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भाजपा और कांग्रेस दोनों खुश फिर राजस्थान निकाय चुनाव में जीता कौन?

भाजपा और कांग्रेस दोनों खुश फिर राजस्थान निकाय चुनाव में जीता कौन?

राजस्थान के 31 जिलों में अजमेर नगर निगम सहित 129 स्थानीय निकायों के चुनावी नतीजों को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस अपनी-अपनी जीत के दावे के साथ जश्न मनाने में मशगूल हैं। लेकिन, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के गृह जिले धौलपुर-झालावाड़ में भाजपा की शर्मनाक पराजय से पार्टी की खिसकती नींव और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के संसदीय क्षेत्र अजमेर में पार्टी की हार के परिप्रेक्ष्य तथा निर्दलीयों के दबदबे में प्रदेश की भावी राजनीति के संकेतों को समझने की भूल दोनों ही राजनीतिक दलों के संगठन एवं कर्णधारों के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है। इसलिए इन चौकाने वाले परिणामों के गहन विश्लेषण से कड़ा सबक लेने की जरूरत महसूस की जाने लगी है। मुख्यमंत्री के अलावा सूबे के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया सहित 11 मंत्रियों के प्रभार वाले जिलों में भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा है तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के अलावा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी के निवार्चन क्षेत्र नोखा (बीकानेर) में 35 वार्डों में से कांग्रेस को महज एक वार्ड में जीत हासिल हुई है। वहीं राकांपा ने फिर से अपना बोर्ड बनाया है। अलबत्ता पार्टी के मुख्य सचेतक गोविन्द सिंह डोटासरा के सीकर जिले में कांग्रेस ने सात निकायों में केवल श्रीमाधोपुर को छोडकऱ शेष सभी में विजय का परचम फहराया।

चुनाव में सरकारी मशीनरी के कथित दुरूपयोग, भय फैलाने इत्यादि आरोपों के बावजूद भाजपा ने विधानसभा, लोकसभा, निकाय चुनाव का प्रथम चरण और पंचायत चुनाव के बाद अब पांचवे चुनाव में भी जीत का सिलसिला बरकरार रखा है। लेकिन, अब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके सांसद पुत्र दुष्यंत सिंह के निवार्चन क्षेत्र झालावाड़ और गृह जिले धौलपुर में भाजपा पिछड़ गई है। इसके बावजूद भाजपा प्रदेश में मिली जीत पर गदगद है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस वसुंधरा को उनके गृह जिले में मात मिलने पर वाह-वाही लूट रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का कहना है कि विधानसभा उपचुनाव तथा पंचायत चुनाव में कांग्रेस का मत प्रतिशत बढ़ा है। मुख्यमंत्री को तो गृह जिले में ही नकार दिया गया। उधर, मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया थी- जनता ने हमारे डेढ़ वर्ष के सुशासन पर मोहर लगाई है। इस चुनाव में सफलता इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश-प्रदेश विकास के नये आयाम छू रहा है।

स्थानीय निकाय चुनावों में अक्सर सत्तारूढ़ दल के साथ चलने की प्रवृत्ति देखी जाती है लेकिन 2010 में कांग्रेस शासन के दौरान हुए 126 निकायों के चुनाव में भाजपा ने इस ट्रेंड को बदलकर 57 निकायों तथा कांग्रेस ने 49 निकायों पर कब्जा जमाया था। इस बार 129 निकायों के चुनावों में भाजपा ने अजमेर नगर निगम तथा 15 नगर परिषदों में महज चार तथा 113 नगरपालिकाओं में से 62 में स्पष्ट बहुमत हासिल किया। कांग्रेस ने आठ नगर परिषदों में बढ़त ली तथा करौली में निर्दलीयों को बहुमत मिला वही गंगापुर सिटी, बूंदी परिषद में भाजपा-कांग्रेस पार्षदों की संख्या बराबरी पर थी। इसी तरह नगर पालिकाओं में कांग्रेस को 25, निर्दलीय व अन्य को 17 निकायों में बढ़त मिली और 9 पालिकाओं में भाजपा-कांग्रेस के बराबर पार्षद थे। लेकिन, शुक्रवार 21 अगस्त को महापौर सभापति के चुनाव में भाजपा ने 67 की जगह 87 निकायों तथा कांग्रेस ने 33 के स्थान पर 37 निकायों में अपना वर्चस्व स्थापित किया। इस प्रकार पिछले चुनाव की तुलना में भाजपा 30 अधिक निकायों पर कब्जा करने में सफल रही तो कांग्रेस को एक दर्जन वार्डों से हाथ धोना पड़ा। भाजपा ने कांग्रेस से बहुमत वाले चार निकाय छीन लिए। निर्दलीयों के समर्थन एवं निवाई, मांडलगढ़, रतनगढ़, प्रतापगढ़ पालिका में हुई वोटिंग से भाजपा को सफलता मिली। अजमेर नगर निगम सहित चार निकायों में लॉटरी से चेयरपर्सन का फैसला हो पाया। चार निकायों में निर्दलीय तथा नोखा में एनसीपी की चेयरपर्सन चनी गईं। कांग्रेस के विरोध के बावजूद भाजपा सरकार द्वारा पंचायती राज संस्थाओं की तरह निकाय प्रतिनिधियों के लिये भी दसवीं कक्षा उत्तीर्ण होने की अनिवार्यता के चलते 23 महिलाओं सहित 63 चेयरपर्सन दसवीं पास है जबकि 36 स्नातक एवम 14 स्नातकोत्तर चेयरपर्सन चुने गये हैं। चुनाव में 45 प्रत्याशी निर्विरोध पार्षद चुने गये, जिनमें 23 भाजपा, 13 कांग्रेस तथा 9 निर्दलीय हैं। इसी प्रकार 11 निकाय प्रमुखों का निर्वाचन भी निर्विरोध हुआ। कुछ वार्डों में दोनों दलों द्वारा घोषित प्रत्याशियों ने नामांकन पत्र तक दाखिल नहीं किया तो कुछ वार्डों में अधिकृत प्रत्याशियों का नामांकन खारिज होने पर निर्दलियों को समर्थन देने की मजबूरी रही। इस चुनाव में काफी संख्या में निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव में उतरे जिनमें भाजपा-कांग्रेस के बागी भी शामिल थे। हालात यहां तक पहुंचे कि दोनों दल सभी वार्डों में अपने उम्मीदवार खड़े नहीं कर पाये। कुछ क्षेत्रों में ऐसा चुनावी रणनीति के तहत भी किया गया। पिछली बार की तुलना में निर्दलीयों को अपेक्षाकृत अधिक सफलता भी मिली और उनके समर्थन से भाजपा अपने बोर्ड बनवाने में भी कामयाब रही। अजमेर नगर निगम में भाजपा को केवल स्पष्ट बहुमत मिला (60 में से 31) टिकट वितरण में व्याप्त गुटबाजी के चलते पूर्व पार्षद भारती श्रीवास्तव को टिकट नहीं मिलना उनकी बेटी रूचि श्रीवास्तव (22) को नागवार गुजरा और वह गुडग़ांव में मल्टीनेशनल कंपनी का लाखों का पैकेज छोड़कर चुनाव मैदान में निर्दलीय उतरीं तथा सबसे कम उम्र की पार्षद बन गईं।

दसवीं तक की शैक्षणिक योग्यता की अनिवर्याता के बावजूद निकाय प्रमुखों के चुनाव में 33 पार्षदों के वोट खारिज हुए हैं जिसमें किशनगढ़ (अजमेर) नगर परिषद में सर्वाधिक चार वोट शामिल हैं वहीं राज्य सरकार निकायों को हाईटेक बनाने के लिये प्रभावी कदम उठा रही है। सितम्बर माह से स्मार्ट राज प्रोजेक्ट के प्रथम चरण के तहत सातों निगमों तथा पच्चीस नगर परिषदों में इसे लागू किया जायेगा। अब निकायों में कई कार्य ऑनलाइन होंगे।

पिछले चुनाव में भाजपा ने छ: नगर निगमों पर कब्जा किया था। इस बार अजमेर निगम पर भाजपा ने कब्जा तो कर लिया, लेकिन महापौर के चयन में पार्र्टी की गुटबाजी ने जो फजीहत करवाई है, उसकी थू-थू हो रही है। निगम के इस चुनाव पर सभी की निगाहें थी। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का यह संसदीय क्षेत्र रहा है और वह केन्द्र में मंत्री रह चुके हंै। अब भाजपा के प्रो. सांवरलाल जाट केन्द्र में मंत्री हैं। अजमेर उत्तर से विधायक प्रो. वासुदेव देवनानी और दक्षिण से अनीता भदेल वसुंधरा मंत्रिमंडल में स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री हैं। भाजपा की तरह कांग्रेस भी गुटबाजी की शिकार थी, इसके बावजूद कांग्रेस ने 60 सदस्यीय निगम में भाजपा को 31 पार्षदों के साथ बहुमत की दहलीज पर रोकने में सफलता हासिल की। कांग्रेस को 22 तथा निर्दलीयों को सात वार्डों में सफलता मिली। अजमेर उत्तर में 28 में से भाजपा के 19 तथा दक्षिण में 32 में से 12 पार्षद चुने गये। लिहाजा देवनानी गुट के धर्मेन्द्र गहलोत को महापौर का प्रत्याशी बनाया गया। लेकिन, भाजपा के सुरेन्द्र सिंह शेखावत बगावत पर उतर आये। उन्हें अनीता भदेल का करीबी माना जाता है। मुख्यमंत्री के स्तर पर बात पहुंची, लेकिन अन्तत: चुनाव हुआ। कांग्रेस तथा निर्दलीयों के समर्थन से शेखावत को तीस वोट मिले तथा अन्य तीस भाजपा पार्षदों ने गहलोत का साथ दिया। दोबारा लॉटरी डालने पर गहलोत की किस्मत खुली। वह पहले भी महापौर रह चुके हैं। कांग्रेस ने दोबारा लॉटरी को चुनौती देने का मन बनाया है।

वर्ष 2015 के चुनाव में 76.19 प्रतिशत रिकॉर्ड मतदान हुआ। कुल मतदाताओं की संख्या 37.12 लाख थी। वर्ष 2010 के चुनाव में भाजपा को 36.78 फीसदी कांग्रेस को 36.35 प्रतिशत तथा निर्दलीयों को 25.08 फीसदी मत मिले थे। लेकिन, चेयरपर्सन के सीधे चुनाव में 39.87 एवं कांग्रेस को 37.19 प्रतिशत वोट हासिल हुए। वर्ष 2015 के चुनाव में भाजपा का मत प्रतिशत 37.59 और कांग्रेस का 34.18 प्रतिशत रहा। वहीं निर्दलीय 26.99 फीसदी वोट लेने में सफल रहे। अब यह देखना है कि निकाय चुनावों में जिलों के अनुसार हार-जीत का विश्लेषण किस तौर-तरीके से किया जाता है और उसका प्रतिफल क्या निकलता है।

जयपुर से गुलाब बत्रा

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