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मोदी का चमत्कार या नीतीश का बंटाधार?

मोदी का चमत्कार या नीतीश का बंटाधार?

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

सज्जन की जाति न पूछ कर उसके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का मूल्य होता है न कि उसकी म्यान का। लेकिन, हम कबीर के दोहे को कब समझ सकेंगे? तब ही जब सियासतदान इसे समझने देंगे। मुद्दा बिहार विधान सभा चुनाव में जातीय और धार्मिक समीकरणों के ध्रुवीकरण का है। क्योंकि, दो साल बाद यूपी सहित देश के कई राज्यों में विधान सभा चुनाव होंगे ऐसे में यह चुनाव देश की दिशा और केंद्र सरकार की दशा भी तय करेगा। एनडीए और नीतीश महागठबंधन से लेकर एआईएमआईएम नेता असदुद्दुीन ओवैसी तक इसी रास्ते पर चल रहे हैं। हिन्दीभाषी राज्य बिहार में वोटों के ध्रुवीकरण का यह खेल पुराना है। ऐसे में यह देखना होगा कि बिहार की जनता क्या फैसला करेगी।

जाति-धर्म में बड़ी ताकत है

बिहार के मतदाताओं को चार भागों में बांट सकते हैं, ये हैं- अगड़ी जातियां, पिछड़ी जातियां, दलित वर्ग और मुसलमान। मुख्य रुप से अगड़ी जातियां पिछले करीब तीन दशकों से बीजेपी के साथ हैं। अगड़ों में ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ हैं। सूबे में ब्राह्मण 6 फीसदी, राजपूत-भूमिहार 5-5 फीसदी और कायस्थ 1.5 प्रतिशत हैं जबकि, ओबीसी करीब 52 फीसदी, मुसलमान 16.50 फीसदी और दलितों, महादलितों की आबादी करीब 16 प्रतिशत है।

बिहार की चारों उच्च जातियां और सूबे की 7 फीसदी वैश्य आबादी बीजेपी की पारंपरिक वोटर मानी जाती हैं। कोइरी वर्ग की आबादी 7 फीसदी है। यह भी अभी एनडीए के साथ मानी जाती है। बिहार की बात करें तो 15 साल के लालू-राबड़ी राज में सबसे ज्यादा प्रताडि़त अगड़ी जातियां और वैश्य समुदाय ही रहा है। लालू यादव ने मुस्लिम-यादव, दलितों और अति पिछड़ों के वोटों के दम पर ही बिहार में राज किया। लेकिन, समय के साथ लालू यादव कमजोर हुए। नीतीश कुमार ने उनके सामाजिक समीकरणों को बीजेपी के साथ मिलकर तोड़ दिया था। अब अपना सियासी अस्तित्व बचाने के लिए लालू विरोध के नाम पर ही अपनी सियासी पहचान बनाने वाले नीतीश कुमार, लालू यादव से गलबहियां कर चुके हैं। जबकि, रामविलास पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी एनडीए का हिस्सा हैं। वोटों के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो एनडीए करीब 48 फीसदी वोटों के साथ मजबूत हालत में दिखता है, तो नीतीश-लालू और राहुल का महागठबंधन कमजोर हालत में। बिहार की आबादी में बनिया 7 फीसदी और यादव 15 फीसदी को छोड़कर 32 प्रतिशत पिछड़ी जातियों के लोग हैं। यह वोट मुख्यत: लालू और नीतीश की पार्टी को मिलता रहा है। अगर यह वोट नीतीश महागठबंधन के पक्ष में एकजुट हुआ तो एनडीए गठबंधन भारी मुश्किल में पड़ सकता है। वहीं कांग्रेस का मतलब साथ रहकर जिताओ-हराओ और अकेले रहकर हार जाओ वाली है। वैसे कांग्रेस की साख मुसलमानों, दलितों और ब्राह्मणों के बीच अभी भी अच्छी है। ऐसे में नीतीश महागठबंधन को कांग्रेस समर्थकों का वोट मिला तो एनडीए के लिये बेहद नुकसानदायक होगा। क्योंकि, एनडीए के नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिये कि अगड़े वोटर्स के मतदान का प्रतिशत अन्य जातियों के मुकाबले कम रहता है। इसके कई कारण हैं। बाहर रहकर नौकरी करना और वहां मौजूद लोगों का स्थानीय नेताओं से निजी स्वार्थों का होना इसकी बड़ी वजहें हंै। गुजरात और सूरत में लाखों की संख्या में प्रवासी बिहारी हीरा और कपड़ा के कारखानों में काम करते हैं। ऐसे में सूरत से पांच लाख नमो साडिय़ों के बिहार लाकर बांटनेे के पीछे भी बीजेपी की रणनीति शायद यही है। साडिय़ों के डिब्बों पर नरेन्द्र मोदी की तस्वीर बनाई गई है। यह कुछ ऐसा है कि हम आपके काम आ रहे हैं, तो आप हमारा साथ दीजिये। जदयू का आरोप है कि बीजेपी साड़ी के रुप में गरीब मतदाताओं को घूस देने की कोशिश कर रही है। यह फैक्टर भी चुनावी घमासान को कांटे का बनाने में महत्वपूर्ण रोल अदा कर रहा है।

फिर से जंगलराज ?

नीतीश को घेरने के लिये बिहार में बीजेपी लालू विरोध और जंगलराज पर फोकस कर रही है। बीजेपी के स्टार कैंपेनर नरेन्द्र मोदी बार-बार अपनी रैलियों में लालू-नीतीश दोस्ती को जंगलराज पार्ट-2 का आगाज और बिहार को बीमारु राज्य बता चुके हैं। इसमें सच्चाई भी है। लालू राज में हुई गुंडागर्दी से पूरी आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी भयभीत दिखता है। नीतीश कुमार के सियासत की बुनियाद ही लालू विरोध की रही है। उन्होंने पहले लालू को जंगलराज का कर्ताधर्ता बताकर ही बीजेपी का हाथ थामा था। इसके बाद नरेन्द्र मोदी के विरोध के नाम पर बीजेपी और एनडीए को छोड़ा, इसे भी लोग पचा नहीं सके हैं। इसी वजह से नीतीश कुमार के पार्टी जदयू की 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार हुई। नीतीश कुमार ने बिहार का विकास किया, इससे बीजेपी भी इनकार नहीं कर सकती है, लेकिन खुद को विकास पुरुष कहलाना पसंद करने वाले नीतीश कुमार जंगलराज के परिचायक माने जाने वाले लालू यादव के साथ दोस्ती के बाद सवालों के घेरे में हैं। नीतीश कुमार लाख सफाई दें, खुद को चंदन और दूसरों को विषधर बताएं लेकिन वह खनिज और लौह-अयस्कों से भरपूर अविभाजित बिहार पर राज करने वाले और उसी समय बिहार को बीमारु राज्य का तमगा दिलाने वाले लालू यादव के साथ मिलकर बिहार का विकास कैसे करेंगे? यह एक बड़ा सवाल जनता के दिमाग में है। एक आंकड़े के मुताबिक प्रति व्यक्ति आय, साक्षरता, बिजली की खपत, दिहाड़ी मजदूरों की संख्या और शिशु मृत्यु दर के मामले में बिहार देश के राज्यों में सबसे निचले पायदान पर है। नरेन्द्र मोदी के मुंह से नीतीश-लालू विरोध में कही गई यही बातें एनडीए गठबंधन की सबसे बड़ी मजबूती है।

लालू की यादवों-मुस्लिमों पर पकड़ कमजोर!

बिहार में जीत को लेकर सभी दलों में धुकधुकी मची हुई है। हाल ही में बिहार में हुए विधान परिषद के चुनाव इस बात के साफ संकेत हैं कि, लालू की पकड़ उनके मुस्लिम-यादव वोट बैंक समीकरण पर कमजोर हुई है। सारण प्रमंडल के तीनों जिलों छपरा, सिवान और गोपालगंज में आरजेडी-जेडीयू गठबंधन की करारी हार इसका सबूत है। मिथिलांचल, तिरहुत, कोसी और सीमांचल में भी बीजेपी की पकड़ मजूबूत हुई है। ऐसे में यक्ष प्रश्न यह कि क्या एनडीए गठबंधन का विजय-रथ नीतीश महागठबंधन के रथ को बिहार विधान सभा चुनाव में पीछे छोड़ देगा?

12-09-2015

नीतीश की मजबूरी या मौकापरस्ती

नीतीश कुमार सियासत के धुरंधर तीरंदाज हैं। जदयू में कभी खुद से आगे किसी को बढऩे नहीं दिया। समय-समय पर अपने अजीज मित्रों और वरिष्ठतम नेताओं तक को भी पार्टी से निकाला या साइड कर उन्हें उनकी औकात दिखा दी। जब, जरुरत पड़ी तो उन नेताओं को गले भी लगा लिया। नीतीश कुमार शायद पीएम पद की हसरत लगाए बैठे हैं। नरेन्द मोदी के विरोध और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जिस तरह एनडीए को छोड़ा, महाविरोधी लालू यादव और कांग्रेस से दोस्ती की, इससे इस बात को भारी बल मिलता है कि समय आने पर वह अपनी छवि के दम पर पुराने जनता परिवार, कांग्रेस, आप, दक्षिण भारतीय राज्यों के दलों और टीएमसी सहित अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों की मदद से प्रधानमंत्री बनने का मौका भी तलाश रहे हैं।

जातिवादी राजनीति की राह पर नीतीश कुमार

सवाल यह कि क्या, नीतीश कुमार लालू यादव से हाथ मिलाकर जिस जातिवादी राजनीति की राह पर आगे बढ़ रहे हैं, वो बिहार की उम्मीदों को तोड़ तो नहीं देगा? बिहार की जनता अब भी नीतीश में विकास पुरुष की छवि देखती है, लेकिन लालू-राबड़ी राज में फैले जंगलराज और आतंक से इस कदर भयभीत है कि उसे इस दोस्ती में फिर वही पुराना मंजर नजर आता है। नीतीश जनता को सुशासन की गारंटी तो दे रहे हैं, लेकिन लोगों की हालत गोनू झा की बिल्ली जैसी हो गई है जो दूध का जला छांछ भी फूंक-फूंक कर पीये। नीतीश मोदी विरोध और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जिस तरीके से लालू के जंगलराज का बचाव करते हैं उससे भी अधिकांश लोगों की उम्मीदों पर ग्रहण लगता दिख रहा है। यह नीतीश की मजबूरी भी है क्योंकि वह जिस जाति से आते हैं उसके बूते सत्ता कभी नहीं पा सकते। ऐसे में नीतीश को अगड़ों-पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों का साथ चाहिये। नीतीश को लेकर एक अच्छी बात यह है कि जीतन राम मांझी जब सीएम पद पर पहते हुए विवादास्पद बयान दे रहे थे तो वह उन्हें सीएम पद से हटाने के पक्ष में थे, जबकि राजद सुप्रीमो लालू यादव इसके खिलाफ थे। क्योंकि, इससे दलितों और महादलितों में गलत संदेश जाता, लेकिन लालू यादव की सलाह को नीतीश कुमार ने नहीं माना। ऐसे में सवाल यह कि क्या नीतीश ने मांझी को उनके विवादास्पद बयानों के लिये हटाया या अपने वोट बैंक को बरकरार रखने के लिये? दरअसल पूरी कवायद कुर्सी की है। सत्ता से उपजे ताकत की है। जाति इसमें यूरिया है जिसमें नाईट्रोजन और ऑक्सीजन दोनों भरपूर मात्रा में हैं। बिहार में होनेे वाला विधानसभा चुनाव इसी के बूते लडऩे की पूरी तैयारी है।

बीजेपी का वॉर रुम

बिहार चुनाव में बीजेपी की नेतृत्व वाली बीजेपी प्रचार में बहुत आगे है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सूबे की पल-पल बदलती सियासी सेहत का जायजा ले रहे हैं। बीजेपी ने जीपीएस लगे 160 ट्रकों को नीतीश सरकार के विरोध और एनडीए के प्रचार के लिये रवाना किया था। इसकी मॉनिटरिंग लगातार की जा रही है कि सभी ट्रक अपने इलाकों में पहुंचे या नहीं। बीजेपी और एनडीए के इस हाइटेक प्रचार का जवाब नीतीश-लालू-कांग्रेस महागठबंधन भी कार्यक्रमों, सभाओं और पोस्टर, बैनरों से दे रहा है। नीतीश अपने ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के तहत ‘हर घर दस्तक’ अभियान भी चला रहे हैं।

एनडीए में सीट और सीएम पद पर पेंच

बिहार में पिछड़ों और दलितों का वोट निर्णायक है। बीजेपी के साथ सवर्ण और बनिया वर्ग पूर्व से जुड़े रहें हैं, लेकिन बिहार में बीजेपी सत्ता से दूर ही रही। इसे ही देखते हुए बीजेपी ने नीतीश कुमार से दोस्ती की और सत्ता में आई थी। नीतीश से अलग होने के बाद रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा को साथ लेकर बीजेपी ने दलित और पिछड़े कुशवाहा समाज के वोटों को साध लिया है। इसी बात का फायदा एलजेपी नेता रामविलास पासवान, आरएसएलपी नेता उपेन्द्र कुशवाहा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी उठा रहे हैं। एलजेपी नेता रामविलास पासवान ने 50 सीटों की मांग की है जबकि, उपेन्द्र कुशवाहा की महत्वाकांक्षा 50 से ज्यादा सीट पाने की है। लेकिन, बीजेपी कुशवाहा की पार्टी को लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन के लिहाज से करीब 23 सीटों से ज्यादा नहीं देना चाहती है, साथ ही एलजेपी को भी इसी आधार पर 45 के करीब सीटें देकर बाकी बची करीब 175 सीटों में से संभव है कि बीजेपी महादलित वोटों को अपने पाले में करने के लिए जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को उनकी मांगों के मुताबिक 20-25 चुनिंदा सीटें दे और बाकी बची करीब 150 सीटों पर खुद चुनाव लड़े। ऐसा हुआ तो मांझी की पार्टी चुनाव में शानदार प्रदर्शन कर सकती है। इस बीच रामविलास पासवान ने भी खुद को सीएम पद का दावेदार बताने वाला मास्टर स्ट्रोक खेल दिया है। उनके, समर्थन में बीजेपी के शत्रुघ्न सिन्हा भी बिना बुलाये कूद पड़े हैं। दरअसल, इसके पीछे महत्वाकांक्षा के साथ ही विरोधियों की रणनीति भी है और ऐसी कोई भी कोशिश एनडीए को कमजोर ही करेगी। एलजेपी और आरएसएलपी को यह नहीं भूलना चाहिये की उनकी पार्टी का एक भी विधायक बिहार में नहीं है।

पप्पू यादव किसके साथ?

एनडीए को बाहुबली नेता पप्पू यादव अपना समर्थन देना जरुर चाहते हैं, लेकिन बीजेपी की मजबूरी उन पर लगे दाग और स्थानीय नेताओं का विरोध है। कोसी और पूर्णिया प्रमंडल की करीब तीन दर्जन सीटों पर पप्पू यादव का वर्चस्व माना जाता है। वैसे पप्पू यादव, असदुद्दुीन ओवैसी की एआईएमआईएम और राकांपा के साथ गठबंधन करें तो भी इसका फायदा एनडीए को मिल सकता है।

असदुद्दुीन ओवैसी से किसे नुकसान?

एआईएमआईएम नेता असदुद्दुीन ओवैसी ने 16 अगस्त को सीमांचल के किशनगंज में एक बड़ी रैली कर इलाके की 25 सीटों पर चुनाव लडऩे की बात कही थी। इससे लालू का पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक दरकेगा। इसे लेकर राजद नेताओं में भारी बेचैनी है क्योंकि असदुद्दुीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के चुनाव लडऩे से एनडीए खासकर बीजेपी को बड़ा फायदा होने की उम्मीद है। राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. मनोज झा का आरोप है कि असदुद्दुीन ओवैसी की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मिलीभगत है।

केजरीवाल देंगे नीतीश-लालू-कांग्रेस को मदद?

दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है आजकल इसी नक्शे पर चल रहे हैं दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल साहब और बिहार के सीएम नीतीश कुमार। नीतीश ने भी समय को भांपकर केजरीवाल को गले लगा लिया है क्योंकि, इससे उन्हें दिल्ली में रह रहे प्रवासी बिहारियों के वोट मिलने की आशा है। लेकिन, सवाल तो यह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उपजे केजरीवाल किस मुंह से नरेन्द्र मोदी के विरोध के नाम पर चारा घोटाले में सजा पाकर जेल की हवा खा चुके लालू यादव और कांग्रेस के साथी नीतीश कुमार के लिये वोटों की मांग करेंगे। एक विकल्प यह है कि पॉलिटिकली करेक्ट होने के लिये केजरीवाल सिर्फ जदयू प्रत्याशियों के लिये वोट मांगे लेकिन, ऐसा करने से दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पूर्वांचली वोट बैंक पर असर पड़ सकता है, क्योंकि दिल्ली में करीब 30 फीसदी बिहारी वोटर्स हैं। जो भी हो केजरीवाल ऐसा करेंगे तो नीतीश की नैया पार लगे न लगे उनकी छवि की नैया में बड़ा सूराख होना तय है।

बागी बनेंगे विभीषण

अपनों से भितरघात का खतरा भी बड़ा है। इससे बीजेपी सहित लालू यादव की राजद और नीतीश की जदयू सबसे ज्यादा परेशान है। बीजेपी की तैयारी 200 सीटों पर चुनाव लडऩे की थी अब वह 150 सीटों पर चुनाव लडऩे की तैयारी में है साथ ही जो उसकी जीती कुछ सीटें हैं वहां सहयोगी दल चुनाव लड़ेंगे। जदयू ने पिछली बार 141 सीटों पर जबकि राजद ने करीब 170 सीटों पर चुनाव लड़ा था। अबकी बार वो 100-100 सीटों पर ही चुनाव लड़ेंगे। ऐसे में अपने विभीषण न बनें इसके लिये सभी दल डैमेज कंट्रोल में जुटे हुए हैं।

जिस अंदाज में दिनोंदिन बिहार विधान सभा का होने वाला चुनाव रंग बदल रहा है वह नीतीश-लालू के साथ ही बीजेपी के नरेंद्र मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के माथे पर बल डालने के लिये काफी है। ऐसे में एक महागठबंधन दूसरे महागठबंधन पर तभी जीत हासिल कर पायेगा जब वो दूसरे की रणनीतिक गलतियों का समय से फायदा उठाएगा। फिलहाल, आप भी देखिये और समझिये कि जातीय अंकगणित के इस चुनावी चौसर में कौन राजनीतिक गठबंधन

कितना बड़ा खिलाड़ी साबित हो सकता है, जो चुनाव रुपी कोर्ट में मतदातारुपी खिलाडिय़ों की मदद से अपने-अपने उम्मीद्वारों के पक्ष में वोटों की गोलबंदी कराने में सफल होता है, क्योंकि इसी के बाद मिलेगा उन्हें सत्ता का शानदार अवार्ड।


जातीय और धार्मिक वर्गीकरण करने वालों की होगी करारी हार


12-09-2015

बिहार विधान सभा चुनाव में बीजेपी नेता नरेन्द्र मोदी बिहार के सीएम नीतीश कुमार को घेरने का एक भी मौका नहीं छोड़ रहे हैं। फिर, चाहे बीमारु बिहार, डीएनए, जंगलराज पार्ट-2 या जेल और जहर का मुद्दा ही क्यों न हो। आरा और सहरसा की परिवर्तन रैली में नरेन्द्र मोदी ने बिहार को सवा लाख करोड़ के पैकेज का ऐलान किया तो राजनीतिक शुचिता और मदद की उनकी शैली पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए। क्या है बिहार विधान सभा चुनाव को लेकर बीजेपी और एनडीए की रणनीति? इस मामले पर उदय इंडिया संवाददाता कुमार मयंक ने खुलकर बात की बीजेपी के युवा नेता और दिल्ली से सांसद मनोज तिवारी से। जवाब में बीजेपी सांसद मनोज तिवारी ने सीएम नीतीश कुमार को तानाशाह बताते हुए लालू का साथ लेकर विकास को पीछे धकेलने का आरोप लगाया। प्रस्तुत हैं उनसे बातचीत के मुख्य अंश-

नीतीश कुमार की छवि विकास पुरुष की रही है। बीजेपी इस पर मुहर भी लगा चुकी है, ऐसे में नीतीश-लालू और कांग्रेस महागठबंधन को शिकस्त देने के लिये बिहार में बीजेपी की रणनीति क्या है?

देखिए, बिहार में बीजेपी-जेडीयू सरकार के पहले कार्यकाल में परिवर्तन दिखा था। लेकिन, दूसरी बार सीएम बनने के बाद नीतीश जी निरंकुश हो गए, बीजेपी को भी किनारे कर दिया। इसके बाद अपराध और भ्रष्टाचार का ग्राफ बढ़ा। अलग होने के बाद जिस नीतीश कुमार को देख रहे हैं, उन्हें हम विकास पुरुष नहीं मानते हैं। दस साल से नीतीश सीएम हैं, लेकिन बिहार के प्रति व्यक्ति की आय देश में सबसे कम है, बेरोजगारी सबसे ज्यादा है और बिजली की आपूर्ति मांग की तुलना में मात्र तीन फीसदी है। भगवान नीतीश जैसा सीएम किसी राज्य को कभी नहीं दे। वहीं, गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी दस साल बाद देश के प्रधानमंत्री बन गए और दस साल मुख्यमंत्री रहने के बाद नीतीश को लालू की जरुरत पड़ गई।

नरेन्द्र मोदी ने गया रैली में बिहार को बीमारु राज्य बताया। आरा-सहरसा रैली में पैकेज का छप्पन भोग परोस दिया। विरोधी कह रहे हैं कि मदद के नाम पर बोली लगाई गई। नीतीश कह रहे हैं कि आखिर मदद की बात उन्हें चुनाव के ही वक्त क्यों याद आई? क्या, पैकेज बिहार का हक नहीं है?

नीतीश कुमार बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग करते हैं, लेकिन बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलने के बाद मु्श्किल से सत्तर हजार करोड़ का पैकेज नसीब होता। अब जब प्रधानमंत्री ने ऐतिहासिक सहायता कर दी है तो खलबली मची है। नीतीश जी तो 12 हजार करोड़ रुपया भी खर्च नहीं कर पाते हैं। अब अचानक सवा करोड़ का पैकेज मिल जाये तो नीतीश जी को कुछ समझ में कैसे आएगा। विकास को लेकर पीएम नरेन्द्र मोदी की हाई-लेवल सोच को समझना नीतीश जी के बूते की बात नहीं है।

क्या पैकेज के पीछे दिल्ली में मिली हार का सबक तो नहीं है? क्योंकि, बिहार में एनडीए के स्टार कैंपेनर खुद नरेन्द्र मोदी हैं और उन्हें लेकर बीजेपी कोई चांस नहीं लेना चाहती।

नहीं। यह पैकेज पॉलिटिक्स तब कहा जाता जब नरेन्द्र मोदी का बिहार प्रेम अचानक उमड़ता। पीएम का लाल किले का भाषण हो या संसद का पहला भाषण। उन्होंने, यही कहा कि बिना बिहार, पूर्वी यूपी और देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों के विकास के देश का विकास नहीं हो सकता। किसी भी प्रधानमंत्री को इसे स्वीकार करने और कहने के लिये बड़ा कलेजा चाहिये। पहले दिन से ही बिहार के विकास का एजेंडा है।

बीजेपी का अपना वोट-बैंक है, लेकिन नीतीश के कद के बराबर सीएम कैंडिडेट के लायक कोई नेता नहीं है। जबकि, लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को पीएम कैंडिडेट बनाकर कांग्रेस को अपना पीएम कैंडिडेट का नाम बताने की चुनौती दी थी। क्या यह बीजेपी की दोहरी सियासी चाल नहीं है?

नीतीश की बरगदी छाया की वजह से ही बिहार बीजेपी में कोई नेता बड़ा जनाधार हासिल करने वाला नहीं बन सका। नीतीश और लालू जी जैसे लोगों ने दूसरों को पनपने ही नहीं दिया। ये सवाल तो नीतीश कुमार से पूछा जाना चाहिये कि दस वर्षों में अपने समकक्ष किसी और नेता को क्यों नहीं बनने दिया।

बीजेपी के शॉटगन शत्रुघ्न सिन्हा पार्टी लाइन से अलग होकर नीतीश-लालू की तरफदारी करते हैं और पार्टी के फैसले पर खुलेआम सवाल उठाते हैं। नीतीश ने तो उनके पिता वीपी सिन्हा के नाम पर अस्पताल बनाने का भी ऐलान कर दिया है।

यह मौकापरस्ती तो नीतीशजी की हैं। जब कोई बीजेपी से नाराज होता है तभी मदद क्यों करते हैं। ऐसे उन्हें पता नहीं है कि वीपी सिन्हा बिहार की कि तनी बड़ी प्रतिभा थे।

क्या जंगलराज पार्ट-2, जेल और जहर शब्दों का जिक्र करने के पीछे नरेन्द्र मोदी की रणनीति अगड़ों, पिछड़ों, दलितों और यादव वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति का एक हिस्सा है?

जहर और सांप शब्दों की शुरुआत नरेन्द्र मोदी ने तो कभी नहीं की। नीतीश-लालू ही आपस में कर रहे हैं। हमलोगों ने सिर्फ एक शब्द कहा- अहंकार, वो अहंकार उस दिन दिखा जब नीतीश जी ने बीजेपी नेताओं के सामने से भोज की थाली छीन ली थी। गठबंधन के लगाव को लात मार दिया था।

नीतीश-लालू और कांग्रेस के साथ होने से वोटों का समीकरण उनके पक्ष में दिख रहा है। इसकी भरपाई बीजेपी कैसे करेगी? खासकर जब अगड़ी जाति के वोटर्स के मतदान का प्रतिशत कम रहता है।

देखिए, बिहार को जातीय समीकरण और धार्मिक वर्गीकरण में इस कदर कुचला जा चुका है कि अब नीतीश-लालू महागठबंधन पर विश्वास नहीं किया जा सकता। बिहार को सिर्फ विकासवादी सरकार चाहिए। एक ऐसा शासक और पार्टी चाहिये जो सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखता हो।

यह सच है कि बीजेपी और कोई भी पार्टी पारंपरिक वोटों से अकेले दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकती। क्या आपको नहीं लगता है कि विकास के नाम पर चुनाव जीतना वर्तमान हालात में दूर की कौड़ी है इसलिए, बीजेपी भी जातीय ध्रुवीकरण कर रही है?

देखिए, जात-पात से उपर की सरकार चाहिये, वापस गौरवशाली बिहार चाहिये। भारतीय जनता पार्टी की कोशिश यह है कि हम समान रुप से सबका सम्मान करते हैं चाहे वह किसी भी जाति का हो। जातियों के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए और जो-जो राज्य जातीय भेदभाव में पड़ा है उसका विकास नहीं हुआ है। भाजपा की कोशिश है की बिहार-यूपी जैसे बड़े राज्यों के निवासियों में जाति और धर्म की बजाय पूरे राज्य के विकास की ललक हो।

क्या पप्पू यादव और लवली आनंद की देर-सबेर एनडीए में एंट्री होगी? कोसी और पूर्णिया की तीन दर्जन से ज्यादा विधानसभा सीटों पर उनका दबदबा माना जाता है। कांटे की टक्कर में इन इलाकों की सीटों को जीतना एनडीए के लिये अनिवार्य भी है।

ये तो भविष्य की बात है। बीजेपी का एजेंडा है कि जो लोग चुनाव के पहले पार्टी के एजेंडेे का समर्थन करते हैं पार्टी उनको लेने पर विचार कर सकती है।

ऐसे में क्या नरेन्द्र मोदी के स्वच्छ राजनीति का फॉमूला फेल नहीं होगा क्योंकि, पप्पू यादव को दागी माना जाता है? बिहार बीजेपी के नेता भी उनसे नाखुश दिखते हैं। पप्पू यादव की नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के पीछे एनडीए के मदद की बात सियासी हल्कों में है।

ऐसा सब कुछ ध्यान में रखकर ही होगा। बीजेपी विचार कर सकती है। जहां तक पीएम से पप्पू यादव के मिलने की बात है तो वो सांसद हैं और उन्हें इसका अधिकार है।

खबर है कि जीतन राम मांझी बीजेपी में आएंगे, लेकिन चुनाव के बाद। ऐसे में क्या बीजेपी उन्हें अभी पार्टी में शामिल नहीं कर, एनडीए में रखकर महादलितों का वोट साधना चाहती है?

जीतन राम मांझी जी एनडीए के साथ हैं। उनके साथ जो अन्याय हुआ है बीजेपी उसके खिलाफ है। किसी के साथ जातिगत रुप से नफरत की भावना कभी नहीं रखनी चाहिए।

एनडीए के चारों दलों में सीटों का बंटवारा नहीं होने के पीछे ज्यादा सीटों की मांग है। ऐसे में चुनाव के पहले सीटों के बंटवारे की लड़ाई बीजेपी कैसे जीतेगी?

इसका समाधान पार्टी के बड़े नेता आपस में बैठकर निकाल लेंगे। मुझे पूरा विश्वास है कि भाजपा के नेतृत्व में बिहार में सरकार बनेगी। आप नोट कर लीजिये, एनडीए को 185 सीटें मिलेंगी।

एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने सीमांचल में सभा की और 25 सीटों पर चुनाव लडऩे की बात कही। इससे एनडीए को कितना फायदा होगा?

सभी लोगों को लोकतंत्र में चुनाव लडऩे का अधिकार है। मैं इस पर कुछ नहीं बोलूंगा। फायदा-नुकसान से मतलब नहीं है। एनडीए अपने एजेंडे पर चल रही है।



फासीवाद को किसी कीमत पर लागू नहीं होने देंगे”


12-09-2015

बिहार विधान सभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा? नीतीश-लालू और नरेन्द्र मोदी एक दूसरे पर जुबानी तीर चला रहे हैं। जनता सब देख रही है। वोट के दिन वही करेगी फैसला। क्या एनडीए को मिलेगी जनता की शह या नीतीश-लालू-कांग्रेस गठबंधन की होगी जीत? सभी दलों के नेता अपने महागठबंधन की जीत के दावे में लगे हैं। इन्हीं सवालों को लेकर उदय इंडिया संवाददाता कुमार मयंक ने बात की राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा से। हमने उनसे पूछे चुभते हुए हर वह सवाल जो लालू-नीतीश की दोस्ती पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। जवाब में राजद नेता मनोज झा ने लालू-नीतीश दोस्ती को देश की जरुरत, नरेन्द्र मोदी को आधुनिक नीरो और असदुद्दीन ओवैसी को आरएसएस का एजेंट बताया। प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश-

नीतीश कुमार और उनकी सरकार ने आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव को जेल भिजवाने में अहम भूमिका निभाई। जंगलराज का कर्ताधर्ता बताकर अलग हुए। आज आप उन्हीं के साथ हैं। क्या महज सत्ता के लिए साथ हैं दोनों दल?

सर्वप्रथम, लालूजी का जेल जाना कानूनी पहलू है। इसमें भाजपा और समाज के सामंती सोच वाले नेताओं का दबाव रहा, जो लालूजी की सामाजिक और समावेशी न्याय की राजनीति से आहत थे। ऐसी सोच वाले लोगों का संस्थाओं और कार्यपालिका पर लंबे समय तक कब्जा रहा है । इसलिए, उन्होंने चारा घोटाले के माध्यम से लालूजी को घेरने की चेष्टा की। दूसरा यह कि हम मिलकर पूंजीपतियों की पुरजोर हितैषी केंद्र की अधिनायकवादी दक्षिणपंथी सरकार का मुकाबला कर सकते हैं। साथ आना देश की वैकल्पिक राजनीति के साथ न्याय करना है। लालू-नीतीश की दोस्ती आवाम की आवश्यकता है। दोनों नेता किसानों, अकलियतों और मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक हुए हैं।

 

क्या नीतीश कुमार आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव के कंधे का इस्तेमाल सत्ता के लिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकि एक बड़ा वोट बैंक लालू यादव के साथ है?

कंधे का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। राजनीति फोटो फ्रेम में बंद यथार्थ नहीं है। यह सही है कि हमारे गहरे मतभेद रहे हैं, एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ें हैं, बहुत बुरा-भला भी कहा है और एक-दूसरे के खिलाफ कई बार हदें भी पार की हैं, लेकिन जब देश में हालात आपातकाल जैसे दिख रहे हैं तो साथ आने में ही समझदारी थी। यह हमारी पूंजी है। हम इस दोस्ती को सीट, वोट, साफ और कम साफ चेहरों में बांटकर नहीं देख रहे हैं। यह चुनाव सिर्फ बिहार का चुनाव नहीं है, राजनीति में वैकल्पिक दर्शन का चुनाव है। हम देश को यह बताना चाहते हैं कि फासीवाद को किसी कीमत पर देश में हावी नहीं होने देंगे। जहां किसी भी सुधार और विरोध की जगह नहीं होती।

क्या लालू यादव के जहर पीने वाले बयान के बाद आपको यादव समाज नीतीश कुमार से दूर नहीं दिखता?

मीडिया, राजद को यादव में महदूद करता है यह ठीक नहीं है। हमारा वोट बैंक तमाम वंचित समूह के लोग और अगड़ी जातियों के प्रगतिशील लोग हैं। जिनका मानना है कि इस देश की व्यवस्था में संसाधनों के वितरण में खामी है। साथ ही जहर वाले बयान का मतलब, जदयू और राजद के बीच हुई पुराने सभी कटु बयानों और मतभेदों को किनारे करना है। कम सीटों पर लड़कर भी मुल्क को भरोसा देने और फासीवाद के खिलाफ लड़ाई के लिये त्याग है। यह चुनाव आखिरी नहीं बल्कि बेहद महत्वपूर्ण है।

क्या लालू परिवारवाद के शिकार नहीं हो गए हैं, इसे लेकर पप्पू यादव को भी पार्टी से निकाला। पत्नी के बाद बेटे-बेटियों को आगे कर रहे हैं, क्यों आप और रघुवंश सिंह जैसे बुद्धिजीवियों को आगे नहीं लाते?

लोकतंत्र में परिवारवाद उसी वक्त खत्म हो जाता है जब आप जनता के बीच जाते और उनसे सहमति लेते हैं। दल की बैठक में सभी लोग खुलकर अपनी राय रखते हैं, उसके बाद ही चीजें तय होती हैं। देखिए, राबड़ी देवी को सीएम बनाने की मांग पूरे दल की थी। कांग्रेस, भाजपा और सभी दलों के नेताओं के बच्चे राजनीति में हैं। वहीं देश में आरएसएस एक ऐसा परिवार है जो चुनाव नहीं लड़ता लेकिन, सभी चुनाव को तय करने की कोशिश करता है। इसके बारे में भी लोगों को सोचना चाहिए।

नरेन्द्र मोदी का आरोप है कि लालू-नीतीश की दोस्ती जंगलराज पार्ट-2 की शुरुआत है। बिहार बंद के दौरान हुए हंगामे पर पटना हाईकोर्ट भी सख्त है। क्या इससे जनता के बीच गलत मैसेज नहीं गया है?

हमसे 15 वर्षों में कई गलतियां हुई हैं। लालूजी ने भी उन गलतियों के लिये माफी मांगी है लेकिन, सामंती व्यवस्था को तोड़कर दबे-कुचलों को बैलेट का लोकतंात्रिक हक और उन्हें सामाजिक सम्मान भी लालू जी ने ही दिलाया। देखिये, पटना हाईकोर्ट ने 50 पेज के पन्नों में तीसरे पन्ने के तीसरे पैराग्राफ पर एक छोटी सी टिप्पणी की है। लेकिन, 2004 में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों जस्टिस दुरई स्वामी राजू और अरजीत पसायत ने गुजरात दंगों को लेकर यह टिप्पणी की थी कि जब मासूम बच्चों और महिलाओं का कत्लेआम हो रहा था तो आधुनिक नीरो मुंह फेर कर बैठे थे। यह टिप्पणी तो नरेन्द्र मोदी पर ही है और यह पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी से ज्यादा घातक हैं।

लालू यादव दबे-कुचलों के मसीहा कहलाते हैं, लेकिन बिहार में बाथे, मियांपुर और शंकर बिगहा सहित अनेक जातीय नरसंहारों को राकने में पूरी तरह विफल रहे। जबकि, पुलिस-प्रशासन आपके हाथों में था।

हुजूर, अमीर दास कमीशन की रिपोर्ट सार्वजनिक होने दीजिए, सच पता चल जाएगा। इसे रणवीर सेना ने अंजाम दिया क्योंकि, वह भाकपा (माले) की बिहार में गरीबों को उनका हक दिलाने के लिये आंदोलन के खिलाफ था और लालू जी की सरकार बनने पर वंचितों और कमजोरों को मानसिक मजबूती मिली की लोकतंत्र में हमारा भी बराबर का वजूद है। इस बदलाव को सामंती वर्ग और भाजपा के लोग स्वीकार नहीं कर सके। इनका वर्चस्व कार्यपालिका में था और पुलिस-प्रशासन की मदद से इन जातीय नरसंहारों को अंजाम दिया गया। कोबरा पोस्ट की ऑन कैमरा रिपोर्ट इस बात का सबूत है कि इन नरसंहारों को अंजाम दिलाने, रणवीर सेना को बनाने और बढ़ाने के पीछे बीजेपी सामंती चरित्र के लोगों का हाथ है। फिर इन लोगों ने पटना हाईकोर्ट में केस कर जंगलराज की टिप्पणी ले ली। आखिर क्यों जंगलराज पर ही चर्चा होती है और आधुनिक नीरो पर नहीं? लक्षमणपुर बाथे में दलितों का नरसंहार करने के बाद आज यही अभिजात्य वर्ग जीतन राम मांझी को लेकर सत्ता पर काबिज होने के लिये घूम रहा है। हम बदनाम इसलिए हैं कि सच को नरेन्द्र मोदी की तरह पीआर कंपनी की मदद से नहीं ढंक सके ।

नरेन्द्र मोदी के बिहार पैकेज पर आपकी प्रतिक्रिया।

ये पैकेज नहीं पैकेजिंग है। देखिये, रेलवे और हाइवे पर पहले ही सहमति बन चुकी थी। ऐसी योजनाओं का भी शिलान्यास कर दिया जिन पर सहमति बाद में आई। हम चाहते थे कि विशेष राज्य का दर्जा मिले, एक्साइज शुल्क में इतनी छूट मिले कि कोई भी बिहार में आसानी से कारखाना लगा सके। झारखंड बनने के बाद इसका अभाव हो गया है। खुद को बादशाह समझने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बातों के खिलाड़ी हैं। शहंशाह की तरह आये और बिहार की स्वाभिमानी जनता को खैरात की नीलामी में ले गये। अपमानित करने वालों को जनता कठोर सबक देगी।

नीतीश कुमार खुद को चंदन और दूसरों को विषधर बताते हैं। क्या ऐसा कर वह लालू यादव से दूर दिखने की कोशिश कर रहे हैं?

कतई नहीं, मीडिया का एक वर्ग दबाव में इसे चला रहा है क्योंकि, भाजपा के पास जनाधार नहीं, नेता नहीं, योजना नहीं और कार्यक्रम भी नहीं है, ऐसी हालत में स्टूडियो में लड़ रहे हैं। हमारी दोस्ती के पीछे मुल्क और जनता की सियासी दशा और दिशा बदलना है।

कांग्रेस को 40 सीटें चुनाव लडऩे के लिए दी गईं हैं, जबकि बिहार में उसका जनाधार खिसक चुका है। यह एनडीए को वॉक-ओवर है या नीतीश कांग्रेस प्रत्याशियों की जीतने के बाद लालू विरोध की एक चाबी अपने पास रखना चाहते हैं?

कतई नहीं, कांग्रेस एक राष्ट्रीय दल है। राष्ट्रीय स्तर पर गैर भाजपा के रुप में कांग्रेस का बेहद महत्वपूर्ण स्थान है। यह चुनाव जीतने का नहीं भरोसा देने का चुनाव है। इसके पीछे सुविधा की सियासत की बात सरासर गलत है।

 

असदुद्दीन ओवैसी के एआईएमआईएम के सीमांचल में लडऩे से राजद का (माय) समीकरण ध्वस्त होने की आशंका है। इससे आपके महागठबंधन को कितना घाटा और एनडीए को कितना फायदा होगा?

हमारी नजर में ओवैसी साहब की भाजपा से सांठ-गांठ है। महाराष्ट में भी उन्होंने यही किया। मेरा दावा है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के सभी प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो जाएगी, भले ही कोई असदुद्दीन ओवैसी साहब आएसएस के माध्यम से करोड़ों का बंडल लेकर आ जाएं। हमारा जितना विरोध आरएसएस से है उतना ही असदुद्दीन ओवैसी की जुबान से है। हम मानते हैं कि एक तरह से हिंदू संप्रदायवाद, मुस्लिम संप्रदायवाद से गलबहियां कर रहा है। लेकिन, ओवैसी और आरएसएस के लोग गलतफहमी में हैं। आज इस देश में स्वभाव से उदारवादी बहुसंख्यक हिंदूओं की वजह से ही धर्मनिरपेक्षता कायम है। दोनों ही धर्मों के प्रगतिशील लोग असदुद्दीन ओवैसी को सबक सिखाएंगे।

 

आप लोगों ने वामपंथी साथियों को छोड़ दिया और एनसीपी नाराज होकर अलग हो गई। आखिर क्यों?

हम आपके माध्यम से अपील करते हैं कि सभी वामपंथी दल खासकर सीपीआई (माले) और एनसीपी हमारे साथ आए, जिससे की एनडीए से चुनावी लड़ाई पुख्ता तौर पर लड़ी जा सके। हम त्याग के लिये तैयार हैं। हमें भरोसा है कि एनसीपी हमारे साथ मिलकर ही चुनाव लड़ेगी।


 

     कुमार मयंक

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