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राजनीति से कुछ हट के ‘अटलजी’

राजनीति से कुछ हट के ‘अटलजी’

12-09-2015राजनीति के क्षेत्र में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम जितनी दूर तलक जाता है उनका व्यक्त्वि भी लोगों को उतना ही अपनी तरफ आकर्षित करता है। वाजपेयी जी जब भी अपने मुखारविंद से कुछ कहते हैं तो उनके शब्द लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं। उनके राजनीतिक भाषणों को तो सभी ने सुना और जाना है, लेकिन उनके गैर-राजनीतिक भाषण जो लोगों की पहुंच से परे रहे है, वो अब एक किताब के रुप में हमारे सामने है। ‘राजनीति के उस पार’ पुस्तक में अटल जी के ऐसे ही भाषणों का संग्रह है, जिनका केन्द्र राजनीति नहीं अपितु संस्कृतिक धरोहर है। अटल जी राजनीति के निपुण राजनयिक तो हैं ही इसके साथ ही वे एक कवि, मनीषी, भाषा प्रभु और उच्च कोटि के वक्ता भी हैं। उनके भाषणों में भारतीय संस्कृति मुखर होती है। राष्ट्रभक्ति की रसधारा प्रवाहित होती है, उनके भाषण प्राय: जनमानस को सुसंस्कृत करने की प्रेरणा देने वाले होते हैं।

‘राजनीति के उस पार’ पुस्तक अटल जी के गैर-राजनीतिक भाषणों का दूसरा संग्रह है जो कि मूलत: हिंदी में है। इसके पूर्व उनके भाषणों का एक और संग्रह सुधीर नांदगावकर द्वारा ‘अटलजींचे आवाहन’ मराठी में संकलित किया जा चुका है। जिसमें अटल जी के सभी गैर-राजनीतिक भाषणों को मराठी में भाषान्तर करके पेश किया गया है, बावजूद इसके अटलजी के भाषणों की सुगंध में रत्तीभर भी कमी नहीं आई है। ‘अटलजींचे आवाहन’ को पढ़कर ऐसा लगता है मानों अटल जी ने मूल भाषण ही मराठी में दिया हो। ‘राजनीति के उस पार’ पुस्तक में कहीं-कहीं भाषणों में दाल में नमक के बराबर राजनीति प्रवेश देखने को मिल सकता है, वरन ये संग्रह राजनीति से परे लोगों के लिए एक प्रेरणादायी प्रयास है। इस पुस्तक में अटल जी के पच्चीस भाषण संग्रहित हैं। इसमें महापुरूषों को अर्पित भावभीनी शब्दांजलि है, संसदीय जनतंत्र का मूलगामी विश्लेषण है, राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का समर्थन है। इस पुस्तक के संग्रहकर्ता सुधीर नांदगावकर हैं अटल जी के भाषणों के प्रति इनका अगाध प्रेम है। जिसके चलते इन्होंने अटल जी के भाषणों का दूसरा संग्रह प्रकाशित किया है।

अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों की खासियत यह है कि वह अपने भाषणों में शब्द प्रहार जमकर करते हैं, लेकिन कमर के नीचे नहीं। शायद यही वजह है कि लोग ज्यादा देर तक उनसे नाराजगी नहीं रख पाते हैं। अटल जी जब शब्दों का प्रयोग करना शुरू करते हैं तो लगता है, मानों शब्द उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं, लेकिन अपशब्द उनसे कोसों दूर भागते हैं। और, अगर गलती से बोलते वक्त जरा सी भी भूल हो जाए तो अटल जी तुरंत खेद व्यक्त करने से भी नहीं चूकते जो उनके बड़प्पन को दर्शाता है। अटल जी जब बोलते हैं तो उनका भाषण केवल सुना नहीं जाता बल्कि, देखा भी जाता है। वह अचानक से भाषण देते हुए अपनी आंखें मूंद लेते हैं, तो कभी अपने कंठ से उभरते शब्दों को अपने कंठ में ही रोक कर ऐसा विराम लेते हैं कि उत्सुकता से सारे श्रोताओं के प्राण कंठ तक आ जाते हैं। अचानक ही मासूम बच्चे जैसी मुस्कान उनके चेहरे पर ऐसे बिखर जाती है कि सभा में उपस्थित लोगों का मातृहृदय जागृत हो जाये। आवाज में उतार-चढ़ाव कोई उनसे सीखे। उनकी केवल जिह्वा नहीं बल्कि, सारा शरीर बोलता है। अगर उनकी जिह्वा पर मां सरस्वती का निवास है, तो उनकी भाव-भंगिमाओं व हाथों की ऊंगलियों पर नटराज विराजते हैं।

संक्षेप में कहा जाए तो ‘राजनीति के उस पार’ पुस्तक में अटल जी के जो गैर-राजनीतिक भाषणों का संग्रह है, वह आम लोगों को निराशा से आशा की ओर ले जाने वाला है। मन को जागृत करने वाला है, अटल जी भाषण के बीच अपनी कविता की एक पंक्ति बोलते हैं ”छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता’’। जिससे साफ झलकता है कि अटल जी की कविताएं और भाषण लोगों के लिये सदैव प्रेरणा का सागर बने रहे हैं।

प्रीति ठाकुर

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