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राजस्थान में विकास के पंख और 56 इंच का सीना

राजस्थान में विकास के पंख और 56 इंच का सीना

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बिहार विधानसभा के प्रस्तावित चुनाव के मद्देनजर अपनी पहली चुनावी रैली में संसद के मानसून सत्र के बाद 50 हजार करोड़ रूपये से भी अधिक का विशेष पैकेज देने की घोषणा कर के राजस्थान के मतदाताओं की दुखती रग दबा दी है। तीस साल के अंतराल के बाद केन्द्र में अपने बलबूते सत्तारूढ़ हुई भारतीय जनता पार्टी ने केन्द्र और प्रदेश में एक ही दल की सरकार होने से विकास में तेजी लाने के अपने नारे पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।

भाजपा की तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष वसुंधरा राजे की अगुवाई में सुराज संकल्प यात्रा को मिले प्रदेशव्यापी समर्थन की बदौलत भाजपा को 200 सदस्यीय राज्य विधानसभा में 163 सीटों का ऐतिहासिक कीर्तिमान बहुमत हासिल हुआ था। लोकसभा चुनाव में तो मतदाताओं ने सभी 25 सीटें भाजपा की झोली में ही डाल दीं और कांग्रेस को अपना खाता खोलने का मौका तक नहीं दिया। चुनावों की इसी श्रृंखला में स्थानीय निकाय चुनावों के प्रथम चरण में भी भाजपा को पिछली बार की तुलना में व्यापक बहुमत मिला। पांच नगर निगमों में भाजपा का परचम फहराया और भरतपुर में भी भाजपा के समर्थन से महापौर चुने गये। पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव में भी भाजपा को बढ़त मिली और अब 31 जिलों के 129 निकायों के चुनाव में भी सत्तारूढ़ भाजपा बहुमत के प्रति आशान्वित है। यह बात जुदा है कि लोकसभा चुनाव के मुकाबले पंचायत चुनाव में भाजपा को मिले मत प्रतिशत में कमी आयी और कांग्रेस के वोटों में वृद्धि हुई।

भाजपा के नारे के अनुरूप प्रदेश में तथा केन्द्र में पार्टी के सत्तारूढ़ होने से भौगोलिक दृष्टि से देश के सबसे बड़े और थार मरूस्थल भू-भाग को समेटे राजस्थान की जनता में यह विश्वास जगा था कि अब उसके लिए ”अच्छे दिन आएंगे”, तथा कभी बीमारू प्रदेश गिना जाने वाला यह राज्य तेजी से विकास की दौड़ में अग्रणी बनेगा। लेकिन, साल-दर-साल बीतने की इस घड़ी में सिवाए निराशा के उसके हाथ कुछ नहीं लगा। केन्द्र और राज्य के आपसी संबंधों तथा कामकाज की समीक्षा से यही दृश्य बन रहा है कि राज्य की भाजपा सरकार द्वारा विभिन्न क्षेत्रों के लिए प्रेषित विकास संबंधी प्रस्तावों का केन्द्र स्तर पर चीरहरण हो रहा है। एक-एक कर ये प्रस्ताव या तो ठंडें बस्ते के हवाले किए जा रहे हैं या उन्हें खारिज किया जा रहा है। चाहे पानी का मसला हो या सड़क, बिजली सहित अन्य विकास योजनाओं के लिए संसाधन जुटाने में कोताही बरती जा रही है।

29-08-2015

भारत के कुल क्षेत्रफल 32 लाख 68 हजार 90 वर्ग किलोमीटर में से राजस्थान का क्षेत्रफल 3 लाख 42 हजार 239 वर्गमीटर है। यानी क्षेत्रफल के हिसाब से देश का दसवां भाग राजस्थान का है। हिमालय से भी प्राचीन अरावली पर्वत श्रृंखला की बदौलत राजस्थान प्राकृतिक रूप से दो भागों अर्थात उत्तर- पश्चिमी और दक्षिण-पूर्वी भागों में बंटा हुआ है। शुष्क जलवायु तथा वर्षा की अनिश्चित्ता तथा साल-दर-साल सूखे एवं अकाल की विभीषिका के चलते प्रदेश में उपलब्ध जल की मात्रा महज एक प्रतिशत से कुछ अधिक है। इसके बावजूद राजस्थान की पेयजल समस्या के स्थायी समाधान के लिए विशेष पैकेज या विशिष्ट श्रेणी के अनुरूप केन्द्रीय वित्तीय सहायता की मांग को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया। आजादी के 68 साल बीतने पर भी प्रदेशवासियों के लिए शुद्ध पेयजल अभी भी महज सपना है।

थार मरूस्थल तथा जनजातीय बहुल इलाकों में दूरदराज के गांवों तक आवागमन के लिये सड़कों का अभाव अभी भी अभिशाप बना हुआ है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार ने लगभग 1700 करोड़ रूपये की अतिरिक्त मांग केन्द्र को प्रेषित की थी। लेकिन, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने राजस्थान सहित अन्य प्रदेशों की इससे संबंधित मांगों को वित्त मंत्रालय को भेज दिया है, जहां फाइलों का अटकना तो आम बात मानी जाती है। दरअसल सड़कों की लंबाई तथा उसके अनुपात में व्यय राशि बढ़ जाने से प्रदेशों से बजट आवंटन की मांग की गई है। राजस्थान में 4102 कि.मी. लंबाई में कुल 1406 ग्रामीण सड़कों का निर्माण प्रस्तावित था, जिसके लिए ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 1108 करोड़ रूपये का बजट आवंटित किया था। किन्तु, लागत में वृद्धि के मद्देनजर ठेकेदारों ने बढ़ी हुई दरों से भुगतान की मांग पर कोई

आश्वासन नहीं मिलने पर सड़क निर्माण कार्य ठप्प कर दिया है।

केन्द्र सरकार के इस रवैये पर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। दोनों जगह भाजपा के सत्तारूढ़ होने से विधायक, सांसद और मंत्रीगण चुप्पी साधने को मजबूर हैं। वहीं विपक्षी दल कांग्रेस का इस मामले पर मौन खटकता है। अगर केन्द्र में दूसरे दल की सरकार होती तो प्रदेश में सत्तारूढ़ अन्य राजनीतिक दल हाय-तौबा मचा देते। पश्चिम बंगाल का उदाहरण हमारे सामने है जहां तृणमूल सरकार अपनी विकास योजनाओं के लिये केन्द्र सरकार पर हर तरह से दबाव बनाकर हर बार किसी तरह अपना मकसद पूरा करने में कामयाब हो जाती है। बिहार सरकार ने अपने प्रांत को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग को बराबर बुलंद किए रखा है। राजस्थान में भी पूर्ववर्ती कांग्रेस की गहलोत सरकार द्वारा केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के समक्ष राजस्थान को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को प्रमुखता नहीं मिली साथ ही पेयजल के मामले में भी विशेष पैकेज की मांग दरकिनार कर दी गई। इन परिस्थितियों में विकास के लिए केन्द्र व राज्य में एक ही दल की सरकार होने का नारा या फतवा हवा-हवाई हो गया है।

यही हालात अब भी सामने है जब केन्द्र और राजस्थान में भाजपा सत्ता में है, लेकिन विकास योजनाओं के लिए संसाधन उपलब्ध कराने में कैंची की धार तेज हो रही है। यदि भाजपा इस नारे को हकीकत में बदलने की ईच्छा रखती तो पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की महत्वाकांक्षी योजना बाड़मेर जिले में तेल रिफाइनरी की स्थापना को लेकर बेहतर तरीके से पहल कर सकती थी। विधानसभा चुनाव में तेल रिफाइनरी की स्थापना अहम चुनावी मुद्दा था। भाजपा नेता वसुंधरा राजे रिफाइनरी के लिए केन्द्र सरकार के सार्वजनिक प्रतिष्ठान एच.पी.सी.एल के साथ हुए समझौते को राज्य हितों के विपरीत बताती रहीं। उनका यह तथ्य तर्कसंगत माना जा सकता है कि तेल हमारा, जमीन हमारी और पैसा भी हमारा तो केन्द्र सरकार का रिफाइनरी लगाने में क्या योगदान है? जबकि, तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में पंजाब में भटिण्डा रिफाइनरी केन्द्र की सहायता से लगाई गई थी। भाजपा की इस मांग को वर्तमान नरेन्द्र मोदी सरकार हकीकत में बदलने की पहल कर सकती थी और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लगातार जवाबी हमलों का मुंहतोड़ जवाब दे सकती थी, लेकिन साल-डेढ़ साल के दरम्यान इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाता तो दूर, इस सोच पर गंभीरता से विचार तक नहीं किया गया। इस मुद्दे पर राजनैतिक पर्यवेक्षकों का यह मानना है कि भले ही केन्द्र व राज्य में भाजपा सत्तारूढ़ है, लेकिन उनके नेताओं के आपसी रिश्ते

इतने बेहतर नहीं है कि अब तक हर चुनाव में भाजपा की झोली भरने वाली राजस्थान की जनता की भलाई के लिए 56 इंच के सीने वाला नेतृत्व बड़ी लकीर खींचने का बड़प्पन दिखा सके।

अलबत्ता ललित मोदी प्रकरण के चक्रव्यूह में फंसी मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे 19-20 नवम्बर को प्रस्तावित रिसर्जेन्ट राजस्थान को उसके मुकाम पर पहुंचाने में जुटी हैं, जिसमें राज्य के चहुमुंखी विकास के लिए भारी भरकम निवेश का ताना-बाना बुना जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इसके उद्घाटन के लिए न्यौता दिया गया है। वे क्या सौगात देकर जायेंगे? यह आने वाला समय बताएगा। इस बीच राजस्थान को सौर ऊर्जा का हब बनाने की कवायद शुरू हो गई है। करीब 32 हजार मेगावाट बिजली के उत्पादन में एक लाख 92 हजार करोड़ के निवेश संबंधी प्रस्ताव पर एमओयू को कैबिनेट ने अपनी मंजूदी दे दी है। राज्य सरकार ने चार कंपनियों के साथ 50-50 प्रतिशत की भागीदारी तथा दो कंपनियों को प्रदेश में निवेश करने में रियायत देने संबंधी एमओयू किए हैं। राजस्थान सौर ऊर्जा नीति 2014 के अन्तर्गत मुख्य सचिव की अध्यक्षता में संयुक्त वेंचर कम्पनी गठित की जाएगी जो चार कंपनियों के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन में बराबर की हिस्सेदार होंगी। ऊर्जा के इस विपुल भंडार से प्रदेश में औद्योगीकरण तथा विकास को नये पंख लगेंगे और केन्द्र सरकार इन पंखों को मजबूती तथा ऊंची उड़ान देने के लिए आगे आएगी? इस सवाल का तकाजा बरकरार है।

जयपुर से गुलाब बत्रा

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