ब्रेकिंग न्यूज़ 

बिहार का महासंग्राम कौन बनेगा बाजीगर?

बिहार का महासंग्राम  कौन बनेगा बाजीगर?

बिहार राज्य सामाजिक आंदोलन, राष्ट्रीय आंदोलन और बदलाव के तमाम आंदोलनों का गवाह रहा है। शासन और सत्ता के सबसे बुरे, जर्जर दिनों से लेकर वहां के लोगों ने जय-पराजय के कई दौर को देखा है । ऐसे में पूरी राजनीतिक लड़ाई विकास और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे पर सिमटती जा रही है। दो ध्रुवीय चुनाव की पृष्ठभूमि बन रही है। एक का नायक भाजपा तो दूसरे का जदयू बन रहा है। राष्ट्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस इस बार सहयोगियों के सहारे राजनीति की चौसर में उतरी है।

बिहार की धरती पौ फटने और सूरज की सुनहरी किरणों का इंतजार कर रही है। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान को भी नई हलचल देखने की उम्मीद बंध गई है। सेनाएं सज रही हैं। सबको बस चुनाव आयोग के उद्घोष का इंतजार है। इस बार का बिहार विधान सभा चुनाव इसलिए भी काफी दिलचस्प होगा, क्योंकि राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार और जदयू से लेकर भाजपा तथा स्वतंत्र एजेंसियों ने दर्जनों सर्वे कर लिये हैं। सबके पास अपने गणितीय आंकलन का फॉर्मूला है। बस केवल प्रमेय और बीज-गणितीय सूत्र का सिद्ध होना बाकी है।

बिहार विधान सभा का आगामी चुनाव भी अपने आप में तमाम गणितीय जटिलताएं समेटे है। इसलिए अभी इसकी भविष्यवाणी भी उतनी आसान नहीं है। वैसे भी बिहार के लोगों के बारे में तीन बातें आम हैं । पहला खूब छककर खाते हैं, दूसरा खूब पढ़ते हैं और अंत में काफी जटिल राजनीति करते हैं। ऐसे में रायसीना हिल का भी माथा चकराया हुआ है।

बिहार राज्य सामाजिक आंदोलन, राष्ट्रीय आंदोलन और बदलाव के तमाम आंदोलनों का गवाह रहा है। शासन और सत्ता के सबसे बुरे, जर्जर दिनों से लेकर वहां के लोगों ने जय-पराजय के कई दौर को देखा है। ऐसे में पूरी राजनीतिक लड़ाई विकास और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे पर सिमटती जा रही है। दो ध्रुवीय चुनाव की पृष्ठभूमि बन रही है। एक की नायक भाजपा तो दूसरे की जदयू बन रही है। राष्ट्रीय राजनीतिक दल कांग्रेस इस बार सहयोगियों के सहारे राजनीति की चौसर में उतरी है।

12-09-201510 करोड़ 41 लाख (2011 की जनगणना) की आबादी वाले बिहार में कुल 243 विधान सभा सीटें हैं। राज्य में करीब 6 करोड़ 68 लाख मतदाता (3.56 करोड़ पुरूष, 3.11 करोड़ महिलाएं और 2169 अन्य)हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए 40 (38+2) सीटें आरक्षित हैं। 203 सीटों पर सामान्य वर्ग के प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमाएंगे।

मतदाताओं की दृष्टि से राज्य में 18+9 साल की आयु वर्ग का 3.69, 20-29 आयु वर्ग का 31, 30-39 आयु वर्ग का 27.8, 40-59 साल आयु वर्ग का 11.05′ प्रतिशत मतदाता है। 60-69 साल आयु वर्ग के 07, 70-79 आयु वर्ग के 2.79 और शेष 80 साल और इससे अधिक उम्र के मतदाता हैं। यानी युवा मतदाता(18-40 वर्ष)का प्रतिशत करीब 64 प्रतिशत से अधिक है। जाहिर है जो दल इसे जोड़ पाएगा, बिहार की सत्ता भी उसी के हाथ में होगी।

राज्य में विकास को आधार बनाकर देखा जाए तो 2013-14 में बिहार 15 प्रतिशत की दर से विकास कर रहा था। 2015-16 में यह दर 13.09 प्रतिशत पर आ गई है। राज्य में आज भी 65 प्रतिशत भूमिहीन है। 42.5 प्रतिशत लोगों के पास पक्का मकान है। 67.8 प्रतिशत साक्षरता दर है। 33.74 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। प्रति व्यक्ति आय भी 15,506 रूपये है। अधिकांश हिस्से में बिजली, पीने का साफ पानी, दवा, पढ़ाई-लिखाई, सड़क जैसी मूलभूत चीजों का अभाव है। बिहार का युवा जीवन के सपने देखने में सबसे आगे है। पढऩे की जबरदस्त भूख है। मौसम और परिवेश साथ दे तो फसल, अनाज, सब्जियों की पैदावर भरपूर होती है, लेकिन रोजगार के अवसर नदारद हैं। कल-कारखानों के मामले में बेहद पिछड़े हैं। मजदूरों के दूसरे राज्यों में जाकर काम करने और युवाओं के रोजी-रोटी तलाशने से ही जीवन चल पाता है। यही वजह है कि देश के हर कोने से लेकर दुनिया के तमाम देशों तक बिहार के युवा फैले हैं।

कानून व्यवस्था

पिछले कुछ दशक से लगातार चिंता का विषय बनी है 15 साल के राष्ट्रीय जनता दल के शासन के दौरान अपहरण, लूट, हत्या, बलात्कार में आकंठ डूब जाने के कारण लालू प्रसाद के शासन काल को ‘जंगलराजÓ तक की संज्ञा दी जाने लगी थी। इसी को मुद्दा बनाकर 2005 में भाजपा-जद(यू)गठबंधन सत्ता में आया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पहला कार्य विकासोन्मुखी रहा। गठबंधन ने दूसरा चुनाव भी इसी बिना पर लड़ा और जोरदार सफलता मिली। यहां तक कि नीतीश कुमार के समर्थकों ने उन्हें विकास पुरूष और सुशासन बाबू तक कहना शुरू कर दिया, लेकिन 2014 में हुए लोकसभा चुनाव से पहले यह गठबंधन टूट गया। 2005 से 2013 के बीच नजर डाले तो 2005 में हत्या की जहां 3423 घटनाएं हुई थी, वहीं बलात्कार की 973, डकैती की 2379 और अपहरण के 2226 मामले प्रकाश में आए।

इसके बाद 2013 में 3441 हत्या के, 1128 बलात्कार, 1521 डकैती तथा 5506 अपहरण की घटनाएं हुईं। 2010 में 2821 दलितों के उत्पीडऩ की घटनाएं हुईं थीं और 2013 में इस तरह के 4670 मामले प्रकाश में आए। ऐसे में कांग्रेस व्यवस्था में बड़ा सुधार आ गया हो। ऐसा भी नहीं कहा जा सकता।

12-09-20152010 बनाम 2014

2010 का विधानसभा चुनाव भाजपा ने जद(यू) के साथ और राजद ने लोजपा के साथ मिलकर लड़ा था इस चुनाव में कांग्रेस भी राजद लोजपा के साथ थी। तब भाजपा की 91, राष्ट्रीय जनता दल की 22, कांग्रेस की 4, लोजपा की 3, अन्य 02, निर्दलय की 06 और जद(यू) की 115 सीटें आईं थीं।

2014 में जद(यू) कांग्रेस अकेले चुनाव लड़े। इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के खाते में 22, राजद के 2, जद(यू) के दो कांग्रेस के दो, लोजपा के 06, आरएलएसपी के खाते में तीन तथा अन्य के खाते में तीन सीटें आईं थीं। इस आम चुनाव में आरएलएसपी, लोजपा और भाजपा साथ थी।

बिहार में भाजपा

2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रवेश को नाक का सवाल बना लिया था। अलग होने की धमकी दी थी। तब भाजपा और जद(यू) ने मिलकर चुनाव लड़ा था। अब वही नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री हैं और उनके करीबी अमित शाह भाजपा अध्यक्ष। भाजपा बिहार के विधानसभा चुनाव की धुरी बन गई है। सभी विपक्षी दलों का इससे मुकाबला है। दिलचस्प यह भी है कि प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष की टीम बिहार में जो मुद्दा, बहस-मुबाहिशा छोड़ कर आ रही है, सभी दलों और मीडिया के लिए वही चर्चा का विषय बन जा रहा है। यहां तक कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद के पैरों तले जमीन खिसकती नजर आ रही है। राजनीति के पंडित भी मानते हैं भाजपा ने चुनाव में हलचल पैदा कर दी है और इससे सबकी पेशानी पर बल हैं।

भाजपाध्यक्ष ने बिना किसी राजनीतिक लाग-लपेट के चुनाव की रणनीति तैयार की है। भाजपा यह चुनाव किसी चेहरे को आगे करके लडऩे की बजाय पार्टी के बूते लड़ती जा रही है। प्रत्याशियों के चयन से लेकर प्रचार तक के लिए निश्चित मानदंड हैं। ऐसे में विरोधियों के बीच खलबली मचना स्वाभाविक है, क्योंकि पार्टी ने मुख्य मुद्दा विकास को बनाया।

रंजना

Компания Ингейтсайт: promo.ingate.ruнесъемное протезирование

Leave a Reply

Your email address will not be published.