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आखिर जम्मू-कश्मीर के गरीब विद्यार्थी कहां जायें?

आखिर जम्मू-कश्मीर के गरीब विद्यार्थी कहां जायें?

पिछले दिनों संसद में पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने जम्मू-कश्मीर के बच्चों की विशेष स्कॉलरशिप योजना पर उदासीनता बरतने के लिए केंद्र सरकार की खिचाई करते हुए इससे सम्बंधित सवाल उठाया था। महबूबा मुफ्ती के अलावा जम्मू-कश्मीर के सांसदों ने भी इस मुद्दे को सदन में कई बार उठाया लेकिन केंद्र सरकार ने शिक्षा से जुड़े इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर अब तक कोई ठोस पहल नहीं की है न कोई संजीदगी दिखाई है। जबकि केंद्र और राज्य दोनों जगह ही एनडीए की सरकार है।

असल में यूपीए सरकार ने 5 साल पहले जम्मू-कश्मीर के गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए एक योजना शुरू की थी जिसके तहत वो देशभर में कहीं भी अपनी शिक्षा प्राप्त कर सकते थे इसमें प्रधानमंत्री विशेष स्कॉलरशिप योजना के तहत प्रतिवर्ष 5000 छात्रों को स्कॉलरशिप दी जानी थी। जिसमें 250 इंजीनियरिंग, 250 मेडिकल तथा अन्य कोर्सेस के लिये 4500 सीटें उपलब्ध थीं। इस योजना के लिए यूपीए सरकार द्वारा 1200 करोड़ रुपये का बजट भी स्वीकृत किया गया था। जिसका उद्देश्य साफ था कि प्रतिवर्ष जम्मू एवं कश्मीर से 5000 गरीब छात्र-छात्राएं प्रदेश से बाहर जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करें ताकि उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा में लाया जा सके।सरकार ने गरीब बच्चों को राज्य से बाहर आकर अन्य राज्यों में पढऩे-लिखने और प्रशिक्षण प्राप्त कर उचित रोजगार पाने का सुनहरा अवसर प्रदान किया था। इस विशेष स्कॉलरशिप योजना के तहत इसमें बच्चों का रहना, खाना एवं उनके पढऩे की फीस शामिल थी। ऐसी सुविधा थी कि बच्चे अपनी मर्जी से मान्यता प्राप्त महाविद्यालय या विश्वविद्यालय चुनें । अपनी मर्जी के चुनिंदा कोर्स में पढ़ाई करें और अपने पढऩे की सूचना सरकार को दें। यह सिलसिला वर्ष 2011-12 से प्रारम्भ हुआ। 2011-12 में 38, 2012-13में 3562, 2013-14 में 3747, 2014-15 में 2102 बच्चें जम्मू कश्मीर से निकले और उन्होंने देश के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लिया । योजना की निगरानी हेतु मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक समिति बनाई और उसके क्रियान्वन का काम एआईसीटीई को दिया गया। मगर दुर्भाग्य से दोनों ने मिलकर ऐसे नियम बनाये कि फिलहाल यह योजना नियमों में ही फंसकर रह गयी। इसका मूल उद्देश्य ही खो गया। और अब तो इसे ख़त्म करने की कोशिश भी की जा रही है । शुरू के 2-3 साल तो यह योजना ठीक ठाक चली लेकिन बाद में यह सरकारी लालफीताशाही का शिकार होकर नियम-कानूनों में ही फंसकर रह गई। हाल यह हुआ कि 2014-15 में एआईसीटीई द्वारा सिर्फ 250 सीटों पर   स्कॉलरशिप दी गई जबकि बाकी 4750 सीटें खाली रह गईं। कुछ बच्चों ने एआईसीटीई में पंजीकरण कराकर अपने स्तर पर कॉलेज ढूंढे और उनमें अध्ययन कर रहे हैं। जिन्हें सरकार अब स्कॉलरशिप नहीं दे रही है। वर्ष 2013-14 में 75 प्रतिशत बच्चों की स्कॉलरशिप मिल गयी। मगर बाकी बचे 25 प्रतिशत बच्चों को अभी तक सरकार ने स्कॉलरशिप नहीं दी है। बच्चों का कोई दोष न होते हुए भी वे दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। शिक्षण संस्थान, जहां वे पढ़ रहे हैं उनसे पैसा मांग रहे हैं। वे गरीब हैं पैसा दे नहीं सकते। लेकिन अब वे कहाँ जाएँ ?ये एक बड़ा सवाल है और इसका जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।

सत्र 2014-15 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इस योजना के लिए इतनी जटिल प्रक्रिया अपनायी कि कोई बच्चा जम्मू-कश्मीर से बाहर पढऩे ही न जा न पाये। हालत यह हो गए की 5000 में से सिर्फ 250 ही एआईसीटीई की तरफ से पंजीकृत हो पाए। दुसरी तरफ मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने ही उन संस्थानों का आह्वान किया जो जम्मू-कश्मीर के बच्चों को स्कॉलरशिप स्कीम में पढ़ाना चाहते हैं जिसके लिए लगभग 250 संस्थानों ने आवेदन किया। अब 5000 बच्चों की वरीयता सूची बनाकर इन संस्थानों में बच्चों की मर्जी से उनका दाखिला करना था। किन्तु ऐसा नहीं किया गया। अचानक एक नई प्रक्रिया को लागू किया गया। इसमें यह तय किया गया कि प्रत्येक संस्था को दो बच्चे दिये जायेंगे। कुलमिलाकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय, यूजीसी, एआईसीटीई की गाइडलाइंस ही विरोधाभाषी है ।

सच्चाई यह है की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को यूजीसी और एआईसीटीई के ही कुछ बड़े अधिकारी पलीता लागने की फिराक में हैं। उन्हें ऐसा करने से रोका जाना चाहिये और इसके लिए स्पष्ट नीति होनी चाहिए वर्ष 2014-15 में जानबूझकर लगाये बन्धन खत्म कर जो बच्चा जहां पढ़ रहा है, वहीं पढऩे दिया जाये। उसे स्कॉलरशिप भी दी जाये। अन्यथा जम्मू-कश्मीर में अब तक जैसा होता आया है, वैसा ही होने का खतरा बढ़ जाएगा। नई युवा पीढ़ी के गलत हाथों में चले जाने की प्रबल संभावना है। कुछ निजी संस्थान तो पिछले 2 वर्षों से कश्मीर के सैकड़ों छात्रों को अपनें यहाँ बिना फीस लिए पढ़ा भी रहें है और उनके रहने-खानें का खर्च भी खुद वहन कर रहे है। लेकिन वे निजी क्षेत्र से है इसलिए सरकार उनकी मदत नहीं करना चाहती ना ही उन बच्चों को स्कालरशिप ही अब तक मिली है जबकि वो सभी नियम-कानूनों के तहत यहाँ आयें है और वो इसके पात्र है। इस योजना की सबसे अच्छी बात यह थी की जम्मू-कश्मीर के युवा आतंकवाद को अपने जेहन से निकालकर शिक्षा के लिए देश के कई हिस्सों में जा रहे थे। भारत के अन्य हिस्सों में आकर हिन्दुस्तान के बारे में इनकी अच्छी समझ पैदा हुई। उन्होंने बाकी हिंदुस्तान का वातावरण देखा, यहां के रीति रिवाज देखे, यहां का खान-पान देखा, लोगों से मिले और विचारों का आदान प्रदान हुआ। इन युवाओं ने कश्मीर और भारत को एक करके देखा, भारत की संस्कृति एवं देश के महापुरुषों को जाना समझा । क्योकि शिक्षा ही सकारात्मक सोच का जरिया है और ऐसे प्रयासों से ही कश्मीर के युवाओं का अलगाव खत्म होगा।

3लेकिन सरकारी उपेक्षा के शिकार हुए इन गरीब बच्चों को अगर समय रहते राहत न मिली तो ठीक नही होगा खासतौर से उन गरीब लड़कियों को जो अपने सुनहरे भविष्य का सपना आंखों में लिये अपने घरों से कई सौ किलोमीटर दूर देश के विभिन्न कालेजों में दिन-रात पढ़ाई करने में जुटी हैं। उनकी आंखों में अपने गरीब मां-बाप के सपने पूरे करने का चमकीला अरमान पल रहा है। देश व समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का जज्बा हिलोरें ले रहा है। जम्मू-कश्मीर के अधिकांश बच्चों ने तो जम्मू-कश्मीर से बाहर आकर अन्य राज्यों में इसलिये पढना कबूल किया कि उनके परिवार के दिन बहुरेंगे। उनके प्रदेश में खुशहाली फिर लौटेगी। पढ़ाई करने के बाद वे देश व समाज की अगवानी करेंगे। लेकिन केन्द्र सरकार से उन्हें सहायता न मिली तो वे नौजवान कहां जाएंगे। शायद उन्हें फिर आतंकवाद की अंधेरी और खतरनाक गुफा में घुसने को मजबूर होना पड़ेगा, जिससे बचकर वे अपना करियर बनाने निकले थे।

इस योजना के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय, यूजीसी, एआईसीटीई द्वारा जानबूझकर बनाई गई जटिल प्रक्रिया की वजह से 2015-16 के मौजूदा सत्र में भी बहुत कम कश्मीरी बच्चे पंजीकृत किये जायेगे और अगले साल से इस पूरे योजना को ही बंद करने की तैयारी है क्योकि यूपीए सरकार ने पाँच साल के लिए यह विशेष योजना बनाई थी जिससे कश्मीरी बच्चे देश की मुख्य धारा से जुड़ सकें लेकिन अब एनडीए सरकार इस योजना को जारी नहीं रखना चाहती। सच्चाई तो यह है एनडीए की सरकार बनते ही इतनी अच्छी योजना पर ग्रहण लगना शुरू हो गया था और केंद्र सरकार और मानव संसाधन विकास मंत्रालय की उपेक्षा से तो अगले साल से यह बंद ही होने वाली है । ऐसा लग रहा है कि कश्मीर के बच्चे सिर्फ मुस्लिम होनें का खामियाजा भुगत रहें है। इस योजना में केंद्र सरकार की उपेक्षा से यह लगने लगा है कि शायद नई सरकार नहीं चाहती कि जम्मू-कश्मीर के गरीब बच्चे बाहर आकर पढ़ें एवं देश की मुख्यधारा में शामिल हों। बाहर आने वाले गरीब बच्चे मुख्य रूप से दूरदराज के गरीब मुसलमान परिवारों से हैं। लेकिन कश्मीरी छात्रों से जुड़े इतने संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार संजीदा नहीं है। ऐसा लग रहा है की जम्मू-कश्मीर के बच्चों को शिक्षा के माध्यम से देश और समाज की मुख्यधारा में जोडऩे की इतनी अच्छी योजना भी केंद्र सरकार की बेरुखी से दम तोडती नजर आ रही है।

शशांक द्विवेदी

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