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”कर्मण्येवाधिकारस्ते”

”कर्मण्येवाधिकारस्ते”

कांग्रेस का शुरू में आक्रामक होना समझ में नहीं आया, लेकिन संसद के मानसून सत्र के अंतिम सोपान में कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान संभाल लेने के बाद सारा भेद खुलता नजर आ रहा है। दरअसल, सोनिया और सुषमा के बीच अदावत पुरानी है। सुषमा ने 2009 में सोनिया को पीएम न बनने देने के लिए एक बड़ा संकल्प ले लिया था। उन्होंने ये कह दिया था कि ऐसा हो गया तो, वह बड़ा आंदोलन छेड़ देंगी।

मोदी सरकार भ्रष्ट है, यह हम नहीं कांग्रेस कह रही है। सरकार इसलिए भ्रष्ट है क्योंकि भ्रष्टाचारी सुषमा स्वराज को बचा रही है, वसुंधरा और शिवराज का इस्तीफा नहीं ले रही है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का दोष सिर्फ इतना है कि उन्होंने आईपीएल के पूर्व कमिश्नर और पं जवाहर लाल नेहरू के समय से सत्ता के करीब रहे उद्योगपति गूजरमल मोदी के बेटे ललित मोदी की कैंसर से पीडि़त पत्नी के इलाज के लिए उन्हें राजनयिक वीजा दिए जाने की सिफारिश कर दी और कांग्रेस नेता, पूर्व केन्द्रीय राज्यमंत्री कोयला घोटाले के आरोपी संतोष बगरोडिया के लिए ऐसा करने से मना कर दिया। इसलिए कांग्रेस अपनी कमीज सफेद बताकर मोदी सरकार को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेर रही है। संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही में बाधा डाल रही है।

कांग्रेस का शुरू में आक्रमक होना समझ में नहीं आया, लेकिन संसद के मानसून सत्र के अंतिम सोपान में कांग्रेस अध्यक्षा के कमान संभाल लेने के बाद सारा भेद खुलता नजर आ रहा है। दरअसल, सोनिया और सुषमा के बीच अदावत पुरानी है। सुषमा ने 2009 में सोनिया को पीएम न बनने देने के लिए एक बड़ा संकल्प ले लिया था। उन्होंने ये कह दिया था कि ऐसा हो गया तो वह बड़ा आंदोलन छेड़ देंगी। सुषमा बाल मुंडवा लेंगी, जमीन पर सोएंगी आदि-आदि। खैर सोनिया पीएम नहीं बनीं, मनमोहन सिंह बन गए। लेकिन, कुछ साल तक लोकसभा से लेकर, प्रमुख समारोह में दोनों नेताओं की कभी नजर नहीं मिली। अभी ज्यादा नहीं कोई सवा साल पहले गांधी परिवार के करीबी दिग्विजय सिंह, सुषमा को बेहतर पीएम उम्मीदवार बता रहे थे और अब अचानक सुषमा इतनी खराब हो गईं कि उनके इस्तीफे पर पूरा जोर लगाकर कांग्रेस अध्यक्षा संसद में बाधा डलवा रही हैं।

अभी कुछ दिन पहले कांग्रेस अध्यक्षा अपने नेताओं को संबोधित कर रहीं थीं। वह बता रहीं थीं कि लोकसभा चुनाव और उसके बाद राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार से कोमा में गई पार्टी, अब कोमा से बाहर निकल चुकी है। कांग्रेस अध्यक्षा का मकसद पार्टी नेताओं को एकजुट करके राजनीतिक अभियान को धार देना था। लेकिन दुविधा यह है कि पिछले 13 महीने के केन्द्र सरकार के शासन में कांग्रेस को एक ‘लाल पाई’ का भ्रष्टाचार नहीं मिला। प्रधानमंत्री मोदी पहले ही कह चुके हैं कि ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ लिहाजा कांग्रेस अध्यक्षा, उपाध्यक्ष राहुल गांधी और पूरी पार्टी इसी का हवाला देकर भ्रष्टाचार की लकीर पीट रही है। देश में विकास के ठप्प होने का मुद्दा उठा रही है और संसदीय कामकाज में दीवार बनकर खड़ी है।

दरअसल इसके पीछे केन्द्र सरकार को कामकाज न करने देने का कांग्रेस का एजेंडा काम कर रहा है। विपक्ष को पता है कि संसदीय लोकतंत्र में पारित प्रावधान से देश की सरकार कामकाज करती है। विकास के कार्य होते हैं। लोगों को रोजगार मिलता है, अर्थव्यवस्था को विस्तार मिलता है। ऐसा हुआ तो मोदी सरकार का जनता में इकबाल मजबूत होगा। इसलिए सुनियोजित षडय़ंत्र के तहत संसदीय कामकाज ठप्प करने की कोशिश जारी है।

संसदीय कार्यमंत्री वेंकैया नायडू, केन्द्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली समेत पूरा सत्ता पक्ष किसी भी मुद्दे पर बहस ,चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन कांग्रेस को चर्चा मंजूर नहीं है। वह पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भ्रष्ट बताकर उनका इस्तीफा चाहती है। जिनके अब तक के राजनीतिक जीवन पर कोई दाग नहीं है।

अभी यूपीए सरकार को सत्ता से हटे महज 14 महीने हुए हैं। केन्द्र के दस साल के शासन में आजादी के बाद से अब तक एक के बाद एक कई बड़े घोटाले हुए। ‘टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाले से दूरसंचार विभाग की अब तक कमर सीधी नहीं हो पाई है। पूरे 1.86 लाख करोड़ का घोटाला। इसमें संलिप्तता के चलते तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए.राजा, कनीमोई और कितने लोगों को जेल जाना पड़ा। कोयला खदानों का घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल में लूट, आदर्श सोसाइटी घोटाला तत्कालीन रेल मंत्री पवन बंसल के भांजे द्वारा अफसरों की तैनाती की हेरा-फेरी, पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार पर सीबीआई के दस्तावेजों से छेड़छाड़ और इसके चलते इस्तीफा। हिमाचल के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की सरकार पर एक के बाद एक भ्रष्टाचार के आरोप, दिल्ली सरकार पर राष्ट्रमंडल खेल घोटाले में संलिप्तता के आरोप, सुरेश कलमाड़ी एंड कंपनी का खेल और इन सबको भूलकर कांग्रेस अब भ्रष्टाचार की बात कर रही है। विपक्ष को रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी द्वारा किया गया कारनामा भी अब याद नहीं है।

कांग्रेस नेता सुषमा के अलावा वसुंधरा राजे सिंधिया और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर भी आरोपों की झड़ी लगा रहे हैं। जबकि राजस्थान में कांग्रेस कोई ठोस प्रमाण नहीं दे पा रही है। पार्टी की नारेबाजी के सिवा कुछ नहीं है। मध्य प्रदेश में विपक्ष ‘व्यापम घोटाले’ को लेकर राज्य सरकार को घेर रही है, लेकिन कांग्रेस के दिग्गज नेता, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्य के राज्यपाल रामनरेश यादव का नाम आते ही दस जनपथ चुप नजर आता है। जबकि वस्तुस्थिति यह है कि उच्च न्यायालय के आदेश पर ‘एसआईटी’ मामले की जांच कर रही थी। तमाम अधिकारी, नेता, मंत्री इसके आरोप में जेल में हैं। शिवराज सरकार ने जांच की निष्पक्षता बनाये रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यहां तक कि राज्य सरकार ने सीबीआई से भी जांच का अनुरोध कर दिया और पूरे मामले की जांच अब केन्द्रीय जांच एजेंसी कर रही है, लेकिन कांग्रेस अपनी जिद पर अडिग है।

दिलचस्प है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार के मुद्दे पर केन्द्र को घेर रही है, लेकिन उसके साथ विपक्ष भी एक जुट नहीं है। सुषमा के इस्तीफे के सवाल पर समाजवादी पार्टी अलग हो जाती है। बसपा सुप्रीमों मायावती के सुर बदल जाते हैं। मध्यप्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों के इस्तीफे पर भी विपक्ष में एक राय नहीं है और हो भी नहीं सकती, क्योंकि समाजवादी पार्टी की मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकार खुद बड़े घोटालों में घिरी है। कानून-व्यवस्था की स्थिति भी राज्य में दयनीय है। बसपा की सरकार ने भी सभी रिकॉर्ड तोड़ रखे थे। दोनों ही दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों पर पहले से ही आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मुकदमा चल रहा है। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन घोटाले से लेकर बसपा सरकार के आधा दर्जन मंत्रियों पर लगे आरोप, जांच और जेल जाने की घटना अभी लोग भूले नहीं हैं, वहीं नोएडा, ग्रेटर नोएडा, यमुना एक्सप्रेस-वे प्राधिकरणों के मुख्य अभियंता यादव सिंह के रहस्य से पर्दा उठना अभी बाकी है। उत्तर प्रदेश सरकार यादव सिंह को बचाने, घोटालों पर पर्दा डालने की हर जोर अजमाइश कर रही है। ऐसे में काजल की कोठरी से निकलकर दूसरे की आंखों में लगे सूरमे की खुद से बराबरी आखिर कैसे हो सकती है? यह तो वही बात हुई कि नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।

एक बात और कांग्रेस को गौर करनी चाहिए। मोदी सरकार ने टू-जी स्पेक्ट्रम और लाइसेंस आवंटन की नीलामी कराई है। कोयला खदानों की नीलामी हुई है। लाखों- करोड़ों में हुई है और कोई आरोप नहीं है। सब कुछ साफ-सुथरी प्रक्रिया से हुआ। 13 महीने की केन्द्र सरकार पर कदाचार का कोई भी आरोप नहीं लगा है। विपक्ष के पास ढेला भर का उदाहरण नहीं है। इसके बावजूद देश की आम जनता को गुमराह करने का प्रयास चल रहा है। मोदी सरकार को सांप्रदायिक बताने के फेर में 1993 में मुंबई बम धमाकों के आरोपी याकूब मेमन को फांसी का विरोध करके कांग्रेस के नेता नई मिसाल गढ़ रहे हैं।

रंजना

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