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लिथियम भंडार से बदलेगी भारत की ऊर्जा तस्वीर

लिथियम भंडार से बदलेगी भारत की ऊर्जा तस्वीर

इस महीने के शुरूआत में केंद्र सरकार ने जब यह जानकारी दी कि जम्मू-कश्मीर में देश का सबसे बड़ा लिथियम भंडार मिला है। इसके बाद देश में खुशी की लहर फैलनी ही थी। फैले भी क्यों नहीं, दुनिया इन दिनों ऊर्जा के स्रोत के रूप में पेट्रोलियम पदार्थों की बजाय इलेक्ट्रिक बैटरियों की ओर मुड़ रही है। हाल के दिनों में जिन बैटरियों को ऊर्जा के स्रोत के रूप में जिन इलेक्ट्रिक बैटरियों को सबसे ज्यादा मुफीद और कारगर माना जा रहा है, वे लिथियम से ही तैयार की जाती हैं। लिथियम बैटरियों की खोज कोई बहुत पुरानी नहीं है।  लिथियम आयन बैटरियों के विकास के लिए साल 2019 में तीन वैज्ञानिकों जॉन बी गुडएनफ, एम स्टेनली व्हिटिंघम और अकीरा योशिनो को मिला था। इन वैज्ञानिकों ने जिन लिथियम-आयन बैटरियों का विकास किया है, इलेक्ट्रिक कारों के लिए वे ज्यादा मुफीद और कारगर मानी जा रही हैं। लिथियम के लिए भारत अब तक ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना जैसे देशों पर निर्भर था। जम्मू-कश्मीर में लिथियम के बड़े भंडार के मिलने से उम्मीद की जा रही है कि भारत सरकार की वैश्विक वार्मिंग कम करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों को मजबूती रहेगी। यह छुपी हुई बात नहीं है कि कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार पेट्रोलियम का ऊर्जा के रूप में ज्यादा इस्तेमाल है। अब जानकार मान रहे हैं कि लिथियम भंडार की खोज से साल 2030 तक भारत में इलेक्ट्रिक गाड़ियों के निर्माण में 30 फ़ीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है।

खनिज मंत्रालय के अनुसार, जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया ने करीब 59 लाख टन वाले इस लिथियम भंडार की खोज जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले में सलाल हेमना ब्लॉक की है। यह संयोग ही है कि जिस इलाके में यह महंगा और महत्वपूर्ण खनिज मिला है, वह चिनाब नदी पर बने 690 मेगावाट की क्षमता वाले सलाल जल विद्युत पावर स्टेशन से करीब 8 किलोमीटर दूर है। जब भी कहीं खनिज मिलता है, वहां अगर आबादी होती है तो उन्हें हटाना और उसके चलते जनांदलनों का खतरा होता है। लेकिन जिस सलाल इलाक़े में लिथियम का भंडार मिला है, उसके आसपास के इलाक़े में भी कोई रिहायशी बस्ती नहीं है।

लिथियम के इस भंडार मिलने से खुशी होनी स्वाभाविक है। लेकिन यह भी सच है कि इसके लिए भारत को रिसर्च एवं विकास की राह पर लंबी दूरी तय करनी है। सबसे पहले तो इस खोज को मूर्त रूप देने और उसके खनन पर बड़ा काम किया जाना बाकी है। संयुक्त राष्ट्र संघ  ने खनिज की खोज और उसके खनन को अमलीजामा पहनाने के लिए जो प्रक्रिया तय की है, उसे संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क वर्गीकरण यानी यूएनएफसी कहा जाता है। इसके मुताबिक जम्मू-कश्मीर में मिला लिथियम भंडार जी3 श्रेणी का है। खोज की दिशा में पहला चरण जिसे जी 1 कहा जाता है, उसमें पहले सर्वेक्षण किया जाता है। फिर जब खनिज की संभावना मिलती है तो उसे आगे बढ़ाया जाता है। जम्मू-कश्मीर में जो लिथियम मिला है, वह जी 3 श्रेणी का है। अब इसके दोहन के लिए प्रक्रिया पर विचार किया जाना है। दुनिया में लिथियम के उत्खनन के लिए दो प्रमुख तरीकों का प्रयोग किया जाता है। पहले तरीके में नमकीन पानी का वाष्पीकरण करना और तरीका कठोर चट्टानों को कुचल कर निकालना। इसके बाद प्राप्त खनिज का शुद्धिकरण किया जाता है। इसके लिए भी लंबी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। जिसमें काफी वक्त लगता है।

दूसरी प्रक्रिया के तहत 1000 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर अयस्क को कुचला जाता है। फिर उसे गरम किया जाता है। फिर इसे सल्फ्यूरिक अम्ल के साथ ठंडा किया जाता है। इसके बाद फिर इसे गरम किया जाता है। अंत में अयस्क से अशुद्धियों को निकालने की प्रक्रिया होती है और फिर जो अयस्क मिलता है, वह लिथियम कार्बोनेट होता है। जिसके दोहन के लिए चूने का प्रयोग किया जाता है। इसके बात वह लिथियम मिलता है, जिसका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक बैटरियों में किया जा सकता है। लिथियम की उपयोगिता और भावी अर्थव्यवस्था में इसकी भूमिका को देखते हुए भारत को यह देखना होगा कि वह जम्मू-कश्मीर में मिले लिथियम के उत्खनन के लिए किस तरीके का इस्तेमाल करता है और किस तरह वह इसे अपनी बैटरियों के लिए हासिल करता है। भारत की इस दिशा में सफलता अयस्क को साफ करके मूल लिथियम हासिल करने के लिए अपनायी जाने वाले तरीके पर निर्भर करेगा।

भारत के लिए लिथियम का भंडार मिलना ही उसकी सफलता की गारंटी नहीं है। यह सिर्फ एक चरण है। शोध संस्था काउंसिल ऑफ एनर्जी, एनवायर्नमेंट एंड वाटर यानी सीईईडब्ल्यू ने अपने एक शोध अध्ययन में पाया है कि भारत को पचास गीगावाट की क्षमता वाली बैटरियों को तैयार करने के लिए जिन संयंत्रों को लगाया जाना है, उसके लिए कम से कम 33 हजार 750 करोड़ रूपए का निवेश करना होगा। दरअसल भारत ने साल 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए जो लक्ष्य तय किया है, उसके लिए भारत को कम से कम 903 गीगाबाइट के ऊर्जा संरक्षण करने वाली बैटरियों की जरूरत होगी। जाहिर है कि इस पर बड़ा खर्च आना है।

वैसे दुनिया में सबसे ज्यादा लिथियम का भंडार दक्षिण अमेरिकी देश चिली के पास है, जो करीब 92 लाख टन का है। नई खोज के बाद भारत दूसरे स्थान पर आ गया है। इसके बाद 57 लाख टन भंडार वाले आस्ट्रेलिया का स्थान है। चौथे नंबर पर 22 लाख टन भंडार के साथ अर्जेंटाइना है। पांचवें नंबर 15 लाख टन भंडार वाला चीन है। इसके बाद नंबर आता है, आता है चीन का, जिसके पास नौ लाख टन लिथियम भंडार है। लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा 52 प्रतिशत लिथियम की आपूर्ति आस्ट्रेलिया करता है, जबकि चिली 25 प्रतिशत और चीन दुनिया को 13 प्रतिशत लिथियम की आपूर्ति करता है। इसी तरह अर्जेंटाइना छह फीसद और ब्राजील सिर्फ एक फीसद लिथियम की आपूर्ति करता है। जाहिर है कि भारत अब लिथियम का बड़ा आपूर्तिकर्ता देश के रूप में भी उभर सकता है।

लिथियम की ताकत और महत्ता और भारत की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि देश में बड़ा लिथियम भंडार मिलने के बावजूद भारत सरकार विदेशों में भी लिथियम की खोज का काम जारी रखे हुए है। प्रधानमंत्री मोदी ने जो स्वदेशी और किफायती तकनीक विस्तार के साथ ही कार्बन उत्सर्जन को कम करने का जो लक्ष्य तय किया है, यह खोज और उसकी गंभीरता इसी मंशा के अनुरूप है। हाल के दिनों में, कोरोना की महामारी के बाद सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में सतत और कार्बन उत्सर्जन रहित ऊर्जा के लिए लिथियम की मांग बढ़ रही है। इसके साथ ही पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने के लिए संकल्पबद्ध हैं और इसके लिए हरित ऊर्जा अपनाने की राह को तेजी से स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में लिथियम की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर में लिथियम का बड़ा भंडार मिलने पर खुशी और उत्साह का माहौल होना स्वाभाविक है।

 

उमेश चतुर्वेदी

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