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विफलताओं की बाढ़ में उम्मीद के तिनके पर राजपरिवार

विफलताओं की बाढ़ में उम्मीद के तिनके पर राजपरिवार

हास्य-व्यंग्य

बेटा:       पिताजी

पिता:      हां बेटा।

बेटा: पिताजी, राहुल गांधी किसी राज परिवार से हैं?

पिता: बेटा, वह किसी राज परिवार से नहीं हैं। वह तो एक ऐसे महान परिवार से हैं जिसने देश की आजादी की लड़ाई में बहुत कुर्बानियां दी हैं।

बेटा:       तो क्या वह महात्मा गांधी के वंशज हैं?

पिता: नहीं बेटा, वह तो स्वर्गीय फिरोज गांधी के सुपौत्र हैं।

बेटा:       तो क्या फिरोज गांधी महात्मा गांधी के परिवार से थे?

पिता: नहीं बेटा, वह तो एक सभ्य पारसी परिवार से थे।

बेटा:       फिर वह गांधी कैसे हो गये?

पिता: उनका पारिवारिक कुलनाम (सरनेम)   गांडी (त्रद्धड्डठ्ठस्रद्ध4) था। जब श्रीमती इंदिरा ने उनसे शादी का मन बनाया तो बापू बीच में पड़े और पंडित नेहरू को उन्होंने मना लिया। साथ ही फिरोज जी को अपने कुलनाम के स्पेलिंग बदलने को कहा। इस प्रकार वह गांधी (त्रड्डठ्ठस्रद्धद्ब) बन गये।

बेटा:       तो फिर राहुल को युवराज क्यों कहते हैं?

पिता: बेटा, राहुल का परिवार और उनकी कांग्रेस पार्टी आजादी मिलने के बाद से ही लगातार देश की सत्ता में रही है। श्रीमती सोनिया गांधी के बाद, कांग्रेस भी उन्हें ही अपना सर्वेसर्वा बनाने पर तुली है । इसलिए मीडिया ने राहुल को कांग्रेस का युवराज बना दिया है।

बेटा:       पिताजी, पर भारत में तो प्रजातंत्र है, राजशाही नहीं। तो यहां शाही परिवारतंत्र कैसे चल सकता है?

पिता: तेरी बात तो ठीक है पर यह अब कांग्रेस पार्टी में एक अटूट परम्परा बन चुकी है। इसे अब कोई नहीं तोड़ सकता। कांग्रेसी स्वयं भी इस राजवंशी परम्परा को चालू रखना चाहते   हैं। यदि इक्का-दुक्का कोई व्यक्ति उसका विरोध करता है तो उसे पार्टी गद्दार करार   देकर, राजवंशी प्रथा के आधार पर गद्दार मानकर देश-निकाले की तर्ज पर पार्टी-निकाला देती है।

बेटा:       पिताजी, राजवंश में तो उत्तराधिकार अनुक्रमण बना होता है जैसे बरतानिया आदि में। पर क्या यह कांग्रेस परिवार में भी है?

पिता:      बिलकुल है, जब कभी लोग राहुल के विकल्प की बात सोचते हैं तो उनकी नजर किसी और पर न पड़कर केवल उनकी बहन प्रियंका पर ही जाती है।

बेटा:       पर पिताजी, वंशीय परम्परा में तो अनुक्रमण में राहुल के बाद नम्बर उनके बच्चों का होना चाहिये।

पिता:      वह इसलिए कि राहुल अभी अविवाहित हैं और उनकी कोई संतान नहीं है।

बेटा:       पर पिताजी राहुल शादी क्यों नहीं करते?

पिता:      बेटा, यह तो व्यक्ति व परिवार का अपना मामला है, इसमें हम क्या कह सकते हैं?

बेटा:       फिर भी पिताजी, राहुल देश के नेता हैं। उनके हितैषियों को तो अपनों की चिन्ता सताती ही रहती होगी। याद है जब मेरी शादी नहीं हो रही थी तो आप कितनी चिन्ता करते थे? आपको रात को नींद नहीं आती थी? मेरी बहनें तो इस मामले में मेरे पीछे ही पड़ी रहती थीं।

पिता:      बेटा, वह बड़े आदमी हैं। अपना मुकाबला उनसे मत कर।

बेटा:       पर पिताजी, सोनियाजी भी तो एक भारतीय मां हैं। उन्हें और राहुल की बहन को उनकी शादी की चिन्ता क्यों नहीं होती?

पिता:      बेटा, सोनियाजी तो एक महान नारी हैं। उन्हें चिन्ता केवल राहुल की नहीं, वह तो पूरे देश की चिन्ता करती हैं। देश की चिन्ता के आगे उनके मन में राहुल की चिन्ता नगन्य हो जाती है।

बेटा:       पिताजी कुछ भी हो। सोनियाजी को राहुल की चिन्ता करनी चाहिये। प्रियंका उनसे छोटी हंै। उसकी शादी हुये कई साल हो गये और उसके दो बच्चे भी हो चुके हैं। पिताजी, राहुल की उम्र कितनी है?

पिता:      यही कोई 45-46।

बेटा:       पिताजी, आप तो सहज भाव से ऐसे बोल रहे हैं मानों राहुल अभी बच्चे हैं, और उनकी अभी शादी की उम्र ही नहीं हुई है।

पिता:      ऐसी बात नहीं, पर जब वह ही चिन्ता नहीं करते तो हमें भी अपना मगज खपाने की क्या आवश्यकता है?

बेटा: पिताजी, ऐसा नहीं। जब राहुल और सोनियाजी हमारी और देश की इतनी चिन्ता करते हैं तो हमारा भी कर्तव्य है कि हम भी उनकी चिन्ता करें।

पिता:      तू तो ऐसे बात कर रहा है जैसे कि तू बिचौलिया बनना चाहता है और तेरी नजर में उनके योग्य कोई लड़की है।

बेटा:       पिताजी, मेरे पास उनके लायक लड़की कहां हो सकती है, पर चिन्ता मुझे जरूर है क्योंकि, उनकी पार्टी के लोग ही कहते हैं , कि वह पार्टी और देश का भविष्य हैं। मैं उनके आगे के भविष्य की सोच रहा हूं और चिन्ता कर रहा हूं।

पिता:      बेटा, काम चिन्ता से नहीं बनता, कुछ करने से बनता है।

बेटा:       पिताजी, राहुल बाबा कई बार अचानक गुम हो जाते हैं। किसी को पता नहीं होता कि वह देश में हैं या विदेश में। उनके साथ उनकी माताजी व बहन भी नहीं होते। वह कहां जाते हैं?

पिता:      बेटा, यह हम जैसे आम आदमियों की समझ के बाहर की बातें हैं। हर बड़ा आदमी काम करके थक जाता है और उसे एकान्त और आराम की आवश्यकता होती है। उस फुर्सत के समय ही तो उन्हें ठण्डे दिमाग से देश के बारे सोचने का समय मिलता हैं। राहुल भी कहीं जाकर सकून पाते होंगे।

बेटा:       पिताजी, कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल प्रधानमंत्री बनने के बाद ही विवाह करना चाहते हों।

पिता:      यह तो मैं नहीं कह सकता पर इतना सच अवश्य है कि अभी चार साल तो उनके प्रधानमंत्री बन पाने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे तो वह बूढ़े हो जायेंगे।

बेटा:       पर यह तो अवश्य लगता है कि वह पहले कांग्रेस अध्यक्ष बनना चाहते हैं और शादी बाद में करना चाहते हैं।

पिता:      उनके कांग्रेस अध्यक्ष बनने की संभावना के समाचार तो तब से आ रहे हैं जब वह पिछले संसद सत्र के दौरान दो मास के लिये अज्ञातवास पर चले गये थे। तब तो समाचार आ रहे थे कि, वह इस बात से नाराज हैं कि उन्हें अध्यक्ष नहीं बनाया जा रहा। फिर मीडिया में तो यह भी अटकलें लगाई जाने लगी थीं कि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी ताजपोशी अप्रैल में हो जायेगी। उसके बाद तो अफवाहें कई प्रकार की छपती रहीं।

बेटा:       पर पिताजी, यह समझ नहीं आता कि उन्हें अध्यक्ष क्यों नहीं बनाया जा रहा है। यह तो घर का ही मामला है। पद और कुर्सी तो घर में ही रहेगी चाहे उस पर मां बैठे या बेटा।

पिता:      यह तो बेटा सोनियाजी ही जानें कि वह क्यों राहुल के लिये गद्दी खाली नहीं कर रहीं। उसके पीछे भी कोई कारण होगा, कोई राज होगा, उनकी कोई सोच होगी। इसके विपरीत तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तो राहुल में एक अच्छा व सफल प्रधानमंत्री होने के सभी गुण व लक्षण देखते थे और कहते थे कि पार्टी जब भी कहे मैं उनके लिये कुर्सी खाली करने के लिये तैयार हूं। इस ताजपोशी में तो मुझे ब्रिटेन की महारानी और यहां भारत में सोनियाजी में एक समानता दिखती है। ब्रिटेन की महारानी की आयु अब 90 वर्ष के लगभग हो चुकी है। गद्दी के प्रथम हकदार युवराज चाल्र्स स्वयं बूढ़े हो गये हैं पर उन्हें गद्दी तो तभी मिलेगी जब महारानी स्वयं ही राजपाट छोड़ दें। पर वह ऐसा नहीं कर रहीं। उसके पीछे भी कोई कारण होगा, कोई सोच होगी। वह सब कुछ अपने राष्ट्र के हित में ही कर रही हैं। यही समानता मुझे यहां भारत में कांग्रेस पार्टी में दिख रही है। ब्रिटेन में राजकुमार चाल्र्स बड़े धैर्य से प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनके चेहरे पर इस बात का कोई रोष या चिन्ता नजर नहीं आती। न ही वह किसी प्रकार का कोई ऐसा आभास देते हैं जैसा राहुल कर रहे हैं।

बेटा: पर पिताजी, कौन माता-पिता अपनी आंखों के सामने ही अपने बेटे की ताजपोशी नहीं देखना चाहते?

पिता:      बेटा, बहुत ही कम राज परिवार ऐसे हुये हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में ही अपने युवराज की स्वयं ताजपोशी कर दी हो। पर कांग्रेस में शायद यह भी हो जाये।

बेटा:       पर पिताजी, कांग्रेस संगठन को सत्ता-परिवर्तन की आवश्यकता क्या है?

पिता:      यह तो हमारे कांग्रेसी भाई ही जाने पर इतना अवश्य माना जाता है कि बदलाव सदा स्वागत योग्य होता है।

बेटा:       पिताजी, अज्ञातवास के बाद तो अब राहुल गांधी बहुत ही आक्रमणकारी हो गये हैं। वह तो रोज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ताबड़तोड़ हमले बोलते जा रहे हैं।

पिता:      बेटा कांग्रेस को इसका कोई फायदा तो अभी तक होता नजर नहीं आता। बिहार के विधान परिषद व मध्य प्रदेश व राजस्थान के नगर निकाय चुनाव में तो कांगे्रस को इन आक्रमणों से हार का मुंह ही देखना पड़ा।

बेटा:       अब तो सोनियाजी के भी तेवर सख्त हो गये हैं। उन्होंने भी कमान सीधे अपने हाथ में ले ली है। वह भी अब अपनी बात दूसरों से न बुलवाकर वाणी के तीर स्वयं साध रहीं हैं। अब तो ऐसा लग रहा है कि उनकी बढ़ती उम्र उनकी राजनीति को कमजोर नहीं कर रही है।

पिता:      यह तो है।

बेटा:       आखिर पिताजी, राहुल के पास युवा का उबलता हुआ खून है। कुछ कर बैठने का जुनून है।

पिता:      और सोनियाजी के पास तो इतना लम्बा अनुभव है। 125 वर्ष से अधिक कांग्रेस के इतने लंबे इतिहास में इतने लंबे समय तक लगातार कोई एक व्यक्ति, विशेषकर कोई महिला कांग्रेस अध्यक्ष नहीं रही। यह सौभाग्य व गौरव तो न पंडित नेहरू, न उनकी सास इंदिराजी और न उनके पति राजीवजी प्राप्त कर सके।

बेटा:       साथ ही यह भी ठीक है कि अब तक के चुनावों में कांग्रेस की इतनी बड़ी हार भी कभी नहीं हुई जितनी कि राहुल के युवा व सोनियाजी के इतने लंबे अनुभव के अन्तर्गत हुई।

पिता:      मुझे तो लगता है कि कांग्रेस की यह बुरी हार इस दोहरे नेतृत्व के कारण हुई। चुनाव तो एक संग्राम होता है इसकी बागडोर एक हाथ में होनी चाहिये।

बेटा:       मुझे तो लगता है कि सोनियाजी भी सचिन की तरह राजनीति में इतनी लंबी पारी खेलना चाहती हैं कि लिटिल मास्टर की तरह उनके रिकॉर्ड भी कोई तोड़ न सके।

पिता:      तेरी इस बात में दम लगता है। वह प्रधानमंत्री न बन पाईं तो इतिहास में यही मील का पत्थर सही।

बेटा:       फिर यह भी तो एक मील का पत्थर ही है कि नेहरू-गांधी परिवार ने इतने लंबे समय तक आजादी की लड़ाई नहीं लड़ी जितने लंबे समय तक वह प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सत्ता का सुख प्राप्त कर सके हैं।

पिता:      जो भी हो बेटा, सोनियाजी राहुल को प्रधानमंत्री अवश्य देखना चाहती हैं। उम्मीद पर ही तो दुनिया खड़ी है। एक यह उम्मीद ही सही। विफलताओं की बाढ़ में उम्मीद के तिनके के सहारे परिवार।

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