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सल्लेखना (संथारा) आत्महत्या नहीं, आत्मसाधना है

सल्लेखना  (संथारा) आत्महत्या नहीं, आत्मसाधना है

जैन धर्म की सबसे प्राचीन आत्मउन्नयन की परम्परा है, संथारा (संलेखना)। इस पर राजस्थान हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है और इसे अपराध घोषित किया है। जबकि संथारा, आत्महत्या नहीं, आत्मसाधना है। संथारा एक अहिंसक और आध्यात्मिक साधना पद्धति है, इसलिए इसके समर्थन में होने वाले उपक्रम भी अहिंसक एवं आध्यात्मिक ही होने चाहिए। मनुष्य जीवन निवृत्ति प्रधान जीवन है। निवृत्तिमूलक प्रवृत्तियां सांसारिक एवं शारीरिक विषय भोगों से अनासक्त/विरक्त और रत्नत्रय के संवद्र्धन हेतु होने से भव भ्रमण करने में समर्थ कारण हैं।

संथारा समाधि एवं साधनामय मृत्यु का उपक्रम है। जो मरण ज्ञानपूर्वक होता है वह सुखद एवं भव भ्रमण विनाशक होता है। प्रत्येक जीव मरण समय में होने वाले दु:खों से भयभीत है, मरण से नहीं। अपने मरण को सुखद और स्वाधीन करने के लिए मरण संबंधी ज्ञान होना आवश्यक है। मरण का ज्ञान अर्थात सल्लेखनामरण/समाधिमरण करने का ज्ञान होना आवश्यक है। सल्लेखनाव्रत धारण करने के लिए द्रव्यश्रुत का ज्ञान बहुत हो यह आवश्यक नहीं है, किन्तु सल्लेखना के योग्य परिश्रम-विशुद्धि रूप भावश्रुत का ज्ञान होना आवश्यक है।

मनुष्य जीवन का सर्वोत्कृष्ट महोत्सव मृत्यु है। आत्मकल्याण करने के लिए सल्लेखना धारण कर अपनी मृत्यु का महोत्सव मनाना चाहिए। मनुष्य जीवन में राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक आदि विविध प्रकार के उत्सव मनाने का अवसर प्राप्त होता है। प्रत्येक उत्सव का अपनी-अपनी जगह महत्व है। उनके महत्व का कारण उनमें अनेक विशेषताएं हैं। जो विशेष समय पर आते हैं, अनेक बार मनाने का अवसर प्राप्त होता है, किन्तु मृत्यु महोत्सव जीवन के अंत में एक बार ही मनाने का अवसर प्राप्त होता है।

सल्लेखना धर्मध्यान सहित साम्य भावपूर्वक ज्ञान-वैराग्य युक्त शीतल छाया में निर्विकल्प संपन्न होती है। इसमें शील आदि धर्मों की रक्षा एवं निज शुद्धस्वरूप की स्थिरता होने से सल्लेखनाधारी निर्वाण की ओर अग्रसर होता है। समाधि चाहने वाले मुनियों, ज्ञानी श्रावकों सल्लेखना धारण करने से सांसारिक एवं शारीरिक किसी भी प्रकार के विषय-भोग भोगने का प्रयोजन नहीं होता है, अपितु शाश्वत अतीन्द्रिय आनंद प्राप्ति का प्रयोजन होता है, इसलिए आराधक अपने उपयोग को संसार एवं शरीर संबंधी विषयों में न भ्रमाते हुए निज शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थिर करता है तथा साम्य भावों के साथ शरीर का उत्सर्ग कर देता है। विनश्वर शरीर के लिए अविनश्वर शरीर को नहीं छोड़ता है। शरीर के विनाश होने पर पुन: दूसरा शरीर मिल जाता है, किन्तु निज शुद्धात्म धर्म के छूटने पर उसका पुन: मिलना उदधि के मध्य गिरी हुई मुद्रिका का पुन: मिलने के समान दुर्लभ है।

सल्लेखना धारण करने का प्रयोजन है-दुखों का क्षय हो, कर्मों का क्षय हो, रत्नत्रय की एकता की पूर्णता हो। इस अवसर में मिथ्यात्व-रागादि विकल्प जाल सहित निर्विकार, चित-चमत्कार, विज्ञानधन, अनादिनिधन, स्वस्वरूप में अनुष्ठान करना मात्र ही मेरा प्रयोजन है। मैं सांसारिक एवं शारीरिक प्रयोजन नहीं साधना चाहता हूं। मैंने तो सुगति का मार्ग ग्रहण कर लिया है।

मैं सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र की एकता रूप पूर्णता की सिद्धि के प्रयोजनार्थ इस देह में रह रहा था। इसलिए देह की स्वस्थ्य या अस्वस्थ्य अवस्था से मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। देह का परिणमन भी मेरे वश में नहीं है। अत: सल्लेखना धारण करने का एकमात्र प्रयोजन यह है कि सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र और तप-आराधनापूर्वक निज शुद्ध आत्मस्वरूप में निमग्न रहते हुए मरण का ही अन्त करना है तथा सल्लेखना पूर्वक मरण किये बिना भव भ्रमण का अंत नहीं आता है। भव का अंत करना ही सल्लेखना का प्रयोजन है।

मरण के समय सल्लेखना धारण करने के इच्छुक आराधक को पूर्व से ही सल्लेखना का अभ्यास सैनिक के समान करते रहना चाहिए। जैसे सैनिक युद्धकला का अभ्यास प्रतिदिन करता रहता है। रणभेरी बजने पर वह युद्ध के लिए सहर्ष साउत्साह युद्ध के मैदान में आ जाता है। धैर्य और विवेक से युद्ध करता हुआ शत्रुओं को पराजित कर अपनी विजय पताका फहराता है। वैसे ही आराधक जीवन में व्रत-तप आदि द्वारा सल्लेखना धारण करने का अभ्यास प्रतिदिन करता रहता है। मरण समय आने पर आराधक मृत्यु को जीतकर आत्म स्वातंत्रय की ध्वजा फहराता है।

सल्लेखनामरण से स्वेच्छापूर्वक शरीर-विसर्जन/मरण नहीं है। यद्यपि सल्लेखनामरण की विधि में प्रीतिपूर्वक मरण को ग्रहण करना कहा गया है। प्रीति का अर्थ प्रेम, उत्साह है, स्वेच्छा नहीं। सल्लेखना का प्रीतिपूर्वक धारण मरण के अंत समय में मरण का अंत करने के लिए किया जाता है। जीव अपने ही परिणामों से प्राप्त इन्द्रिय, बल, और आयु के प्रति निर्मोह रहता है तथा भविष्य में भी इनकी प्राप्ति की चाह नहीं रखता है।

सल्लेखना का धारण आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यानपूर्वक निदान आदि रहित शुद्ध भावों से किया जाता है। जबकि स्वेच्छापूर्वक जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों से घबराकर स्वर्गादिक के भोगों की अभिलाषा से या अपना नाम अमर करने की कामना से किया जाता है जो कि अज्ञान मरण है, अज्ञानजनित भावातिरेक है। मरण के यथार्थ स्वरूप से अनभिज्ञ गुरु के उपदेश से जल-प्रवाह, जल-प्रपात, जलाशय में डूबकर, ऊपर से कूदकर, शस्त्रों से तन पृथक कर, जमीन में दबकर, अग्नि में प्रवेश कर स्वर्ग प्राप्ति की कामना से किया गया मरण स्वेच्छामरण है, जो कि सल्लेखना से सर्वथा विपरीत है। अत: स्पष्ट है कि सल्लेखना-मरण, स्वेच्छा-मरण नहीं है, क्योंकि सल्लेखना में स्वेच्छा नहीं है, अपितु मरण समय आने पर छूटते हुए शरीर को निर्ममत्व भाव से छोड़ा जाता है।

सल्लेखना का धारण अपने अभिप्रायपूर्वक किया जाता है तो भी आत्महत्या नहीं है, क्योंकि इसके धारण करने में प्रमत्त योग का अभाव है। अप्रमत्त जीव अहिंसक है, वह आत्मघाती नहीं होता है। वह तो पतझड़ में झड़ते हुए पके पत्ते की भांति छूटते हुए शरीर को छोड़ता है। इसलिए सल्लेखनामरण आत्महत्या नहीं है। आत्महत्या तो तब होती है जब प्रमत्त योगपूर्वक प्राणों का घात किया जाता है। जैसे कषायवश, विषभक्षण कर, शस्त्र घातकर, श्वासादि का निरोध कर, कूप आदि जलाशय में डूबकर पर्वत आदि उच्च स्थानों से गिरकर, भवन आदि के ऊपर से कूदकर, शरीर में आग लगाकर मरण करने में प्रमत्त योग होने से हिंसा है/आत्मघात है/आत्महत्या है, परन्तु सल्लेखनामरण में मरण को अवश्यंभावी जानकर रागादि के अभावपूर्वक शरीर छोड़ा जाता है, इसलिए आत्मघात नहीं है।

जगत के जीव द्रव्य प्राणों के घात को तो आत्मघात स्वीकार करते हैं, किन्तु विषय कषायों से ग्रसित शरीर से एकत्वभाव रखते हुए इन्द्रियाधीन होकर, अभक्ष्य आदि का सेवन करते हुए कुस्थानों में दुध्र्यान के साथ मरण करना आत्मघात नहीं मानते हैं, जबकि ऐसा मरण आत्महत्या ही है।

जो मरण संसार का किनारा न लावे, भाव की वृद्धि करे वह आत्मघात नहीं तो फिर क्या है? क्योंकि सल्लेखनामरण करने से आराधक को संसार से पार होने का किनारा मिल जाता है, भव का अंत हो जाता है किन्तु जिस मरण से संसार से पार होने का किनारा न मिले वह मरण आत्महत्या ही है।

जगत में जिन जीवों की परिणति/परिणाम/भाव संसार एवं शरीर भोगों से अनासक्त हैं तथा अन्य पर द्रव्यों से भिन्न अपने आत्म-स्वभाव को जानते मानते हैं उनका मरण ही सल्लेखनामरण है। यद्यपि सल्लेखना धारण करने में बुद्धिपूर्वक आहार आदि का क्रमश: त्याग किया जाता है। विकारों के शमन होने से शरीर का परिणमन सल्लेखना के अनुकूल रहता है। शरीर में ऐसा कोई विकार पैदा नहीं होता है कि जिससे आराधक के परिणामों में आत्र्त-रौद्र ध्यान हो।

सल्लेखनामरण आत्महत्या इसलिए भी नहीं है कि सल्लेखना का आराधक शरीर एवं बाह्य साधनों को पदोन्नत शासकीय कर्मचारी की भांति छोड़ देता है। जैसे किसी शासकीय कर्मचारी की पदोन्नति होकर स्थानान्तर होता है, तब वह शासकीय कर्मचारी शासकीय समस्त साधन/उपकरण एवं आवास स्थान को छोड़कर चला जाता है। प्राप्त उन्नत पद को सहज ही संभाल लेता है वैसे ही जिनेन्द्र शासन का अनुसरण करने वाला जीव मोक्षपद प्राप्त करने के लिए पदोन्नत होता हुआ सल्लेखनामरण करता है। इसलिए वह शरीर एवं बाह्य साधनों को निर्ममत्व भाव से छोड़ देता है तथा प्राप्त भावी शरीर को ग्रहण कर लेता है। इसलिए भी सल्लेखनामरण, आत्महत्या नहीं है।

आत्महत्या तो तब होती है जब जीव का भाव संसार एवं शरीर भोगों में आसक्त हो। आत्महित की भावना से शून्य हो, देहादि पर द्रव्यों में एकत्व बुद्धि हो, स्त्री-पुत्र आदि चेतन पदार्थों में अति ममत्व हो। शरीर की उत्पत्ति में अपना उत्पाद, उसके विनाश में अपना विनाश, उसके विकास में अपना विकास मानता हो तथा दु:खों के कारणभूत अशुचि, विपरीत बंध स्वरूप आस्रव भावों में सुख समझता हो। ऐसे अन्यथा श्रद्धान-युक्त जीव का मरण आत्महत्या है।

सल्लेखना और आत्महत्या में बहुत बड़ा अन्तर है। सल्लेखना धारण करने में जीव के परिणाम पर द्रव्य एवं पर भावों से भिन्न एवं पर कर्ता-भोक्ता रहित होते हैं तथा अपने शुद्ध चैतन्य में ही स्थिर रहते हैं। बाह्य में होने वाली अनुकूलता एवं प्रतिकूलता से अपना लाभ-अलाभ न मानते हुए साम्य भावों के साथ सल्लेखना धारण की जाती है। किन्तु आत्मघात में सांसारिक एवं शारीरिक विषय भोगों की चाह होती है। इच्छा के अनुरूप विषय भोगों के आसार दिखाई न देने पर, कठोर वचन सहन न होने पर, अपमानजनित दु:ख/भय होने पर आत्महत्या करता है।

सल्लेखना धारण करने में विषयों को क्रमश: विधिपूर्वक किया जाता है। आत्मस्वरूप की स्थिरता की वृद्धि के हेतु विद्यार्थी का शाला और पुरानी पुस्तकों की भांति शरीर आदि को छोड़ दिया जाता है। जिस प्रकार विद्यार्थी ज्ञानवृद्धि हेतु निम्नस्तरीय शाला और पुस्तकों को छोड़कर उच्चस्तरीय शाला और पुस्तकों को ग्रहण कर लेता है। उसी प्रकार आराधक निजशुद्ध स्वरूप की स्थिरता की वृद्धि हेतु जीर्ण शरीर एवं बाह्य अन्य साधनों को छोड़ देता है और नया शरीर और साधनों को ग्रहण कर लेता है अर्थात योग्य आत्म-साधना का कार्य आगे बढ़ाने के लिए पूर्व शरीर को छोड़ नया शरीर ग्रहण कर लेता है किन्तु आत्महत्या इसके बिल्कुल विपरीत है।

                     प्रस्तुति: ललित गर्ग

गणि राजेन्द्र विजय

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