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बदलते दौर में मीडिया

बदलते दौर में मीडिया

56-57 BOOK+Astro_Layout 1मीडिया समाज का वो आईना है जिसमें देश का हर नागरिक समूचे भारत के दर्शन एक ही स्थान पर कर लेता है। यही नहीं लोकतंत्र के चार स्तंभ माने जाते हैं, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता, जिसमें पत्रकारिता को एक सशक्त स्तंभ के रूप मे जाना जाता है, जो शेष तीन स्तंभों की कार्यप्रणाली पर अपनी तीखी नजर रखता है। लेकिन बदलते परिवेश में मीडिया की परिभाषा में परिवर्तन आए हैं। मीडिया, पत्रकारिता और सोशल मीडिया के क्या मायने हैं और क्या दायित्व हैं समाज के लिए? इस महत्व को उजागर करते हुए साहित्य अमृत ने अपना ‘मीडिया विशेषांक’ निकाला है, जिसमें पत्रकार जगत के महारथियों के विचारों को उजागर किया गया है।

इस विशेषांक में पत्रकार जगत के दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहन करने वालों में बहुत से धुरंधरों ने अपने अनुभव के आधार पर पत्रकारिता के विषय में अपनी कलम रूपी तलवार चलाई है। जिसमें विशेष रूप से गणेश शंकर विद्यार्थी, कृष्ण बिहारी मिश्र, सूर्यकांत बाली, गिरिराज किशोर, एन.के.सिंह, विजय दत्त श्रीधर, विश्वनाथ सचदेव, हिमांशु द्विवेदी, प्रकाश मनु, शंकर शरण और गोपाल चतुर्वेदी, सहित तमाम पत्रकार शामिल हैं।

इंडिया टीवी के प्रमुख और प्रधान संपादक रजत शर्मा कहते हैं कि ”एक जमाना था, जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ब्रेक की हुई खबरें सोशल मीडिया में ट्रेंड करती थीं। मगर अब सोशल मीडिया पर वायरल हुई खबरें न्यूज रूम तक को प्रभावित करती हैं। अमूमन हर पत्रकार ताजा घटनाक्रमों की जानकारी के लिए फेसबुक, टिवटर आदि पर नजरें गड़ाए रहते है” उदय इंडिया साप्ताहिक पत्रिका के संपादक दीपक कुमार रथ अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहते हैं- समय के साथ मीडिया के स्वरूप और मिशन में काफी परिवर्तन हुआ है। अब गंभीर मुद्दों के लिए मीडिया में जगह घटी है। अखबार का मुखपृष्ठ अमूमन राजनेताओं की बयानबाजी, घोटालों, क्रिकेट मैचों अथवा बाजार के उतार-चढ़ाव को ही मुख्य रूप से स्थान देता है। जिस पेज पर कल तक खोजी पत्रकारों के द्वारा ग्रामीण पृष्ठभूमि की समस्याएं, ग्रामीणों की राय व गांव की चौपाल प्रमुखता से छापी जाती थीं, वहीं आज फिल्मी तरानों की अद्र्धनग्न तस्वीरें नजर आती हैं। वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय लिखते हैं कि ”पिछले दो-तीन वर्षों में जैसी विस्फोटक घटनाएं हुई हैं, वैसी पहले कभी-कभार होती थीं। वह भी तब जब कोई विदेशी जासूसी का बड़ा विस्फोट होता था। याद करें तो पाएंगे कि सन 1985-86 में तीन-चार बड़े खुलासे हुए थे, जिसमें इक्के-दुक्के पत्रकार भी खलनायक बनकर सामने आए। उसी तरह कभी-कभार कुछ पत्रकारों के भ्रष्ट होने की घटनाएं सामने आती रही हैं, लेकिन पेड न्यूज ने उसका संस्थानीकरण कर दिया है।” लंबे अरसे तक पाञ्चजन्य के संपादक रहे तरूण विजय अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ”आज पत्रकारिता शहर और अमीर केंद्रित हो गई है। पत्रकारों के अपने-अपने राजनीतिक संरक्षक हैं। नक्सली या जेहादी आतंकवादी के प्रति सहानुभूति वाले इंटरव्यू छपते और प्रसारित होते हैं, पर शहीद सैनिकों के परिवारजन के भाव के बारे में कभी चर्चा सुनी है क्या? ”

समाज में जागरुकता लाने में अखबारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह भूमिका किसी एक देश अथवा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। स्वतंत्रता के बाद सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक ढांचे में जहां परिवर्तन आये, वहीं पत्रकारिता के क्षेत्र में भी व्यापक बदलाव आया। इसने एक प्रच्छन्न उद्योग का स्वरूप ग्रहण कर लिया। इस तरह निष्पक्ष पत्रकारिता का पूरा आदर्श और ढांचा ही चरमराने लगा। अखबारों के पन्ने रंगीन होते जा रहे हैं और उनमें विचार-शून्यता साफ झलकती है। आज समाचारपत्रों में फिल्में, लजीज व्यंजन और सेक्स संबंधित ऐसी तमाम सामग्री बहुतायत में परोसी जाने लगी है जो मनुष्य के जीवन में पहले बहुत अहम स्थान नहीं रखती थीं। साहित्य अमृत के ‘मीडिया विशेषांक’ में सभी वरिष्ठ पत्रकारों ने अपने विचारों में यही चिंता जताई है कि वक्त के साथ मीडिया का स्वरूप बदलता जा रहा है। पत्रकारिता की विषय-वस्तु ओझल होती जा रही है। जो चिंता का विषय है।

प्रीति ठाकुर

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