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सियासी स्वार्थ पर कुर्बान देशहित

सियासी स्वार्थ पर कुर्बान देशहित

विशेषज्ञों ने मीडिया के हर उपलब्ध फोरम पर बताया कि संसद की एक दिन की कार्यवाही पर देश के करदाताओं का कितना पैसा खर्च होता है। लेकिन, सोनिया गांधी की अध्यक्षता और उनके बेटे राहुल गांधी की उपाध्यक्षता में चल रही कांग्रेस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। उनके सांसद दोनों सदनों में तख्तियां लहराते रहे, राज्यसभा के सभापति, खासकर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, तथा जवाब देने के लिए खड़े हुए मंत्री अपने-अपनें चेहरों को विपक्ष के कागजी प्रहार से बचाते रहे, सदन के बीचो-बीच आकर नारेबाजी करते रहे, सदन के कागजों-पत्रों के टुकड़े कर उछालते रहे और इस तरह दोनों सदनों का कामकाज ठप्प किए रहे।

विडंबना ही है कि संसद का मानसून सत्र, विपक्ष खासकर कांग्रेस सांसदों की हुल्लड़बाजी से धुल गया। काम ढेले भर का भी नहीं हुआ। यह हालत तब है जबकि, लोकसभा में एनडीए का बहुमत है, हालांकि राज्यसभा में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए का यह सत्र कितना अहम था, यह इसी बात से स्पष्ट है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग 1 प्रतिशत का इजाफा करने में सक्षम वस्तु और सॢवस टैक्स विधेयक (जीएसटी) तथा भूमि अधिग्रहण विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विधेयक लटके हुए हैं जिनसे, देश में विकास की रफ्तार तेज हो सकती है।

कांग्रेस के अडिय़लपन ने राज्यसभा में जिन 10 विधेयकों को पारित होने से रोका उनमें भ्रष्टाचार निरोधक संशोधन कानून, व्हिसल-ब्लोअर (भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले कार्यकर्ताओं)को संरक्षण देने वाला कानून, रीयल एस्टेट के नियमन का विधेयक, मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल से जुड़ा कानून, बाल न्याय (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) कानून में संशोधन का विधेयक, बिजली नियमन कानून, अनुसूचित जातियों-जनजातियों पर ज्यादती रोकने से संबंधित कानून, दिल्ली हाईकोर्ट (संशोधन) विधेयक और निरर्थक कानून खत्म करने वाला विधेयक शामिल है। इनमें से कुछ को लोकसभा पहले ही पारित कर चुकी है। इनके अलावा जीएसटी और जमीन का उचित मुआवजा तथा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और जमीन के पूर्व मालिकों को फिर से बसाने में पारदर्शिता वाला विधेयक, जिसे आमतौर पर भूमि अधिग्रहण कानून कहा गया, संसद की चयन समिति में लंबित थे। जिन्हें संबंधित समितियों ने अपने संशोधनों के साथ सदन में भेज दिया। एनडीए सरकार ने मानसून सत्र में 7 नए विधेयक भी रखे जिनमें चार—ग्राहकों के अधिकारों से जुड़े कानून समेत—आॢथक विधेयक हैं और बाकी पंचायतों तथा स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं को आरक्षण देने, सड़क, सुरक्षा तथा डीएनए की प्रोफाइलिंग से संबंधित विधेयक थे।

इनमें से जीएसटी का विधेयक तो यूपीए के शासनकाल का ही है, एनडीए सरकार ने उसे सभी राज्यों की सरकारों के लिए अधिक लाभप्रद बनाया। यूपीए सरकार के 2013 के जमीन अधिग्रहण कानून में भी एनडीए सरकार ने जो 11 संशोधन प्रस्तावित किए उनमें से 7 को संसदीय समिति ने हटा दिया। केंद्र सरकार तो इस बात के लिए भी तैयार हो गई कि राज्य सरकारें अपनी जरूरत के हिसाब से भूमि अधिग्रहण के लिए जिस तरह चाहें कानून बना लें। कांग्रेस समेत विपक्ष और देश के कई किसान संगठनों की मांग के मद्देनजर सरकार ने इसे अपनी नाक का सवाल नहीं बनाया। जाहिर है, प्रधानमंत्री मोदी ‘सबका साथ, सबका विकास’ के अपने लक्ष्य को महज एक और नारे के तौर पर नहीं लेते। लेकिन, संसद में कुछ नहीं हो सका। विशेषज्ञों ने मीडिया के हर उपलब्ध फोरम पर बताया कि संसद की एक दिन की कार्यवाही पर देश के करदाताओं का कितना पैसा खर्च हो जाता है। लेकिन, सोनिया गांधी की अध्यक्षता और उनके बेटे राहुल गांधी की उपाध्यक्षता में चल रही कांग्रेस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। उनके सांसद सदनों में तख्तियां लहराते रहे, राज्यसभा के सभापति खासकर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, तथा जवाब देने के लिए खड़े हुए मंत्री अपने-अपने चेहरों को विपक्ष के कागजी प्रहार से बचाते रहे, सदन के बीचो-बीच आकर नारेबाजी करते रहे, सदन के कागजों-पत्रों को टुकड़े कर उछालते रहे। इस तरह विपक्ष ने संसद के दोनों सदनों का कामकाज ठप्प किए रखा। इसके बाद सदन के बाहर आकर सोनिया-राहुल के नेतृत्व में नारेबाजी में लगे रहे, नौबत यहां तक आ गई कि लोकसभा अध्यक्ष को 25 कांग्रेस सांसदों को पांच दिनों के लिए निलंबित करना पड़ा। सोनिया गांधी ने इस कार्यवाही को ”लोकतंत्र का काला दिन” करार तो दिया लेकिन, यह भूल गईं कि उनके रिमोट कंट्रोल से डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में 10 साल चली यूपीए सरकार के कार्यकाल में अप्रैल 2012 से फरवरी 2014 के दौरान कुल 47 सांसदों, जिनमें तेलगांना के सवाल पर कांग्रेस आलाकमान से अलग राय रखने वाले कांग्रेस सांसद भी थे, उन सांसदों को 4 से 5 दिन के लिए निलंबित किया गया था। मार्च 1989 में उनके पति दिवंगत राजीव गांधी की सरकार में विपक्ष के 63 सांसदों को सदन से निलंबित कर दिया गया था। संसदीय इतिहास में वह अब तक का सबसे बड़ा निलंबन है।

लोकसभा में कभी-कभार बोलने वालीं और अपने निर्वाचन क्षेत्र की समस्याएं कभी न उठाने वाली सोनिया और अनजान जगहों पर लंबी तथा गोपनीय ढंग से छुट्टिïयां मनाकर ‘देश की आवाज सुनने’ के लिए भारत लौटे उनके पुत्र का एनडीए सरकार के साथ खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर इतने शत्रुतापूर्ण रवैया क्यों हैं, कि वे दोनों देश के विकास की भी परवाह करने को तैयार नहीं हैं? छुट्टिïयों से लौटकर कांग्रेस उपाध्यक्ष ने देश भर में घूम-घूमकर प्रधानमंत्री मोदी और एनडीए सरकार की आलोचना में जितने झूठे बयान दिए, उस स्तर पर तो असभ्य और अनर्गल बयान देने के लिए परिचित कुछ क्षेत्रीय नेता भी कभी नहीं उतरे। शताब्दी भर से अधिक उम्र वाली पार्टी के नेतृत्व का यह स्तर आज की राजनीति को किस ओर ले जाएगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

देेखें कि मोदी सरकार से मां-बेटे की सियासी तकलीफ क्या है? संसद में कांग्रेस के नितांत असंसदीय विरोध का प्रत्यक्ष कारण था, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का पिछले तीन वर्षों से ब्रिटेन में प्रवास कर रहे टी-20 क्रिकेट के पूर्व शहंशाह, विवादास्पद ललित मोदी की कथित मदद करना और सरकारी नौकरियों तथा मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए परीक्षाएं कराने वाले बदनाम और व्यापम घोटाले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कथित तौर पर शामिल होना। स्वराज ने संसद में दिए बयान में स्पष्ट तौर पर कहा कि उन्होंने ललित मोदी को यात्रा के दस्तावेज देने की कोई सिफारिश ब्रिटिश सरकार से कभी नहीं की। हां, उन्होंने उनकी कैंसर पीडि़त पत्नी, जो कि भारतीय नागरिक हैं उनके इलाज के लिए मदद जरूर की। स्वराज ने इससे काफी दिन पहले ट्विटर पर भी निजी हैसियत से ललित मोदी की मदद करने की बात लिखी थी। इतना ही नहीं स्वराज के पति ने जो कि सीनियर एडवोकेट हैं, काफी दिन पहले सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट कर दिया था कि उनकी लॉ-फर्म ललित मोदी की कंपनी की वकील रही है। स्वराज की बेटी भी कुछ समय उस कंपनी की वकील रहीं। इस मामले में यही ठोस तथ्य थे। कांग्रेस और मीडिया में सोनिया-राहुल की कदमबोसी करने वाला एक वर्ग इसके अलावा जो कुछ कहता-दिखाता रहा, वह सब साइड शो के अलावा कुछ नहीं था। कांग्रेस स्वराज और उनके परिवार पर बिना सिर-पैर के आरोपों के अलावा संसद में कोई ठोस सबूत इस मामले में पेश नहीं कर पाई। ठोस सबूत नहीं थे, इसलिए सत्ता पक्ष की बहस कराने की चुनौती भी स्वीकार करने की हिम्मत पार्टी नहीं जुटा पाई। राहुल ने इसे भ्रष्टाचार और चोरी तक न जाने क्या-क्या कह डाला। सरकार ने जब भ्रष्टाचार पर बहस कराने की तैयारी दिखाई तो कांग्रेस यूपीए काल के भारी-भरकम भ्रष्टाचार के मामलों के जख्म फिर हरे होने के अंदेशे से सहम गई और जब तर्क न हो तो तब तक बहस से बचना ही ठीक है।

यही हर्ष राजे पर आरोपों का हुआ। राजे ने ललित मोदी परिवार से अपने पारिवारिक रिश्ते पहले भी कभी नहीं छुपाए, उन पर आरोपों का आधार ललित मोदी द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों के सामने इस्तेमाल किया उनका वह रेफरेंस था जो उस जमाने का था जब, राजे मुख्यमंत्री नहीं बल्कि, विपक्ष की नेता थीं। इस मामले को कांग्रेस ने जब राजे के धौलपुर महल के एक पुराने मामले से जोड़ दिया तो उसे मुंह की खानी पड़ी। महल वाले मामले में कांग्रेस नेताओं के आरोपों की कलई दो दिन में ही खुल गई और राजे उन पर हमलावर हो गईं। संसद में राजे के खिलाफ भी कांग्रेस कोई ठोस आरोप या तथ्य पेश नहीं कर पाई। यही हाल शिवराज चौहान के विरूद्ध आरोपों का था। व्यापम मामले की जांच का पहला आदेश चौहान ने ही दिया। जांच पर निगरानी के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की निगरानी का प्रस्ताव भी उनकी सरकार ने ही दिया। यहां तक कि अंत में पूरी जांच सीबीआइ को सौंपने की कांग्रेस, कुछ विपक्षी दलों और मीडिया से उठी मांग पर भी सबसे पहले चौहान की सरकार ने कार्रवाई की। उन पर बिना सिर-पैर के आरोप लगाने वाली मध्य प्रदेश कांग्रेस और उसके नेता, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, चौहान के विरूद्ध ठोस सबूत पेश करने के चक्कर में झूठी सीडी प्रसारित करने के मामले में फंस गए, हाइकोर्ट ने भी जांच के बाद मूल सीडी में छेड़छाड़ करना सही पाया। चौहान के विरूद्ध प्रदेश कांग्रेस के दुष्प्रचार को प्रदेश की जनता ने हाल में हुए उपचुनावों में भाजपा उम्मीदवारों को भारी वोटों से जिताकर नकार दिया। ऐसे में बौखलाई कांग्रेस ने स्वराज, राजे के मामले के साथ चौहान को भी लपेट लेने में राजनैतिक समझदारी दिखाई। व्यापम की जांच-पड़ताल में मध्य प्रदेश गए दिल्ली के एक बड़े न्यूज चैनल के पत्रकार की संदेहास्पद मौत के बाद मीडिया में व्यापम को लेकर मची कवरेज की मारामारी से शायद कांग्रेस ने मान लिया, कि इससे मोदी सरकार दबाव में आ जाएगी और चौहान की छुट्टी कर दी जाएगी जो राज्य में अपनी ईमानदारी, साफगोई और आम लोगों से करीबी संबंधों के बूते कांग्रेस के ताबूत में एक तरह से कील ठोक रहे हैं। लेकिन, कांग्रेस का दांव उल्टा पड़ा। मोदी सरकार ने जब देखा कि सोनिया-राहुल के पास तीनों नेताओं के विरूद्ध नारेबाजी के अलावा कोई ठोस तथ्य नहीं है तो उसने, अपना रुख कड़ा कर लिया। 25 कांग्रेस सांसदों के निलंबन ने लगभग समूचे विपक्ष को कुछ समय के लिए कांग्रेस के पाले में खड़ा जरूर कर दिया, लेकिन इसकी असली वजह जद (यू) जैसे दलों के बिहार विधानसभा के चुनाव में लगे ऊंचे सियासी दांव अधिक रहे। सपा जैसे दलों, जिनका बिहार चुनाव में कुछ अधिक दांव नहीं, स्वराज का समर्थन किया। बिहार चुनाव निबटने के बाद दूसरे राज्यस्तरीय विपक्षी दल कांग्रेस के साथ शायद ही खड़े नजर आएं।

सुषमा स्वराज को लेकर सोनिया-राहुल ने जैसी कटुता का प्रदर्शन किया, उसकी वजह विश्लेषक ललित मोदी द्वारा ट्विटर समेत तमाम सोशल नेटवॄकग साइटों पर सोनिया गांधी परिवार और कांग्रेस के विरूद्ध किए अनगिनत तीखे और तथ्यपूर्ण आरोपों को मानते हैं। ललित मोदी ने सबूत रख दिए कि किस तरह कांग्रेस समेत तमाम पार्टीयों के नेता उनकी मेजबानी लेते हैं और उनकी मदद करते हैं। इसके अलावा नरेन्द्र मोदी ने अपने करिश्मे और अपील के बूते 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस के लोकसभा सांसदों की संख्या 44 पर समेट दी, वह भी कांग्रेस अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के नेतृत्व के लिए अपमानजनक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी कराने वाला तथ्य साबित हुआ है। फिर सत्ता जाने के साथ ही उसके साथ मिलने वाले विशेषाधिकार भी खत्म हो गए। कांग्रेस के अंग्रेजी अखबार ‘नेशनल हेराल्ड’ की जमीन और भवनों की अरबों रूपयों की मिल्कियत के अदालती मामले में सोनिया गांधी और कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं के उलझने को भी मोदी सरकार के प्रति सोनिया-राहुल के घृणा की एक हद तक गुस्से का कारण कहा जाता है। जब व्यक्तिगत, पारिवारिक और राजनैतिक साख ही संकट में पड़ जाए तो देश और उसका हित किसे याद रहता है?

लेकिन संसद की कार्यवाही लगातार न चलने देने की देश में कोई अच्छी प्रतिक्रिया नहीं हुई। तमाम न्यूज चैनलों के रोजाना किए गए सर्वे में 98 प्रतिशत तक उत्तरदाताओं ने कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों के दुराग्रही रवैए को नापसंद किया। पता नहीं, कांग्रेस के रणनीतिकारों के ध्यान में यह बात आएगी भी या नहीं, या पार्टी अपने युवा नेता की मनमर्जी पर चलती रहेगी?

                (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

जगदीश उपासने

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