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ज्ञान न पूछो नेताओं से पूछ लीजिए जात

ज्ञान न पूछो नेताओं से पूछ लीजिए जात

वोट और बेटी जाति में ही देने चाहिये। भारतीय राजनीति की इस कहावत पर बिहार में तो सोलह आने अमल होता है। यही वजह है कि लोग कहने लगे हैं, कि जातिवाद तो बिहार के डीएनए में ही है। तभी तो जातिगत बंधन तोडऩे का अभियान चलाने वाले जय प्रकाश नारायण के बिहार आंदोलन से जुड़े लालू यादव और नीतीश कुमार जैसे अनुयायी इन दिनों जातिवाद की राजनीति कर रहे हैं। लालू ने तो अपनी जाति के वर्चस्व को कायम करने के लिए डेढ़ दशक बिहार में जंगलराज कायम कर दिया। नीतीश कुमार अति पिछड़ा और दलितों को ‘बांटो और राज करो’ की राजनीति करते रहे हैं। भाजपा इस जातिवादी राजनीति को काटने के लिए जवाबी जातिवादी राजनीति करती रही है। इस तरह से बिहार में हर पार्टी अपनी तरह से जाति साधना करने में लगी है। बिहार जातिवाद का ऐसा भंवर बन चुका है जिसने राज्य के विकास को अवरूद्ध कर दिया है। इसके बावजूद जातिवादी राजनीति राज्य का पीछा नहीं छोड़ रही है।

राजद सुप्रीमो लालू यादव जातियों की गोलबंदी के आधार पर पंद्रह साल तक इस राज्य के भाग्यविधाता’ बने रहे। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के वीपी सिंह सरकार के फैसले के बाद राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। लालू प्रसाद ने उस दौर में पिछड़ी जातियों को अपने साथ गोलबंद करने के लिए अगड़ी जातियों को निशाना बनाया गया था। तब उनका नारा हुआ करता था भूरा बाल साफ करो (यानी, भूमिहार, राजपूत ,ब्राह्मण और कायस्थ) यह जातीय समीकरण कुछ ही वर्षों में बेअसर होने लगा तो उनका सारा जोर माय (मुस्लिम-यादव) के सामाजिक आधार पर हो गया। अब इसमें भी ह्रास हो रहा है। जदयू सुप्रीमो नीतीश कुमार सत्ता में आए और कुछ वर्षों में बगैर किसी हल्ला-हंगामा के उन्होंने भाजपा की छाया से बाहर आरक्षण की बंदरबांट करके अपना अलग सामाजिक आधार तैयार किया। अति पिछड़ा (राज्य की कोई 33 प्रतिशत आबादी) और महादलित इसके मुख्य घटक थे। इस नजरिये से उन्होंने लालू से अलग राह अपनाकर खुद का जनाधार बनाया।

राज्य में नवंबर में होने वाले विधान सभा चुनाव भी इस जातिवादी खेल का अपवाद नहीं हैं। बिहार विधान सभा चुनाव की आहट के साथ ही सभी राजनीतिक दल जातीय समीकरण दुरुस्त करने में जुट गए हैं। दलित-महादलित के मुद्दे पर यहां की राजनीति पहले से ही गर्म थी, अब अन्य जातियों की गोलबंदी भी तेज हो गई है। सभी दल विभिन्न जातियों पर पकड़ रखने वाले नेताओं को अपनी ओर खींचने में लगे हैं, वहीं जातीय-सम्मेलनों का दौर भी जारी है। बिहार में चुनाव पहले से ही जातीय आधार पर लड़े जाते रहे हैं। वर्ष 2005 और 2010 के विधानसभा चुनाव में हालांकि जाति-कार्ड के बजाय विकास को मुख्य मुद्दा बनते देखा गया था। लगा था, बिहार के लोग जातीय भावना से अब ऊपर उठ गए हैं, लेकिन वर्ष 2015 आते-आते सभी दलों का जोर फिर जातीय समीकरण बिठाने पर है।

इस बीच, राज्य सरकार ने तेली, बढ़ई और चौरसिया जाति को अति पिछड़ा वर्ग में तथा लोहार जाति को अनुसूचित जाति में शामिल करने का फैसला किया है। सरकार के इस फैसले को भी जाति-साधना के नजरिये से देखा जाने लगा है। पटना में अभी हाल ही में जब चौरसिया सम्मेलन का आयोजन किया गया तो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उसमें बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए थे। इसके अलावा प्रजापति सम्मेलन में लालू प्रसाद पहुंचे थे और उन्होंने अपने अंदाज में समाज के नेताओं का मनुहार भी किया। इसके पहले तेली महासम्मेलन, कुर्मी सम्मेलन, गोस्वामी महासभा का आयोजन हो चुका है, अब कायस्थ सम्मेलन होना प्रस्तावित है।

बिहार में इस साल का विधान सभा चुनाव दिलचस्प होगा। एकतरफा तो बिल्कुल भी नहीं होगा। मुकाबला अब साफ तौर पर नजर आ रहा है। बिहार में जाति के नाम पर पहले और विकास के नाम पर बाद में वोट पड़ता है। इसलिए सुशासन और कुशासन का कोई मतलब नहीं रह जाता। गठबंधन के बाद स्थितियां साफ हो गई हैं, कि कौन किसके साथ है। यादव, कुर्मी, मुसलमान एक तरफ हो जाएंगे बाकी जातियां एक तरफ। फिर भी लालू-नीतिश और कांग्रेस के गठबंधन का पलड़ा भारी है क्योंकि, यादव, मुसलमान और कुर्मी को मिलाकर 36.50 प्रतिशत हो जाते हैं। लेकिन, इमसे पेंच यह है कि यादव अब लालू के पीछे एकजुट नहीं हंै, यह लोकसभा चुनाव से स्पष्ट है। फिर चारा घोटाले में सजा होने के बाद से अपनी जाति में भी उनका प्रभाव घटा है।

एक वक्त, लालू के आगे यादव समाज का कोई नेता खड़ा नहीं हो पाता था। लेकिन जब से लालू की पत्नी विधान सभा और बेटी लोकसभा चुनाव हारी हैं, तब से उनके नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे हैं। कभी लालू के ‘हनुमान’ माने जाने वाले रामकृपाल यादव अब बीजेपी में हैं। लालू के साले साधु यादव खुद की पार्टी बनाकर अलग मोर्चा तैयार करने में जुटे हैं। कभी लालू के प्यारे रहे पप्पू यादव फिर से अपनी पार्टी बना चुके हैं।

जदयू में शरद यादव से लेकर विजेंद्र यादव और नरेंद्र नारायण यादव जैसे नेता हैं। कभी लालू का दाहिना हाथ रहे रंजन यादव लालू का साथ छोड़कर अभी तक जदयू में थे, लेकिन अब वह वहां से भी जुदा हो चुके हैं। कहा जाता है कि पप्पू यादव अपने वर्ग के जितने वोट काटेंगे, वह राजद के ही वोट होंगे। आंकड़ों पर गौर करें तो लालू-राबड़ी के कार्यकाल में बिहार की राजनीति पर यादवों का साम्राज्य कायम था। लालू जब पहली बार वर्ष 1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, तब बिहार में यादव विधायकों की संख्या 63 थी। लालू जब राजनीति के शिखर पर थे, तब 1995 में संख्या 86 हो गई। इसके अलावा यदि ओवैसी की पार्टी बिहार में अपने उम्मीदवार खड़े करती है तो वह इसी सेक्युलर गठबंधन के मुस्लिम वोटों में भी सेंध लगाएगी।

12-09-2015

नीतीश की महादलित राजनीति को काटने के लिए भाजपा ने सबसे पहले महादलित नेता जीतन राम मांझी को अपने पाले में किया, जबकि दलित नेता रामविलास पासवान इधर डेढ़ साल से उसके साथ ही हैं। इस तरह भाजपा ने एक तरह से पूरे दलित वोटों को अपने कब्जे में करने की कोशिश की है। भाजपा को भरोसा है कि भूमिहार नेता गिरिराज सिंह और राजपूत नेता राधामोहन सिंह के केंद्रीय मंत्रिमंडल में होने का फायदा उसे इस चुनाव में जरूर मिलेगा।

भाजपा नेताओं को यह उम्मीद भी है कि उपेंद्र कुशवाहा के राजग में होने के कारण लव-कुश (कुर्मी और कोइरी यानी कुशवाहा) जाति के वोटों में भी सेंध लगेगा। वैसे, इन जातियों के वोटों पर पिछले चुनाव तक नीतीश कुमार का एकछत्र राज माना जाता रहा है, परंतु कुशवाहा के अलग दल बना लेने से कुछ वोट कटने का अंदेशा जेडीयू को भी है। उपेंद्र ने राजग के सामने खुद को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाने की दावेदारी भी पेश कर दी है।

हालांकि नीतीश समर्थकों का कहना है, कि नीतीश कुमार बिहार के विकास का चेहरा हैं। उन्होंने कभी जात-पात की राजनीति नहीं की है। उनका दावा है कि नीतीश के समर्थक सभी जाति में हैं। इधर, सांसद पप्पू यादव भी अलग पार्टी बनाकर ‘यादव नेता’ बनने में लगे हुए हैं। पप्पू का दबदबा वैसे तो पूरे कोसी क्षेत्र में माना जाता है, लेकिन तीन जिले- पूर्णिया, सहरसा और मधेपुरा में खास प्रभाव माना जाता है। बिहार में लालू प्रसाद की यादवों और मुस्लिम वोटर्स पर खासी पकड़ मानी जाती रही है। आज बिहार में विभिन्न दलों के नेता जिस वोट बैंक को लेकर सबसे ज्यादा आशंकित हैं, वह है यादवों का वोट।

मोदी को भले ही बिहार में मौजूदा जातिवाद से अफसोस हो, लेकिन खुद उनकी पार्टी चुनाव प्रचार में जातिवाद का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। पार्टी अभी से जातिगत कार्ड खेल रही है और दावा किया है कि मौर्य शासक, चंद्रगुप्त और अशोक, जिन्होंने पाटलिपुत्र पर शासन किया, वे खुद पिछड़ी जाति यानी कुशवाहा या कोइरी थे। इसे दुर्भाग्यपूर्ण माना जा सकता है कि क्यों भाजपा इस जातीय झंझट में पड़ गई, जबकि इसकी यूएसपी विकास का मंत्र है और इसी एजेंडे पर इसे लोकसभा चुनाव में जीत भी मिली थी। इसका सीधा मतलब है कि पार्टी खुद यह मान रही है कि जातीय समीकरण को काटते हुए चुनाव जीतने की उसकी डगर आसान नहीं है। भाजपा राज्य में सिर्फ ‘मामूली जीत’ की ही उम्मीद कर सकती है। जाति के नाम पर राजनीति नहीं करने का दावा करने वाली भाजपा ने इन चुनावों में खुल कर जाति का सहारा लिया है। उसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अतिपिछड़ा होने को खूब प्रचारित किया है ।

बिहार विधान सभा के चुनाव में सभी दल हर हथकंडा अपनाकर जीतना चाहते हैं। इस बार बिहार के चुनाव की डोर दिल्ली की राजनीति से भी जुड़ी हुई है। बिहार की हार जीत सारे राष्ट्रीय परिदृश्य को प्रभावित करेगी। अगर बिहार की धरती में भाजपा टीम को धक्का लगा तो दिल्ली विधान सभा चुनावों के बाद यह उसके नेतृत्व पर भारी होगा। सिर्फ इतना ही नहीं, इसका असर उत्तर प्रदेश सहित पूरे उत्तर भारत पर पड़ेगा। भाजपा के भीतर नरेंद्र मोदी और अमित शाह के एकछत्र नेतृत्व पर सवाल उठने लगेंगे। वहीं अगर नीतीश-लालू यादव और कांग्रेस गठबंधन हारा तो बिहार और देश की राजनीति में यह बड़ा परिवर्तन होगा। सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई के योद्धाओं को शायद अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ेगा।

सतीश पेडणेकर

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