही है। दुष्यंत कुमार की गजल की एक पंक्ति है- इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं- यह पंक्ति यहां पूरी तरह से लागू होती है। 15वीं लोकसभा में भाजपा ने इसी रणनीति का इस्तेमाल किया था। तब भाजपा के नेता और मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था, हालांकि उनकी पार्टी संसद का कामकाज ठप्प करने के पक्ष में नहीं है मगर, कभी-कभी इसका इस्तेमाल खास रणनीति से किया जाता है। कहना होगा कि इस रणनीति का इस्तेमाल करके भाजपा कांग्रेस को धूल चटाकर सत्तारूढ़ हो गई। अब कांग्रेस इसी हथियार का प्रयोग कर रही है। इसलिए भाजपा को कांग्रेस के संसद को ठप्प करने के अभियान का विरोध करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। इसलिए ही कामयाबी के शॉर्टकट निकालने के बजाय स्वस्थ्य परंपराओं को कायम करना जरूरी है।

अब तो संसद में हंगामा, शोरगुल, कामकाज ठप्प होना हर सत्र की बात हो गई है। पहले हंगामा होता था तो लोग कहते थे कि मछली बाजार बन गया है, अब कहते हैं कि पार्लियामेंट बन गया है। राजनीतिक दलों को लगता है की संसद में अच्छी बहस करने की तुलना में संसद में हंगामा करना और उसका बायकॉट करना राजनीतिक दृष्टि से ज्यादा फायदेमंद होता है। इससे मीडिया में ज्यादा प्रचार मिलता है। लेकिन, इस अहंकार और राजनीतिक स्वार्थों की लड़ाई में ससंद के मुख्य कामकाज देश के लिए कानून बनाने में संसद का महत्वपूर्ण समय बर्बाद हो रहा है और इसकी चिंता किसी दल को नहीं है।

देश जानता है कि महत्वपूर्ण आर्थिक सुधारों के कई विधेयक संसद में लटके हुए हैं, जिनका मानसून सत्र में पारित होना जरूरी था। यदि भूमि अधिग्रहण और जीएसटी विधेयक इस सत्र में पारित हो जाते तो निश्चित रूप से देश में विकास की गति तेज होती। देश का हित इन बिलों को लटकाए रखने में नहीं, बल्कि किसी समाधान पर पहुंचने में है। यह चर्चा से ही संभव हो सकता है। संसद का कामकाज ठप्प करने से नहीं।

ऐसे में संसद को पंगु करने की कांग्रेस की मंशा को जनता विकास विरोधी ही मानेगी। इस बारे में दो राय नहीं हो सकती कि संसद को शांतिपूर्ण तरीके से चलाना, विधायी कार्य निपटाना सरकार की जिम्मेदारी होती है। लेकिन, इसमें विपक्ष को भी सहयोग करना चाहिए। संसद रूपी गाड़ी सरकार और विपक्ष रूपी दो पहियों पर ही चल पाती है। यदि विपक्ष असहयोग का रूख अपनाता है तो देश और जनता का नुकसान ही करता है। अभी यह नुकसान कांग्रेस कर रही है। बेशक भ्रष्टाचार पर अंकुश जरूरी है लेकिन, विधायी कार्य भी उतने ही जरूरी हैं। उनकी अनदेखी करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।


मानसून सत्र-क्या यह भारत का नुकसान है?


संसद का तयशुदा मानसून सत्र 13 अगस्त को संपन्न हो गया। राजनीतिक रूप से यह सत्र काफी शिक्षा प्रदान करने वाला लेकिन निराशा भरा था। संसद भारतीय लोकतंत्र का सबसे अच्छा प्रतिनिधित्वकर्ता है पर बिना किसी मुद्दे के ‘संसदीय कार्यवाही का बाधित होना’ संसदीय व्यवस्था में भेद्यता को रेखांकित करता है।

जीएसटी के महत्व को अतिरंजित नहीं होना चाहिए। यह पूरे देश को एक आर्थिक बाजार में बदलता है। यह माल और सेवाओं की सहज और निर्बाध रूप से आवाजाही की सुविधा प्रदान करता है। यह परेशानी और भ्रष्टाचार को कम करता है। यह एक समान्य कर व्यवस्था को प्रतिपादित करता है तथा ‘कर के ऊपर कर’ की अवधारणा को समाप्त करता है। इससे कर राजस्व में उछाल आता है और सकल घरेलू उत्पाद पर एक अनुकूल प्रभाव पड़ता है। जीएसटी को देश की मुख्यधारा की अधिकतम राजनीतिक पार्टियों का लगातार समर्थन प्राप्त हुआ है। कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार ने 2006 में जीएसटी की अवधारणा की घोषणा की थी और इस विधेयक को 2011 में पेश किया गया था। आज जीएसटी पर कांग्रेस अपने कदम वापस खींच रही है। कांग्रेस पार्टी की असहमति-टिप्पणी की आपत्तियां विरोधाभासी और तुच्छ हैं। इस मुद्दे पर संसद का बहुमत कांग्रेस के खिलाफ है। इसलिए इसका पारित होना राज्यसभा द्वारा इस पर मीमांसा को केवल रोकने के उद्देश्य से बिना किसी कारण इख्तियार किए गए अशांति और वाकयुद्ध पर निर्भर करता है। कांग्रेस इस बात से स्पष्ट रूप से अवगत है कि संविधान संशोधन के पारित होने में किसी भी तरह की देरी इस विधेयक को कम-से-कम एक वर्ष के लिए विलम्बित कर देगी जिसको अधिकतम राज्यों द्वारा स्वीकार कर लिया गया है। इससे कांग्रेस की रणनीति स्पष्ट हो जाती है। उनकी प्राथमिकता सूची में राष्ट्रीय हित सबसे नीचे है।

कांग्रेस पार्टी ने यह प्रदर्शित किया है कि लगातार ये सारी चीजें एक परिवार की गुलाम बनकर रह गई हैं। यह राष्ट्रीय हित और नीतिगत मुद्दों पर भी समझौते के लिए तैयार नहीं है क्योंकि कांग्रेस अब तक 2014 में मिली अपनी अप्रत्याशित चुनावी हार को पचा नहीं पाई है। इस सत्र में भारत को हुए नुकसान से कांग्रेस पार्टी का लाभ कतई नहीं हो सकता। इनके ‘बिना किसी कारण के संसद में व्यवधान’ की नीति के खिलाफ जनमत में लोकप्रिय अस्वीकृति है। लोकसभा में आखिरी दिन की बहस कांग्रेस पार्टी के तर्क के खोखलेपन को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित कर देता है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस सत्र में सदन में निम्नतम मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत किया। देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब मुख्यधारा की एक पार्टी के सर्वोच्च नेता ने सदन के वेल में आकर हंगामें का नेतृत्व किया हो। उन्होंने तो अपने कद और गरिमा का भी खयाल नहीं रखा। जहां तक राहुल गांधी का सवाल है, तो इस बात की कोई गंभीर उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह बहस के स्तर को उठा पाएंगे। वह नारेबाजी और एक संसदीय भाषण के बीच के अंतर को पहचान पाने में नाकाम रहे हैं। जिस तेजी से वह आगे बढ़ रहे हैं, उसी तरह से वह और अधिक अपरिपक्व होते जा रहे हैं। आक्रामक शारीरिक भाषा तर्कसंगत निष्कर्ष का विकल्प कदापि नहीं हो सकती। यह राजग सरकार है जिसने अवैध विदेशी सम्पत्तियों के खिलाफ कड़े कानून बनाये। यह राजग सरकार है जो वत्र्तमान विवाद के केंद्र में रहे आरोपी अपराधी को सजा दिलाने के लिए प्रभावी कदम उठा रही है।

यह सत्र आम लोगों की इस राय पर प्रकाश डालता है और बताता है कि किस तरह कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक हताशा के द्वारा भारत के आर्थिक हितों का फिरौती के लिए अपहरण कर लिया गया है। भारतवर्ष इस पर एक साथ खड़ा है हालांकि थोड़ा निराश है। इस हताशा से उभरता विरोध देश को इस चुनौती का सामना करने के लिए बल प्रदान करेगा।

अरुण जेटल

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