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नई आतंकी रणनीति दीनानगर से उधमपुर तक

नई आतंकी रणनीति दीनानगर से उधमपुर तक

पंजाब में हुई आतंकी वारदात को सोनिया गांधी, कांग्रेस के प्रताप सिंह बाजवा और कैप्टन अमरेन्द्र सिंह जैसे लोगों ने इसे खालिस्तान से जोड़कर लांछन लगाने की पुरानी शैली को तेज कर दिया है। उनका, कहना है कि पंजाब की वर्तमान सरकार खालिस्तानी आतंकवादियों के प्रति नरम रुख रखती है और उन्हें प्रत्यक्ष रूप से शह भी दे रही है। इसलिए इस प्रकार के हमले पंजाब में दोबारा शुरु हुए हैं।

इसमें कोई शक नहीं की जम्मू-कश्मीर में सेना की सख्ती के कारण पाकिस्तान आतंकवादियों की भारत में घुसपैठ करवाने में दिक्कत महसूस कर रहा है। उसी प्रयास में बार-बार सीजफायर का उल्लंघन कर भारतीय चौकियों पर गोलाबारी करता रहता है, ताकि उसकी आड़ में आतंकी घुसपैठ करा सके। पाकिस्तान से लगते पंजाब के गुरुदासपुर जिले की सीमा से आतंकवादी भारतीय सीमा में घुसे और 27 जुलाई की सुबह उन्होंने दीनानगर में कहर बरपा दिया। अभी तक की जांच से इतना तो स्पष्ट हो गया है कि, वे हिट एंड ट्रायल पद्धति से हमला करने के लिये नहीं आये थे, बल्कि उन्होंने अपने निशानें का चयन बहुत ही सावधानी से किया था ताकि, सर्वाधिक नुकसान हो। आतंक की लहर फैल जाये, लेकिन नागरिकों की सूझबूझ से तीनों आतंकवादी अपने नापाक मंसूबों में पूरी तरह कामयाब नहीं हो सके। फिर भी दीनानगर शहर के थाने पर आतंकवादियों ने कब्जा कर लिया और लगभग बारह घंटों की मुठभेड़ में तीनों आतंकवादी मारे गये। थाने तक पहुंचने से पहले उन्होंने रेल पटरी पर बम रख कर ट्रेन उड़ाने का प्रयास भी किया, लेकिन रेलवे रेल कर्मचारियों की सूझ-बूझ से वह हादसा टल गया। इसी प्रकार उन्होंने पंजाब रोडवेज की एक बस पर हमला करके यात्रियों को मारने की कोशिश की, लेकिन वह हादसा भी बस के ड्राइवर नानक चन्द्र की सूझबूझ से टल गया। इसमें कोई शक नहीं कि पंजाब पुलिस के जवानों ने भी बहादुरी से दुश्मनों से लोहा लिया और इसमें गुरुदासपुर के पुलिस अधीक्षक   बलजीत सिंह सैनी शहीद भी हो गये। पंजाब और जम्मू-कश्मीर की बहुत लम्बी सीमा पाकिस्तान से लगती है। अभी तक पाकिस्तान अपने आतंकवादियों को जम्मू-कश्मीर सीमा से ही भारत में घुसपैठ करवाता था। लेकिन, अब उसने पंजाब के रास्ते भी यह नया प्रयोग किया है। दरअसल गुरुदासपुर, कठुआ और साम्बा एक ही श्रृंखला में हैं। कठुआ और साम्बा से पिछले दिनों आतंकवादी आक्रमण कर ही चुके हैं। उसी तरीके से अब गुरुदासपुर से लगती सीमा का उपयोग किया गया है। इसलिए कम-से-कम यह तो नहीं कहा जा सकता कि यह हमला अचानक हुआ या इसकी कोई आशंका नहीं थी। कठुआ और साम्बा वाले हमलों के बाद से तो इसकी आशंका और बढ़ गई थी। अभी तक कुछ प्रश्न अनुत्तरित हैं, जिनकी खोजबीन चल रही है। क्या घुसपैठ करने वाले आतंकवादी गिरोह में तीन सदस्य ही थे या फिर बाकी मौके की तलाश में हैं? लेकिन इस हमले को लेकर जो लिखा-पढ़ा जा रहा है, वह ज्यादा चिंताजनक है।

पंजाब में हुई आतंकी घटना को सोनिया गांधी, कांग्रेस के प्रताप सिंह बाजवा और कैप्टन अमरेन्द्र सिंह जैसे लोगों ने इसे खालिस्तान से जोड़कर लांछन लगाने की पुरानी शैली को तेज कर दिया है। उनका, कहना है कि पंजाब की वर्तमान सरकार खालिस्तानी आतंकवादियों के प्रति नरम रुख रखती है और उन्हें प्रत्यक्ष रूप से शह भी दे रही है। इसलिए इस प्रकार के हमले पंजाब में दोबारा शुरु हुये हैं। इसे संकट काल में भी राजनैतिक रोटियां सेंकने से अतिरिक्त कुछ नहीं कहा जा सकता। ये दोनों सज्जन और इनकी बिरादरी के दूसरे लोग भी अच्छी तरह जानते हैं कि खालिस्तान, उन दिनों भी, जिन दिनों पंजाब में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पूरे उफान पर था, ख्याली पुलाव था, जिसका पंजाब के लोगों से कुछ लेना-देना नहीं था। अकालियों से राजनैतिक लड़ाई लडऩे के लिये सोनिया कांग्रेस के पास अनेक राजनैतिक आधार हैं। लेकिन, संकट की इस घड़ी में पाकिस्तान प्रायोजित इस्लामी आतंकवाद को राज्य की राजनीति में हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना विकृत मानसिकता ही कही जा सकती है। अब गुरुदासपुर में हुए इस हमले को पंजाब की भीतरी राजनीति से जोड़ कर हल्ला मचाने वाले लोग जानबूझकर असली संकट और खतरे से लोगों का ध्यान हटाने के लिये ही ऐसी बयानबाजी करते प्रतीत होते हैं। पंजाब में पुलिस के सर्वेसर्वा रहे के.पी.एस गिल ने ठीक ही कहा है कि, खालिस्तान की बात समाप्त हुये अर्सा हो चुका है और जो लोग उस में शामिल थे वे भी समाप्त हो चुके हैं। लेकिन, सोनिया और कांग्रेस के नेताओं की बयानबाजी से लगता है कि कहीं वे उसे फिर से जिन्दा करने की फिराक में तो नहीं? परन्तु ऐसा नहीं कि पाकिस्तान के इस्लामी आतंकवाद को लेकर सोनिया और कांग्रेस पहली बार दोहरी नीति अपना रहे हों। जिन दिनों पूरा देश कमोवेश इस प्रायोजित इस्लामी आतंकवाद से लडऩे के लिये मानसिक रुप से एकजुट होता दिखाई दे रहा था, सोनिया गांधी और कांग्रेस ने ठीक उसी वक्त हिन्दू आतंकवाद का राग छेड़कर उस लड़ाई को कमजोर करने की कोशिश ही नहीं की बल्कि, आतंकवाद से लडऩे के राष्ट्रीय संकल्प को खंडित भी किया। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ठीक कहा है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ी जा रही लड़ाई में सोनिया और कांग्रेस ने ठीक मझधार में भितरघात किया है।

29-08-2015

भारत पर छद्म आक्रमण का असली खतरा आईएसआईएस की ओर से है और हिन्दुस्तान के अनेक मुसलमान इससे जुड़ रहे हैं। पाकिस्तान में आतंकवादी गिरोह भी अब किसी-न-किसी रुप में उसी आईएसआईएस का हिस्सा है। अभी तक विभिन्न देशों में जो इस्लामी आतंकवादी गिरोह काम कर रहे थे, वे अब धीरे-धीरे आईएसआईएस की छतरी के नीचे एकत्रित होकर संयुक्त रणनीति बना रहे हैं। भारत इस संयुक्त इस्लामी आक्रमण का प्रमुख शिकार है। इसलिये आतंकवादियों का हमला चाहे दिल्ली में होता है, या गुरुदासपुर में, कठुआ में होता है या दीनानगर में, उसे एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझने की जरुरत है। सीमित राजनैतिक हितों के भीतर विचरने वाले लोग तो इन हमलों को पंजाब या जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र या उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में देखकर ही आरोप-प्रत्यारोप का सत्र प्रारम्भ करेंगे, लेकिन आतंकवादियों के लिये इन शब्दों के कोई मायने नहीं हैं। वे स्थान का चयन तो सुविधा और स्थिति देखकर करते हैं अन्यथा, उनका निशाना भारत ही होता है। इसलिये जरुरी है कि आतंकवादी हमलों का मुकाबला करने के लिये नीति बनाते समय इस मुक्कमल परिदृश्य को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाये। यह भी ध्यान में रख लेना चाहिये कि इस्लामी आतंकवादी हमलों की यह कहानी लम्बी चलने वाली है। इसलिये रणनीति भी लम्बी दूरी की ही बननी चाहिये। दुर्भाग्य से राजनैतिक दल अभी भी इन हमलों को पक्ष-विपक्ष के नजरिए से ही देख रहे हैं और उसी को ध्यान में रखते हुये प्रादेशिक संदर्भों में इसकी व्याख्या कर रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो पंजाब में कम-से-कम कांग्रेस के लोग, इस हमले को अकाली दल पर हमला करने के अवसर के रुप में प्रयोग न करते। दुनिया के दूसरे हिस्सों में इस्लाम और चर्च की जो लड़ाई दिखाई दे रही है, वह वर्चस्व की लड़ाई है। लेकिन, हिन्दुस्तान में ये दोनों एक हो जाते हैं और इस देश के खिलाफ वैचारिक लड़ाई लड़ते हैं। हिन्दुस्तान वास्तव में चिन्तन में लोकतांत्रिक देश है। इसलिए यहां ईश्वर को लेकर चिन्तन एवं कल्पना के लिये आसमान तक छलांग ही नहीं लगाई जा सकती, बल्कि उसको लेकर विभिन्न अवधारणाओं को एक साथ लेकर सुखपूर्वक जिया भी जा सकता है। इतना ही नहीं आम जनता के स्तर पर उनको एक साथ स्वीकार भी किया जा सकता है। इस्लाम और चर्च को यह अस्वीकार है। इसलिये उनका ध्येय हिन्दुस्तान को काट-छांट कर सामी चिन्तन के रास्ते पर लाना है। इस्लाम और चर्च के ये हमले हिन्दुस्तान पिछले आठ सौ साल से झेल रहा है। लेकिन, फिर भी इस्लाम, हिन्दुस्तान को परास्त करने में सफल नहीं हो पाया। अब जब फिर से तेल की ताकत से इस्लाम को नई ऊर्जा मिली है तो उसने फिर हिन्दुस्तान को निशाना बना लिया है। यह निशाना एक बड़े अभियान और लक्ष्य का हिस्सा है। लेकिन, दुर्भाग्य से हमारे देश के राजनैतिक दल इस्लामी आतंकवाद से भी चुनावों की पंचवर्षीय योजना में लाभ उठाने की रणनीतियां बनाने में ही मस्त है। साम्यवादी दल जिस बेशर्मी से आतंकवादियों के समर्थन में प्रत्यक्ष या परोक्ष खड़े दिखाई देते हैं, उससे किसी को आश्चर्य नहीं हो सकता। क्योंकि साम्यवादियों के मन में भारत की जो अवधारणा है, वह इस देश के आम आदमी से बिल्कुल भिन्न है। इस देश को खंडित देखने में ही उनको अपनी वैचारिक सफलता दिखाई देती है। यही कारण था कि उन्होंने पाकिस्तान के निर्माण का समर्थन किया था। लेकिन अब तो सोनिया और कांग्रेस जिस तरह खुलेआम आतंकवादियों के समर्थन में खड़ी दिखाई देती है, उससे कांग्रेसियों में भी बेचैनगी दिखाई दे रही है। परन्तु इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि असली कांग्रेसी हाशिए पर चले गये हैं और पार्टी पर जिन लोगों का कब्जा हो गया है, वे सोनिया गांधी के विश्वासी लोग ही हैं। पंजाब में पाकिस्तानी आक्रमण के वक्त भी, पंजाबियों की पारम्परिक एकता को खंडित करने के लिए सोनिया और कांग्रेस के प्रयास उसी रणनीति की ओर संकेत करते हैं, जिसके तहत कांग्रेस ने कभी तुच्छ राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिये जरनैल सिंह भिंडरावाले को जन्म दे दिया था।

इस बात में कोई शक नहीं कि भारत पर होने वाले इस प्रकार के आतंकवादी हमलों में पाकिस्तान की प्रमुख ही नहीं बल्कि, पूरी भूमिका रहती है। जैसे-जैसे पाकिस्तान की सरकार समर्पित आतंकवादी गिरोहों और आईएसआईएस में सांठ-गांठ बढ़ती जा रही है वैसे-वैसे पाकिस्तान की ओर से होने वाले हमले और ज्यादा कॉर्डिनेटेड होते जाएंगे। इस का ताजा उदाहरण जम्मू-कश्मीर के सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण उधमपुर में बीएसएफ के जवानों पर हुआ ताजा हमला है। दो पाकिस्तानी आतंकवादी कश्मीर में घुसे और कई दिन घाटी में घूमते रहे। इसके बाद दोनों ने सीमा सुरक्षा बल की बस पर हमला कर दो जवानों को शहीद कर दिया और कई जवान घायल हो गये। ये तो चांस की बात थी कि दोनों आतंकियों में से जीवित बच गये आतंकी नावेद को गांव के ही दो युवकों ने पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। कसाब के बाद पकड़ा गया यह दूसरा पाकिस्तानी आतंकी है। जिसका, पाकिस्तान में बैठा बाप कह रहा है कि वही इस नावेद का बदनसीब पिता है और यह भी बताता है कि उसे भी पाकिस्तानी सेना अब मार देगी। पाकिस्तान ने इस युवक को प्रशिक्षण इस प्रकार दिया है कि वह हंसकर बता रहा है कि उसे आदमियों को मारने में मजा आता है। जाहिर है ऐसा प्रशिक्षण पाने वाले पाकिस्तान में और युवा भी होंगे जो आदमी से रोबोट बनाने की इस्लामी प्रक्रिया में शामिल होंगे। इस आतंकी से यह भी खुलासा हुआ है कि उनका, मकसद अमरनाथ की यात्रा में कोहराम मचाना था। इसलिए यह प्रश्न बार-बार उठता रहता है कि ऐसे वातावरण में भारत को पाकिस्तान से कोई बातचीत करनी चाहिए या नहीं? भारत और पाकिस्तान में द्विपक्षीय बातचीत का यह सिलसिला पिछले कई दशकों से चला आ रहा है। लेकिन आज तक किसी की समझ में नहीं आया कि यह बातचीत होती क्यों है और इससे, निष्कर्ष क्या निकलता है? इसलिए आम आदमी का मानना है कि पाकिस्तान से बातचीत करने का कोई लाभ नहीं है और बेवजह इसे चलाए रखने का कोई अर्थ भी नहीं है। नरेन्द्र मोदी ने ऊफा में दोनों देशों के बीच जिन मुद्दों की चर्चा करते हुए बातचीत आगे बढ़ाने की बात कही थी, उसमें कश्मीर की चर्चा नहीं थी। तब सभी को लगने लगा था कि अब शायद मामला पटरी पर आ जाएगा। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ इस्लामाबाद को स्पष्ट करना पड़ा की कश्मीर, पाकिस्तान की शाह रग है। गुरुदासपुर में हुआ हमला शायद शाह रग की याद दिलाने के लिये किया गया। लेकिन, ताज्जुब है दीनानगर में इतने बेगुनाह लोगों के मारे जाने के बाद भी अंग्रेजी मीडिया चिल्ला रहा है कि भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत किसी हालत में भी नहीं छोडऩी चाहिए। ऐसे समय में भारतीय भाषाओं की मीडिया की पीठ थपथपानी पड़ेगी कि उसने देशवासियों की भावनाओं के अनुरूप बातचीत बंद किये जाने की वकालत की है। आखिर, क्या कारण है कि जब भी देश पर कहीं भी आतंकवादी आक्रमण होता है तो अंग्रेजी भाषा का मीडिया, आम जन-भावना के बिल्कुल विपरीत बोलता है और भारतीय भाषाओं का मीडिया, मोटे तौर पर जन-भावनाओं के अनुकूल बोलता है। यदि अंग्रेजी भाषा के मीडिया का स्वर तार्किक हो, तब भी उसकी बात समझ में आ सकती है। लेकिन, दुर्भाग्य से सदा ही उसमें जिद ज्यादा होती है और तर्क कम। पाकिस्तान से बातचीत करते हुए लगभग सात दशक बीत गये और उस बातचीत ने चार युद्ध ही दिये। जब बातचीत और आगे बढ़ी तो पाकिस्तान ने राज्य प्रायोजित इस्लामी आतंकवाद दिया, जिसके कारण यदि सिविल पॉपुलेशन की बात छोड़ भी दी जाये तो अभी तक इतने भारतीय सैनिक मार दिये हैं जितने इन चार युद्धों में भी नहीं मरे थे। अब भी जैसे ही बातचीत का उत्साह बढ़ता है वैसे ही सीमा पर आतंकवादी हमला होता है। क्या समय नहीं आ गया है कि पाकिस्तान के साथ बातचीत रोकने का प्रयोग करके भी देख लिया जाये? लेकिन अंग्रेजी मीडिया और उससे जुड़े तथाकथित बुद्धिजीवी क्या ऐसा होने देंगे? एक खतरा और भी है। जैसे-जैसे नावेद उर्फ कासिम का मुकद्दमा आगे बढ़ता जायेगा, वैसे-वैसे अली बाबा के वही ‘चालीसÓ जो याकूब मेनन को बेगुनाह सिद्ध करने के लिये दिन-रात एक किये रहे, एक बार फिर कासिम की बेगुनाही के लिये जी-जान लड़ा देंगे। तब तक जलपाईगुड़ी और यमुनानगर के उन दो जवानों की शहादत को लोग भूल चुके होंगे, जिन्होंने देश के लिये प्राण न्यौछावर कर दिये। वैसे कासिम की उम्र को लेकर अभी ही कुछ उत्साहियों ने कनकौये उड़ाने शुरु कर दिये हैं।

कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

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